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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

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पृष्ठ 39

-२१] लोभी मुसाफिरकी मृत्यु १९
तन्मया भद्रं न कृतं यदत्र मारात्मके विश्वासः कृतः । तथा
ह्युक्तम्—
इसलिये मैंने अच्छा नहीं किया जो इस हिंसकमें विश्वास किया, जैसा
कहा है—
नदीनां शस्त्रपाणीनां नखिनां शृङ्गिणां तथा ।
विश्वासो नैव कर्तव्यः स्त्रीषु राजकुलेषु च ॥ १९ ॥
नदियोंका, हाथमें शस्त्रधारण करने वालोंका, नख और सींग वाले प्राणि-
योंका, स्त्रियोंका तथा राजाके कुलका विश्वास कभी न करना चाहिए ॥ १९ ॥
अपरं च,—
सर्वस्य हि परीक्ष्यन्ते स्वभावा नेतरे गुणाः ।
अतीत्य हि गुणान्सर्वान्स्वभावो मूर्ध्नि वर्तते ॥ २० ॥
और दूसरे—मनुष्यको सबके स्वभावकी परीक्षा करनी चाहिए न कि अन्य
गुणोंकी; क्योंकि सब गुणोंको छोड़कर स्वभावही सबसे श्रेष्ठ है ॥ २० ॥
अन्यच्च,—
स हि गगनविहारी कल्मषध्वंसकारी
दशशतकरधारी ज्योतिषां मध्यचारी ।
विधुरपि विधियोगाद्ग्रस्यते राहुणासौ
लिखितमपि ललाटे प्रोज्झितुं कः समर्थः ?' ॥ २१ ॥
और चन्द्रमा जो आकाशमें विचरता है, अंधकारको दूर करता है, सहस्र
किरणोंको धारण करता है, और नक्षत्रोंमें बीचमें चलता है उस चन्द्रमाको भी
भाग्यसे राहु ग्रस लेता है, इसलिये जो कुछ भाग्य ( ललाट ) में विधाताने
लिख दिया है उसे कौन मिटा सकता है ?' ॥ २१ ॥
इति चिन्तयन्नेवासौ व्याघ्रेण व्यापादितः खादितश्च । अतोऽहं
ब्रवीमि—"कङ्कणस्य तु लोभेन" इत्यादि । अतः सर्वथाऽविचा-
रितं कर्म न कर्तव्यम् ।
यह बात वह सोचही रहा था जब उसको बाघने मार डाला और खा गया ।
इसीसे मैं कहता हूं कि, "कंगनके लोभसे" इत्यादि. इसलिये विना विचारे काम
कभी नहीं करना चाहिये—