हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित)
नारायण पण्डित द्वारा
स्रोत: हितोपदेशः (हिन्दी अनुवाद सहित) · चौखम्बा विद्याभवन · 2017 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१४ हितोपदेशः [ मित्रलाभः ६-
मास। ततः कपोतराजस्तण्डुलकणलुब्धान् कपोतान्प्रत्याह—
'कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकणानां संभवः? तन्निरूप्यतां
तावत्। भद्रमिदं न पश्यामि। प्रायेणानेन तण्डुलकणलोभेना-
स्माभिरपि तथा भवितव्यम्,—
फिर इस व्याधने चावलोंकी कनकीको बखेर कर जाल फैलाया और आप
वहां छुप कर बैठ गया। उसी कालमें परिवारसहित आकाशमें उड़ते हुए चित्रग्रीव
नामक कबूतरोंके राजाने चावलोंकी कनकीको देखा. फिर कपोतराज चावलके
लोभी कबूतरोंसे बोला—'इस निर्जन वनमें चावलकी कनकी कहांसे आई ? पहले
इसका निश्चय करो. मैं इसको कल्याणकारी नहीं देखता हूं, अवश्य इन
चावलोंकी कनकीके लोभसे हमारीभी वैसी ही गति हो सकती जैसी कि—
कङ्कणस्य तु लोभेन मग्नः पङ्के सुदुस्तरे।
वृद्धव्याघ्रेण संप्राप्तः पथिकः स मृतो यथा' ॥ ५॥
कंगनके लोभसे गाढ़ी गाढ़ी कीचडमें फँसे हुए एक बटोहीको, बूढे बाघने
पकड़ कर मार डाला' ॥ ५ ॥
कपोता ऊचुः—'कथमेतत् ?'। सोऽब्रवीत्—
कबूतर बोले—'यह कथा कैसे है ?'—वह कहने लगा.
कथा २
[ सुवर्णकंकणधारी बूढ़ा बाघ और मुसाफिरकी कहानी २ ]
'अहमेकदा दक्षिणारण्ये चरन्नपश्यम् । एको वृद्धव्याघ्रः स्नातः
कुशहस्तः सरस्तीरे ब्रूते —'भो भोः पान्थाः ! इदं सुवर्णकङ्कणं गृह्य-
ताम् ।' ततो लोभाकृष्टेन केनचित्पान्थेनालोचितम्—भाग्येनैत-
त्संभवति । किंतुत्वस्मिन्नात्मसंदेहे प्रवृत्तिर्न विधेया ।
'एक समय मैंने दक्षिणके वनमें चलते हुए देखा कि एक बूढ़ा बाघ नहा
धोकर कुशा हाथमें लिये सरोवरके किनारे पर ( बैठा हुआ ) बोला—'ओ
बटोहियो ! यह सुवर्णका कंगन लो'. तब लोभके मारे किसी बटोहीने जीमें
विचारा कि—'यह बात भाग्यसे होती है, परंतु इस आत्माके संदेहमें ( अर्थात
कहीं मर तो न जाऊं ? इस सोचमें ) प्रवृत्ति नहीं करनी चाहिये ।