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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

श्री एकनाथ-चरित्र
एकनाथ का जन्म संत परिवार में हुआ था। उनके परदादा भानुदास महाराष्ट्र के महान संत थे। उनके पुत्र
थे चक्रपाणि और उनके पुत्र थे सूर्यनारायण। एकनाथ ने सूर्यनारायण के घर में शक १४५० में पैठण में जन्म
लिया। एकनाथ को ज्ञानेश्वर का अवतार कहा जाता है क्योंकि उन्होंने ज्ञानेश्वर के कार्य को पूरा किया। तेरहवीं
सदी के अन्तिम दशक में ज्ञानेश्वर ने अपनी इहलीला समाप्त की। उन्होंने ज्ञानेश्वरी के रूप में जो ज्ञानसम्पदा
महाराष्ट्र को सौंपी उसका प्रचार-प्रसार करने का दायित्व नामदेव के कन्धों पर आ पड़ा। उन्होंने ई०स० १३५०
तक यह जिम्मेदारी निभायी लेकिन अगले दो सौ वर्ष का कालखण्ड (ई०स० १३५० से १५५० के बीच) इस
कार्य के लिए अनुपयुक्त था क्योंकि इसी कालखण्ड में मुसलमानों ने देश में भयानक उत्पात मचाया और
अशांति का वातावरण बना दिया। फिर एकनाथ का उदय हुआ। उन्होंने महाराष्ट्र में परमार्थ विषयक जागृति का
बिगुल बजाया। उनके प्रयासों से जनजीवन में धार्मिक आस्था जोर मारने लगी और जीवन सामान्य हो चला।
एकनाथ का जन्म मूल नक्षत्र में हुआ था। उनके जन्म के कुछ ही महीने बाद उनके माता-पिता की मृत्यु
हो गयी। वे अकेले रह गये तो उनके दादा-दादी लाड़-प्यार से उन्हें 'एका' कहकर पुकारने लगे। छठवें वर्ष ही
उनका जनेऊ हो गया और उन्हें घर में ही ब्रह्मकर्म की शिक्षा दी जाने लगी। घर में जो गुरु पढ़ाने आते थे वे
उनकी बुद्धि की तीव्रता से परेशान थे। एक दिन उन्होंने चक्रपाणीजी से कह ही दिया, "मैंने तो पेट के लिये
कथा कहना सीखा था किन्तु आपका पौत्र ऐसे जटिल प्रश्न करता है कि मैं उसका समाधान नहीं कर पाता।"
बारह वर्ष की आयु तक आते-आते उसने रामायण, महाभारत आदि पौराणिक ग्रन्थों का अध्ययन पूरा कर लिया
था। दैनिक कृत्य के उपरान्त वे भगवद्भजन में लग जाते। एक रात वे अकेले ही शिवालय में बैठकर राम-कृष्ण-
हरि का मंत्र जप रहे थे कि तभी उन्हें आत्मिक प्रेरणा हुई कि देवगढ़ जाकर जनार्दन स्वामी के चरणों में गिरना
है। वे दादा-दादी से बिना कुछ कहे ही देवगढ़ के लिये चल पड़े। तीसरे दिन प्रातःकाल वे देवगढ़ पहुँचे। गुरु
के दर्शन होते ही वे मानों गद्गद् हो गये। उन्होंने स्वयं को उनके चरणों में सौंप दिया। यह शक संवत् १४६७
की घटना है।
एकनाथ जनार्दन स्वामी के व्यक्तित्व से अत्यधिक प्रभावित हुए। ब्राह्मण कुल में पैदा होकर वे यवन
शासक की नौकरी में थे लेकिन किसी भी कर्म में वे कम नहीं थे। प्रातःकाल से मध्याह्न तक का काल स्नान-
संध्या, समाधि तथा दत्तात्रेय की सेवा में बीतता। इसके बाद वे अपने सरकारी कामकाज में व्यस्त हो जाते।
सायंकाल संध्यावंदन आदि से निवृत्त होकर वे 'ज्ञानेश्वरी' तथा 'अमृतानुभव' का पारायण करते। गुरुसेवा करते-
करते एकनाथजी के मनोविकार शान्त हो गये। उनकी चित्तवृत्ति शुद्ध हो गयी। उनके जैसा शिष्य पाकर जनार्दन
स्वामी अत्यन्त प्रसन्न हुए। एकनाथ ने गुरुमुख से ही ज्ञानेश्वरी, अमृतानुभव तथा श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थ सुने
और इससे उनका आत्मबोध जागृत हो गया। एक बार जनार्दन स्वामी ने एकनाथ को देवगढ़ के हिसाब-किताब
का काम सौंपा। उन्होंने देखा कि एक दिन के हिसाब में एक पाई की भूल रह गयी है। तीन पहर रात बीत जाने
पर जनार्दन स्वामी जागे तो उन्होंने एकनाथ को हिसाब मिलाते देखा। तभी संयोगवश भूल पकड़ में आ गयी थी।
एकनाथ ने जोर से ताली बजायी। गुरु ने हर्ष से पूछा, "यह ताली किसलिये बजायी?" एकनाथ ने पूरी कथा

सुना दी। उन्होंने उपदेश दिया, "नाथ! एक पाई की भूल का पता लगते ही जब तुम्हें इतना हर्ष हो रहा है तब
संसार की जो बड़ी भूल तुम्हारे हाथों हुई है उसका पता लगने से तुम्हें कितना आनन्द होगा? प्रिय शिष्य, यदि
ऐसी ही तन्मयता से श्री दत्त का चिन्तन करो तो भगवत्प्राप्ति की ताली मिल गयी समझो।" छः वर्ष तक उन्होंने
गुरु की सेवा की और जनार्दन स्वामी ने उन्हें श्री दत्तात्रेय के दर्शन कराने का संकल्प किया। देवगढ़ पर जहाँ
जनार्दन स्वामी समाधि लगाते थे वह स्थान अत्यन्त रमणीक था। इसी स्थान पर उन्हें श्री दत्तात्रेय के दर्शन होते
थे। एक दिन जनार्दन स्वामी ने एकनाथ से संकेत में ही बताया कि इस स्थान पर दत्तात्रेय भगवान के सिवाय
और कोई आता नहीं। वे किसी भी रूप में आ सकते हैं लेकिन उन्हें देखकर डरना नहीं। एक दिन जनार्दन
स्वामी पूजा से निवृत्त हुए थे तभी एक फकीर वहाँ आ पहुँचे और जनार्दन स्वामी से बातें करने लगे। उनका वेष
असाधारण था। पूरा शरीर चमड़े से ढँका हुआ था। साथ में एक कुतिया भी थी। उनकी आँखों से मानों आग
बरस रही थी। जनार्दन स्वामी ने फकीर की आज्ञा से कुतिया का दूध निकाला और मिट्टी के पात्रों में उसे उड़ेल
कर एक साथ पीने लगे। एकनाथ ने वह पात्र धोया और उसी धोवन को तीर्थ मानकर ग्रहण किया। फकीर ने
एकनाथ को अपने पास बुलाया। एकनाथ ने फकीर और गुरु दोनों को नमस्कार किया। फिर हाथ जोड़कर सामने
खड़े हो गये। उन्होंने देखा कि जो गुरु थे वही परमगुरु हैं और जो परमगुरु थे वही गुरु हैं। फकीर के रूप में
उपस्थित दत्तात्रेयजी बोले, "यहाँ महाभागवत का जन्म हुआ है। इसके हाथों भागवत धर्म का प्रसार होगा।"
इसका उल्लेख उन्होंने एक अभंग में इस प्रकार किया है—"एका (एकनाथ) ने जनार्दन की शरण जाकर,
आत्मदृष्टि पाकर परब्रह्म भगवान दत्त को इन आँखों से देखा।" श्री दत्तात्रेय के दर्शन से उन्हें इस बात का ज्ञान
हुआ कि सगुण-निर्गुण एक है। वह दत्त है अर्थात् अपना रूप उन्होंने पहले ही दिया हुआ है। वह सहजसिद्ध हैं,
अर्थात् बुद्धि पर से परदा हटते ही वह उपस्थित हो जाता है।
एकनाथ को श्री दत्तात्रेय भगवान के दर्शन हो गये और इनका वरप्रसाद भी मिला तो जनार्दन स्वामी के मन
में आया कि अब इससे अनुष्ठान कराना चाहिये। इसके लिये उन्होंने देवगढ़ पर वायव्य दिशा की ओर सुलभ
पर्वत पर एक सुरम्य स्थल निश्चित कर लिया। वहाँ वे ब्राह्म मुहूर्त में उठकर स्नान-संध्या आदि से निवृत्त होकर
तदुपरान्त पूर्वाभिमुख होकर सिद्धासन लगाकर बैठ जाते। श्रीकृष्ण की मूर्ति का ध्यान करना ही उनका दैनिक
कार्यक्रम था। वे इस प्रकार का अभ्यास योग करने लगे। इससे बाह्य स्फुरण की गति बन्द हो गयी और वे इसी
देह में विदेहावस्था का भोग करने लगे। जनार्दन स्वामी ने उन्हें अच्छी तरह समझा दिया था कि सगुण और
निर्गुण एक हैं। प्राणायाम, धारणा और ध्यान ये सब भक्ति के साधन हैं। वे भक्तिपूर्वक श्रीकृष्ण की मूर्ति का
ध्यान करते थे। फलस्वरूप एकनाथ को साक्षात आनन्दमय भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन हुए। देवगढ़ पर वे इस
प्रकार तपश्चर्या कर रहे थे कि एक दिन जब वे समाधि में थे तभी एक काला सर्प फूत्कार करता हुआ उन पर
टूट पड़ा और उनके शरीर से लिपट गया। आश्चर्य तो इस बात का था कि साम्य स्थिति का अनुभव करने वाले
एकनाथ के अंगस्पर्श से कालसर्प की दंश करने की दुष्ट बुद्धि नष्ट हो गयी ओर वह नाथ के मस्तक पर फन
फैलाकर झूमने लगा।
एकनाथ जब अनुष्ठान सम्पन्न कर घर लौटे तो गुरु जनार्दन स्वामी ने विचार किया अब उनका यहाँ का
काम समाप्त हो चुका है अतः अब उसे तीर्थयात्रा के लिये भेज देना चाहिये। वे चाहते थे कि इस प्रकार अनेक
संत-महात्माओं का सत्संग लाभ कर वह भागवत धर्म का प्रवर्तक बने। जनार्दन स्वामी ने उन्हें साथ लेकर
नासिक-त्र्यंबकेश्वर तक चलना स्वीकार कर लिया। रास्ते में गोदावरी के तट पर वे चन्द्रभट नामक ब्राह्मण के

श्री एकनाथ-चरित्र ५
आश्रम में रुके। ब्राह्मण ने अभ्यागतों का उचित स्वागत किया तथा बाद में चतुःश्लोकी भागवत का निरूपण
किया। जनार्दन स्वामी को वह इतना अच्छा लगा कि उन्होंने एकनाथ को चतुःश्लोकी भागवत पर 'ओवी' छन्द
में विस्तृत ग्रन्थ लिखने की आज्ञा दे दी। दूसरे दिन वे पंचवटी-नासिक पहुँचे। वहाँ से त्र्यंबकेश्वर। फिर वहाँ से
गोदावरी के उद्गम स्थल ब्रह्मगिरि पर्वत की परिक्रमा करके तथा निवृत्तिनाथ की समाधि के दर्शन करके
पुलकित हुए। गंगास्नान, ब्राह्मण-संतर्पण आदि से निवृत्त होकर तथा एकनाथ को आगे का कार्यक्रम बताकर
जनार्दन स्वामी देवगढ़ लौट गये। उनके साथ चन्द्रभट भी चले गये।
एकनाथ ने चार-पाँच वर्ष में भारतवर्ष की यात्रा की। गुरु से बिछोह उन्हें सहन नहीं हो रहा था। गुरु का
उपदेश था—'‘योगक्षेम चलाने वाले भगवान समर्थ हैं। अपना ज्ञान कहीं प्रकट न करो और साधु-महात्माओं से
मिलते हुए अपना स्वानंद अन्दर ही अनुभव करो।’'
एकनाथ ने इस प्रकार अखण्ड मनःस्थिति में रहकर यात्रा की। पयोष्णी, नर्मदा, ताप्ती, गंगा, यमुना,
कावेरी, तुङ्गभद्रा आदि नदियों में स्नान किया, आठों विनायकों तथा बारहौं ज्योतिर्लिंगों के दर्शन किये। गोकुल,
वृन्दावन, मथुरा आदि कृष्णभक्ति के क्षेत्रों में सुख का अनुभव किया फिर प्रयाग, काशी और गया की त्रिस्थली
यात्रा की। महान भक्त नरसी भगत का जूनागढ़ प्रदेश देखा, द्वारिका का दर्शन कर भाव-विभोर हो गये। पचीसवें
वर्ष वे घर लौटे।
एकनाथ के दादा-दादी ने एकनाथ की खोज की और उसे घर लिवा आये। दादा-दादी के आग्रह से
एकनाथ ने गृहस्थाश्रम धर्म स्वीकार कर लिया। उनकी पत्नी उनके अनुरूप ही थी। गुरु के घर रहकर जिस
वेदान्त विचार का अध्ययन उन्होंने किया था उससे उन्होंने यही निष्कर्ष निकाला कि परमार्थ का सच्चा अर्थ
गृहस्थाश्रम में रहकर उसे लोकोपयोगी और जीवनोपयोगी बनाना है। उनकी लोकसेवा में जातिभेद और वर्णभेद
को कोई स्थान नहीं था। स्त्री-पुरुष में भेद करना भी उन्हें स्वीकार नहीं था। उनके इस समव्यवहार के सम्बन्ध
में कथा प्रसिद्ध है कि एक बार श्राद्ध में ब्राह्मणों के समय पर न आने पर उन्होंने पितरों के लिये बनाया भोजन
अंत्यजों को खिला दिया था। उनके विरोधकों ने यह भ्रामक प्रचार कराया कि एकनाथ देववाणी (संस्कृत) का
अपमान करके मराठी भाषा में भागवत कहता है और रचता है। यह भी कहा कि यह चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को नष्ट
कर रहा है, ज्ञानमार्ग की अपेक्षा भक्तिमार्ग को प्रधानता देता है और ब्राह्मणों के समान अन्य तीनों वर्णों का
समादर करता है। लेकिन एकनाथ अपने समभाव पर अडिग रहे। उन्होंने एक अभंग में कहा है, निंदक हमारी
काशी है, वे हमारे सारे पापों का विनाश करने वाले हैं। निंदक हमारे धोबी हैं, वे हमारे कपड़ों को बिना कुछ
लिये ही धो डालते हैं। निंदक हमारे गुरु हैं।
एकनाथजी ने विपुल ग्रन्थ रचना की है जिनमें प्रमुख हैं—'स्वात्मबोध', 'चिरंजीव पद', 'आनन्दलहरी'
आदि। नाथ भागवत उनका सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसके अतिरिक्त 'भावार्थ रामायण' उनका महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ
है।

एकनाथ की श्रीमद्भागवत
( एकादश स्कन्ध )
मान्यता है कि श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध पर जिसमें साधकोपयोगी तत्त्वज्ञान का ही विस्तृत विवेचन
है उसकी रचना करने के लिये ही एकनाथ महाराज ने जन्म लिया था। वारकरी सम्प्रदाय के लोग उन्हें संत
ज्ञानेश्वर का अवतार मानते हैं और 'ज्ञानेश्वरी' के बाद 'नाथ भागवत' को पूजनीय मानते हैं। जहाँ ज्ञानेश्वरी
में कृष्ण-अर्जुन संवाद को ग्रन्थ का आधार बनाया गया है, वहाँ नाथ-भागवत में श्रीकृष्ण उद्धव संवाद की
चर्चा है। जिस प्रकार समस्त भारतवर्ष में रामायण और महाभारत का आदरपूर्वक पठन-पाठन किया जाता है,
उसी श्रद्धा से महाराष्ट्र में एकनाथी भागवत का पठन-पाठन किया जाता है।
ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि वेद अत्यन्त महान होते हुए भी देने के मामले में कंजूस हैं। वे सबके समझने
लायक भी नहीं हैं। वेद की दृष्टि से गीता अधिक उदार है। वेद की कमी को पूरा करने के लिये ही भगवान
ने गीता प्रकट की।
"वेद सम्पन्न होय ठायीं। परी कृपणु ऐसा आनु नाहीं। जे कानीं लागला तिहीं। वर्णांच्याचि ॥ ....तरी मज
पाहतां तें उणें। फेडावया गीतापणें। वेदु वेठला भलतेणें। सेव्य होआवया ॥ म्हणोनि मज कांही। समर्थनी आत
विषय नाहीं। गीता जाणा हे वाङ्मयी। श्रीमूर्त्ति प्रभुची ॥ इ० (ज्ञानेश्वरी, अ० १८)'' इसमें ज्ञानदेव ने गीता
को 'प्रभु की वाङ्मयी मूर्ति' तक कह डाला है।
गीता के सम्बन्ध में एकनाथ महाराज कहते हैं—‘‘कृष्णनिःश्वासी जन्मले वेद। गीता श्रीकृष्ण मुखें
प्रगटली शुद्ध। यालागीं गीतार्थ अगाध। धडौते वेद तेणें झाले ॥’’ (अ० ३१) अर्थात् वेदों का जन्म कृष्ण के
श्वासोच्छ्वास से हुआ लेकिन गीता साक्षात उनके मुख से प्रकट हुई यह उसकी विशेषता है। श्री गुलाबराव
महाराज तो गीता को 'जागृत श्रुति' कहते हैं।
जो सम्बन्ध वेद और गीता में है वही सम्बन्ध गीता और ज्ञानेश्वरी में है और वही सम्बन्ध श्री ज्ञानेश्वरी
और नाथ भागवत में है। गीता के काल में उसका अन्तर्निहित रहस्य ग्रहण करने लायक अधिकांश लोगों की
क्षमता नहीं हुई थी इसलिये भगवान श्रीकृष्ण को पुनः चार हजार वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। शक १११७
में ज्ञानेश्वर के रूप में श्रीकृष्ण का अवतार हुआ। इससे पूर्व गीता ग्रन्थ संस्कृत भाषा की मोटी पोथियों के
वेष्टनों में बँधा हुआ था तथा जनसाधारण की पहुँच से बहुत दूर था। हालांकि उनका हृदय उस ज्ञान को प्राप्त
करने के लिए छटपटा रहा था। ज्ञानेश्वर ने 'ज्ञानेश्वरी' लिख कर जनमानस की तृष्णा को शान्त किया।
वेद की कमी को गीता ने पूरा किया तथा गीता की कमी की आपूर्ति ज्ञानेश्वरी ने की। उसी प्रकार
ज्ञानेश्वरी की कमी को एकनाथी भागवत ने पूरा किया। सन् १५७३ में एकनाथजी ने भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध
पर विस्तृत और प्रौढ़ टीका लिखी। ज्ञानेश्वरी श्रीमद्भागवत की भावार्थ टीका है तो नाथभागवत श्रीमद्भागवत
के ग्यारहवें स्कन्ध पर सर्वांगपूर्ण टीका है। आकार में यह ज्ञानेश्वरी से दुगुनी है। इसकी रचना पैठण में शुरू
हुई और समापन वाराणसी में हुआ। यदि ज्ञानेश्वरी को ठीक तरह से समझना है तो एकनाथी भागवत के अनेक
पारायण करने चाहिये ऐसा अनेक विद्वानों का मत है। यह मर्म जानकर ही श्री तुकाराम महाराज ने भण्डारा
पर्वत पर बैठकर उस ग्रन्थ के एक सहस्र पारायण किये थे यह बात सर्वविदित है।

८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्री दत्तात्रय भगवान के आदेश से एकनाथ ने भागवत के एकादश स्कन्ध पर टीका लिखना प्रारम्भ किया।
वे अपने ग्रन्थ निर्माण का कारण सन्तजनों की आज्ञा बतलाते हैं। "संतों ने काफी आग्रह किया तो मैंने पूछा,
महाराज किस ग्रन्थ को प्रारम्भ करूँ यह बतलाएँ। इस पर संतों ने कहा, पुराणों में भागवत श्रेष्ठ है; उसमें
'उद्धवगीत' अत्यन्त श्रेष्ठ है अतः तुम उसी का प्रारम्भ करो। भगवान तुम्हें सहायक हैं।"
"एकांती आणि लोकांतीही ग्रंथ करण्याबद्दल संतांनी फार आग्रह केला, तेव्हां मी म्हटलं, महाराज!
कोणत्या ग्रंथाला प्रारम्भ करूँ ते सांगावें त्या वेळीं संत म्हणालें, पुराणांमध्ये भागवत हे श्रेष्ठ होय, त्याकरितां
त्याचा तूं आरम्भ कर वक्ता भगवान तुला साह्य आहे (१-५७-५८)"
फलतः वे संतों को वन्दन कर उसके बाद अपनी कुलदेवी एकवीरा (रेणुका) तथा सद्गुरु जनार्दन
महाराज को नमस्कार करते हैं।
"आता कुलदेवतेला नमस्कार करूँ. ती ऐक्यरूपानें एकनाथामध्येच राहिलेली असल्याकारणानें,
ऐक्यावांचून दुसरो गोष्टच काहूँ देत नाहीं. कानांमध्ये आणि मुखामध्ये एकपणानें ती 'एकवीरा' (श्री रेणुका)
देवीच एकत्वानें वास करीत आहे. तीच शिव आणि शक्ति अशीं दोन्ही स्वरूपें घेऊन, एकपणानेंच मिरवीत
आहे. (१-६८-७०)" एकादश स्कन्ध की अपनी टीका का आरम्भ उन्होंने (किसी) एकादशी को ही
किया था।
"म्हणून एकादश स्कंधावरची ही टीका, एकादशीलाच एका म्हणजे एकनाथ करीत आहे त्यामुळे ती
एकपणाच्या सुखाला एकत्वानें प्राप्त होईल" (१-११४-११५)
"इसलिये एकादश स्कन्ध की यह टीका एकादशी के ही दिन एका अर्थात् एकनाथ आरम्भ कर रहा
हैं। इससे वह एकपन के सुख को एकत्व से पात्र होगी।" (१-११४-११५)
श्री एकनाथजी ने अपनी टीका के लिये सम्पूर्ण भागवत को छोड़कर ग्यारहवें स्कन्ध को क्यों चुना इसको
वे स्वयं ग्रन्थ के आरम्भ तथा अन्त में बताते हैं। ग्यारह का अर्थ एक के साथ एक ही होता है। वहाँ दो
का प्रवेश नहीं है, अर्थात् यहाँ केवल 'अद्वैत ही अद्वैत है द्वैत की कोई बात नहीं है।'
एकनाथी भागवत में ३१ अध्याय हैं जिनमें कुल मिलाकर १८७९८ ओवियाँ हैं। ओवी मराठी के सन्त
साहित्य का अत्यन्त लोकप्रिय छन्द है, जिसका मुकुन्दराज के समय से ही प्रयोग होता आ रहा है, अर्थात्
काल के साथ ही ओवी की बनावट में अन्तर भी विद्यमान है। लेकिन ज्ञानेश्वर की ओवी अप्रतिम मानी जाती
है। एकनाथजी ने स्वयं अपनी संशोधित ज्ञानेश्वरी में इसका प्रमाण-पत्र दिया है। वे कहते हैं कि ज्ञानेश्वर
के बाद 'ओवी' लिखने का अर्थ है अमृत से भरी थाली में 'नरोटी' (नारियल को तोड़ने के बाद उसके ऊपरी
आवरण का टुकड़ा) रखना। स्पष्ट है इस अभिप्राय को लाक्षणिक रूप में ही लेना होगा।
यह त्रिकालाबाधित सत्य है कि जब दुनिया में कोई नयी चीज आती है या कोई नया आविष्कार होता
है तो उसका जमकर विरोध होता है। जिस समय एकनाथ पैठण में भागवत की टीका लिख रहे थे उस समय
पैठण के कतिपय संस्कृत विद्वानों तथा अनुदार पण्डितों ने उनका प्रखर विरोध किया किन्तु एकनाथ ने अपने
स्वभाव के अनुरूप बड़े संयम से उनका विरोध सहन किया। एकनाथजी के पुत्र हरि पण्डित भी संस्कृत के
प्रकाण्ड विद्वान थे। पहले उनका स्वर भी विरोधकों में था, पर बाद में वे अपने पिता के भक्त हो गये। पैठण
के एक भक्त ने नाथ द्वारा लिखित भागवत के पाँच अध्यायों (पंचाध्यायी) की नकल तैयार की और उसका

एकनाथ की श्रीमद्भागवत ९
पारायण शुरू किया। वहाँ से वह काशी पहुँचा और पंचाध्यायी का पाठ करने लगा। ऐसा प्रतीत होता है कि
इस 'पंचाध्यायी' को जनार्दन स्वामी ने भी सुना था और यह ग्रन्थ पूरा होगा ऐसा आशीर्वाद भी दिया था।
"त्या वाराणसी नामक मुक्तिक्षेत्रांत, मणिकर्णिकेच्या महातीरावर, पंचमुद्रा नामक पीठामध्यें ही
एकादशस्कंधावर टीका केली आहे ती ऐकून सज्जनांना संतोष झाला आणि जनार्दन ही आनंदाने प्रसन्न झाले.
त्यानें पांच अध्याय संपतांच आपण आपल्या मुखानें वरदान दिले होते. ते असें की हा ग्रंथ निर्विघ्नपणें सिद्धीस
जाईल" (३१-५३५)
हिन्दी रूपान्तर—
उस वाराणसी नामक मुक्तिक्षेत्र में मणिकर्णिका के महातट पर पंचमुद्रा नामक पीठ में यह एकादश स्कन्ध
पर टीका लिखी है। उसे सुनकर सज्जनों को संतोष प्राप्त हुआ और जनार्दन भी आनन्द से प्रसन्न हो उठे।
उन्होंने पाँच अध्याय पूर्ण होने पर ही अपने मुख से वरदान दिया था। वरदान यह था कि यह ग्रन्थ निर्विघ्न
रूप से सम्पन्न होगा।
काशी के कुछ विद्वानों ने 'पंचाध्यायी' को सुना और तत्कालीन पीठाधिपति से (इनके ठीक-ठीक नाम
का स्पष्ट निर्देश नहीं मिलता।) उन्होंने एकनाथजी के पास आदेश भेजा कि वे अपने ग्रन्थ के साथ काशी
आयें। इतना ही नहीं उन्होंने ब्राह्मण द्वारा किया जाने वाला 'पंचाध्यायी' का पारायण बन्द करवा कर पोथी
को अपने अधिकार में ले लिया और मठ में सुरक्षित रखवा दिया। कुछ दिन के बाद जब एकनाथजी के पास
आदेशपत्र पहुँचा तो काशी के विद्वानों का आदर करने वे काशी चलने की तैयारी करने लगे। इसी बहाने काशी
यात्रा का लाभ होगा इस उद्देश्य से अनेक भक्तगण उनके साथ हो लिये। जहाँ-जहाँ से वे गुजरते वहाँ से
और भक्त उनके साथ हो लेते। पंचगंगा घाट पर पूरा जुलूस रुका।
प्रारम्भ में काशी के विद्वानों ने उन्हें अपने कार्य से विरत होने को कहा किन्तु एकनाथ ने उसमें अपनी
असमर्थता प्रकट की। वे पंचगंगा घाट पर बैठ कर ग्रन्थ रचना करने लगे। वाराणसी में पंचगंगा घाट के किस
स्थान पर इस दिव्य ग्रन्थ का लेखन हुआ होगा यह तो पता नहीं है, पर यह मान्यता अवश्य है कि तैलंग
स्वामी मठ से लगे स्थान पर जो अकेले मुरलीधर कृष्ण की श्याम प्रतिमा स्थापित है वह एकनाथ महाराज
की ही देन है। लगता है कि आरम्भ में एकनाथ पंचगंगा घाट पर टिके थे, पर बाद में 'पंचमुद्रापीठ' अर्थात्
मणिकर्णिका घाट के परिसर में आ गये, जहाँ उन्होंने कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को ग्रन्थ पूरा किया।
"महामंगल अशा कार्तिक महिन्यांत शुद्ध पौर्णिमेच्या दिवशी सोमवार शिवयोगाचे दिवशी ही एकादश
स्कंधावरील टीका समाप्त झाली" (३१-५५२)
कुछ ही महीनों बाद कई पण्डित आदरपूर्वक ग्रन्थ का श्रवण करने लगे। ग्रन्थ पूर्ण होते ही उनके पूर्व
विरोधकों ने नाथ भागवत की पाण्डुलिपि को पालकी में रखकर उसकी जयजयकार करते हुए जुलूस निकाला
और फूल-मालाएँ चढ़ा कर उनकी पूजा की।
इस ग्रन्थ में भागवत धर्म की परम्परा, स्वरूप, विशेषताएँ, ध्येय, साधन आदि सब कुछ भागवत के आधार
पर रोचक ढंग से निरूपित किया हुआ है। भागवत धर्म की आत्मा है—"सब भूतों में भगवद्भाव का अनुभव
करना"।
एकनाथजी ने तीन प्रकार के भक्त कहे हैं—(१) प्राकृत, (२) मध्यम और (३) उत्तम। मूर्तिपूजक प्राकृत
हैं, ईश्वर को ध्यान में रखकर प्राणिमात्र को समान दृष्टि से देखने वाले को मध्यम तथा प्राणिमात्र में ईश्वर

१० श्रीमद् एकनाथी भागवत
का दर्शन करनेवालों को उत्तम भक्त कहा है। उन्होंने प्रपंच को परमार्थपरक बनाने का स्वानुभव दूसरों को
दिया। उन्होंने संत ज्ञानेश्वर का तत्त्वज्ञान पूर्णतयः स्वीकार किया तथा उसे अधिक सरल, उदार, विशाल तथा
समावेशक बनाया। इस दृष्टि से नाथ भागवत उत्तम भाष्य ग्रन्थ है।*
श्रीमद् एकनाथी भागवत का हिन्दी में भावानुवाद तैयार करते समय मैंने मराठी में कृष्णाजी नारायण
आठल्ये द्वारा अनुवादित ग्रन्थ सार्थ श्री एकनाथी भागवत का उदारतापूर्वक उपयोग किया है जिसके लिए मैं
उनका कृतज्ञ हूँ।
—ना०वि० सप्रे

  • कुछ अंश रामचन्द्र कृष्ण कामत द्वारा लिखित सार्थ श्री एकनाथी भागवत की सम्पादकीय से साभार।

विषयानुक्रमणिका
पृष्ठ
अध्याय १ १-१९
मंगलाचरण, परिक्षिती वृत्तांत; श्रीकृष्ण चरित्र की अपूर्वता, भूभार हरण के लिये
यदुकुल नाश का कृष्ण का संकल्प, ब्रह्मश्राप, लौहमूसल की उत्पत्ति, यादव मूसल
का चूर्ण तथा शेष टुकड़े समुद्र में फेंकते हैं, उससे समुद्र में घास उत्पन्न होती है।
शेष टुकड़े से व्याध का बाण बनाना।
अध्याय २ २०-५७
नारद-वसुदेव भेंट एवं वार्ता, संत दर्शन का माहात्म्य, जड़भरत जनक एवं नौ ऋषभ
पुत्रों का संवाद, भागवतधर्म का रहस्य, भगवद्भक्तों के लक्षण, भक्ति की अनन्यता,
नामस्मरण महिमा।
अध्याय ३ ५८-९८
जनक के प्रश्न, माया के लक्षण, तरने के उपाय, नारायण स्वरूप, सद्गुरु लक्षण,
सच्छिष्य लक्षण, परब्रह्म लक्षण, कर्माकर्म विवरण, पूजा विधान, मूर्ति ध्यान, विवरण
आदि।
अध्याय ४ ९९-११२
भागवत अवतार कथा, नारायण आख्यान, नानावतार वर्णन, अभक्त के लक्षण एवं
गति।
अध्याय ५ ११३-१४०
युग के अनुसार भगवतसेवा, नामस्मरण आदि के मार्ग, मद्य, मांस, मैथुन के प्रयोग
सम्बन्धी वेदोक्ति, भागवद्धर्म रहस्य, वसुदेव का भाग्य, निमिजायंत संवाद, पंचाध्यायी
का माहात्म्य।
अध्याय ६ १४१-१६१
श्री कृष्णदर्शनार्थ देवताओं का आगमन, कृष्ण-द्वारका वर्णन, निजधाम गमन के लिये
प्रार्थना, उद्धव का साथ चलने का आग्रह, द्वारका में उत्पात, यादवों का प्रभास जाने
का विचार, प्रभास महात्म्य, श्रीकृष्ण चरित्र महात्म्य।
अध्याय ७ १६२-१९२
श्रीकृष्ण उद्धव संवाद, भगवान का उद्धव को उपदेश, यदु-अवधूत संवाद, अवधूत
के चौबीस गुरु। पृथ्वी, वायु, जल, आकाश, अग्नि, चन्द्र, सूर्य आदि के अनुकरणीय
गुण, कपोत-कपोती कथा।

१२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अध्याय ८ १९३-२०१
अजगर, पतंग, समुद्र, मधुमक्खी, मछली, पिंगला वेश्या आदि गुरुओं से अवधूत ने
बोध प्राप्त किया।
अध्याय ९ २१०-२३२
परिग्रह से बाधकता, त्याग से अनन्त सुख की प्राप्ति, टिटवी, बालक, साँप, मकड़ी
आदि शेष गुरुओं से बोध, दत्तात्रेय परम्परा, सद्गुरु माहात्म्य, यदु की संगमुक्तता।
अध्याय १० २३३-२६५
निष्काम धर्माचरण, सद्गुरु की आवश्यकता, शिष्य लक्षण, स्वर्ग-सुख का वर्णन,
सकाम कर्म के दुष्परिणाम, वेदान्त-मीमांसक मत विवेचन।
अध्याय ११ २६६-३३२
बंधमोक्ष की व्याख्या, शुकवामदेव दृष्टांत, विद्या, अविद्या, जीव परमात्मैक्यता, मुक्तों
के लक्षण, पाण्डित्य, प्रतिष्ठा प्राप्ति के इच्छा की निरर्थकता, वैदिक तांत्रिक दीक्षा,
प्रतिमा पूजा का विधान, पूजा के ११ अधिष्ठान, निर्गुण से सगुण का वैशिष्ट्य नाम
महिमा, सत्संग यह भक्ति का सर्वोत्तम साधना।
अध्याय १२ ३३३-३५९
सत्संग महिमा, गोपिका यश वर्णन, भववृक्ष वर्णन, गुरु भक्ति से भववृक्षच्छेदन।
अध्याय १३ ३६०-३९४
त्रिगुण लक्षण, परमार्थ के लिये सत्यगुण, उसी से रजतम का नाश, सनकादिकों के
ब्रह्मदेव से प्रश्न, चित्त में विषय या विषय में चित्त, हंसगीता, सनकादिकों का सन्देह
निवारण।
अध्याय १४ ३९५-४२०
‘‘भक्ति से सायुज्य मुक्ति मिलती है तो वेदज्ञ भिन्न-भिन्न मतों का प्रतिपादन क्यों
करते हैं ?’’ उद्धव की शंका का समाधान, पुरुषार्थ सम्बन्धी मतभेद, तदनुरूप वेदार्थ,
उत्तम पुरुषार्थ भक्ति, स्त्री-संग त्याग, ध्यानयोग वर्णन।
अध्याय १५ ४२१-४३३
भक्ति मार्ग में सिद्धियों का विघ्न, अष्ट महासिद्धि तथा १० अन्य सिद्धियों की
प्राप्यता, सिद्धि साधनोपाय, सिद्धियों का वर्णन तथा उनके त्याग की आवश्यकता पर
बल।
अध्याय १६ ४३४-४५०
नाथ भागवत का पूर्वार्द्ध विश्लेषण, भगवद्विभूति वर्णन, अर्जुन के प्रश्न का सन्दर्भ,
समाधान एवं वासुदेवादि व्यूहमूर्ति, उनके भक्त, विभूतियों का अनंततत्व, भक्त
महिमा आदि।

विषयानुक्रमणिका १३
अध्याय १७ ४५१-४७५
चारों युगों के धर्म, वर्णाश्रम धर्म, उनके लक्षण, वर्ण-बाह्यों के लक्षण, धर्मों के धर्म
लक्षण, ब्रह्मचर्य गृहस्थ के धर्म।
अध्याय १८ ४७६-४९४
वानप्रस्थाश्रम धर्म, संन्यासाश्रम धर्म, परमहंस का. धर्म, शक्ति व भक्ति का वर्णन।
अध्याय १९ ४९५-५२०
युधिष्ठिर को भीष्म द्वारा मोक्ष धर्म कथन, ज्ञान-विज्ञान लक्षण, शक्ति रहस्य, यम
नियम, निर्गुण विवेचन, शम दमादि के लक्षण।
अध्याय २० ५२१-५४१
वेद ही गुण-दोष बनाते, फिर कैसे न देखें? किसकी सुनें तुम्हारी या वेद की?
उद्धव का प्रश्न एवं समाधान गुण-दोष न देखना उत्तम साधना, मनोजय, कर्म,
सांख्य एवं भक्ति योग।
अध्याय २१ ५४२-५६५
स्वधर्माचरण से मोक्ष-प्राप्ति, देशकाल द्रव्य की शुद्धता, धर्म, अधर्म, फलश्रुति का
स्वरूप, कर्मकाण्डियों का मनोराज्य, श्रीकृष्ण ही सही अर्थ में वेदज्ञ।
अध्याय २२ ५६६-५९९
तत्व संख्या निरूपण, प्रकृति एवं पुरुष, मंत्रों का एकत्व, जन्म, मरण, देह, अवस्था,
आत्मा पर आरोप।
अध्याय २३ ६००-६४४
भिक्षु गीतारंभ, अधर्म का धन नाशवान, धन के पाँच हिस्सेदार, भिक्षु कथा, छल
पश्चात्ताप तथा स्वयं की कथा का वर्णन, सुख-दुःख मीमांसा, भिक्षु गीत माहात्म्य।
अध्याय २४ ६४५-६७१
कपिल एवं देवहुति संवाद, ज्ञान से द्वंद्वनाश, नारायण का लीला विग्रह, सृष्टिक्रम;
त्रिलोक रचना, प्रलय लक्षण, कर्म की ऊँच-नीच गति, स्वर्ग, ध्रुव, वैकुण्ठ लोकों
का वर्णन, सगुण भक्तों को सायुज्यता, अनन्य भक्तों का प्रेमरहस्य, सांख्य शास्त्र।
अध्याय २५ ६७२-६९२
त्रिगुण विजय, निर्गुण उपासना, त्रिगुणों के लक्षण, त्रिगुण तथा निर्गुण आहार, त्रिगुणों
से सुख, निर्गुण सुख, विविध वृत्ति, विविध अहंकार एवं ममत्व के लक्षण, गुण एवं
निर्गुण ज्ञान वर्णन।
अध्याय २६ ६९३-७१४
विषयासक्ति से अनर्थप्राप्ति, भागवत धर्माचरण यही नरदेह का कर्त्तव्य, विषयासक्ति
निषेध, पुरूर व्याख्यान, ऐलगीत, संतसंग महिमा।

१४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अध्याय २७ ७१५-७३४
भक्तों की पूजाविधि, आगमोक्त हवन विधि, प्रतिमाओं के प्रकार, मूर्ति प्रतिष्ठा,
फलश्रुति, पूजोपचार का वैभव, निष्काम भक्ति से साधक की भगवदैकता।
अध्याय २८ ७३५-७६६
किसी के स्वाभाविक कर्म की स्तुति या निन्दा न करें, सर्वत्र भगवद्भाव से देखें,
आत्मा में संसार निर्मूल, ज्ञानी की विदेहता, अनन्य भक्तों को विघ्न नहीं सताते।
अध्याय २९ ७६७-८०९
भोले भाले लोगों को ईश्वर प्राप्ति सुगम कैसे ? भागवद्धर्म से जन्म-मरणच्छेद, स्त्री
संग त्याग की आवश्यकता, प्राचीन ज्ञानी स्त्रियाँ, श्रीकृष्णाज्ञा से उद्धव का
बदरिकाश्रम प्रयाण।
अध्याय ३० ८१०-८२८
श्रीकृष्ण स्वरूप सौन्दर्य वर्णन, द्वारका में भीषण उत्पात का वर्णन, यादवों में कलह
एवं संहार, बलराम निर्वाण, कृष्ण मूर्ति वर्णन, जराव्याध का बाण मारना, पश्चात्ताप
एवं कृष्ण का क्षमादान एवं सदेह स्वर्ग को भेजना।
अध्याय ३१ ८२९-८५१
श्रीकृष्ण निर्वाण, देवताओं की कृष्णस्तुति, १४ श्लोकों का माहात्म्य, दारूक का
द्वारका में आगमन, कृष्ण निधन समाचार का कथन, शोक, यादव सतियाँ, अर्जुन
द्वारा मृतक संस्कार, द्वारका विलय, पाण्डव स्वर्गारोहण, उपसंहार इति।

संत एकनाथ

॥ श्री॥
श्रीमद् एकनाथी भागवत
सदा सेव्या सदा सेव्या श्रीमद्भागवती कथा
यस्याः स्मरणमात्रेण हरिश्चत्तं समाश्रयेत्।
अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां भारतार्थविनिर्णयः
गायत्री भाष्यरूपौ सौ वेदार्थ परिबृंहिता ॥
प्रथम अध्याय
ॐ श्री गणाधिपतये नमः श्री सरस्वत्यै नमः।
श्री गुरुभ्यो नमः॥
भक्त्या भागवतं भावमभावं काव्यपाठतः।
पठनात्पदव्युत्पत्तिर्ज्ञानप्राप्तिस्तु भक्तितः॥
ओंकारस्वरूप श्री जनार्दन स्वामी को मैं प्रणाम करता हूँ। हे सद्गुरु जनार्दन ! आपके स्वरूप में आदि-अंत
की कल्पना ही सम्भव नहीं है। ऐसे आपके श्रीचरणों को 'मैं' और 'तुम' वाला भाव भूलकर मैं प्रणाम करता हूँ।
श्री एकदंत गजानन ! आपको भी मैं प्रणाम करता हूँ। सम्प्रति तुम ही एकात्म भाव से एक में अनेकता काः दर्शन
करा रहे हो, फिर भी अद्वैत नहीं टूटता। तुझमें समस्त चराचर का वास है इसीलिये तुम्हें 'लम्बोदर' कहते हैं
इसीलिए सचमुच ही तुम सबके सम्बन्धी हो। तुम्हारा जो दर्शन करता है उसका संसार सुखमय होता है और
इसीलिये तुम्हें 'विघ्नकर्ता' यह उत्तम नाम शोभा देता है। हे गणराजा ! 'आनन्द' ही तुम्हारा मुख है, चारों पुरुषार्थ
तुम्हारे चार हाथ हैं और प्रकाशमानों को प्रकाश देनेवाला तुम्हारा दाँत चमकता रहता है। पूर्वमीमांसा तथा
उत्तरमीमांसा ये दोनों तुम्हारे कर्ण के स्थान पर हैं। मुख में परा-पश्यंती-मध्यमा तथा वैखरी नामक चार वाणी
हाथ जोड़कर खड़ी रहती हैं। हे विनायक ! सारी सृष्टि एकाएक आत्मस्वरूप से परिपूर्ण दिखाई देने लगती है।
वही तुम्हारी दृष्टि दिव्य और सुख से सन्तुष्ट करने वाली है। सुख से तोंद भरी है, नाभी में आनन्द भरा हुआ है।
नाभी के नीचे करधनी शोभा दे रही है। तुमने शुद्ध सत्व का सुन्दर वस्त्र परिधान किया है। तुमने शरीर पर धारण
किये हुए सुन्दर अलंकारों को तुम्हारे ही शरीर के कारण शोभा प्राप्त हुई है। प्रकृति और पुरुष तुम्हारे दो चरण हैं,
उन्हें मोड़ कर सहजासन में बैठकर तुम पूर्णत्व से शोभायमान लग रहे हो। तुम्हारा क्षणमात्र के लिए भी दर्शन हो
जाए तो विघ्न तो खोजने से भी नहीं मिलता। संसार का बन्धन तोड़ने वाला परशु तुम्हारी मुट्ठी में है ही।
अनन्यभाव से जो भक्त तुम्हें अच्छा लगता है उसे तुम सांसारिक संकटों से मुक्त करते हो। तुम स्वयं ही उसे
अपने बोधरूपी अंकुश से अपनी ओर खींच लेते हो। जो निरभिमान और निरपेक्ष है उसका सुख तुम्हीं बढ़ाते हो।
उसे आनन्दरूपी मोदक देकर उसे अपने हाथ से शान्ति प्रदान करते हो। सूक्ष्म से सूक्ष्म कण में भी तुम्हारा

२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अधिष्ठान रहता है इसलिए मूषक-वाहन यह नाम तुम्हें शोभा देता है। तुम न तो पूरे नर हो न पूरे कुंजर हो। तुम
व्यक्त और अव्यक्त से परे हो। तुम्हें ऐसा निर्विकार जानकर मैं तुम्हें सादर प्रणाम करता हूँ ताकि यह ग्रन्थ बिना
किसी विघ्न के पूरा हो जाय। ऐसे श्री गजानन को 'मैं' कह कर प्रणाम करने वाला भी कहाँ का है ? क्योंकि जो
मूल रूप से अकर्ता है वही इस ग्रन्थ कथा का विस्तार कर रहा है। अब विवेक की साक्षात मूर्ति तथा जो इन्द्रिय
वृत्तियों को चेतनता प्रदान करती है उस सरस्वती को भी मैं प्रणाम करता हूँ। जो वाचा से बात कराती है, बुद्धि
को बोध प्रदान कराती है और प्रकाश को प्रकाशमान करती है, जो आँखों में दृष्टि के रूप में रहती है अथवा
फल में रस के रूप में रहती है, उसी प्रकार शिव की काया में शक्तिरूप से रहती है। शक्कर में जिस प्रकार
माधुर्य या पुष्प में मकरंद रहता है, उसी प्रकार शिव का और शक्ति का सम्बन्ध अनादिसिद्ध एवं तर्क से परे है।
वाचा से जिसका वर्णन सम्भव नहीं है, ऐसा वह आत्मस्वरूप का माधुर्य चारों ओर वाणियों में श्रेष्ठत्व से भरा
हुआ है। इसलिए वाणी की देवता सरस्वती ग्रन्थ के अर्थ की उत्तम अभिरुचि प्रदर्शित करती है। संसार में विवेक
का चुनाव करने वाले जो हंस हैं उस पर ही यह हँसवाहिनी देवी सहजासन में बैठी हुई है। परमहंस पर
विराजमान उस देवी को विवेकी हंस ही ठीक तरह से पहचानते हैं। लेकिन जो मूर्ख, मंदबुद्धि और भाग्यहीन
होते हैं उन्हें वह उनके पास होते हुए भी नहीं दिखाई देती। उसके रूप का विचार करने पर ऐसा प्रतीत होता है
कि उसका निराकार और विश्वाकार रूप भी वही है। वही आत्मीयता से अनुपम कथा कहलवाता है। 'यह बोल
अच्छा रहा' यह बात जिस प्रकार बोल कर ही अभिव्यक्त की जाती है, उसी प्रकार मन का स्तुति-भाव वाणी से
ही वाणी का गौरव करता है ऐसा समझना चाहिए। वह वाग्विलास रूपी सर्वांगसुन्दरी सरस्वती देवी अंतर्बाह्य
रहकर स्वयं ही ग्रन्थ का सुन्दर अर्थ कहती है। वह स्वभाव से सर्वदा ही प्रसन्न रहती है इसलिए इस निरूपण में
बहार आ गयी है। फिर भी उसने मुझमें वक्ता होने का अभिमान नहीं होने दिया है। वाग्देवता की यह स्तुति
वाणी ने ही की है, इसलिए मन में द्वैत का विचार आने का अवसर ही नहीं प्राप्त हुआ है। उसने 'बोल' और
'बोलने' को नष्ट किया, मौन को भी तोड़ दिया लेकिन निरूपण तो कराया ही और जो बोलने के लिए असम्भव
है उसे शब्दों के माध्यम से व्यक्त कराया। ऐसी उस सरस्वती को प्रणाम करने के लिए सेवक बन कर गया तो
'मैं पन' के साथ परावाणी भी लुप्त हो गयी। जहाँ 'मैं पन' का ही अभाव है वहाँ 'तू पन' को कहाँ स्थान
मिलेगा ? फिर भी इस विषय प्रतिपादन में वह कल्पनातीत प्रसाद भर-भर कर डाल रही है। जिस प्रकार सागर
में लहरें उछलती हैं उसी प्रकार यहाँ आत्मस्वरूप पर स्वरूपाकार शब्दों की लहरें शोभा दे रही हैं। जिस प्रकार
चीनी का रवा माधुर्य से अलग नहीं होता उसी प्रकार निरूपण के शब्द ब्रह्मरसयुक्त होने के कारण ब्रह्मसुख के
रस से अलग नहीं हैं। वहाँ ब्रह्मानन्द रस वृत्ति ने 'मैं पन' के साथ सरस्वती को भी एक ही थाली में परोसा है।
इससे अभिन्नत्व के शेष से तृप्ति की डकार आने के कारण इस कथा के उद्गार बाहर आ रहे हैं। अब संतप्त
जनों को शान्त करने के लिए स्वानन्द की वर्षा करने वाले जो चिदानन्द के मेघस्वरूप ही हैं उन्हें प्रणाम करता
हूँ। वे चैतन्य के अलंकार, ब्रह्मविद्या का श्रृंगार अथवा ईश्वर का मनोरम निवास ही हैं। वे ब्रह्मवस्तु के
निवासस्थान अथवा सुख का पूर्ण उल्लास अथवा सुरक्षित विश्राम स्थल हैं अथवा वे भूतदया का सागर, करुणा
का मायका अथवा स्वानन्द का गौरव करनेवाले निर्गुण के सगुण अवयव ही हैं अथवा वे आँखों की दृष्टि अथवा
उसकी सुन्दर पुष्टि हैं जिनके चरणांगुष्ठ में संतोष को भी संतोष प्राप्त होता है। वे जिनकी ओर देखते हैं उनका
भवसंकट दूर होता है और उनकी आँखों के सामने परब्रह्म अपने आप प्रकट हो जाता है। वे साधन में किया गया
कठिन प्रयास अथवा शास्त्रचातुरी का विलास नहीं देखते। यदि विश्वास हो तो वे स्वयं ही ज्ञान का प्रकाश

प्रथम अध्याय ३
फैलाते हैं। वे सदैव संसार में ही रहते हैं, हर प्राणी को दिखाई पड़ते हैं लेकिन अनिश्चय के कारण प्राणी दुविधा
में रहते हैं और नास्तिक लोग उनके अस्तित्व को नकारते हैं। एकलव्य ने द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूरत बनायी
और उसे गुरु मानकर सम्पूर्ण धनुर्विद्या सीखी और अर्जुन आदि पर भी भारी रहा ऐसी कथा महाभारत में है। वह
गुरुभाव ही उसके लिए फलदायी सिद्ध हुआ। अर्थात यह संसार विश्वास न होने के कारण ही नष्ट होता है और
अनिश्चय में फँसा रहता है। यदि निश्चय कर उन पर विश्वास किया जाए और भक्तिभाव से उनके चरणों पर
माथा रखा जाए तो कभी आत्मानुभव की कमी नहीं होती। उन्हें आस्थापूर्वक प्रणाम करने से वे हमसे एकात्मता
कायम करते हैं लेकिन हमें भी एकात्मता से उनका सेवक बनकर रहना होगा। उनकी सेवा के माधुर्य को
ब्रह्मसुख की उपमा भी कम होगी। अनन्य भक्ति से जो उनकी उपासना करते हैं वे उस आत्मस्वरूप के सच्चे
माधुर्य का अनुभव लेते हैं। वे प्रकृति से परे रहते हैं, प्रकृतिरूप में रहते हुए भी वे अविकृत रहते हैं, उनके ही
कारण प्रकृति के आकार, विकार और व्यवहार की बाधा नहीं होती। वे न तो भोग से ऊबते हैं न त्याग का
आडम्बर रचते हैं। वे हमेशा अपनी सहज स्थिति में ही रहते हैं। जिस प्रकार आत्म-साक्षात्कार के समय उत्पन्न
होने वाली प्रेम की तरंगें शरीर में ही विलीन हो गयीं उसी प्रकार उस समय होने वाले विलक्षण आनन्द से
अनुभव होने वाला विस्मय भी विस्मृत हो गया, प्रपंच और परमार्थ एक हो गया। लेकिन ऐसा कुछ हुआ था
इसका भी उसे स्मरण न रहा। स्मरण का विस्मरण के साथ ही लोप हो गया, काया काया में ही विलीन हो गयी,
अन्दर-बाहर वाला भाव टूट गया, लेकिन वह गया या रहा इसका भी उसे स्मरण नहीं है। स्वरूप की जागृति के
कारण उनके स्वप्न और जागृति नष्ट हो गयी, साक्षात्कार के साथ सुषुप्ति समाप्त हो गयी, उन्मनी अवस्था में
तूर्यावस्था स्थिर हो गयी। दृश्य द्रष्टा के साथ चला गया, अकेलेपन के कारण दर्शन भी नष्ट हो गया और उनका
न होना भी लुप्त होकर उस लोप के साथ लुप्त करने वाले ज्ञान का भी विलय हो गया। ज्ञान अज्ञान को ले गया
तभी ज्ञातापन का भी लोप हो गया और विज्ञान शरीर में घुल गया। लेकिन यह घुलना कोई नयी बात नहीं है।
इसलिए जो सचमुच ही सज्जन हैं वे मुझे सावधान करें, मेरी ओर ध्यान दें, यही इस शिशु की प्रार्थना है। लेकिन
जिस प्रकार सूर्य सदैव प्रकाश का ही गोला है, अग्नि सदैव तेजयुक्त ही रहती है, उसी प्रकार संत सदैव सावधान
ही रहते हैं। मेरा यह कहना कि वे मेरी ओर ध्यान दें, एक बचकाना प्रयास ही है। यह सुनकर संतजनों ने बार-
बार गौरव कर आग्रहपूर्वक आज्ञा की और यह ग्रन्थ प्राकृत में लिखवाया। एकान्त में तथा अन्य लोगों के बीच
भी जब संतों ने आग्रह किया जो मैंने कहा, "महाराज ! कृपया बतायें कि मैं किस ग्रन्थ को लिखना प्रारम्भ
करूँ ? उस समय संत बोले, पुराणों में भागवत श्रेष्ठ है और उसमें उद्धवगीत तो अत्यन्त श्रेष्ठ है इसलिए तुम उसे
प्रारम्भ करो। वक्ता भगवान तुम्हारे सहायक हैं। हमें ज्ञानकथा सुनने की लालसा है, तिस पर तुम्हारे जैसा सरस
वक्ता हो तो फिर और क्या चाहिए ? हमें मालूम है कि संतों की स्तुति करने से तुम्हें स्फूर्ति प्राप्त होती है लेकिन
अब कथा की शुरुआत कर विषय का प्रारम्भ करो। संतों की इस वाणी से मन सहसा प्रसन्न हो उठा। इस
प्रसादवाणी से अंतःकरण स्वानंदरूपी उल्लास से भर उठा। जिस प्रकार मेघों की गर्जना से विभोर होकर मोर
नाचनें लगता है या मेघों से गिरते जल को देख चातक मन ही मन प्रसन्न हो उठता है अथवा जैसे चन्द्रकिरण
देखकर चकोर आनन्द से डोलने लगता है उसी प्रकार संतों के मुख से निकला उत्तर मुझे सदैव सुख ही देता
आया है। हे स्वामीजन ! आपने सचमुच ही मुझे आनन्द विभोर कर दिया। क्योंकि आपका यह कार्य आप मुझसे
ही पूरा कराने वाले हैं इसलिए मैं व्यर्थ ही 'मैं पन' के वश में क्यों हो जाऊँ ? लेकिन दास समर्थों की आज्ञा का
उल्लंघन नहीं कर सकता। इसलिए आपने जो कार्य मुझे सौंपा है, उसे मैं पूरा करूँगा। लेकिन आप अपनी

कृपादृष्टि बनाये रखें जिससे कार्य अपने आप ही पूर्णत्व की ओर पहुँचेगा। इस पर संत बोले, "अरे! हमने
तुम्हारे मन के साथ अपना मन जोड़ कर शब्दों में तारतम्य बना रखा है। इसलिए तुम अपना विषय शीघ्र प्रारम्भ
करो। अब कुलदेवता को नमस्कार करें। वह ऐक्य रूप से एकनाथ में ही निहित होने के कारण ऐक्य के सिवाए
अन्य कोई चीज निकालने ही नहीं देता। उसने मन को केवल एक ही रूप दिखलाया है इसलिए जन में या वन
में वही स्वरूप दिखायी देने लगा है। कानों में और मुख में वह 'एकवीरा' (श्रीरेणुका) देवी ही एकत्व से
निवास कर रही है। वही शिव और शक्ति का रूप लेकर एकत्व से शोभायमान हो रही है। उस एकवीरा ने गर्भ
धारण कर एकत्व में ही एक वीर को जन्म दिया। जिसके आतंक से बड़े-बड़े वीर भी काँपते हैं, उस बोधरूपी
परशुराम को उसने जन्म दिया। उसने जन्म लेकर माया जननी का वध किया और आज्ञा शिरोधार्य कर पिता को
संतोष प्रदान किया। इसीलिए वह इस भूमण्डल पर सदा विजयी होता रहा। उसने अहंकार रूप-सहस्रबाहु
सहस्रार्जुन का वध किया और उसका राज्य अपने स्वजातीय ब्राह्मणों को अर्पण कर दिया। उसने जननी को मार
कर उसे पुनर्जीवित कर दिया। वही हमारी कुलदेवता बनी। उसने अपने ही नाम से हमें ख्याति दिलवायी,
क्योंकि एकवीरा और एकनाथ एक ही अर्थ के शब्द हैं। उसका जब वध हुआ उसी समय उसके स्वभाव में
परिवर्तन हुआ और वह माता जगदम्बा क्रोध त्याग कर शान्त हो गयी। उसने गोद में बिठा कर आश्वासन दिया
कि कैसा भी संकट क्यों न आये लेकिन मेरा नामस्मरण करने से समाधान प्राप्त होगा। उस जगदम्बा का
जयजयकार करने के लिए ग्रन्थ के प्रारम्भ में ही 'उदो', 'उदो' (उदयोस्तु) अर्थात् उदय हो कहता हूँ। वही मेरी
बुद्धि में योगरूपी गर्भ रखकर स्वयं प्रकट हुई है। अब उस गुरु जनार्दन को प्रणाम करें जो संसाररूपी गज के
लिए सिंह के समान है और जो जन में तथा विजन में समदृष्टि से पूर्ण है। जिसके कृपाप्रसाद से साधक को देह
में देहांगों का भास नहीं होता और संसार का अंधड़ देखते-देखते स्वप्नवत हो जाता है। जिसके कृपाकटाक्ष से
अलक्ष्य वस्तु भी दिखाई दे जाती है और गुरुत्व के कारण साक्षी को भी साक्ष्य का विस्मरण हो जाता है। जिन्होंने
बिना जीवन के ही जीवित रखा, मृत्यु के बिना हीं मृत्यु को मार डाला, दृष्टि लेकर अदृश्य का दर्शन कराया,।
सारा शरीर ही चक्षुरूप बनाया, देह में ही देह को विदेही बनाया और फिर विदेह भाव को मिटाया और अन्त में
मिटने को भी मिटाया बचा केवल आत्मरूप। अभाव भाव में मिला, सन्देह असन्देह में गला, विस्मय विस्मयी में
डूब गया, दिव्यानंद का अनुभव हुआ। स्वेच्छा से ही भक्त बना तो उस भक्तिभाव में भी ईश्वर दिखाई दिया। तब
भज्य, भजक और भजन का अंत हुआ सा लगा। नमन से ही नमन किया, फिर नमन करने वाले कहाँ चले गये
इसका पता नहीं चला। दृष्य और द्रष्टा दोनों का ही एक साथ अन्त हो गया। दृष्टि का सामर्थ्य नष्ट होकर दर्शन
भी क्षीण हो गया। अब जब सब कुछ देवतामय ही हो गया इसलिए भक्त का भक्तिभाव भी नष्ट हो गया। दोनों
भाव नष्ट होकर अभेद भाव से केवल अनंतरूप शेष रह गया। त्याग के साथ अत्याग का लय हुआ, भोग के
साथ अभोग भी उड़ गया, योग के साथ अयोग भी डूब गया और योग्यता का अहंभाव भी नष्ट हो गया। इसमें
भी अधिक आस यह है कि सायुज्य स्थिति में भी वह दास बन कर रह गया है। वहाँ का आनन्दरस अत्यन्त
अविनाशी और अगोचर है। 'शिवो भूत्वा शिवं भजेत' अर्थात् शिव होकर शिव की पूजा करना इसी अवस्था में
शोभा देता है। अन्यथा बोलना तो केवल बोलना ही है। उस योग में स्वस्वरूप से भजन करने में कोई लाभ नहीं
है। अभेद भाव के इस सेवासुख में नारद प्रसन्नता से नाचता, गाता है। शुकसनकादिक जो स्वस्वरूप के संत हुए
वे इसी पथ पर आगे बढ़ने से हुए। सागर में जब ज्वार आता है तो उसी पानी से गड्ढे भी भर जाते हैं। उसी
प्रकार ईश्वर ने मुझे अपना देवत्व प्रदान कर मुझे अपना भक्त बना लिया। वैसे देखा जाए तो समुद्र और नदी का

प्रथम अध्याय ५
जल एक समान है, लेकिन जब उनका संगम होता है तो उसकी विशेष शोभा रहती है। उसी प्रकार परमेश्वर के
साथ ऐक्य रूप से भजन करने पर भजन का सुख द्विगुणित हो जाता है। दायाँ और बायाँ ये शरीर के दो अंग हैं
लेकिन इन से जिस शरीर का बोध होता है, वह एक ही है। उसी प्रकार ईश्वर और भक्त ये दो अलग मालूम होने
पर भी देवत्व में दोनों के ऐक्य का अनुभव होता है। उसी प्रकार यद्यपि गुरु जनार्दन ने मुझे अपनत्व का सम्मान
देकर मुझे अद्वैत भक्त बना रखा है, फिर भी मेरी काया, वाचा तथा मन को प्रेरित कर वही मुझे परिचालित करते
हैं। वही (जनार्दन) मेरा मुख बन गया है, मेरी दृष्टि के आगे मूर्तिमंत होकर वही खड़ा है और विवेक बन कर
वही ग्रन्थ का लेखन करा रहा है। लेकिन उनका लाघव विस्मयकारी है क्योंकि उन्होंने मेरा नाम अभंग में रख
दिया है। लेकिन उसका अभिमान भी नहीं होता।" यह भाषण सुनकर उसे संतोष हुआ और उसने कहा,
"शाबास ! तुम सचमुच ही निजभक्ति के अवतार हो, इसीलिए यह रहस्य तुम्हारे मुँह से निकल रहा है। इसे
स्तुति कहें या विषय का प्रतिपादन ? यह ग्रन्थ की प्रस्तावना है या ब्रह्मज्ञान ? यह साहित्यशास्त्र है या समाधान !
यह क्या है यही समझ में नहीं आता। तुम्हारा एक-एक शब्द मानों विलासपूर्ण विवेक है। वह संतोष को
अपरिमित संतोष प्रदान करता है। तुम्हारे मुख से जो भी वाणी निकलती है वह संतों के हृदय को ग्राह्य होती है।
मुमुक्ष रूपी भ्रमरों के झुण्ड उस पर मँडराते रहेंगे। ग्रन्थ का प्रारम्भ सुन्दर होने के कारण मुक्त, मुमुक्षु, साधक एवं
प्रतिबद्ध लोग भी केवल श्रवणसुख से निजसुख का आनन्द प्राप्त करेंगे। वचनामृत के इस तुषार से ग्रन्थरूपी
भूमि में विवेक के अंकुर फूटे और उसमें फल लगे। अथवा निष्प्राण में प्राण आये, सिद्ध को सिद्धि प्राप्त हुई
अथवा पतिव्रता को अपना पति वर्तमान वैभव के साथ प्राप्त हुआ। इस प्रकार मैंने हर्षभरे स्वर में कहा, ठीक है
महाराज ! आपके चरणों के कृपाप्रसाद से मैं ग्रन्थ का अनुवाद सहज और सरल ढंग से करूँगा। सेतुबंध के समय
श्रीरामचन्द्र के दृष्टिप्रताप से ही शिलाएँ समुद्र पर तैर सकी थीं और वसिष्ठजी की आज्ञा से सूर्यमण्डल के स्थान
पर छाटी (साधुओं का गमछा) ही प्रकाशमान हुई थी। याज्ञवल्क्यजी के मंत्राक्षतों से ही शुष्क काष्ठ में नये
पल्लव विकसित हुए या धर्मराज ने श्वान को भी स्वर्गारोहण के योग्य बनाया। उसी प्रकार मेरे नाम से ग्रन्थ
प्रकाशित होना भी गुरु के प्रताप और वैभव का द्योतक है। यदि एका (एकनाथ) और एकादश इन आद्याक्षरों से
ही घटित देखा जाए तो राशि-नक्षत्र एक ही होता है। लेकिन जब उस एक ही में पूर्ण दिखाई देता है तो उसकी
कीमत दस गुनी हो जाती है। एक के साथ एक रखने से ग्यारह हो जाता है। इसीलिए एका को भी अकेले ही
ग्रन्थ लिखने की प्रेरणा हुई। जो सुन्दर है उसे और भी सुन्दर बनाकर, मन को दृढ़ रखकर गुरु जनार्दन एकनाथ
को टीकाकार बना कर उसका जीवन सार्थक कर रहे हैं। दशमस्कंध का जहाँ अन्त होता है, वहीं एकादश स्कन्ध
का प्रारम्भ होता है और मानों एकादश स्कन्ध से जगन्नाथ ही ग्रन्थ का प्रारम्भ कर रहे हैं। इसलिए एकादश
स्कन्ध की यह टीका एकादशी के ही दिन एका अर्थात एकनाथ कर रहा है। इसलिए उस एक के सुख से एकत्व
की प्राप्ति होगी। अब व्यास, वाल्मीकि, भार्गव आदि जिनका पुराणों में 'उशना कवि' शुक्राचार्य, आदिकवि के
रूप में गौरव किया गया है-उन महाकवियों को प्रणाम करता हूँ। उनसे प्रार्थना करता हूँ कि वे अपने ज्ञान से
मेरी बुद्धि को विकसित करें ताकि मेरा यह ग्रन्थ पूर्ण हो। उसी प्रकार ग्रन्थ का अनुवाद करने के लिए अत्यन्त
चतुर श्री शंकराचार्यजी को भी प्रणाम करता हूँ। उन्होंने अपनी कर्मठता का विचार दूर रखकर पृथ्वी पर ज्ञानसूर्य
(ज्ञानमार्ग) का प्रकाश फैलाया। अब भागवत के श्रेष्ठ टीकाकार श्रीधर को प्रणाम करता हूँ जिनकी टीका में
असीम अर्थ भरा हुआ है। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक टीकाकार, काव्य रचयिता तथा विवेक चतुर होंगे, जिनके
चरणों में नमस्कार कर ग्रन्थश्रवण करने के लिए उपस्थित रहने की विनती करता हूँ। अब निवृत्तिनाथ, ज्ञानेश्वर,

६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नामदेव, वटेश्वर आदि जिन पर गुरु की विशेष कृपा है ऐसे प्राकृत कवियों को भी प्रणाम करता हूँ। जिनके
ग्रन्थों का अवलोकन करने से प्राकृत लोगों को भी ज्ञानप्राप्ति होती है, उनके चरणों पर भी एकात्म-भाव से और
अनन्य भक्ति से मस्तक रखता हूँ। संस्कृत ग्रन्थकर्ताओं को 'महाकवि' कहते हैं और प्राकृत ग्रन्थकर्ताओं को
'लघुकवि' ऐसा क्यों है? क्या सुवर्ण पुष्पों में किसी को नया तथा किसी को पुराना कहा जा सकता है? क्या
कपिलागाय का दूध, दूध है और अन्य गायों का दूध पानी ? वास्तव में दोनों का दूध रंग और स्वाद में समान रूप
से मधुर होता है। जब मराठी अनुवाद से संस्कृत समझ में आती है तो मराठी भाषा समझने में क्या कठिनाई है?
राजा यदि जंगल में जाकर बैठता है तो सेवक के लिए वही स्थान पवित्र हो जाता है। यदि सेवक उसकी सेवा के
लिए जंगल में नहीं पहुँचेगा तो राजा उसे दण्ड देगा अथवा यदि राजा एक गरीब लड़की से तथा दूसरी अमीर
लड़की से शादी करता है तो वहाँ जाकर दोनों का दर्जा बराबरी का हो जाएगा। संसार में वस्तुओं के नाम देश
और भाषा के अनुसार बदलते रहते हैं किन्तु राम, कृष्ण आदि जो विशिष्ट नाम हैं वे भाषा की भिन्नता के कारण
नहीं बदलते। संस्कृत भाषा की उत्पत्ति यदि ईश्वर से हुई तो क्या मराठी भाषा चोरों ने बनायी? इन भ्रमों को दूर
रखिये। व्यर्थ की बातें करने से क्या लाभ है? सारांश हरिकथा संस्कृत में हो या मराठी में, वह समान रूप से
पावन है, ऐसा ही लोग कहेंगे। अब मेरे पितामह के पितामह भानुदास का वंदन करता हूँ क्योंकि उनके ही
कारण हमारा वंश भगवान को सर्वतोपरि प्रिय हुआ है। जिसने बचपन में ही ज्ञानसूर्य को प्राप्त कर लिया और
स्वयं चित्सूर्य बन गया, उसी प्रकार मानापमान को जीत कर वे भगवत् पावन हुए जिसकी पगबंध प्राप्ति देखने
के लिए साक्षात श्री विट्ठल आये थे। उनके कुण्डल कान में चमकने के कारण रात में भी दिखाई दिये। उसी
भानुदास का पुत्र था चक्रपाणी, जिसे सुलक्षण पुत्र की प्राप्ति हुई। उसका नाम 'सूर्य' रख कर भानुदास ने इस
लोक से बिदा ली। उस सूर्य के तेजस्वी किरणों से माता रुक्मिणी पैदा हुई, इसलिए रखुमाई वास्तव में हमारी
माता है। ग्रन्थ के प्रारम्भ में मैंने पूर्वजों की मालिका का अभिवादन किया। ऐसे वैष्णव कुल में मैंने जन्म लिया
यह मेरा अहोभाग्य है। इसी वैष्णव कुल में नारद, प्रह्लाद, सनकादिक, उद्धव, अक्रूर, श्रीशुक, वसिष्ठ आदि
परमेश्वर के महान भक्तों ने जन्म लिया और वे संसार के लिए भूषण बन गये हैं। ये सारे वैष्णव ग्रंथार्थ की ओर
अवधान देंगे इसलिए मैंने ग्रन्थ के प्रारम्भ में ही वैष्णव वंश की मालिका को प्रणाम किया। अब जिस गोत्र में
मैंने जन्म लिया उन विश्वामित्र जी को मैं प्रणाम करता हूँ। वे प्रतिसृष्टि निर्माता ब्रह्मदेव सदृश हैं तथा उनके ही
कारण गायत्री मंत्र को महत्व प्राप्त हुआ है। उपनिषदों का विवेचन करने वाले ऋषि याज्ञवल्क्य को भी मैं प्रणाम
करता हूँ। वे कृपामृत की वर्षा कर कवि के कर्त्तव्य की पुष्टि करते हैं। आज समस्त प्राणिमात्र को भी मैं प्रणाम
करता हूँ क्योंकि उनके ही कारण ईश्वर से मैत्री सम्भव हुई और ग्रन्थारम्भ का कार्य उत्तम रीति से सम्पन्न हुआ।
अब गुरुओं के भी गुरु दत्तात्रय महाराज को प्रणाम करता हूँ जिन्होंने अपना बोध विशद करने के लिए ग्रन्थ
लिखने की प्रेरणा दी। वही शब्द सुझाते हैं, अर्थों में अर्थ प्रकाशित करते हैं पर वक्तृत्व का श्रेय मुझको देते हैं।
वे कहते हैं कि श्रीमद्भागवत भगवान के हृद्गत है। जिसका चित्त निरन्तर भगवान के साथ रहता है, उसे ही वह
प्राप्त होगा। कल्प से भी पूर्व, भगवान ने बुद्धिमान ब्रह्मदेवजी को आत्मबोध कराने के उद्देश्य से, इस ज्ञान का
चार श्लोकों में उपदेश किया था। उसका सद्भाव-विस्मयकारी है। क्योंकि केवल शब्दमात्र (एक बार कहने
से) से ही उसे उसका अनुभव प्राप्त हुआ। सद्गुरु कृपा की महानता का वर्णन किन शब्दों में किया जाय ? उसने
क्षणमात्र में ब्रह्मदेव को निःसन्देह कर दिया। वही चार श्लोकोंवाला उपदेश गुरुपरम्परा से वैसा का वैसा चला
आ रहा है। ब्रह्मदेव ने वह उपदेश अत्यन्त बुद्धिमान एवं भक्तिमान मानसपुत्र नारद को दिया। उसे सुनकर नारद

प्रथम अध्याय ७
तृप्त होकर नखशिखांत अर्थमय हो गये और पूर्ण परमानन्द से नाचने लगे। कन्धे पर ब्रह्म-वीणा रखे तथा
ब्रह्मज्ञान से गीत गाते और ब्रह्मानन्द से नाचते हुए भूमण्डल पर आये। सरस्वती के तट पर रुके। वहाँ उन्हें व्यास
ऋषि के दर्शन हुए। उस समय महर्षि व्यास सन्देह-सागर में हिचकोले खा रहे थे। उन्होंने वेदार्थ से युक्त समस्त
पुराणों की रचना की थी लेकिन जैसा समाधान वे चाहते थे, वह उन्हें नहीं मिला था। 'आप जरा भी चिन्तित न
हों' इस प्रकार नारदजी ने उन्हें आश्वस्त किया। उन्होंने एकान्त में व्यासजी को गोपनीय तत्त्व का उपदेश दिया
और फिर वे चार श्लोक दिखा कर उन्हें भयमुक्त कर दिया। उसे भानु से छिपा कर आकाश से भी बचा कर,
धीरे से कान में बताकर निजबोध का उपदेश किया तब कहीं उन्हें स्वसुख का समाधान प्राप्त हुआ। तब स्वयं
व्यासजी ने शुक को दशलक्षण भागवत का उपदेश देकर उसे आत्मज्ञान से सार्थक किया। इस प्रकार शुक को भी
आनन्द हुआ और वह भी परमानन्द से तृप्त हुआ। फिर वह समाधिस्थ होकर आत्मशान्ति में स्थिर होकर बैठ
गया। इससे उसे समाधि में ही सहज समाधान प्राप्त हुआ। फिर उस स्थिति में वह अचानक परीक्षित को
ब्रह्मज्ञान सिखाने पहुँचा। परीक्षित के अधिकार का क्या पूछना? उसने तो कलि को ही बाँध रखा था। उसका
अधिकार युधिष्ठिर से भी श्रेष्ठ है, ऐसा अनुभव हो रहा था। क्योंकि जब तक श्रीकृष्ण भूलोक पर थे तभी तक
धर्मराज वहाँ था, कृष्ण के निजधाम चले जाने के बाद वह कलि के भय से भाग गया। लेकिन परीक्षित कलि को
दबाकर शासन कर रहा था, अर्थात वह धर्मराज से भी अधिक साहसी था। वह अर्जुन की वीर निर्व्यंग परम्परा में
उत्पन्न हुआ था। वह कृष्ण की बहन सुभद्रा का नाती था। (सुभद्रा का पुत्र था अभिमन्यु और उसका पुत्र
परीक्षित) उसका पिण्ड मानों अधिकार रूपी पिण्ड था क्योंकि गर्भ में उसकी रक्षा श्रीकृष्ण ने की थी। वह जब
गर्भ में था तभी उसके भय से अश्वत्थामा का शस्त्र भीतर नहीं प्रवेश कर पाया था। उसके अधिकार की भला
कौन व्याख्या कर सकता है? जिसने गर्भ में भी मेरी रक्षा की वह परमेश्वर प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है, ऐसा
परीक्षण वह कर रहा था, इसीलिए उसका नाम परीक्षित रखा गया था। नाम की महिमा कितनी अगाध .है।
अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित ने पृथ्वी का उद्धार करने के लिए ही जन्म लिया था। उसके ही कारण त्रिभुवन को
श्रीमद्भागवत का प्याऊ उपलब्ध हुआ था, यह बात प्रसिद्ध है। शरीर में वैराग्य और विवेक लेकर ब्रह्मप्राप्ति के
लिए सर्वस्व का त्याग करनेवाले उस परीक्षित को देखकर श्रीकृष्ण को नितांत प्रसन्नता हुई। ब्राह्मणों का कोप
विचित्र था। उन्होंने परीक्षित को ब्रह्मज्ञान का शाप दिया। ऐसे लोगों के चरणों में मैं काया, वाचा तथा मन से
भक्तिभाव से नमस्कार करता हूँ। ब्राह्मण ब्रह्मा से भी अधिक श्रेष्ठ हैं इस सम्बन्ध में मैं अधिक क्या कहूँ?
लेकिन श्री विष्णु अभी भी अपने हृदय पर श्रीवत्सलांछन धारण करते हैं। इसलिए ब्राह्मण ब्रह्मा के लिए भी पूज्य
हैं यह मेरा विचार सही है। इसीलिए वेदरूप नारायण पृथ्वी पर आये। इसीलिए ब्राह्मण पृथ्वी पर के ईश्वर हैं। वे
परब्रह्म के अवयव हैं। ऐसा होते हुए भी जो उन्हें नहीं भजते वे भाग्यहीन हैं। ब्राह्मणों का सामर्थ्य विचित्र है।
उन्होंने ईश्वर को अपना आज्ञाधारी बना रखा है। अहो! मूर्त्ति की प्रतिष्ठा करते समय, उसमें केवल मंत्रांश से ही
देवत्व का अंश प्रकट होता है। इस पर संतों ने कहा, क्या कहूँ? तुम भक्ति से जो भी स्तवन करते हो उसमें
सचमुच ही साहित्य और चातुर्य के नये सिद्धान्तों की सृष्टि करते हो। तुमने गणपति और सरस्वती दोनों को ही
एक ही पंक्ति में बिठाया है। उसी प्रकार संत्वर्णन में तुमने स्तुति के रूप में एकात्मता प्रकट की। इसके बाद
कुल और कुलदेवता का वर्णन करते समय तुमने जो कथा सुनायी उसे सुनकर मन से चिन्ता का पूरी तरह
विस्मरण हो गया। जो सद्भाव संतचरणों में था वही ब्राह्मणों के प्रति भी। गुरुस्तवन से भी तुमने संतों को प्रसन्न
कर दिया इसलिए तुम्हारी वाणी धन्य है। तुम्हारे मुख से शब्द निकलते ही हमने पहचान लिया कि स्वयं गुरु

८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जनार्दन तुम्हारे मुख से बोल रहे हैं। तुम में प्रेम का ज्वार उठ रहा है, उसे नियंत्रण में रखो और अगली कथा
सुनाने का मन में निश्चय कर कथा का प्रारम्भ करो। आपने स्मरण दिला कर अच्छा ही किया। इसीलिए मैंने
आपके चरणों पर पूरा विश्वास रखा है। जहाँ कहीं आपको गलती लगती हो उसे आप सुधार दें। ग्रंथार्थ सिद्ध
कर मुझे सज्जनों के बीच मान्यता दिलायें। उन्होंने कहा, "ठीक कह रहे हो। तो हे कविपोषक! तुम्हारे ग्रन्थ का
सन्दर्भ ठीक तरह से जानने के लिए अब संस्कृत पर भी टीका करना शुरू कर दो।" इसी भाषण पर भक्तिभाव
रख कर मैं आपके चरणों से लगा हूँ। अब आपकी आज्ञा से कथा प्रारम्भ करता हूँ तो नैमिषारण्य में सूत
शौनकादिकों को पिछला कथा सन्दर्भ इस प्रकार सुना रहे हैं। इससे पूर्व दशम स्कन्ध में नौ लक्षणों से युक्त कथा
सुनायी। अब ग्यारहवें स्कन्ध में श्रीकृष्ण मोक्ष का लक्षण बता रहे हैं। जो चिदाकाश के पूर्णचन्द्र हैं और
ज्ञानयोगियों में श्रेष्ठ हैं ऐसे वे शुकयोगिन्द्र बोलने लगे और सुनने लगे राजा परीक्षित। उसने कहा, "महाराज,
इसीलिए मैंने सर्वस्व का त्याग किया। तभी आपने कृपापूर्वक दर्शन दिये। मेरे भाग्य की अब कोई सीमा नहीं है।
सचमुच इस मोक्ष की कथा अगाध है। जिन्हें अपने मोक्ष के प्रति आस्था है उन्हें मन लगाकर अत्यन्त आदर के
साथ श्रवण करने के लिए तैयार रहना चाहिए। मन को एकाग्र कर कान में रखना चाहिए और अवधान को
सावधान कर श्रवण करना चाहिए। भगवान ने अनेक युगों में अनेक अवतार धारण किये किन्तु इस श्रीकृष्ण
अवतार का चमत्कार कुछ और ही है। हरि की लीला अगाध है। उसका रहस्य देवताओं की समझ में भी नहीं
आता। जिसने जन्म लेते ही माया (माँ) से अलग होकर अपनी ही लीला से अपना पोषण किया जिसने
बाल्यावस्था में ही पूतना आदि को मुक्ति का सुख भोगने दिया, माँ को विश्वरूप दिखलाया, गोपालों को वैकुंठ
का दर्शन कराया और फिर भी अपना बालरूप नहीं बदलने दिया। बालक था तभी अनेक बलवान लोगों को
मारा, संसार में विलक्षण कर्म किये किन्तु बाल्यावस्था की सीमा कभी पार नहीं की। साक्षात परब्रह्म होते हुए
चोरी की, देवता होते हुए भी व्यभिचार किया, पत्नी और बच्चे रहते हुए भी ब्रह्मचारी होने का आदर्श प्रस्तुत
किया। अधर्म से धर्म की वृद्धि की, अकर्म से कर्म का उद्धार किया, अनियमितता से अत्यन्त कठिन नियमों का
पालन किया। संग से निःसंगता सम्पादित की, भोग से योग को बढ़ाया, बिना त्याग किये अत्यन्त अव्यंग और
निर्दोष त्याग किये। कर्मठ लोगों को बोध कराने के लिए कर्म की जड़ता के बन्धन तोड़ डाले और स्पष्ट कर
दिया कि भोग से भी मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। भक्ति, भुक्ति और मुक्ति इन तीनों को एक ही पंक्ति में
बिठाया। इसकी ख्याति के सम्बन्ध में क्या कहा जाय? इसने मिट्टी खाकर विश्वरूप दिखलाया। उस श्रीकृष्ण
का उत्तम एवं परमपवित्र चरित्र मैं तुम्हें बताऊँगा। इस अवतार में आत्मबोध का पूरी तरह विस्तार हुआ है इसमें
जरा भी सन्देह नहीं है। एकादश स्कन्ध के सारांश में आदि और अन्त में कहीं संक्षेप में तो कहीं विस्तार से
परमात्मस्थिति अर्थात मुक्ति के ही सम्बन्ध में कहा गया है। नारद ने वसुदेव को 'निमि-जयंत' की कथा संवाद
रूप में संक्षेप में बतायी। और उद्धव पर अत्यन्त प्रेम होने के कारण उसे अनेक दृष्टांत देकर श्रीकृष्ण ने स्वमुख
से जो कथा सुनायी वह 'विस्तारस्थिति' है। पहले दशम स्कन्ध में निरोधन लक्षण बताये थे जिसमें श्रीकृष्ण ने
अनेक युक्तियाँ सोच कर किस प्रकार अधार्मिक लोगों का संहार कर पृथ्वी का भार कम किया था इसके बारे में
बताया गया था। उनके अधर्म के कारण पृथ्वी आक्रोश कर रही थी, इसलिए लोगों की सहायता के लिए पूर्णब्रह्म
भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया। उन दुष्ट दैत्य और दानव तथा पृथ्वी के लिए भारस्वरूप हुए समस्त राजाओं
का श्रीकृष्ण भगवान ने वध किया। पिछली कथा का सारांश श्रीशुक आगे बता रहे हैं।