गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
२७० गणितसारसंग्रहः [ ९. ४½-
अजघटरविसंक्रमणद्युदलभैक्यार्धमेव विषुवद्भा ॥ ४½ ॥
लङ्कायां यवकोट्यां सिद्धपुरीरोमकापुर्योः ।
विषुवद्भा नास्त्येव त्रिंशद्घटिकं दिनं भवेत्तस्मात् ॥ ५½ ॥
देशेष्वितरेषु दिनं त्रिंशन्नाड्याधिकोनं स्यात् ।
मेषघटायनदिनयोस्त्रिंशद्घटिकं दिनं हि सर्वत्र ॥ ६½ ॥
दिनमानं दिनदलभां ज्योतिषशास्त्रोक्तमार्गेण ।
ज्ञात्वा छायागणितं विद्यादिह वक्ष्यमाणसूत्रौघैः ॥ ७½ ॥
विषुवच्छाया यत्रयत्र देशे नास्ति तत्रतत्र देशे इष्टशङ्कोरिष्टकालच्छायां ज्ञात्वा तत्काला-
नयनसूत्रम्—
छाया सैका द्विगुणा तया हृतं दिनमितं च पूर्वाह्ने ।
अपराह्वे तच्छेषं विज्ञेयं सारसंग्रहे गणिते ॥ ८½ ॥
विषुवद्भा ( अर्थात् जब दिन और रात दोनों बराबर होते हैं, उस समय पड़ने वाली छाया )
वास्तव में उन दिनों के मध्याह्न ( दोपहर ) समय प्राप्त छाया के मापों के योग की आधी होती है,
जब कि सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, तथा जब वह तुला राशि में भी प्रवेश करता है ॥ ४½ ॥
लंका, यवकोटि, सिद्धपुरी और रोमकपुरी में ऐसी विषुवद्भा ( equinoctial shadow )
बिलकुल होती ही नहीं है; और इसलिए दिन ३० घटी का होता है ॥ ५½ ॥
अन्य प्रदेशों में दिन मान ३० घटी से अधिक या कम रहता है। जब सूर्य मेष राशि और
तुला ( घटायन ) राशि में प्रवेश करता है, तब सभी जगह दिन मान ३० घटी का होता है ॥ ६½ ॥
ज्योतिष शास्त्र में वर्णित विधि के अनुसार दिन का माप तथा दिन की मध्याह्न छाया का माप
समझ लेने के पश्चात्, छाया संबंधी गणित निम्नलिखित नियमों द्वारा सीखना चाहिए ॥ ७½ ॥
ऐसे स्थान के संबंध में दिन का वह समय निकालने के लिए नियम, जहाँ विषुवच्छाया नहीं
होती हो, तथा किसी दिये गये समय पर ( दोपहर के पहिले अथवा पश्चात् ) किसी दिये गये शंकु की
छाया का माप ज्ञात हो—
किसी वस्तु ( शंकु ) की ऊँचाई के पदों में व्यक्त छाया के माप में एक जोड़ा जाता है, और इस
प्रकार परिणामी योग दुगुना किया जाता है। परिणामी राशि द्वारा पूर्ण दिनमान भाजित किया जाता
है। यह समझना चाहिये कि सारसंग्रह नामक गणित शास्त्र के अनुसार, यह प्राप्त फल पूर्वाह्न
और अपराह्न के शेष भागों ( अथवा दोपहर के पहिले दिन के बीते हुए भाग और दोपहर के
पश्चात् दिन के शेष रहने वाले भाग ) को उत्पन्न करता है ॥ ८½ ॥
गये त्रिज्या की माप में कुछ अधिक लंबाई वाला होना चाहिये । यदि 'क पू'
और 'क प' पार्श्व आकृति में क्रमशः पूर्व और पश्चिम दिशा निरूपित
करते हों, तो आकृति उ ख द ग, क्रमशः पू और प को केन्द्र मान कर
और पू ग, तथा प ख त्रिज्याएं लेकर चाप खींचने से प्राप्त होती हैं,
जब कि पू ग और प ख आपस में बराबर हों । भुजा उद जो पूर्वोक्त आकृति
के कोण का अर्धन करती है, क्रमशः उत्तर और दक्षिण दिशा का निरूपण
करती है ।
( ८½ ) यदि वस्तु की ऊँचाई उ है, और उसकी छाया की लंबाई छ है, तो दिन का बीता हुआ
—९. १२½ ] छायाव्यवहारः २७१
अत्रोद्देशकः
पूर्वाह्ने पौरुषी छाया त्रिगुणा वद किं गतम् ।
अपराह्णेऽवशेषं च दिनस्यांशं वद प्रिय ॥ ९½ ॥
दिनांशे जाते सति घटिकानयनसूत्रम्—
अंशहृतं दिनमानं छेदविभक्तं दिनांशके जाते ।
पूर्वाह्ने गतनाड्यस्त्वपराह्ने शेषनाड्यस्तु ॥ १०½ ॥
अत्रोद्देशकः
विषुवच्छायाविरहितदेशेऽष्टांशो दिनस्य गतः ।
शेषश्चाष्टांशः का घटिकाः स्युः खाग्निनाड्योऽहः ॥ ११½ ॥
मल्लयुद्धकालानयनसूत्रम्—
कालानयनाद्दिनगतशेषसमासोनितः कालः ।
स्तम्भच्छाया स्तम्भप्रमाणभक्तैव पौरुषी छाया ॥ १२½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी मनुष्य की छाया उसकी ऊँचाई से ३ गुनी है । हे प्रिय मित्र, बतलाओ कि पूर्वाह्न में
बीते हुए दिन का भाग एवं अपराह्न में शेष रहने वाला दिन का भाग क्या है ? ॥ ९½ ॥
दिन का भाग ( जो बीत चुका है, या बीतने वाला है ) प्राप्त हो चुकने पर घटिकाओं की
संवादी संख्या को निकालने के लिये नियम—
दिन मान के ज्ञात माप को, ( पहिले ही प्राप्त ) दिन के बीते हुए अथवा बीतने वाले भाग
का निरूपण करने वाले भिन्न के अंश द्वारा गुणित करने और हर द्वारा भाजित करने से, पूर्वाह्न के
संबंध में बीती हुईं घटिकाएँ और अपराह्न के संबंध में बीतने वाली घटिकाएँ उत्पन्न होती हैं ॥ १०½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
ऐसे प्रदेश में जहाँ विषुवच्छाया नहीं होती, दिन १/८ भाग बीत गया है, अथवा अपराह्न के संबंध
में शेष रहने वाला दिन का भाग १/८ है । इस १/८ भाग की संवादी घटिकाएँ क्या हैं ? दिन में ३०
घटिकाएं मान ली गई हैं ॥ ११½ ॥
मल्लयुद्ध काल निकालने के लिए नियम—
जब दिन के बीते हुए भाग तथा बीतने वाले भाग के योग द्वारा दिन की अवधि हासित कर,
उसे घटिकाओं में परिवर्तित किया जाता है, तब इष्ट समय उत्पन्न होता है ।
अथवा बीतनेवाला समय ( नियमानुसार ) यह है—
१ १
───────────── अथवा ────────────────── ,
/ छ \ २ ( कोस्पआ + १ )
२ ( ─ + २ )
\ उ /
[चित्र: समकोण त्रिभुज — शीर्ष 'सा', समकोण '० बा', न्यूनकोण 'आ', लम्ब 'उ', आधार 'छ']
जहाँ कोण आ उस समय पर सूर्य का ऊँचाई निरूपक कोण है । यह
सूत्र केवल आ = ४५°, छोड़कर आ के शेष मानों के लिये सन्निकट दिन
का समय देता है । जब यह कोण ९०° के निकटतर पहुँचता है, तब सन्निकट
दिन का समय और भी गलत होता जाता है । यह सूत्र इस तथ्य पर आधारित
है कि किसी समकोण त्रिभुज में छोटे मानों के लिए कोण सन्निकटतः सम्मुख भुजाओं के समानुपाती होते हैं ।
२७२ ] गणितसारसंग्रहः [ ९. १३½-
अत्रोद्देशकः
पूर्वाह्णे शङ्कुसमच्छायायां मल्लयुद्धमारब्धम् ।
अपराह्णे द्विगुणायां समाप्तिरासीच्च युद्धकालः कः ॥ १३½ ॥
अपरार्धस्योदाहरणम्
द्वादशहस्तस्तम्भच्छाया चतुरुत्तरैव विंशतिका ।
तत्काले पौरुषिकच्छाया कियती भवेद्गणक ॥ १४½ ॥
विषुवच्छायायुक्ते देशे इष्टच्छायां ज्ञात्वा कालानयनस्य सूत्रम्¹—
शङ्कुयुतेष्टच्छाया मध्यच्छायोनिता द्विगुणा ।
तदवाप्ता शङ्कुमितिः पूर्वापरयोर्दिनांशः स्यात् ॥ १५½ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वादशाङ्गुलशङ्कोर्द्युदलच्छायाङ्गुलद्वयी ।
इष्टच्छायाष्टाङ्गुलिका दिनांशः को गतः स्थितः ।
त्र्यंशो दिनांशो घटिकाः कास्त्रिशन्नाडिकं दिनम् ॥ १७ ॥
- किसी भी हस्तलिपि में प्राप्य नहीं है ।
किसी स्तम्भ की छाया के माप को स्तंभ की ऊँचाई द्वारा भाजित करने पर पौरुषी छाया माप
( उस मनुष्य की छाया का माप उसकी निज की ऊँचाई के पदों में ) प्राप्त होता है ॥ १२½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई मल्लयुद्ध पूर्वाह्न में आरम्भ हुआ, जब कि किसी शंकु की छाया उसी शंकु के माप के तुल्य
थी । उस युद्ध का निर्णय अपराह्न में हुआ, जबकि उसी शंकु की छाया का माप शंकु के माप से दुगुना
था । बतलाओ कि यह युद्ध कितने समय तक चला ? ॥ १३½ ॥
श्लोक के उत्तरार्ध नियम के लिये उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी १२ हस्त ऊँचाई वाले स्तंभ की छाया माप में २४ हस्त है । उस समय, हे अंकगणि-
तज्ञ, मनुष्य की छाया का माप क्या होगा ? ॥ १४½ ॥
जब किसी भी समय पर छाया का माप ज्ञात हो, तब विषुवच्छाया वाले स्थानों में बीते हुए
अथवा बीतने वाले दिन के भाग को प्राप्त करने के लिये नियम —
शंकु की ज्ञात छाया के माप में शंकु का माप जोड़ा जाता है । यह योग विषुवच्छाया के माप
द्वारा ह्रासित किया जाता है, और परिणामी अंतर को दुगुना कर दिया जाता है । जब शंकु का माप
इस परिणामी राशि द्वारा भाजित किया जाता है, तब दशानुसार पूर्वाह्न में दिन में बीते हुए अथवा
अपराह्न में दिन में बीतने वाले दिनांश का मान उत्पन्न होता है ॥ १५½ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
१२ अंगुल के शंकु के संबंध में विषुवच्छाया दोपहर के समय ( दिन के मध्याह्न में ) २
अंगुल है, और अवलोकन के समय इष्ट ( ज्ञात ) छाया ८ अंगुल है । दिन का कौनसा भाग बीत गया
है, और कौनसा भाग शेष रहा है ? यदि दिन का बीता हुआ भाग अथवा बीतने वाला भाग १/३ है,
तो उसकी संवादी घटिकाएँ क्या हैं, जबकि दिन ३० घटियों का होता है ॥ १६½-१७ ॥
( १५½ ) यहाँ दिन के समय के माप के लिये दिया गया सूत्र बीजीय रूप से, उ / [ २ (छ + उ - व) ]
-९. २० ] छायाव्यवहारः [ २७३
इष्टनाडिकानां छायानयनसूत्रम्—
द्विगुणितदिनभागहृता शङ्कुमितिः शङ्कुमानोना ।
यद्दलच्छ्छायायुक्ता छाया तत्स्वेष्टकालिका भवति ॥ १८ ॥
अत्रोद्देशकः
द्वादशाङ्गुलशङ्कोर्यद्दलच्छायाऽङ्गुलद्वयी ।
दशानां घटिकानां भा का छिन्नादिकं दिनम् ॥ १९ ॥ '
पादच्छायालक्षणे पुरुषस्य पादप्रमाणस्य परिभाषासूत्रम्—
पुरुषोन्नतिसप्तांशस्तत्पुरुषाङ्घ्रेस्तु दैर्घ्यं स्यात् ।
यद्येवं चेत्पुरुषः स भाग्यवानङ्घ्रिभा स्पष्टा ॥ २० ॥
आरूढच्छायायाः संख्यानयनसूत्रम्—
घटियों में दिए गये दिन के समय की संवादी छाया का माप निकालने के नियम—
शंकु ( style ) का माप दिन के दिये गये भाग के माप की दुगुनी राशि द्वारा भाजित किया
जाता है । परिणामी भजनफल में से शंकु का माप घटाया जाता है, और उसमें विषुवच्छाया ( दोपहर
के समय की ऐसे स्थान की छाया, जहाँ दिन रात तुल्य होते हैं ) का माप जोड़ दिया जाता है । यह
दिन के इष्ट समय पर छाया का माप उत्पन्न करता है ॥ १८ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
यदि, किसी १२ अंगुल वाले शंकु के संबंध में, द्युदलच्छाया ( विषुवच्छाया ) २ अंगुल हो, तो
जब १० घटी दिन बीत चुका हो अथवा बीतने वाला हो उस समय शंकु की छाया का माप क्या है ?
दिन का मान ३० घटियाँ होता है ॥ १९ ॥
छाया के पाद प्रमाण माप के द्वारा लिए गये मापों संबंधी मनुष्य के पाद माप की परिभाषा—
किसी मनुष्य की ऊँचाई के १/७ भाग के तुल्य उसके पाद की लंबाई होती है । यदि ऐसा
हो, तो वह मनुष्य भाग्यशाली होगा । इस प्रकार पाद प्रमाण से नापी गई छाया का माप
स्पष्ट है ॥ २० ॥
ऊर्ध्वाधर दीवाल पर आरूढ़ छाया का संख्यात्मक माप निकालने के लिये नियम—
है, जहाँ 'व' शंकु की विषुवच्छाया की लंबाई है । यह सूत्र ऊपर की गाथा ८½ में दिये गये सूत्र की पाद
टिप्पणी पर आधारित है ।
( १८ ) बीजीय रूप से,
छ = उ / २घ - उ + व, जहाँ घ, दिन के समय का माप घटी में दिया गया है । यह सूत्र श्लोक°
१५½ वें की पाद टिप्पणी में दिये गये सूत्र से प्राप्त होता है ।
ग० सा० सं०-३५
२७४ ] गणितसारसंग्रहः [ ९. २१-
नृच्छायाहतशङ्कुर्भित्तिस्तम्भान्तरोनितो भक्तः ।
नृच्छाययैव लब्धं शङ्कोर्भित्त्याश्रितच्छाया ॥ २१ ॥
अत्रोद्देशकः
विंशतिहस्तः स्तम्भो भित्तिस्तम्भान्तरं करा अष्टौ ।
पुरुषच्छाया द्विघ्ना भित्तिगता स्तम्भभा किं स्यात् ॥ २२ ॥
स्तम्भप्रमाणं च भित्त्यारूढस्तम्भच्छायासंख्यां च ज्ञात्वा भित्तिस्तम्भान्तरसंख्यानयन-
सूत्रम्—
पुरुषच्छायानिघ्नं स्तम्भारूढान्तरं तयोर्मध्यम् ।
स्तम्भारूढान्तरहृततदन्तरं पौरुषी छाया ॥ २३ ॥
शंकु की ऊँचाई ( मनुष्य की ऊँचाई के पदों में व्यक्त ) मनुष्य की छाया द्वारा गुणित की
जाती है । परिणामी गुणनफल दीवाल और शंकु के बीच की दूरी के माप द्वारा हासित किया जाता
है । इस प्रकार प्राप्त अंतर मनुष्य की उपर्युक्त छाया के माप द्वारा भाजित किया जाता है । इस प्रकार
प्राप्त भजनफल शंकु की छाया के उस भाग का माप होता है जो दीवाल पर आरूढ़ है ॥ २१ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई स्तंभ २० हस्त ऊँचा है । इस स्तंभ और दीवाल के बीच की दूरी ( जो छाया रेखानुसार
नापी जाती है ) ८ हस्त है । उस समय मनुष्य की छाया मनुष्य की ऊँचाई से दुगुनी है । स्तंभ की
छाया का वह कौन-सा भाग है जो दीवाल पर आरूढ़ है ? ॥ २२ ॥
जब दीवाल पर आरूढ़ ( पड़ी हुई ) छाया का संख्यात्मक मान तथा स्तंभ की ऊँचाई, दोनों
ज्ञात हों, तब दीवाल और स्तंभ के अंतर ( बीच की दूरी ) के माप के संख्यात्मक मान को निकालने
के लिये नियम—
स्तंभ की ऊँचाई और दीवाल पर आरूढ़ ( पड़ी हुई ) छाया के माप का अंतर ( मनुष्य की
ऊँचाई के पदों में व्यक्त ) पुरुष की छाया के माप द्वारा गुणित होकर, उक्त स्तंभ और दीवाल के अंतर
की माप को उत्पन्न करता है । इस अंतर का मान, स्तंभ की ऊँचाई और दीवाल पर आरूढ़ (पड़ी हुई)
छायांश माप के अंतर द्वारा भाजित किया जाने पर, ( मनुष्य की ऊँचाई के पदों में व्यक्त) मानवी छाया
का माप उत्पन्न करता है ॥ २३ ॥
( २१ ) बीजीय रूप से,
अ = (उ × ब - स) / ब , जहाँ उ शंकु की ऊँचाई है,
अ दीवाल पर आरूढ़ छाया की ऊँचाई के पदों में व्यक्त
मनुष्य की छाया का माप है, और स स्तंभ ( शंकु ) और
दीवाल के बीच की दूरी है । नियम का स्पष्टीकरण पार्श्व में
दिये गये चित्र द्वारा हो जाता है । यह बात ध्यान में रखने
- योग्य है कि यहाँ स्तंभ और दीवाल के बीच की दूरी छाया रेखा पर ही नापी जाना चाहिए ।
( २३ और २६ ) इस नियम तथा २६ वीं गाथा के नियम में २१ वीं गाथा में दिये गये उदाहरणों
की विलोम दशा का उल्लेख है ।
-९. २७ ] छायाव्यवहारः २७५
अत्रोद्देशकः
विंशतिहस्तः स्तम्भः षोडश भित्त्याश्रितच्छाया ।
द्विगुणा पुरुषच्छाया भित्तिस्तम्भान्तरं किं स्यात् ॥ २४ ॥
अपरार्धस्योदाहरणम्
विंशतिहस्तः स्तम्भः षोडश भित्त्याश्रितच्छाया ।
कियती पुरुषच्छाया भित्तिस्तम्भान्तरं चाष्टौ ॥ २५ ॥
आरूढच्छायायाः संख्यां च भित्तिस्तम्भान्तरभूमिसंख्यां च पुरुषच्छायायाः संख्यां
च ज्ञात्वा स्तम्भप्रमाणसंख्यानयनसूत्रम्—
नृच्छायाघ्नारूढा भित्तिस्तम्भान्तरेण संयुक्ता ।
पौरुषभाहृतलब्धं विदुः प्रमाणं बुधाः स्तम्भे ॥ २६ ॥
अत्रोद्देशकः
षोडश भित्त्यारूढच्छाया द्विगुणैव पौरुषी छाया ।
स्तम्भोत्सेधः कः स्याद्भित्तिस्तम्भान्तरं चाष्टौ ॥ २७ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक स्तंभ २० हस्त ऊँचा है, और दीवाल पर पड़ने वाली छाया के अंश का माप (ऊँचाई)
१६ हस्त है। उस समय पुरुष की छाया पौरुषी ऊँचाई से दुगुनी है। स्तंभ और दीवाल के अंतर
का माप क्या हो सकता है ? ॥ २४ ॥
नियम के उत्तरार्द्ध भाग के लिए उदाहरणार्थ प्रश्न
कोई स्तंभ ऊँचाई में २० हस्त है, और दीवाल पर पड़ने वाली उसकी छाया की ऊँचाई १६
है । दीवाल और स्तंभ का अंतर ८ हस्त है । पौरुषी ऊँचाई के प्रमाण द्वारा व्यक्त मानवी छाया का
माप क्या है ? ॥ २५ ॥
जब दीवाल पर पड़ने वाली छाया के भाग की ऊँचाई का संख्यात्मक मान, उस स्तंभ तथा
दीवाल का अंतर, और मानुषी ऊँचाई के पदों में व्यक्त मानुषी छाया का माप भी ज्ञात हो, तब स्तंभ
की ऊँचाई का संख्यात्मक मान निकालने के लिये नियम—
दीवाल पर पड़ने वाली छाया के भाग का माप, मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त मानवी छाया
के माप द्वारा गुणित किया जाता है । इस गुणनफल में स्तंभ और दीवाल के अंतर (बीच की दूरी)
का माप जोड़ा जाता है । इस प्रकार प्राप्त योग को मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त मानवी छाया के
माप द्वारा भाजित करने से जो भजनफल प्राप्त होता है वह बुद्धिमानों के द्वारा स्तंभ की ऊँचाई का
माप कहा जाता है ॥ २६ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दीवाल पर स्तंभ की छाया पड़ने वाला भाग १६ हस्त है । उस समय मानवी छाया का मान
मानवी ऊँचाई से दुगुना है । दीवाल और स्तंभ का अंतर ८ हस्त है। स्तंभ की ऊँचाई क्या है ? ॥२७॥
२७६ ] गणितसारसंग्रहः [ ९. २८-
शङ्कुप्रमाणशङ्कुच्छायामिश्रविभक्तसूत्रम्—
शङ्कुप्रमाणशङ्कुच्छायामिश्रं तु सैकपौरुष्या ।
भक्तं शङ्कुमितिः स्याच्छङ्कुच्छाया तदूनमिश्रं हि ॥ २८ ॥
अत्रोद्देशकः
शङ्कुप्रमाणशङ्कुच्छायामिश्रं तु पञ्चाशत् ।
शङ्कूतसेधः कः स्याच्चतुर्गुणा पौरुषी छाया ॥ २९ ॥
शङ्कुच्छायापुरुषच्छायामिश्रविभक्तसूत्रम्—
शङ्कुन्नरच्छायायुतिर्विभाजिता शङ्कुसैकमानेन ।
लब्धं पुरुषच्छाया शङ्कुच्छाया तदूनमिश्रं स्यात् ॥ ३० ॥
अत्रोद्देशकः
शङ्कोरूत्सेधो दश नृच्छायाशङ्कुभामिश्रम् ।
पञ्चोत्तरपञ्चाशन्नृच्छाया भवति कियती च ॥ ३१ ॥
शंकु की ऊँचाई तथा शंकु की छाया की लंबाई के मापों के दत्त मिश्रित योग में से उन्हें
अलग-अलग निकालने के लिए नियम—
शंकु के माप और उसकी छाया के माप के मिश्रित योग को जब १ द्वारा बढ़ाये गये ( मानवी
ऊँचाई के पदों में व्यक्त ) मानवी छाया के माप द्वारा भाजित करते हैं, तब शंकु की ऊँचाई का माप
प्राप्त होता है । दिये गये योग को शंकु के इस माप द्वारा हासित करने पर शंकु की छाया का माप
प्राप्त होता है ॥ २८ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
शंकु के ऊँचाई माप और उसकी छाया के लंबाई माप का योग ५० है । शंकु की ऊँचाई क्या
होगी, जबकि मानवी छाया उस समय मानवी ऊँचाई की चौगुनी है ? ॥ २९ ॥
शंकु की छाया की लम्बाई के माप और ( मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त ) मानवी छाया के
मापके मिश्रित योग में से उन्हें अलग-अलग प्राप्त करने के लिए नियम—
शंकु की छाया तथा मनुष्य की छाया के मापों के मिश्रित योग को एक द्वारा बढ़ाई गई शंकु
की ज्ञात ऊँचाई द्वारा भाजित करते हैं । इस प्रकार प्राप्त भजनफल ( मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त )
मानवी छाया का माप होता है । उपर्युक्त मिश्रित योग जब मानवी छाया के इस माप द्वारा हासित
किया जाता है, तब शंकु की छाया की लंबाई का माप उत्पन्न होता है ॥ ३० ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी शंकु की ऊँचाई १० है । ( मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त ) मानवी छाया और शंकु
की छाया के मापों का योग ५५ है । मानवी छाया तथा शंकु की छाया की लंबाई क्या-क्या हैं ? ॥ ३१॥
(२८ और ३०) यहाँ दिये गये नियम गाथा १२½ के उत्तरार्द्ध में कथित नियम पर आधारित हैं ।
- ९. ३४ ] छायाव्यवहारः [ २७७
स्तम्भस्य अवनतिसंख्यानयनसूत्रम्—
छायावर्गोच्छोध्या नरभाकृतिगुणितशङ्कुकृतिः ।
सैकनरच्छायाकृतिगुणिता छायाकृतेः शोध्या ॥ ३२ ॥
तन्मूलं छायायां शोध्यं नरभानवर्गरूपेण¹ ।
भागं हृत्वा लब्धं स्तम्भस्यावनतिरेव स्यात् ॥ ३३ ॥
अत्रोद्देशकः
द्विगुणा पुरुषच्छाया त्र्युत्तरदशहस्तशङ्कोर्भा ।
एकोनत्रिंशत्सा स्तम्भावनतिश्च का तत्र ॥ ३४ ॥
१. हस्तलिपि में नरभान के लिए नृभावर्ग पाठ है; परन्तु वह छंद की दृष्टि से अशुद्ध है ।
किसी स्तंभ अथवा ऊर्ध्वाधर शंकु की अवनति (झुकाव) के माप को निकालने के लिए नियम—
मानवी छाया के वर्ग और शंकु की ऊँचाई के वर्ग के गुणनफल को दी गई छाया के वर्ग में
घटाया जाता है । यह शेष, मानवी छाया की वर्ग राशि में एक जोड़ने से प्राप्त योगफल द्वारा गुणित
किया जाता है । इस प्रकार प्राप्त राशि दी गई छाया के वर्ग में से घटायी जाती है । परिणामी शेष
के वर्गमूल को छाया के दिये गये माप में से घटाया जाता है । इस प्रकार प्राप्त राशि को जब मानवी
छाया की वर्ग राशि में एक जोड़ने से प्राप्त योगफल द्वारा भाजित किया जाता है, तब स्तंभ की शुद्ध
अवनति ( झुकाव ) का माप प्राप्त होता है ॥ ३२-३३ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
इस समय मानवी छाया मानवी ऊँचाई से दुगुनी है । स्तंभ की छाया २९ हस्त है, और
स्तंभ की ऊँचाई १३ हस्त है । यहाँ स्तंभ की अवनति का माप क्या है ? ॥ ३४ ॥ प्रासाद के भीतर
( ३२-३३ ) मानलो अवनत ( झुके हुए ) स्तंभ की
स्थिति अ ब द्वारा निरूपित है । मानलो वही स्तंभ ऊर्ध्वाधर ( लंब-
रूप ) स्थिति में अ द द्वारा निरूपित है । क्रमशः अ स तथा अ इ
उनकी छाया हैं । तब उस समय मानव की छाया और उसकी
ऊँचाई का अनुपात अ इ / अ द होगी । मानलो यह अनुपात र के बराबर
है । ब से अद पर गिराया गया लंब ब ग अवनत स्तंभ अ ब की
अवनति निरूपित करता है । यह सरलता पूर्वक दिखाया जा सकता है कि
√( (अ ब)² - (ब ग)² ) / (अ स - ब ग) = अ द / अ इ = १ / र । इससे यह देखा जा सकता है कि
ब ग = [ अ स - √( (अ स)² - { (अ स)² - (अ ब)² × र² } ( र² + १ ) ) ] / ( र² + १ ) ।
यहाँ दिया गया नियम इसी सूत्र के रूप में प्ररूपित होता है ।
२७८ ] गणितसारसंग्रहः [ ९. ३५-
कश्चिद्राजकुमारः प्रासादाभ्यन्तरस्थःसन् ।
पूर्वाह्ने जिज्ञासुर्दिनगतकालं नरच्छायाम् ॥ ३५ ॥
द्वात्रिंशद्धस्तोर्ध्वे जाले प्राग्भित्तिमध्य आयाता ।
रविभा पश्चाद्भित्तौ व्यकत्रिंशत्करोर्ध्वदेशस्था ॥ ३६ ॥
तद्भित्तिद्वयमध्यं चतुरुत्तरविंशतिः करास्तस्मिन् ।
काले दिनगतकालं नृच्छायां गणक विगणय्य ।
कथयच्छायागणिते यद्यस्ति परिश्रमस्तव चेत् ॥ ३७½ ॥
समचतुरश्रायां दशहस्तघनायां नरच्छाया ।
पुरुषोत्सेधद्विगुणा पूर्वाह्ने प्राक्तटच्छाया ॥ ३८½ ॥
तस्मिन् काले पश्चात्तटाश्रिता का भवेद्गणक ।
आरूढच्छायाया आनयनं वेत्सि चेत्कथय ॥ ३९½ ॥
शङ्कोर्दीपच्छायानयनसूत्रम्—
शङ्कूनितदीपोन्नतिराप्ता शङ्कुप्रमाणेन ।
तल्लब्धहृतं शङ्कोः प्रदीपशङ्क्वन्तरं छाया ॥ ४०½ ॥
ठहरा हुआ कोई राजकुमार पूर्वाह्न दिन में बीते हुए समय को ज्ञात करने का, तथा (मानवी ऊँचाई के
पदों में व्यक्त) मानवी छाया के माप को ज्ञात करने का इच्छुक था । तब सूर्य की रश्मि पूर्व की
ओर की दीवाल के मध्य में ३२ हस्त ऊँचाई पर स्थित खिड़की में से आकर, पश्चिम ओर की दीवाल
पर २९ हस्त की ऊँचाई तक पड़ी । उन दो दीवालों का अंतर २४ हस्त है । हे छाया प्रश्नों से भिज्ञ
गणितज्ञ, यदि तुमने छाया-प्रश्नों (से परिचित होने) में परिश्रम किया हो, तो (उस दिन) बीते
हुए दिन के समय का माप और उस समय (मानवी ऊँचाई के पदों में व्यक्त) मानवी छाया का
माप बतलाओ ॥ ३५-३७½ ॥
पूर्वाह्न समय मानवी छाया मानवी ऊँचाई से दुगुनी है । प्रत्येक विमिति में (dimension)
१० हस्त वाले वर्गाकार छेद के ऊर्ध्वाधर खात के संबंध में पूर्वी दीवाल से उत्पन्न, पश्चिमी दीवाल
पर पड़ने वाली की ऊँचाई क्या होगी ? हे गणितज्ञ, यदि जानते हो, तो बतलाओ की लंबरूप दीवाल
पर आरूढ छाया छाया का माप कितना होगा ? ॥ ३८½-३९½ ॥
किसी दीवाल के प्रकाश के कारण उत्पन्न होनेवाली शंकु की छाया को निकालने के लिये नियम:—
शंकु की ऊँचाई द्वारा हासित दीपक की ऊँचाई को शंकु की ऊँचाई द्वारा भाजित करना
चाहिये । यदि इस प्रकार प्राप्त भजनफल के द्वारा दीपक और शंकु के बीच की क्षैतिज दूरी को भाजित
किया जाय तो शंकु की छाया का माप उत्पन्न होता है ॥ ४०½ ॥
(३५-३७½) यह प्रश्न श्लोकों ८½ और २३ में दिये गये नियमों के विषय में है ।
(३८½-३९½) यह प्रश्न श्लोक २१ में दिये गये नियमानुसार हल किया जाता है ।
(४०½) बीजीय रूप से कथित नियम यह है:—छ = स ÷ (ब - अ)/अ , जहाँ 'छ' शंकु की छाया का
-९. ४४ ] छायाव्यवहारः [ २७९
अत्रोद्देशकः
शङ्कुप्रदीपयोर्मध्यं षण्णवत्यङ्गुलानि हि ।
द्वादशाङ्गुलशङ्कोस्तु दीपच्छायां वदाशु मे षष्टिर्दीपशिखोत्सेधो गणितार्णवपारग ॥ ४२ ॥
दीपशङ्क्वन्तरानयनसूत्रम्—
शङ्कुनितदीपोन्नतिराप्ता शङ्कुप्रमाणेन ।
तल्लब्धहता शङ्कुच्छाया शङ्कुप्रदीपमध्यं स्यात् ॥ ४३ ॥
अत्रोद्देशकः
शङ्कुच्छायाङ्गुलान्यष्टौ षष्टिर्दीपशिखोदयः ।
शङ्कुदीपान्तरं ब्रूहि गणितार्णवपारग ॥ ४४ ॥
दीपोन्नतिसंख्यानयनसूत्रम्—
————————————————————————————————————————————————
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी शंकु और दीपक की क्षैतिज दूरी वास्तव में ९६ अंगुल है । दीपक की लौ की ऊँचाई
जमीन से ६० अंगुल है । हे गणितार्णव (गणित समुद्र) के पारगामी, मुझे शीघ्र ही १२ अंगुल
ऊँचे शंकु के संबंध में दीपक की लौ के कारण उत्पन्न होने वाली छाया का माप बतलाओ ॥ ४१½-४२ ॥
दीपक और शंकु के क्षैतिज अंतर को प्राप्त करने के लिए नियम—
(जमीन से) दीपक की ऊँचाई को शंकु की ऊँचाई द्वारा ह्रासित किया जाता है । परिणामी
राशि को शंकु की ऊँचाई द्वारा भाजित करते हैं । शंकु की छाया के माप को, इस प्रकार प्राप्त भजनफल
द्वारा गुणित करने पर, दीपक और शंकु का क्षैतिज अंतर प्राप्त होता है ॥ ४३ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
शंकु की छाया की लंबाई ८ अंगुल है । दीप शिखा (दीपक की लौ) की (जमीन से)
ऊँचाई ६० अंगुल है । हे गणितार्णव के पारगामी, दीपक और शंकु के क्षैतिज अंतर के माप को
बतलाओ ॥ ४४ ॥
दीपक की (जमीन से ऊपर की) ऊँचाई के संख्यात्मक माप को प्राप्त करने के लिये नियम--
————————————————————————————————————————————————
माप है, 'अ' शंकु की ऊँचाई का माप है, ब' दीपक की ऊँचाई का माप है,
और 'स' दीपक तथा शंकु के बीच का क्षैतिज अंतर है ।
यह सूत्र पार्श्व में दी गई आकृति से स्पष्ट रूप से सिद्ध किया जा
सकता है ।
(४३) पिछली टिप्पणी में उपयोग में लाये गये प्रतीकों को ही उप-
योग में लाकर, इस नियमानुसार स = छ × (ब - अ) / अ होता है ।
(४४) अगले ४६-४७ वें श्लोकों के अनुसार शंकु की ऊँचाई का दिया गया माप १२
अंगुल है ।
२८० ] गणितसारसंग्रहः [ ९. ४५-
शङ्कुच्छायाभक्तं प्रदीपशङ्क्वन्तरं सैकम् ।
शङ्कुप्रमाणगुणितं लब्धं दीपोन्नतिर्भवति ॥ ४५ ॥
अत्रोद्देशकः
शङ्कुच्छाया द्विनिघ्नैव द्विशतं शङ्कुदीपयोः ।
अन्तरं ह्यङ्गुलान्यत्र का दीपस्य समुन्नतिः ॥ ४६ ॥
शंकुप्रमाणमत्रापि द्वादशाङ्गुलकं गते ।
ज्ञात्वोदाहरणे सम्यग्विद्यात्सूत्रार्थपद्धतिम् ॥ ४७ ॥
पुरुषस्य पादच्छायां च तत्पादप्रमाणेन वृक्षच्छायां च ज्ञात्वा वृक्षोन्नतेः संख्यानयनस्य
च, वृक्षोन्नतिसंख्यां च पुरुषस्य पादच्छायायाः सङ्ख्यानयनस्य च सूत्रम्—
स्वच्छायया भक्तनिजेष्टवृक्षच्छाया पुनस्सप्तभिराहता सा ।
वृक्षोन्नतिः साद्रिहृता स्वपादच्छायाहता स्याद्द्रुमभैव नूनम् ॥ ४८ ॥
दीपक और शंकु के क्षैतिज अंतर के माप को, शंकु की छाया द्वारा भाजित किया जाता है ।
तब इस परिणामी भजनफल में एक जोड़ा जाता है । इस प्रकार प्राप्त राशि जब शंकु की ऊँचाई के
माप द्वारा गुणित की जाती है, तब दीपक की ( जमीन से ऊपर की ) ऊँचाई का माप उत्पन्न
होता है ॥ ४५ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
शंकु की छाया की लंबाई उसकी ऊँचाई से दुगुनी है । दीपक और शंकु की क्षैतिज दूरी का
माप २०० अंगुल है । इस दशा में दीपक की जमीन से ऊँचाई कितनी है ? इसी तथा गत प्रश्न में
शंकु की ऊँचाई १२ अंगुल लेकर नियम के साधन का अर्थ भलीभाँति सीख लेना चाहिये ॥ ४६-४७ ॥
जब मनुष्य की ( पाद प्रमाण में दी गई ) छाया की लंबाई का माप तथा ( उसी पाद प्रमाण
में दी गई ) वृक्ष की छाया की लंबाई का माप ज्ञात हों, तब उस वृक्ष की ऊँचाई का संख्यात्मक
माप निकालने के लिए नियम; साथ ही जब ( उसी पाद प्रमाण में ) वृक्ष की ऊँचाई का संख्यात्मक
माप तथा मनुष्य की छाया की लंबाई का संख्यात्मक माप ज्ञात हो, तब ( उसी पाद प्रमाण में ) वृक्ष
की छाया की लंबाई का संख्यात्मक माप निकालने के लिये नियम—
किसी व्यक्ति द्वारा चुने गये वृक्ष की छाया की लंबाई के माप को निज पाद प्रमाण में नापी
गई उसकी निज की छाया के माप द्वारा भाजित किया जाता है । इससे वृक्ष की ऊँचाई प्राप्त होती है ।
यह वृक्ष की ऊँचाई ७ द्वारा भाजित होकर और निज पाद प्रमाण में नापी गई निज की छाया द्वारा
गुणित होकर, निःसन्देह, वृक्ष की छाया की शुद्ध लंबाई के माप को उत्पन्न करती है ॥ ४८ ॥
( ४५ ) इसी प्रकार, ब = ( स/छ + १ ) अ
( ४८ ) यह नियम उपर्युक्त १२½ वें श्लोक के उत्तरार्द्ध में दिये गये नियम की विलोम दशा है ।
यहाँ दिये गये नियम में मनुष्य की ऊँचाई और उसके पाद माप के बीच का संबंध उपयोग में लाया
गया है ।
-९. ५२ ½ ] छायाव्यवहारः [ २८१
अत्रोद्देशकः
आत्मच्छाया चतुःपादा वृक्षच्छाया शतं पदाम् ।
वृक्षोच्छ्रायः को भवेत्स्वपादमानेन तं वद ॥ ४९ ॥
वृक्षच्छायायाः संख्यानयनोदाहरणम्—
आत्मच्छाया चतुःपादा पञ्चसप्ततिभिर्युतम् ।
शतं वृक्षोन्नतिर्वृक्षच्छाया स्यात्कियती तदा ॥ ५० ॥
पुरतो योजनान्यष्टौ गत्वा शैलो दशोदयः ।
स्थितः पुरे च गत्वान्यो योजनाशीतितस्ततः ॥ ५१ ॥
तदग्रस्थाः प्रदृश्यन्ते दीपा रात्रौ पुरे स्थितैः ।
पुरमध्यस्थशैलस्यच्छाया पूर्वांगमूलयुक् ।
अस्य शैलस्य वेधः को गणकाशु प्रकथ्यताम् ॥ ५२ ½ ॥
इति सारसंग्रहे गणितशास्त्रे महावीराचार्यस्य कृतौ छायाव्यवहारो नाम अष्टमः समाप्तः ॥
॥ समाप्तोऽयं सारसंग्रहः ॥
उदाहरणार्थ एक प्रश्न
पाद माप में निज की छाया की लम्बाई ४ है । ( उसी पाद माप में ) वृक्ष की छाया की
लम्बाई १०० है । बतलाओ कि ( उसी पाद माप में ) वृक्ष की ऊँचाई क्या है ? ॥ ४९ ॥
किसी वृक्ष की छाया के संख्यात्मक माप को निकालने के संबंध में उदाहरण—
किसी समय निज की छाया की लम्बाई का माप निज के पाद से चौगुना है । किसी वृक्ष की
ऊँचाई ( ऐसे पाद-माप में ) १७५ है । उस वृक्ष की छाया का माप क्या है ? ॥ ५० ॥ किसी नगर के पूर्व
की ओर ८ योजन (दूरी) चल चुकने के पश्चाव, १० योजन ऊँचा शैल (पर्वत) मिलता है । नगर में भी
१० योजन ऊँचाई का पर्वत है । पूर्वी पर्वत से पश्चिम की ओर ८० योजन चल चुकने के पश्चात् , एक
और दूसरा पर्वत मिलता है । इस अंतिम पर्वत के शिखर पर रखे हुए दीप नगर निवासियों को दिखाई
देते हैं । नगर के मध्य में स्थित पर्वत की छाया पूर्वी पर्वत के मूल को स्पर्श करती है । हे गणक, इस
( पश्चिमी ) पर्वत की ऊँचाई क्या है ? शीघ्र बतलाओ ॥ ५१-५२ ½ ॥
इस प्रकार, महावीराचार्य की कृति सार संग्रहनामक गणित शास्त्र में छाया नामक अष्टम व्यवहार
समाप्त हुआ ।
इस प्रकार यह सारसंग्रह समाप्त हुआ ।
( ५१-५२ ½ ) यह उदाहरण उपर्युक्त ४५ वें श्लोक में दिये गये नियम को निर्देशित करने
के लिये है ।
परिशिष्ट १
संख्याओं का अभिधान करनेवाले सामान्य और संख्यात्मक अर्थबोधक संस्कृत शब्द
| शब्द | सामान्य अर्थ | संख्या अभिधान | उद्गम |
|---|---|---|---|
| अक्षि | आँख The eye | २ | मनुष्य की दो आँखें होती हैं । |
| अग्नि | आग Fire | ३ | होमाग्नियों की संख्या ३ है, अर्थात् , गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिण । |
| अङ्क | संख्या Number | ९ | शून्य को छोड़कर केवल ९ अङ्क होते हैं । |
| अङ्ग | विज्ञान का एक विभाग<br>An auxiliary division or department of science | ६ | वेदों के अध्ययन के संबंध में ६ विभाग होते हैं, अर्थात् , शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्दस्, ज्योतिष । |
| अचल | पर्वत A mountain | ७ | पौराणिक भूगोल में माने गये ७ मुख्य पर्वत जो कुलाचल कहलाते हैं; अर्थात् , महेन्द्र, मलय, सह्य, शक्तिमत्, ऋक्ष, विंध्य, पारियात्र । |
| अद्रि | पर्वत A mountain | ७ | अचल देखिए । |
| अनन्त | आकाश The sky | ० | आकाश को शून्य समझा जाता है । |
| अनल | आग Fire | ३ | अग्नि देखिए । |
| अनीक | सेना An army | ८ | संस्कृत में ८ प्रकार की सेनाओं का उल्लेख है, अर्थात् पत्ति, सेनामुख, गुल्म, गण, वाहिनी, पृतना, चमू, अनीकिनी । ( जिनागम में गण की जगह अक्षौहिणी का उल्लेख है ।) |
| अन्तरिक्ष | आकाश The sky | ० | अनन्त देखिए । |
| अब्धि | महासागर The ocean | ४ | चार महासागर माने जाते हैं, अर्थात्, पूर्वी, दक्षिणी, पश्चिमी और उत्तरी । |
| अम्बक | आंख The eye | २ | अक्षि देखिए । |
| अम्बर | आकाश The sky | ० | अनन्त देखिए । |
२ गणितसारसंग्रह
| शब्द | सामान्य अर्थ | संख्या अभिधान | उद्गम |
|---|---|---|---|
| अम्बुधि | महासागर The ocean | ४ | अब्धि देखिए । |
| अम्भोधि | महासागर The ocean | ४ | अब्धि देखिए । |
| अश्व | घोड़ा A horse | ७ | सूर्य के रथ में ७ घोड़े माने जाते हैं । |
| अश्विन् | घोड़े सहित Consi- | ७ | अश्व देखिए । |
| ting of horse | |||
| आकाश | आकाश The sky | ० | अनन्त देखिए । |
| इन | सूर्य The sun | १२ | वर्ष के बारह माहों के संवादी सूर्यों की संख्या १२ होती |
| है; अर्थात् , धातृ, मित्र, अर्यमन्, रुद्र, वरुण, सूर्य, भग, | |||
| विवस्वत्, पूषन्, सवितृ, त्वष्टृ और विष्णु । ये बारह | |||
| आदित्य कहलाते हैं । | |||
| इन्दु | चन्द्रमा The moon | १ | पृथ्वी के लिये केवल एक चन्द्रमा है । |
| इन्द्र | इन्द्र देवता The god | १४ | चौदह मन्वन्तरों में से प्रत्येक के लिये १ इन्द्र की दर से |
| Indra | चौदह इन्द्र होते हैं । | ||
| इन्द्रिय | इन्द्रिय An organ | ५ | इन्द्रियां पांच प्रकार की होती हैं, आँख, नाक, जीभ, कान |
| of sense | और शरीर ( स्पर्शन ) । | ||
| इभ | हाथी An elephant | ८ | संसार की आठ दिशा विदिशाओं की रक्षा आठ हाथी करते |
| हुए कहे जाते हैं । वे ऐरावत, पुण्डरीक, वामन, कुमुद, | |||
| अञ्जन, पुष्पदन्त, सार्वभौम और सुप्रतीक हैं । | |||
| इषु | धनुष An arrow | ५ | मन्मथ के पाँच बाण माने जाते हैं, अर्थात्, अरविन्द, अशोक, |
| चूत, नवमल्लिका और नीलोत्पल । | |||
| ईक्षण | आँख The eye | २ | अक्षि देखिए । |
| उदधि | महासागर | ४ | अब्धि देखिए । |
| The ocean | |||
| उपेन्द्र | भगवान् विष्णु | ९ | विष्णु के ९ अवतार माने जाते हैं । |
| God Viṣṇu | |||
| ऋतु | ऋतु A season | ६ | संस्कृत साहित्य के अनुसार वर्षा में ६ ऋतुएँ होती हैं, |
| अर्थात् , वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर । | |||
| कर | हाथ The hand | २ | मानव के दो हाथ होते हैं । |
| करणीय | जो किये जाते हैं, व्रत | ५ | जैन धर्म के अनुसार पाँच प्रकार के व्रत होते हैं, अर्थात् , |
| That which has | अहिंसा, अनृत, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह । | ||
| to be done : an | |||
| act of devotion | |||
| or austerity |
गणितसारसंग्रह ३
शब्द | सामान्य अर्थ | संख्या अभिधान | उद्गम
करिन् | हाथी An elephant | ८ | इभ देखिए ।
कर्मन् | कर्म अथवा कार्य करने | ८ | जैन धर्म के अनुसार आठ प्रकार के कर्म ( प्रकृतिबंध )
| का प्रभाव Action : | | होते हैं, अर्थात्, ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय,
| the effect of | | अन्तराय, वेदनीय, नामिक, गोत्रिक और आयूष्क ।
| action as its | |
| karma | |
कलाधर | चन्द्रमा The moon | १ | इन्दु देखिए ।
कषाय | संसारी वस्तुओं में आसक्ति | ४ | जैन धर्म के अनुसार कर्मों के आस्रव का एक भेद कषाय
| Attachment to | | है, जिसके चार प्रकार हैं, अर्थात्, क्रोध, मान, माया
| worldly objects | | और लोभ ।
कुमारवदन | कुमार अथवा हिंदू युद्ध- | ६ | यह युद्धदेव छः मुखोंवाला माना जाता है ।
| देव के मुख The | | षण्मुख देखिये ।
| faces or Kumāra | |
| of the Hindu | |
| war-god | |
केशव | विष्णु का एक नाम A | ९ | उपेन्द्र देखिए ।
| name of Viṣṇu | |
क्षपाकर | चन्द्रमा The moon | १ | इन्दु देखिए ।
ख | आकाश Sky | ० | अनन्त देखिए ।
खर | | ६ |
गगनं | आकाश Sky | ० | अनन्त देखिए ।
गज | हाथी Elephant | ८ | इभ देखिए ।
गति | पुनर्जन्म का मार्ग | ४ | जैन धर्म के अनुसार संसारी जीव चार गतियों में जन्म लेते
| Passage into | | हैं, अर्थात्, देव, तिर्यञ्च, मनुष्य, नरक । पिथेगोरस का
| rebirth | | Tetractys इससे तुलनीय है ।
गिरि | पर्वत Mountain | ७ | अचल देखिए ।
गुण | गुण Quality | ३ | आदि पदार्थ में तीन गुण माने जाते हैं, अर्थात्, सत्त्व,
| | | रजस्, तमस् ।
ग्रह | ग्रह A planet | ९ | हिन्दू ज्योतिष में ९ प्रकार के ग्रह माने जाते हैं, अर्थात्,
| | | मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु, सूर्य और
| | | चन्द्रमा ।
चक्षुस् | आँख The eye | २ | अक्षि देखिए ।
४ गणितसारसंग्रह
| शब्द | सामान्य अर्थ | संख्या अभिधान | उद्गम |
|---|---|---|---|
| चन्द्र | चन्द्रमा The moon | १ | इन्दु देखिए । |
| चन्द्रमस् | चन्द्रमा The moon | १ | इन्दु देखिए । |
| जलधर पथ | आकाश Sky | ० | अनन्त देखिए । |
| जलधि | महासागर Ocean | ४ | अब्धि देखिए । |
| जलनिधि | महासागर Ocean | ४ | अब्धि देखिए । |
| जिन | वह नाम जिसमें अरिहंत | २४ | जिन आगम के अनुसार भरत कर्मक्षेत्र में अवसर्पिणी काल |
| सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय | में २४ तीर्थंकर होते हैं; प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव और | ||
| और सर्व साधुओं का | अंतिम तीर्थंकर वर्द्धमान महावीर माने जाते हैं। | ||
| नाम गर्भित रहता है। | |||
| The name which | |||
| implies Arhat, | |||
| Siddhas, Achryas, | |||
| Upadhyayas & | |||
| all Saints. | |||
| ज्वलन | आग Fire | ३ | अग्नि देखिए । |
| तत्व | तत्व | ७ | जैन धर्म में सात तत्वों की मान्यता इस प्रकार है : जीव |
| Elementary Pri- | (चेतन), अजीव (अचेतन), आस्रव (कर्मों के आने | ||
| nciples. | के द्वार), बंध (कर्मों का आत्मा के साथ सम्बन्ध), | ||
| संवर (आस्रव का निरोध), निर्जरा (कर्मों का एक देश | |||
| नाश) और मोक्ष (आत्मा का पूर्ण रूप से कर्मों से छूटना)। | |||
| तनु | काय Body | ८ | शिव का तनु आठ वस्तुओं से बना हुआ माना जाता है : |
| पृथ्वी, अप्, तेजस्, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र, यजमान । | |||
| तर्क | Evidence | ६ | तर्क के छः प्रकार हैं : प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, |
| अर्थापत्ति और अनुपलब्धि । | |||
| तार्क्ष्यध्वज | विष्णु Viṣṇu | ९ | उपेन्द्र देखिए । |
| तीर्थंक | Tirthankar or | २४ | जिन देखिए । |
| Jina. | |||
| दन्तिन् | हाथी An elephant | ८ | इभ देखिए । |
| दुरित | सांसारिक कर्म | ८ | कर्मन् देखिए । |
| Worldly action |
गणितसारसंग्रह ५
| शब्द | सामान्य अर्थ | संख्या अभिधान | उद्गम |
|---|---|---|---|
| दुर्गा | पार्वती का अवतार<br>Name of Manifestation of Parvati or Durga. | ९ | दुर्गा के ९ अवतार माने जाते हैं । |
| दिक् | दिशा बिन्दु Quarter or a cardinal point of the universe. | ८ | लोक में आठ दिशाबिन्दु माने जाते हैं । |
| दिक् | दिशाएँ Directions | १० | दस दिशाओं की मान्यता इस प्रकार है कि चार दिशाएँ, चार विदिशाएँ तथा अधो और ऊर्ध्व दिशाएँ मिलकर दस दिशाएँ होती हैं । |
| दिक् | आकाश Sky | ० | अनन्त देखिए । |
| दृक् | आँख The eye | २ | अक्षि देखिए । |
| दृष्टि | ” ” ” | ” | ” ” |
| द्रव्य | द्रव्य का लक्षण सत् है और जो उत्पत्ति, विनाश और ध्रौव्यता सहित है वह सत् है । Elementary substance whose characteristic is existence implying manifestation , disappearance & permanence. | ६ | जिनागम के अनुसार ६ द्रव्य हैं: जीव, धर्म, अधर्म, पुद्गल, काल और आकाश । |
| द्विप | हाथी<br>An Elephant | ८ | इभ देखिए । |
| द्विरद | ” | ” | ” |
| द्वीप | पृथ्वी में स्थित पौराणिक द्वीप विभाग<br>A puranic insular division of the terrestrial world. | ७ | इनके सात विभाग हैं : जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौञ्च, शाक, पुष्कर । |
६ गणितसारसंग्रह
शब्द | सामान्य अर्थ | संख्याभिधान | उद्गम
धातु | शरीर के सरंचक | ७ | सप्त धातुएँ ये हैं—रस ( Chyle ), रक्त, मांस,
| अवयव Constituent | | चर्बी, अस्थि, मज्जा, वीर्य ।
| principles of | |
| the body. | |
धृति | छंद के एक विभेद | १८ | इस छंद में श्लोक के प्रत्येक पद में १८ अक्षर
| का नाम Name of | | रहते हैं ।
| a kind of metre. | |
नग | पर्वत | ७ | अचल देखिए ।
| Mountain | |
नन्द | राजाओं के वंश का नाम | ९ | कहा जाता है कि मगध में ९ नन्द राजाओं ने राज्य
| Name of a dyna- | | किया ।
| sty of kings | |
नभस् | आकाश Sky | ० | अनन्त देखिये ।
नय | वस्तु के एक अंश ग्रहण | २ | जिनागम में मुख्यतः दो नयों का निरूपण है : द्रव्यार्थिक
| करने वाला ज्ञान | | नय और पर्यायार्थिक नय ।
| Method of | |
| Comprehending | |
| things from | |
| particular stand- | |
| points. | |
नयन | आँख The eye | २ | अक्षि देखिए ।
नाग | हाथी An elephant | ८ | इभ देखिए ।
निधि | खजाना Treasure | ९ | कुबेर के पास नव प्रसिद्ध निधियाँ मानी जाती हैं :
| | | पद्म, महापद्म, शङ्ख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द,
| | | नील, खर्व । जिनागम में चक्रवर्ती के भी इनसे भिन्न नव-
| | | निधियों का उल्लेख है ।
नेत्र | आँख The eye | २ | अक्षि देखिए ।
पदार्थ | वस्तुओं के विभेद | ९ | जिनागम में सात तत्व तथा पुण्य और पाप ये दो
| Category of | | मिलकर नव पदार्थ होते हैं । तत्व देखिए ।
| things | |
गणितसारसंग्रह ७
शब्द | सामान्य अर्थ | संख्या अभिधान | उद्गम
पन्नग | सर्प The serpent | ७ | हिन्दू पुराणों में कभी कभी आठ और कभी कभी
| | | सात प्रकार के सर्पों का वर्णन मिलता है ।
पयोधि | समुद्र Ocean | ४ | अब्धि देखिए ।
पयोनिधि | " " | " | " "
पावक | अग्नि Fire | ३ | अग्नि देखिए ।
पुर | नगर City | ३ | हिन्दू पुराणों के अनुसार तीन असुरों के प्ररूपक तीन
| | | पुरों ने देवों के प्रति अत्याचार किया और शिव ने उन्हें
| | | विनष्ट किया । त्रिपुरान्तक से तुलना करिए ।
पुष्करिन् | हाथी Elephant | ८ | इभ देखिए ।
प्रालेयांशु | चंद्रमा The Moon | १ | इन्दु देखिए ।
बन्ध | कर्म बंध Karmic | ४ | जिनागम में बंध के मुख्यतः चार भेद बतलाए गये
| bondage | | हैं : प्रकृति बंध, स्थिति बंध, अनुभाग बंध और प्रदेश बंध ।
बाण | बाण Arrow | ५ | इषु देखिए ।
भ | नक्षत्र | २७ | हिन्दू ज्योतिष में सूर्य पथ पर मुख्यतः २७ नक्षत्रों
| A constellation | | की गणना की गई है ।
भय | डर Fear | ७ |
भाव | तत्व Elements | ५ | पांच तत्व या पंच भूत ये हैं : पृथ्वी, अप्, तेजस्,
| | | वायु, आकाश ।
भास्कर | सूर्य The Sun | १२ | इन देखिए ।
भुवन | लोक The World | ३ | ऊर्ध्वलोक, मध्यलोक, और अधोलोक, की मान्यता है ।
भूत | तत्व Element | ५ | भाव देखिए ।
भूभ्र | पर्वत Mountain | ७ | अचल देखिए ।
मद | घमण्ड Pride | ८ | अष्ट मद के भेद इस प्रकार है : ज्ञान, रूप, कुल,
| | | जाति, बल, ऋद्धि, तप, शरीर का मद ।
महीभ्र | पर्वत Mountain | ७ | अचल देखिए ।
मातृका | देवी A goddess | ७ | साधारणतः सात प्रकार की देवियाँ मानी जाती हैं ।
मुनि | साधु Sage | ७ | मुख्यतः सात प्रकार के ऋषियों का उल्लेख मिलता
| | | है : कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि,
| | | वसिष्ठ ।
मृगाङ्क | चंद्रमा The Moon | १ | इन्दु देखिए ।
रुद्र | शिव या रुद्र का नाम | ११ | रुद्रों की संख्या ११ मानी गई है ।
| A name of Śiva | |
| or Rudra | |
८ गणितसारसंग्रह
शब्द | सामान्य अर्थ | संख्या अभिधान | उद्गम
यति | मुनि Sage | ७ | मुनि देखिए ।
रजनीकर | चंद्रमा The Moon | १ | इन्दु देखिए ।
रत्न | त्रयनिधि Trinity | ३ | जिनागम में मोक्ष का मार्ग सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान,
| | | और सम्यक्चारित्र का एक होना बतलाया गया है, जिन्हें
| | | तीन रत्न भी निरूपित किया गया है ।
रत्न | मूल्यवान पत्थर A pre- | ९ | नव प्रकार के रत्न माने गये हैं : वज्र, वैडूर्य, गोमेद,
| cious gem | | पुष्पराग, पद्मराग, मरकत, नील, मुक्ता, प्रवाल ।
रन्ध्र | छिद्र Opening | ९ | मानव शरीर में नव मुख्य रन्ध्र होते हैं ।
रस | स्वाद Taste | ६ | मुख्य रस छः हैं : मधुर, अम्ल, लवण, कटुक,
| | | तिक्त, कषाय ।
रुद्र | शिव का नाम Name | ११ | मृड देखिए ।
| of a Deity | |
रूप | आकार Form or | १ | प्रत्येक वस्तु का केवल एक रूप होता है ।
| shape | |
लब्ध | नव शक्तियों की प्राप्ति | ९ | नव लब्धियाँ निम्नलिखित हैं : अनन्त दर्शन, अनन्त-
| Attainment of | | ज्ञान, क्षायिक सम्यक्त्व, क्षायिक चारित्र, क्षायिक दान,
| nine powers | | क्षायिक लाभ, क्षायिक भोग, क्षायिक उपभोग, क्षायिक
| | | वीर्य । ये कर्मों के क्षय से क्षायिक भाव के रूप प्राप्त
| | | होते हैं ।
लब्धि | Attainment | ९ | लब्ध देखिए ।
लेख्य | | ६ |
लोक | World | ३ | भुवन देखिए ।
लोचन | आँख The eye | २ | अक्षि देखिए ।
वर्ण | | ६ | जिनागम में वर्ण के पांच प्रकार हैं : कृष्ण, नील, पीत,
| | | रक्त और श्वेत ।
वसु | वैदिक देवताओं की एक | ८ | ये देवता संख्या में आठ होते हैं ।
| जाति A class of | |
| Vedic deities | |
वह्नि | अग्नि Fire | ३ | अग्नि देखिए ।
वारण | हाथी Elephant | ८ | इभ देखिए ।
वार्धि | समुद्र Ocean | ४ | अब्धि देखिए ।
विधु | चंद्रमा The moon | १ | इन्दु देखिए ।
विषधि | समुद्र Ocean - | ४ | अब्धि देखिए ।
विषनिधि | " | " | "