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हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

०८ हितोपदेशः [ प्रस्ताविका ३३-
और जैसे एक पहियेसे रथ नहीं चलता है वैसेही उद्योगके विना प्रारब्ध
नहीं खुलती है ॥ ३२ ॥
तथा च,―
पूर्वजन्मकृतं कर्म तद्दैवमिति कथ्यते ।
तस्मात्पुरुषकारेण यत्नं कुर्यादतन्द्रितः ॥ ३३ ॥
और पूर्व जन्ममें कियेहुए कामहीको प्रारब्ध कहते हैं, इसलिये मनुष्यको
आलस्य छोड़कर पुरुषार्थ करना चाहिये ॥ ३३ ॥
यथा मृत्पिण्डतः कर्ता कुरुते यद्यदिच्छति ।
एवमात्मकृतं कर्म मानवः प्रतिपद्यते ॥ ३४ ॥
जैसे कुम्हार मट्टीके लोंदेसे जो चाहता है सो बनाता है, उसी तरह
मनुष्य भी अपना किया हुआ कर्म पाता है ॥ ३४ ॥
काकतालीयवत् प्राप्तं दृष्ट्वापि निधिमग्रतः ।
न स्वयं दैवमादत्ते पुरुषार्थमपेक्षते ॥ ३५ ॥
काकतालीय न्यायके समान अर्थात् अनायास इकट्ठे धनको सामने देखकर
भी स्वयं भाग्य ग्रहण नहीं करता है, किंतु कुछ पुरुषार्थकी अपेक्षा होती है ॥३५॥
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥ ३६ ॥
उद्योगसे कार्य सिद्ध होते हैं, मनोरथोंसे नहीं, जैसे सोते हुए सिंहके मुखमें
मृग अपने आप नहीं घुसते हैं ॥ ३६ ॥
मातृपितृकृताभ्यासो गुणितामेति बालकः ।
न गर्भच्युतिमात्रेण पुत्रो भवति पण्डितः ॥ ३७ ॥
माता-पितासे अभ्यास कराया गया बालक गुणवान् होता है, गर्भसे
निकलतेही पुत्र पण्डित नहीं होता ॥ ३७ ॥
माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः ।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ॥ ३८ ॥
जिन माता-पिताने अपने बालकको नहीं पढ़ाया है, वे उसके वैरी हैं और
वह बालक सभामें, हंसोंमें बगुलेकी तरह शोभा नहीं देता है ॥ ३८ ॥

-४२ ] सुदर्शनराजाको विष्णुशर्माका आश्वासन ९
रूपयौवनसंपन्ना विशालकुलसंभवाः ।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः ॥ ३९ ॥
सौन्दर्य तथा यौवनसे युक्त और बड़े कुलमें उत्पन्न हुए मनुष्य विद्याहीन
होनेसे सुगन्धरहित टेसूके पुष्पोंके समान शोभा नहीं पाते हैं ॥ ३९ ॥
मूर्खोऽपि शोभते तावत् सभायां वस्त्रवेष्टितः ।
तावच्च शोभते मूर्खो यावत्किञ्चिन्न भाषते' ॥ ४० ॥
सुन्दर कपड़े पहिना हुआ मूर्ख भी सभामें तभीतक अच्छा लगता है कि
जबतक वह कुछ न बोले' ॥ ४० ॥
एतच्चिन्तयित्वा स राजा पण्डितसभां कारितवान् । राजो-
वाच—'भो भोः पण्डिताः ! श्रूयताम् । अस्ति कश्चिदेवंभूतो विद्वान्
यो मम पुत्राणां नित्यमुन्मार्गगामिनामनधिगतशास्त्राणामिदानीं
नीतिशास्त्रोपदेशेन पुनर्जन्म कारयितुं समर्थः ?
यह सोच विचार कर उस राजाने पण्डितोंकी सभा कराई; (और) राजा
बोला-'हे पण्डितमहाशयो ! सुनिये. (इस सभामें) कोई ऐसाभी पण्डित है
जो मेरे नित्य कुमार्गी तथा शास्त्रको नहीं पढ़े हुए बेटोंका अब नीतिशास्त्रके
उपदेशसे नया जन्म करानेको समर्थ हो ?
यतः,—
काचः काञ्चनसंसर्गाद्धत्ते मारकतीं द्युतिम् ।
तथा सत्संनिधानेन मूर्खो याति प्रवीणताम् ॥ ४१ ॥
क्योंकि—सुवर्णके संग होनेसे जैसे कांचकी मरकतमणिकी-सी शोभा हो
जाती है, वैसेही अच्छे संगसे मूर्खभी चतुर हो जाता है ॥ ४१ ॥
उक्तं च,—
हीयते हि मतिस्तात ! हीनैः सह समागमात् ।
समैश्च समतामेति विशिष्टैश्च विशिष्टताम्' ॥ ४२ ॥
और कहा है कि-नीचोंके साथ रहनेसे बुद्धि घट जाती है, समान पुरुषोंके साथ
रहनेसे समान रहती है और अधिक बुद्धिमानोंके साथ रहनेसे बढ़ जाती है' ४२
अत्रान्तरे विष्णुशर्मनामा महापण्डितः सकलनीतिशास्त्र-

१० हितोपदेशः [ प्रस्ताविका ४३-
तत्त्वज्ञो बृहस्पतिरिवाब्रवीत्—'देव ! महाकुलसंभूता एते
राजपुत्राः । तन्मया नीतिं ग्राहयितुं शक्यन्ते ।
उस समय सम्पूर्ण नीतिशास्त्रके सारको जाननेवाले, बृहस्पतिजीके समान एक
बड़े धुरंधर पण्डित विष्णुशर्माजी बोले-'महाराज ! ये बड़े सत्कुलमें उत्पन्न हुए
राजपुत्र हैं, इसलिये मैं इनको नीति सिखा सकता हूं, क्योंकि,—
यतः,—
नाद्रव्ये निहिता काचित्क्रिया फलवती भवेत् ।
न व्यापारशतेनापि शुकवत् पाठ्यते बकः ॥ ४३ ॥
क्योंकि, अयोग्य वस्तुमें किया हुआ परिश्रम सफल नहीं होता है, जैसे अनेक
उपाय करने परभी तोतेके समान बगुला नहीं पढ़ाया जा सकता है ॥ ४३ ॥
अन्यच्च,—
अस्मिंस्तु निर्गुणं गोत्रे नापत्यमुपजायते ।
आकरे पद्मरागाणां जन्म काचमणेः कुतः ? ॥ ४४ ॥
और दूसरे—इस राजकुलमें गुणहीन सन्तान उत्पन्न नहीं होसकती है, जैसे
पद्मरागमणियोंकी खानमें काचमणिका जन्म कैसा होसकता है ? ॥ ४४ ॥
अतोऽहं षण्मासाभ्यन्तरे तव पुत्रान्नीतिशास्त्राभिज्ञान्करिष्यामि' ।
राजा सविनयं पुनरुवाच—
इसलिये मैं छः महीनोंके भीतर आपके पुत्रोंको नीतिशास्त्रमें निपुण कर
दूंगा'. राजा फिर विनयसे बोला,—
'कीटोऽपि सुमनःसङ्गादारोहति सतां शिरः ।
अश्मापि याति देवत्वं महद्भिः सुप्रतिष्ठितः ॥ ४५ ॥
'कीड़ाभी पुष्पोंके संगसे सज्जनके शिरपर पहुंच जाता है और बड़े मनुष्योंसे
स्थापन किया हुआ पाषाणभी देवता मान कर पूजा जाता है ॥ ४५ ॥
अन्यच्च,—
यथोदयगिरेर्द्रव्यं संनिकर्षेण दीप्यते ।
तथा सत्संनिधानेन हीनवर्णोऽपि दीप्यते ॥ ४६ ॥
और दूसरे—जैसे उदयाचलकी वस्तु सूर्यकी किरणोंके गिरनेसे चमकती है
उसी तरह सज्जनोंके पास रहनेसे मूर्ख भी शोभायमान लगता है ॥ ४६ ॥

·४७ ] राजपुत्रोंको सौंप देना ११
गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति
ते निर्गुणं प्राप्य भवन्ति दोषाः ।
आस्वाद्यतोयाः प्रभवन्ति नद्यः
समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः ॥ ४७ ॥
गुण, बुद्धिमानोंमें मिल जानेसे गुण हो जाते हैं और मूर्खोंमें मिल जानेसे वेही
गुण दोष बन जाते हैं. जैसे मीठे जलवाली नदियां समुद्रसे मिलकर खारी
बन जाती हैं ॥ ४७ ॥
तदेतेषामस्मत्पुत्राणां नीतिशास्त्रोपदेशाय भवन्तः प्रमाणम् ।'
इत्युक्त्वा तस्य विष्णुशर्मणो बहुमानपुरःसरं पुत्रान्समर्पितवान् ॥
इसलिये इन मेरे पुत्रोंको नीतिशास्त्रके उपदेश करनेके लिये आप सब प्रका-
रसे समर्थ हैं'—यह कहकर बडे आदरसत्कारसे विष्णुशर्माजीको पुत्र सौंप दिये.
इति प्रस्ताविका ।

‘काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् ।

हितोपदेशः
•
मित्रलाभः
अथ प्रासादपृष्ठे सुखोपविष्टानां राजपुत्राणां पुरस्तात्प्रस्ताव-
क्रमेण स पण्डितोऽब्रवीत्—
फिर राजभवनके ऊपर आनन्दसे बैठे हुए, राजकुमारोंके सामने प्रसंगकी
रीतिसे पंडितजी यों बोले—
‘काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् ।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा’ ॥ १ ॥
‘काव्यशास्त्रके विनोदसे बुद्धिमानोंका और द्यूत आदि दुर्व्यसन, नींद अथवा
कलहसे मूर्खोंका समय कटता है ॥ १ ॥
‘तद्भवतां विनोदाय काककूर्मादीनां विचित्रां कथां कथयामि ?’
राजपुत्रैरुक्तम्—‘आर्य ! कथ्यताम् ।’ विष्णुशर्मोवाच—‘शृणुत;
संप्रति मित्रलाभः प्रस्तूयते । यस्यायमाद्यः श्लोकः—
इसलिये आपकी प्रसन्नताके लिये काग, कछुआ आदिकी विचित्र कथा
कहताहूं’ । राजपुत्र बोले—‘हे गुरुजी ! कहिये’ । विष्णुशर्मा बोले—‘सुनिये मैं
अब मित्रलाभ कहता हूं कि जिसका प्रथम वाक्य यह है—
असाधना वित्तहीना बुद्धिमन्तः सुहृत्तमाः ।
साधयन्त्याशु कार्याणि काककूर्ममृगाखुवत्’ ॥ २ ॥
अस्त्र शस्त्र आदि उपायरहित, तथा धनहीन किन्तु बुद्धिमान् और आपसमें
बड़े परम मित्र ( साथी ) काक, कूर्म, मृग और चूहेके समान शीघ्र कार्योंको
सिद्ध कर लेते हैं’ ॥ २ ॥
राजपुत्रा ऊचुः—‘कथमेतत् ?’। विष्णुशर्मा कथयति,—
राजपुत्र बोले—‘यह कहानी कैसी है ?’ । विष्णुशर्मा कहने लगे—
कथा १
[ काग, कछुआ, मृग और चूहेकी कहानी १ ]
‘अस्ति गोदावरीतीरे विशालः शाल्मलीतरुः । तत्र नानादिग्दे-

[ मित्रलाभः १-५ ] व्याधका जाल फैलाकर चुप बैठना १३
शादागत्य रात्रौ पक्षिणो निवसन्ति । अथ कदाचिदवसन्नायां
रात्रावस्ताचलचूडावलम्बिनि भगवति कुमुदिनीनायके चन्द्रमसि
लघुपतनकनामा वायसः प्रबुद्धः कृतान्तमिव द्वितीयमायान्तं
व्याधमपश्यत् । तमवलोक्याचिन्तयत्—'अद्य प्रातरेवानिष्टदर्शनं
जातम् , न जाने किमनभिमतं दर्शयिष्यति ।' इत्युक्त्वा तदनु-
सरणक्रमेण व्याकुलश्चलितः ।
'गोदावरीके तीरपर एक बड़ा सैमरका पेड़ है । वहां अनेक दिशाओंके
देशोंसे आकर रातमें पक्षी बसेरा करते हैं । एक दिन जब थोड़ी रात रह गई
और भगवान् कुमुदिनीके नायक चन्द्रमाने अस्ताचलकी चोटीकी शरण ली तब
लघुपतनक नामक काग जगा और सामनेसे दूसरे यमराजके समान एक
बहेलिएको आते हुए देखा; उसको देखकर सोचने लगा-कि 'आज प्रातःकालही
बुरेका मुख देखा है । मैं नहीं जानता हूं कि क्या बुराई दिखावेगा ।' यह
कहकर उसके पीछे पीछे घबराकर चल पड़ा ।
यतः,—
शोकस्थानसहस्राणि भयस्थानशतानि च ।
दिवसे दिवसे मूढमाविशन्ति न पण्डितम् ॥ ३ ॥
क्योंकि—सहस्रों शोककी और सैकड़ों भयकी बातें मूर्ख पुरुषको दिन पर
दिन दुःख देती हैं और पण्डितको नहीं ॥ ३ ॥
अन्यच्च, विषयिणामिदमवश्यं कर्तव्यम्,—
और दूसरे-संसारके धंधोंमें लगे हुए मनुष्योंको यह अवश्य करना
चाहिये कि—
उत्थायोत्थाय बोद्धव्यं महद्भयमुपस्थितम् ।
मरणव्याधिशोकानां किमद्य निपतिष्यति ॥ ४ ॥
नित्य उठतेही बड़ा भय आया ( आनेका संभव है ) ऐसा समझ लेना
चाहिये, क्योंकि मरण आपत्ति और शोक, इनमेंसे न जाने कौनसा भी आ
पड़े ॥ ४ ॥
अथ तेन व्याधेन तण्डुलकणान्विकीर्य जालं विस्तीर्णम् । स
च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः । तस्मिन्नेव काले चित्रग्रीवनामा कपो-
तराजः सपरिवारो वियति विसर्पंस्तांस्तण्डुलकणानवलोक्या-

१४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ६-

मास। ततः कपोतराजस्तण्डुलकणलुब्धान् कपोतान्प्रत्याह—
'कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां संभवः? तन्निरूप्यतां
तावत्। भद्रमिदं न पश्यामि। प्रायेणानेन तण्डुलकणलोभेना-
स्माभिरपि तथा भवितव्यम्,—
फिर इस व्याधने चावलोंकी कनकीको बखेर कर जाल फैलाया और आप
वहां छुप कर बैठ गया। उसी कालमें परिवारसहित आकाशमें उड़ते हुए चित्रग्रीव
नामक कबूतरोंके राजाने चावलोंकी कनकीको देखा. फिर कपोतराज चावलके
लोभी कबूतरोंसे बोला—'इस निर्जन वनमें चावलकी कनकी कहांसे आई ? पहले
इसका निश्चय करो. मैं इसको कल्याणकारी नहीं देखता हूं, अवश्य इन
चावलोंकी कनकीके लोभसे हमारीभी वैसी ही गति हो सकती जैसी कि—
कङ्कणस्य तु लोभेन मग्नः पङ्के सुदुस्तरे।
वृद्धव्याघ्रेण संप्राप्तः पथिकः स मृतो यथा' ॥ ५॥
कंगनके लोभसे गाढ़ी गाढ़ी कीचडमें फँसे हुए एक बटोहीको, बूढे बाघने
पकड़ कर मार डाला' ॥ ५ ॥
कपोता ऊचुः—'कथमेतत् ?'। सोऽब्रवीत्—
कबूतर बोले—'यह कथा कैसे है ?'—वह कहने लगा.
कथा २
[ सुवर्णकंकणधारी बूढ़ा बाघ और मुसाफिरकी कहानी २ ]
'अहमेकदा दक्षिणारण्ये चरन्नपश्यम् । एको वृद्धव्याघ्रः स्नातः
कुशहस्तः सरस्तीरे ब्रूते —'भो भोः पान्थाः ! इदं सुवर्णकङ्कणं गृह्य-
ताम् ।' ततो लोभाकृष्टेन केनचित्पान्थेनालोचितम्—भाग्येनैत-
त्संभवति । किंतुत्वस्मिन्नात्मसंदेहे प्रवृत्तिर्न विधेया ।
'एक समय मैंने दक्षिणके वनमें चलते हुए देखा कि एक बूढ़ा बाघ नहा
धोकर कुशा हाथमें लिये सरोवरके किनारे पर ( बैठा हुआ ) बोला—'ओ
बटोहियो ! यह सुवर्णका कंगन लो'. तब लोभके मारे किसी बटोहीने जीमें
विचारा कि—'यह बात भाग्यसे होती है, परंतु इस आत्माके संदेहमें ( अर्थात
कहीं मर तो न जाऊं ? इस सोचमें ) प्रवृत्ति नहीं करनी चाहिये ।

-७ ] बूढा बाघ और मुसाफिरकी कहानी २ १५

-७ ] बूढा बाघ और मुसाफिरकी कहानी २ १५
यतः—
अनिष्टादिष्टलाभेऽपि न गतिर्जायते शुभां ।
यत्रास्ते विषसंसर्गोऽमृतं तदपि मृत्यवे ॥ ६ ॥
क्योंकि—दुर्जनसे मनोरथ पूरा भी हो जाय परन्तु परिणाम अच्छा नहीं
होता है; जैसे अमृतमें विषके मिलनेसे वह अमृत भी मार डालता है ॥ ६ ॥
किंतु सर्वत्रार्थार्जने प्रवृत्तिः संदेह एव ।
परन्तु सर्वदा धनके उत्पन्न करनेमें तो संदेह होताही है ।
तथा चोक्तम्—
न संशयमनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति ।
संशयं पुनरारुह्य यदि जीवति पश्यति ॥ ७ ॥
जैसा कहा है—मनुष्य सन्देहोंमें पडे विना कल्याण नहीं देखता है; परन्तु
सन्देहोंमें पड़कर जो जीता रहता है वही देखता है ॥ ७ ॥
तन्निरूपयामि तावत् ।' प्रकाशं ब्रूते—'कुत्र तव कङ्कणम् ?'
व्याघ्रो हस्तं प्रसार्य दर्शयति । पान्थोऽवदत्—'कथं मारात्मके
त्वयि विश्वासः ?'। व्याघ्र उवाच—'शृणु रे पान्थ ! प्रागेव यौवन-
दशायामतिदुर्वृत्त आसम् । अनेकगोमानुषाणां वधान्मे पुत्रा
मृता दाराश्च । वंशहीनश्चाहम् । ततः केनचिद्धार्मिकेणाहमादिष्टः—
“दानधर्मादिकं चरतु भवान् ।” तदुपदेशादिदानीमहं स्नानशीलो
दाता वृद्धो गलितनखदन्तो कथं न विश्वासभूमिः ?
इसलिये प्रथम इस बातका निश्चय करूं'. प्रकट बोला—'अरे ! तेरा कंगन
कहां है ?' बाघने हाथ पसार कर दिखा दिया. बटोहीने कहा—'मैं तुझ हिंसकमें
कैसे विश्वास करूं ?' बाघ बोला—'सुनरे बटोही ! पहले मैं युवावस्थामें बड़ा दुरा-
चारी था, अनेक गौओं और मनुष्योंके मारनेसे मेरे स्त्री-पुत्र मर गये. और मैं
वंशहीन होगया. तब किसी धर्मात्माने मुझे उपदेश किया कि—“आप दान, धर्म
आदि करिये”. उसके उपदेशसे अब मैं स्नान करता हूं, दानी तथा वृद्ध हूं,
नख और दांत भी मेरे गल गये हैं, मैं विश्वासके योग्य क्यों नहीं हूं ?

१६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ८-
यतः,—
इज्याऽध्ययनदानानि तपः सत्यं धृतिः क्षमा ।
अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ॥ ८ ॥
क्योंकि—यज्ञ करना, वेद पढ़ना, दान देना, तप करना, सत्य बोलना, धीरज
धरना, क्षमाशील होना और लोभ न करना, ये आठ धर्मके मार्ग हैं ॥ ८ ॥
तत्र पूर्वश्चतुर्वर्गो दम्भार्थमपि सेव्यते ।
उत्तरस्तु चतुर्वर्गो महात्मन्येव तिष्ठति ॥ ९ ॥
इनमेंसे पहले चार तो पाखंड रचनेके ( बाहरी दिखावेके ) लिये भी होते हैं
परन्तु पिछले चार केवल महात्मामेंही होते हैं ॥ ९ ॥
मम चैतावांल्लोभविरहो येन स्वहस्तस्थमपि सुवर्णकङ्कणं यस्मै
कस्मैचिद्दातुमिच्छामि । तथापि ‘व्याघ्रो मानुषं खादति’ इति
लोकप्रवादो दुर्निवारः ।
मुझे यहां तक लोभ नहीं है कि अपने हाथका कंगनभी किसीको देना
चाहता हूं, परन्तु ‘बाघ मनुष्यको खा जाता है’ यह लोकनिन्दा नहीं मिट सकती है।
यतः,—
गतानुगतिको लोकः कुट्टनीमुपदेशिनीम् ।
प्रमाणयति नो धर्मे यथा गोघ्नमपि द्विजम् ॥ १० ॥
क्योंकि—अपनी पुरानी लीकपर चलने वाला संसार धर्मके विषयमें कुट्टनीके
उपदेशका ऐसा प्रमाण नहीं करता है कि जैसा गो-हिंसक ब्राह्मणका धर्ममें
प्रमाण ( विश्वास ) करता है ॥ १० ॥
मया च धर्मशास्त्राण्यधीतानि । शृणु,—
और मैंने धर्मशास्त्र भी पढ़े हैं, सुन ऐसा कहा है कि—
मरुस्थल्यां यथा वृष्टिः क्षुधार्ते भोजनं तथा ।
दरिद्रे दीयते दानं सफलं पाण्डुनन्दन ! ॥ ११ ॥
हे युधिष्ठिर ! जैसे मारवाड़देशमें वृष्टिका होना और भूखेको भोजन देना
लाभदायक है, उसी प्रकार दरिद्रको दान देना लाभदायक होता है ॥ ११ ॥
प्राणा यथात्मनोऽभीष्टा भूतानामपि ते तथा ।
आत्मौपम्येन भूतेषु दयां कुर्वन्ति साधवः ॥ १२ ॥
जिस प्रकार अपने प्राण प्यारे हैं, वैसेही अन्य प्राणियोंकोभी अपने अपने

-१६ ] मुसाफिरके समक्ष बाघकी निजी क्रिया १७
प्राण प्यारे हैं, इसलिये साधुजन अपने प्राणोंके समान दूसरोंपर भी दया
करते हैं ॥ १२ ॥
अपरं च,—
प्रत्याख्याने च दाने च सुखदुःखे प्रियाप्रिये ।
आत्मौपम्येन पुरुषः प्रमाणमधिगच्छति ॥ १३ ॥
और दूसरी यह बात है-प्रार्थनाका स्वीकार, दान, सुख तथा दुःख,
शुभ और अशुभमें, पुरुष अपनी आत्माके समान प्रमाण करता है ॥ १३ ॥
अन्यच्च,—
मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत् ।
आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ॥ १४ ॥
और दूसरे—जो पराई स्त्रीको माताके समान, पराये धनको कंकड़के समान,
और सब प्राणियोंको अपनी आत्माके समान समझता है, वही सच्चा पण्डित है॥
त्वं चातीव दुर्गतस्तेन तत्तुभ्यं दातुं सयत्नोऽहम् । तथा
चोक्तम्—
तू अत्यंत निर्धन है इसलिये मैं तुझे देनेको यत्नशील हूं; जैसा कहा है—
दरिद्रान्भर कौन्तेय ! मा प्रयच्छेश्वरे धनम् ।
व्याधितस्यौषधं पथ्यं, नीरुजस्य किमौषधैः ? ॥ १५ ॥
हे युधिष्ठिर ! दरिद्रियोंका पालन और पोषण कर तथा धनवानको धन मत
दे, क्यों कि, रोगीको औषध गुणदायक होती है और नीरोगको औषधियाँ
वृथा हैं ॥ १५ ॥
अन्यच्च,—
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं विदुः ॥ १६ ॥
और-‘यह देना है’ इस निःस्पृह बुद्धिसे जो दान अनुपकारीको देश काल
और सुपात्र विचार कर दिया जाता है वह दान सात्त्विक कहलाता है ॥ १६ ॥
१ जिसके साथ प्रत्युपकार या कोई अन्य तरह स्वार्थका संबंध न हो ऐसे पुरुषको.
हि० २

१८ हितोपदेशः [ मित्रलाभः १७-
तदत्र सरसि स्नात्वा सुवर्णकङ्कणं गृहाण।' ततो यावदसौ तद्वचः-
प्रतीतो लोभात्सरः स्नातुं प्रविशति तावन्महापङ्के निमग्नः पला-
यितुमक्षमः । पङ्के पतितं दृष्ट्वा व्याघ्रोऽवदत्—'अहह, महापङ्के
पतितोऽसि । अतस्त्वामहमुत्थापयामि।' इत्युक्त्वा शनैः शनै-
रुपगम्य तेन व्याघ्रेण धृतः; स पान्थोऽचिन्तयत्—
इसलिये इस सरोवरमें नहाकर सोनेका कंगन ले। तब वह उसकी मीठी २
बातें सुन लोभवश होकर जैसेही सरोवरमें स्नान करनेके लिये उतरा वैसेही घनी
कीचड़में फँस गया और भाग न सका। उसको कीचड़में फँसा देखकर व्याघ्रने
कहा—'ओहो ! तू बड़ी भारी कीचड़में फँस गया है, इसलिये मैं तुझे बाहर
निकालता हूं. यह कह कर और धीरे धीरे पास जाकर उस बाघने उसे पकड़
लिया, तब वह बटोही सोचने लगा—
'न धर्मशास्त्रं पठतीति कारणं
, न चापि वेदाध्ययनं दुरात्मनः ।
स्वभाव एवात्र तथातिरिच्यते
यथा प्रकृत्या मधुरं गवां पयः ॥ १७ ॥
'जो दुष्ट है उसे धर्मशास्त्र और वेद पढ़नेसे क्या होता है ? क्योंकि, स्वभाव ही
सबसे प्रबल होता है, जैसे गौका दूध स्वभावसेही मीठा होता है' ॥ १७ ॥
किंच,—
अवशेन्द्रियचित्तानां हस्तिस्नानमिव क्रिया ।
दुर्भागाभरणप्रायो ज्ञानं भारः क्रियां विना ॥ १८ ॥
और जिनकी इन्द्रियां और चित्त वशमें नहीं है उनका व्यापार हाथीके
स्नानके समान निष्फल है, और इसी प्रकार क्रियाके विना ज्ञान, वंध्या स्त्रियोंके
पालन-पोषणके समान भार अर्थात् निष्फल है ॥ १८ ॥
१ वस्तुतः 'गजवत् स्नानमाचरेत्' यह उक्ति केवल स्नानकी रीत बता देती है,
क्योंकि, हाथी नहानेके बाद तुरंतही शूंड़से अपने शरीरके ऊपर धूल फेंकता है, जिस
वजहसे उसका स्नान निष्फलही है. २ विधवा स्त्रियोंके गहने पहननेके समान निष्फल
है ऐसा अर्थ भी हो सकता है, अर्थात् जैसा कि संतति उत्पत्तिकी आशा न होनेसे
वंध्याका पालन-पोषण भार है वैसेही बिना पतिके विधवाको अलंकार भार है.

-२१] लोभी मुसाफिरकी मृत्यु १९
तन्मया भद्रं न कृतं यदत्र मारात्मके विश्वासः कृतः । तथा
ह्युक्तम्—
इसलिये मैंने अच्छा नहीं किया जो इस हिंसकमें विश्वास किया, जैसा
कहा है—
नदीनां शस्त्रपाणीनां नखिनां शृङ्गिणां तथा ।
विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च ॥ १९ ॥
नदियोंका, हाथमें शस्त्रधारण करने वालोंका, नख और सींग वाले प्राणि-
योंका, स्त्रियोंका तथा राजाके कुलका विश्वास कभी न करना चाहिए ॥ १९ ॥
अपरं च,—
सर्वस्य हि परीक्ष्यन्ते स्वभावा नेतरे गुणाः ।
अतीत्य हि गुणान्सर्वान्स्वभावो मूर्ध्नि वर्तते ॥ २० ॥
और दूसरे—मनुष्यको सबके स्वभावकी परीक्षा करनी चाहिए न कि अन्य
गुणोंकी; क्योंकि सब गुणोंको छोड़कर स्वभावही सबसे श्रेष्ठ है ॥ २० ॥
अन्यच्च,—
स हि गगनविहारी कल्मषध्वंसकारी
दशशतकरधारी ज्योतिषां मध्यचारी ।
विधुरपि विधियोगाद्ग्रस्यते राहुणासौ
लिखितमपि ललाटे प्रोज्झितुं कः समर्थः ?' ॥ २१ ॥
और चन्द्रमा जो आकाशमें विचरता है, अंधकारको दूर करता है, सहस्र
किरणोंको धारण करता है, और नक्षत्रोंमें बीचमें चलता है उस चन्द्रमाको भी
भाग्यसे राहु ग्रस लेता है, इसलिये जो कुछ भाग्य ( ललाट ) में विधाताने
लिख दिया है उसे कौन मिटा सकता है ?' ॥ २१ ॥
इति चिन्तयन्नेवासौ व्याघ्रेण व्यापादितः खादितश्च । अतोऽहं
ब्रवीमि—"कङ्कणस्य तु लोभेन" इत्यादि । अतः सर्वथाऽविचा-
रितं कर्म न कर्तव्यम् ।
यह बात वह सोचही रहा था जब उसको बाघने मार डाला और खा गया ।
इसीसे मैं कहता हूं कि, "कंगनके लोभसे" इत्यादि. इसलिये विना विचारे काम
कभी नहीं करना चाहिये—

२० हितोपदेशः [ मित्रलाभः २२-
यतः,—
'सुजीर्णमन्नं सुविचक्षणः सुतः
सुशासिता स्त्री नृपतिः सुसेवितः ।
सुचिन्त्य चोक्तं सुविचार्य यत्कृतं
सुदीर्घकालेऽपि न याति विक्रियाम्' ॥ २२ ॥
क्योंकि-'अच्छी रीतिसे पका हुआ भोजन, विद्यावान् पुत्र, सुशिक्षित अर्थात्
आज्ञाकारिणी स्त्री, अच्छे प्रकारसे सेवा किया हुआ राजा, सोच कर कहा हुआ वचन,
और विचार कर किया हुआ काम ये बहुत काल तकभी नहीं बिगड़ते हैं' ॥२२॥
एतद्वचनं श्रुत्वा कश्चित्कपोतः सदर्पमाह—'आः, किमेवमुच्यते ?
यह सुनकर एक कबूतर घमंडसे बोला, 'अजी ! तुम क्या कहते हो ?
वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते ।
सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् ॥ २३ ॥
जब आपत्काल आवे तब वृद्धोंकी बात माननी चाहिये; परन्तु उस तरह सब
जगह माननेसे तो भोजन भी न मिले ॥ २३ ॥
यतः,—
शङ्काभिः सर्वमाक्रान्तमन्नं पानं च भूतले ।
प्रवृत्तिः कुत्र कर्तव्या जीवितव्यं कथं नु वा ? ॥ २४ ॥
क्योंकि-इस पृथ्वीतल पर अन्न और पान (इत्यादि सब ) सन्देहोंसे भरा है,
किस वस्तुमें खाने-पीनेकी इच्छा करे अथवा कैसे जिए ? ॥ २४ ॥
ईर्ष्या घृणी त्वसंतुष्टः क्रोधनो नित्यशङ्कितः ।
परभाग्योपजीवी च षडेते दुःखभागिनः' ॥ २५ ॥
ईर्षा करने वाला, घृणा करने वाला, असंतोषी, क्रोधी, सदा संदेह करने वाला
और पराये आसरे जीने वाला ये छः प्रकारके मनुष्य हमेशा दुःखी होते हैं' ॥
एतच्छ्रुत्वा सर्वे कपोतास्तत्रोपविष्टाः ।
यह सुन कर-सब कबूतर ( बहेलियेने चावलके कण जहां छीटे थे ) वहां
बैठ गये ।
यतः,—
सुमहन्त्यपि शास्त्राणि धारयन्तो बहुश्रुताः ।
छेत्तारः संशयानां च क्लिश्यन्ते लोभमोहिताः ॥ २६ ॥

  • २९ ] चित्रग्रीवका कबूतरोंको आश्वासन २१
    क्योंकि-अच्छे बड़े बड़े शास्त्रोंको पढ़ने तथा सुनने वाले और संदेहोंको दूर
    करने वाले (पंडित) भी लोभके वश हो कर दुःख भोगते हैं ॥ २६ ॥
    अन्यच्च,-
    लोभात्क्रोधः प्रभवति लोभात्कामः प्रजायते ।
    लोभान्मोहश्च नाशश्च लोभः पापस्य कारणम् ॥ २७ ॥
    और दूसरे-लोभसे क्रोध उत्पन्न होता है, लोभसे विषयभोगकी इच्छा होती है
    और लोभसे मोह और नाश होता है, इसलिये लोभी पापकी जड है ॥ २७ ॥
    अन्यच्च,-
    असंभवं हेममृगस्य जन्म
    तथापि रामो लुलुभे मृगाय ।
    प्रायः समापन्नविपत्तिकाले
    धियोऽपि पुंसां मलिना भवन्ति ॥ २८ ॥
    और देखो, सोनेके मृगका होना असंभव है, तो भी रामचन्द्रजी सोनेके
    मृगके पीछे लुभा गये, इसलिये विपत्तिकाल आने पर महापुरुषोंकी बुद्धियाँ भी
    बहुधा मलिन हो जाती हैं ! ॥ २८ ॥
    अनन्तरं सर्वे जालेन बद्धा बभूवुः । ततो यस्य वचतात्तत्रावल-
    म्बितास्तं सर्वे तिरस्कुर्व्वन्ति ।
    इसके पीछे सबकेसब जालमें बँध गये । फिर जिसके वचनसे वहां उतरे थे
    उसका सब तिरस्कार करने लगे;
    यतः,-
    न गणस्याग्रतो गच्छेद्सिद्धे कार्ये समं फलम् ।
    यदि कार्यविपत्तिः स्यान्मुखरस्तत्र हन्यते' ॥ २९ ॥
    जैसे कि कहा है-समूहके आगे मुखिया होकर न जाना चाहिये, क्योंकि काम
    सिद्ध होनेसे फल सबको बराबर (प्राप्त) होता है, और जो काम बिगड़ जाय तो
    मुखियाही मारा जाता है' ॥ २९ ॥
    तस्य तिरस्कारं श्रुत्वा चित्रग्रीव उवाच - 'नायमस्य दोषः ।
    उसकी निन्दा सुन कर चित्रग्रीव बोला-'इसका कुछ दोष नहीं है;

२२ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ३०-
यतः,—
आपदामापतन्तीनां हितोऽप्यायाति हेतुताम् ।
मातृजंघा हि वत्सस्य स्तम्भीभवति बन्धने ॥ ३० ॥
क्योंकि-हितकारक पदार्थ भी आने वाली आपत्तियोंका कारण हो जाता है, जैसे
गोदोहनके समय माताकी जांघ बछड़ेके बांधनेका खूँटा हो जाती है ॥ ३० ॥
अन्यच्च,—
स बन्धुर्यो विपन्नानामापदुद्धरणक्षमः ।
न तु भीतपरित्राणवस्तूपालम्भपण्डितः ॥ ३१ ॥
और दूसरे-बन्धु वह है जो आपत्तिमं पड़े हुये मनुष्योंको निकालनेमें समर्थ
हो, और जो दुःखितोंकी रक्षा करनेके उपायके बदले उलहना देनेमें चतुराई
बतावे वह बन्धु नहीं है ॥ ३१ ॥
विपत्काले विस्मय एव कापुरुषलक्षणम् । तदत्र धैर्यमवलम्ब्य
प्रतीकारश्चिन्त्यताम् ।
आपत्तिकालमें घबरा जाना तो कायर पुरुषका चिन्ह है, इसलिये, इस काममें
धीरज धर कर उपाय सोचना चाहिये;
यतः,—
विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः ।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ
प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥ ३२ ॥
क्योंकि-आपदामें धीरज, बढ़तीमें क्षमा, सभामें वाणीकी चतुरता, युद्धमें
पराक्रम, यशमें रुचि, और शास्त्रमें अनुराग ये बातें महात्माओंमें स्वभावसेही
होती हैं ॥ ३२ ॥
संपदि यस्य न हर्षो विपदि विषादो रणे च धीरत्वम् ।
तं भुवनत्रयतिलकं जनयति जननी सुतं विरलम् ॥ ३३ ॥
जिसे सम्पत्तिमें हर्ष, और आपत्तिमें खेद न हो, और संग्राममें धीरता हो,
ऐसा तीनों लोकके तिलक का जन्म विरला होता है और उसको विरली माता
ही जनती है ॥ ३३ ॥
१ अर्थात् तुमने इस उपायसे इस आपत्तिको क्यों नहीं दूर कर दिया ?.

-३७] सब कबूतरोंका जालके साथ उडना २३
अन्यच्च,—
षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता ।
निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता ॥ ३४ ॥
और इस संसारमें अपना कल्याण चाहने वाले पुरुषको निद्रा, तन्द्रा, भय,
क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता ये छः अवगुण छोड़ देने चाहिये ॥ ३४ ॥
इदानीमप्येवं क्रियताम् । सर्वैरेकचित्तीभूय जालमादायोड्डीय-
ताम् ।
अब भी ऐसा करो, सब एक मत होकर जालको लेकर उड़ो;
यतः,—
अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका ।
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः ॥ ३५ ॥
क्योंकि-छोटी छोटी वस्तुओंके समूहसे भी कार्य सिद्ध हो जाता है, जैसे
घासकी बटी हुई रस्सियोंसे मत वाले हाथी बाँधे जाते हैं ॥ ३५ ॥
संहतिः श्रेयसी पुंसां स्वकुलैरल्पकैरपि ।
तुषेणापि परित्यक्ता न प्ररोहन्ति तण्डुलाः ॥ ३६ ॥
अपने कुलके थोड़े मनुष्योंका समूह भी कल्याणका करने वाला होता है, क्योंकि
तुस (छिलके) से अलग हुए चावल फिर नहीं उगते हैं ॥ ३६ ॥
इति विचिन्त्य पक्षिणः सर्वे जालमादायोत्पतिताः । अनन्तरं स
व्याधः सुदूराज्जालापहारकांस्तानवलोक्य पश्चाद्धावन्नचिन्तयत्-
यह विचार कर सब कबूतर जालको लेकर उड़े । फिर वह बहेलिया, जालको
लेकर उड़ने वाले कबूतरोंको दूरसे देख कर पीछे दौड़ता हुआ सोचने लगा.
‘संहतास्तु हरन्त्येते मम जालं विहंगमाः ।
यदा तु निपतिष्यन्ति वशमेष्यन्ति मे तदा’ ॥ ३७ ॥
‘ये पक्षी मिल कर मेरे जालको लेकर उड़े जाते हैं, परन्तु जब ये गिरेंगे
तब मेरे वशमें हो जायेंगे’ ॥ ३७ ॥
ततस्तेषु चक्षुर्विषयातिक्रान्तेषु पक्षिषु स व्याधो निवृत्तः ।
फिर जब वे पक्षी आंखसे नहीं दीखने लगे तब व्याध लौट गया.

२४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ३८-
अथ लुब्धकं निवृत्तं दृष्ट्वा कपोता ऊचुः—'किमिदानीं कर्तु-
मुचितम् ?' । चित्रग्रीव उवाच—
पीछे उस लोभीको लौटता देख कर कबूतर बोले कि—'अब क्या करना
चाहिये ?'. चित्रग्रीव बोला—
'माता मित्रं पिता चेति स्वभावात्रितयं हितम् ।
कार्यकारणतश्चान्ये भवन्ति हितबुद्धयः ॥ ३८ ॥
'माता, पिता और मित्र ये तीनों स्वभावसे हितकारी होते हैं, और दूसरे
(लोग) कार्य और किसी कारणसे हितकी इच्छा करने वाले होते हैं ॥ ३८ ॥
तदस्माकं मित्रं हिरण्यको नाम मूषकराजो गण्डकीतीरे चित्रवने
निवसति, सोऽस्माकं पाशांश्छेत्स्यति ।' इत्यालोच्य सर्वे हिरण्यक-
विवरसमीपं गताः । हिरण्यकश्च सर्वदाऽपायशङ्कया शतद्वारं
विवरं कृत्वा निवसति । ततो हिरण्यकः कपोतावपातभयाच्चकित-
स्तूष्णीं स्थितः । चित्रग्रीव उवाच—'सखे हिरण्यक ! किमस्मान्न
संभाषसे ?' । ततो हिरण्यकस्तद्वचनं प्रत्यभिज्ञाय ससंभ्रमं बहि-
र्निःसृत्याब्रवीत्—'आः, पुण्यवानस्मि । प्रियसूहन्मे चित्रग्रीवः
समायातः ।
इसलिये मेरा मित्र हिरण्यक नाम चूहोंका राजा गंडकी नदीके तीर पर चित्र-
वनमें रहता है, वह हमारे फंदोंको काटेगा । यह विचार कर सब हिरण्यकके
बिलके पास गये । हिरण्यक सदा आपत्ति आनेकी आशंकासे अपना बिल सौ द्वारका
बना कर रहता था । फिर हिरण्यक कबूतरोंके उतरनेकी आहटसे डर कर चुपकेसे
बैठ गया । चित्रग्रीव बोला—'हे मित्र हिरण्यक ! हमसे क्यों नहीं बोलते हो ?'.
फिर हिरण्यक उसका बोल पहिचान कर शीघ्रतासे बाहर निकल कर बोला—'अहा !
में बड़ा पुण्यवान् हूं कि मेरा प्यारा मित्र चित्रग्रीव आया ।
यस्य मित्रेण संभाषो यस्य मित्रेण संस्थितिः ।
यस्य मित्रेण संलापस्ततो नास्तीह पुण्यवान्' ॥ ३९ ॥
जिसकी मित्रके साथ बोल-चाल है, जिसका मित्रके साथ रहना-सहना हो,
और जिसकी मित्रके साथ गुप्त बात-चीत हो, उसके समान कोई इस संसारमें
पुण्यवान् नहीं है' ॥ ३९ ॥

-४१] कबूतरोंका चूहेके पास जाना २५
पाशबद्धांश्चैतान्दृष्ट्वा सविस्मयः क्षणं स्थित्वोवाच-'सखे ! किमे-
तत्?' । चित्रग्रीवोऽवदत्-'सखे ! अस्माकं प्राक्तनजन्म-
कर्मणः फलमेतत् ।
इन्हें जालमें फँसा देख कर आश्चर्यसे क्षणभर ठहर कर बोला-'मित्र ! यह
क्या है?'. चित्रग्रीव बोला-'मित्र ! यह हमारे पूर्वजन्मके कर्मोंका फल है.
यस्माच्च येन च यथा च यदा च यच्च
यावच्च यत्र च शुभाशुभमात्मकर्म ।
तस्माच्च तेन च तथा च तदा च तच्च
तावच्च तत्र च विधातृवशादुपैति ॥ ४० ॥
जिस कारणसे, जिसके करनेसे, जिस प्रकारसे, जिस समयमें, जिस काल तक
और जिस स्थानमें जो कुछ भला और बुरा अपना कर्म है उसी कारणसे,
उसीकें द्वारा, उसी प्रकारसे, उसी समयमें, वही कर्म, उसी काल तक, उसी
स्थानमें, प्रारब्धके वशसे पाता है ॥ ४० ॥
रोगशोकपरीतापबन्धनव्यसनानि च ।
आत्मापराधवृक्षाणां फलान्येतानि देहिनाम् ॥ ४१ ॥
रोग, शोक, पछतावा, बन्धन और आपत्ति, ये देहधारि(प्राणि)योंके लिये
अपने अपराधरूपी वृक्षके फल हैं' ॥ ४१ ॥
एतच्छ्रुत्वा हिरण्यकश्चित्रग्रीवस्य बन्धनं छेत्तुं सत्वरमुपसर्पति ।
चित्रग्रीव उवाच — 'मित्र ! मा मैवम्। अस्मदाश्रितानामेषां ताव-
त्पाशांश्छिन्धि, तदा मम पाशं पश्चाच्छेत्स्यसि ।' हिरण्यकोऽ-
प्याह—'अहमल्पशक्तिः, दन्ताश्च मे कोमलाः । तदेतेषां पाशां-
श्छेत्तुं कथं समर्थः ? तद्यावन्मे दन्ता न त्रुट्यन्ति तावत्तव पाशं
छिनद्मि । तदनन्तरमेषामपि बन्धनं यावच्छक्यं छेत्स्यामि' ।
चित्रग्रीव उवाच — 'अस्त्वेवम् । तथापि यथाशक्त्येतेषां बन्धनं
खण्डय' । हिरण्यकेनोक्तम् — 'आत्मपरित्यागेन यदाश्रितानां परि-
रक्षणं तन्न नीतिविदां संमतम् ।
यह सुनकर हिरण्यक चित्रग्रीवके बंधन काटनेके लिये शीघ्र पास आया.
चित्रग्रीव बोला-'मित्र ! ऐसा मत करो, पहले मेरे इन आश्रितोंके बन्धन काटो,

२६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ४२-
मेरा बन्धन पीछे काटना' । हिरण्यकने भी कहा-'मित्र ! मैं निर्बल हूं, और
मेरे दांतभी कोमल हैं, इसलिये इन सबका बंधन काटनेके लिये कैसे समर्थ हूं ?
इसलिये जब तक मेरे दांत नहीं टूटेंगे तब तक तुम्हारा फंदा काटता हूं । पीछे
इनकेभी बंधन जहां तक कट सकेंगे तब तक काटूंगा' । चित्रग्रीव बोला-'यह
ठीक है, तो भी यथाशक्ति पहले इनके काटो' । हिरण्यकने कहा-'अपनेको छोड़ कर
अपने आश्रितोंकी रक्षा करना यह नीति जानने वालों(पंडितों)को संमत नहीं है;
यतः,—
आपदर्थे धनं रक्षेद्दारान्रक्षेद्धनैरपि ।
आत्मानं सततं रक्षेद्दारैरपि धनैरपि ॥ ४२ ॥
क्योंकि—मनुष्यको आपत्तिके लिये धनकी, धन देकर स्त्रीकी, और धन तथा
स्त्री देकर अपनी रक्षा सर्वदा करनी चाहिये ॥ ४२ ॥
अन्यच्च,—
धर्मार्थकाममोक्षाणां प्राणाः संस्थितिहेतवः ।
तान्निघ्नता किं न हतं, रक्षता किं न रक्षितम् ?' ॥ ४३ ॥
और दूसरे—धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष इन चारोंकी रक्षाके लिये प्राण
कारण हैं, इसलिये जिसने इन प्राणोंका घात किया उसने क्या घात नहीं
किया ? अर्थात् सब कुछ घात किया, और जिसने प्राणोंका रक्षण किया उसने
क्या रक्षण न किया ? अर्थात् सबका रक्षण किया ॥ ४३ ॥
चित्रग्रीव उवाच-‘सखे ! नीतिस्तावदीदृश्येव । किं त्वहमस्सदा-
श्रितानां दुःखं सोढुं सर्वथाऽसमर्थः । तेनेदं ब्रवीमि ।
चित्रग्रीव बोला-‘मित्र ! नीति तो ऐसीही है परन्तु मैं अपने आश्रितोंका
दुःख सहनेको सब प्रकारसे असमर्थ हूं इस कारण यह कहता हूं.
यतः,—
धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत् ।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति ॥ ४४ ॥
क्योंकि—पण्डितको पराये उपकारके लिये अपना धन और प्राणोंकोभी छोड़
देना चाहिये, क्योंकि विनाश तो अवश्य होगा, इसलिये अच्छे पुरुषोंके लिये
प्राण त्यागना अच्छा है ॥ ४४ ॥

-४९ ] साथियोंके लिये चित्रग्रीवकी उदारता २७
अयमपरश्चासाधारणो हेतुः—
जातिद्रव्यगुणानां च साम्यमेषां मया सह ।
मत्प्रभुत्वफलं ब्रूहि कदा किं तद्भविष्यति ॥ ४५ ॥
और दूसरा यहभी एक विशेष कारण है-इन कबूतरोंका और मेरा जाति,
द्रव्य और बल समान है, तो मेरी प्रभुताका फल कहो, जो अब न होगा तो किस
कालमें और क्या होगा ? ॥ ४५ ॥
अन्यच्च,—
विना वर्तनमेवैते न त्यजन्ति ममान्तिकम् ।
तन्मे प्राणव्ययेनापि जीवयैतान्ममाश्रितान् ॥ ४६ ॥
और दूसरे-आजीविकाके विना भी ये मेरा साथ नहीं छोड़ते हैं, इसलिये
प्राणोंके बदलेभी इन मेरे आश्रितोंको जीवदान दो ॥ ४६ ॥
किं च,—
मांसमूत्रपुरीषास्थिनिर्मितेऽस्मिन्कलेवरे ।
विनश्वरे विहायास्थां यशः पालय मित्र ! मे ॥ ४७ ॥
और-हे मित्र ! मांस, मल, मूत्र, तथा हड्डीसे बने हुए इस विनाशी शरीरमें
आस्थाको छोड़ कर मेरे यशको बढ़ाओ ॥ ४७ ॥
अपरं च पश्य,—
यदि नित्यमनित्येन निर्मलं मलवाहिना ।
यशः कायेन लभ्येत तन्न लब्धं भवेन्नु किम् ? ॥ ४८ ॥
और भी देखो-जो, अनित्य और मल-मूत्रसे भरे हुए शरीरसे निर्मल और
नित्य यश मिले तो क्या नहीं मिला ? अर्थात् सब कुछ मिला ॥ ४८ ॥
यतः,—
शरीरस्य गुणानां च दूरमत्यन्तमन्तरम् ।
शरीरं क्षणविध्वंसि कल्पान्तस्थायिनो गुणाः' ॥ ४९ ॥
क्योंकि—शरीर तथा दयादि गुणोंमें बड़ा अन्तर है. शरीर तो क्षणभंगुर है,
और गुण कल्पके अन्त तक रहने वाले हैं' ॥ ४९ ॥