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सर्वकोश
हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)

नारायण पण्डित द्वारा

स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished302 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 302 में से

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पृष्ठ 36

१६ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ८-
यतः,—
इज्याऽध्ययनदानानि तपः सत्यं धृतिः क्षमा ।
अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविधः स्मृतः ॥ ८ ॥
क्योंकि—यज्ञ करना, वेद पढ़ना, दान देना, तप करना, सत्य बोलना, धीरज
धरना, क्षमाशील होना और लोभ न करना, ये आठ धर्मके मार्ग हैं ॥ ८ ॥
तत्र पूर्वश्चतुर्वर्गो दम्भार्थमपि सेव्यते ।
उत्तरस्तु चतुर्वर्गो महात्मन्येव तिष्ठति ॥ ९ ॥
इनमेंसे पहले चार तो पाखंड रचनेके ( बाहरी दिखावेके ) लिये भी होते हैं
परन्तु पिछले चार केवल महात्मामेंही होते हैं ॥ ९ ॥
मम चैतावांल्लोभविरहो येन स्वहस्तस्थमपि सुवर्णकङ्कणं यस्मै
कस्मैचिद्दातुमिच्छामि । तथापि ‘व्याघ्रो मानुषं खादति’ इति
लोकप्रवादो दुर्निवारः ।
मुझे यहां तक लोभ नहीं है कि अपने हाथका कंगनभी किसीको देना
चाहता हूं, परन्तु ‘बाघ मनुष्यको खा जाता है’ यह लोकनिन्दा नहीं मिट सकती है।
यतः,—
गतानुगतिको लोकः कुट्टनीमुपदेशिनीम् ।
प्रमाणयति नो धर्मे यथा गोघ्नमपि द्विजम् ॥ १० ॥
क्योंकि—अपनी पुरानी लीकपर चलने वाला संसार धर्मके विषयमें कुट्टनीके
उपदेशका ऐसा प्रमाण नहीं करता है कि जैसा गो-हिंसक ब्राह्मणका धर्ममें
प्रमाण ( विश्वास ) करता है ॥ १० ॥
मया च धर्मशास्त्राण्यधीतानि । शृणु,—
और मैंने धर्मशास्त्र भी पढ़े हैं, सुन ऐसा कहा है कि—
मरुस्थल्यां यथा वृष्टिः क्षुधार्ते भोजनं तथा ।
दरिद्रे दीयते दानं सफलं पाण्डुनन्दन ! ॥ ११ ॥
हे युधिष्ठिर ! जैसे मारवाड़देशमें वृष्टिका होना और भूखेको भोजन देना
लाभदायक है, उसी प्रकार दरिद्रको दान देना लाभदायक होता है ॥ ११ ॥
प्राणा यथात्मनोऽभीष्टा भूतानामपि ते तथा ।
आत्मौपम्येन भूतेषु दयां कुर्वन्ति साधवः ॥ १२ ॥
जिस प्रकार अपने प्राण प्यारे हैं, वैसेही अन्य प्राणियोंकोभी अपने अपने