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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 869 में से

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पृष्ठ 10

एकनाथ की श्रीमद्भागवत ९
पारायण शुरू किया। वहाँ से वह काशी पहुँचा और पंचाध्यायी का पाठ करने लगा। ऐसा प्रतीत होता है कि
इस 'पंचाध्यायी' को जनार्दन स्वामी ने भी सुना था और यह ग्रन्थ पूरा होगा ऐसा आशीर्वाद भी दिया था।
"त्या वाराणसी नामक मुक्तिक्षेत्रांत, मणिकर्णिकेच्या महातीरावर, पंचमुद्रा नामक पीठामध्यें ही
एकादशस्कंधावर टीका केली आहे ती ऐकून सज्जनांना संतोष झाला आणि जनार्दन ही आनंदाने प्रसन्न झाले.
त्यानें पांच अध्याय संपतांच आपण आपल्या मुखानें वरदान दिले होते. ते असें की हा ग्रंथ निर्विघ्नपणें सिद्धीस
जाईल" (३१-५३५)
हिन्दी रूपान्तर—
उस वाराणसी नामक मुक्तिक्षेत्र में मणिकर्णिका के महातट पर पंचमुद्रा नामक पीठ में यह एकादश स्कन्ध
पर टीका लिखी है। उसे सुनकर सज्जनों को संतोष प्राप्त हुआ और जनार्दन भी आनन्द से प्रसन्न हो उठे।
उन्होंने पाँच अध्याय पूर्ण होने पर ही अपने मुख से वरदान दिया था। वरदान यह था कि यह ग्रन्थ निर्विघ्न
रूप से सम्पन्न होगा।
काशी के कुछ विद्वानों ने 'पंचाध्यायी' को सुना और तत्कालीन पीठाधिपति से (इनके ठीक-ठीक नाम
का स्पष्ट निर्देश नहीं मिलता।) उन्होंने एकनाथजी के पास आदेश भेजा कि वे अपने ग्रन्थ के साथ काशी
आयें। इतना ही नहीं उन्होंने ब्राह्मण द्वारा किया जाने वाला 'पंचाध्यायी' का पारायण बन्द करवा कर पोथी
को अपने अधिकार में ले लिया और मठ में सुरक्षित रखवा दिया। कुछ दिन के बाद जब एकनाथजी के पास
आदेशपत्र पहुँचा तो काशी के विद्वानों का आदर करने वे काशी चलने की तैयारी करने लगे। इसी बहाने काशी
यात्रा का लाभ होगा इस उद्देश्य से अनेक भक्तगण उनके साथ हो लिये। जहाँ-जहाँ से वे गुजरते वहाँ से
और भक्त उनके साथ हो लेते। पंचगंगा घाट पर पूरा जुलूस रुका।
प्रारम्भ में काशी के विद्वानों ने उन्हें अपने कार्य से विरत होने को कहा किन्तु एकनाथ ने उसमें अपनी
असमर्थता प्रकट की। वे पंचगंगा घाट पर बैठ कर ग्रन्थ रचना करने लगे। वाराणसी में पंचगंगा घाट के किस
स्थान पर इस दिव्य ग्रन्थ का लेखन हुआ होगा यह तो पता नहीं है, पर यह मान्यता अवश्य है कि तैलंग
स्वामी मठ से लगे स्थान पर जो अकेले मुरलीधर कृष्ण की श्याम प्रतिमा स्थापित है वह एकनाथ महाराज
की ही देन है। लगता है कि आरम्भ में एकनाथ पंचगंगा घाट पर टिके थे, पर बाद में 'पंचमुद्रापीठ' अर्थात्
मणिकर्णिका घाट के परिसर में आ गये, जहाँ उन्होंने कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को ग्रन्थ पूरा किया।
"महामंगल अशा कार्तिक महिन्यांत शुद्ध पौर्णिमेच्या दिवशी सोमवार शिवयोगाचे दिवशी ही एकादश
स्कंधावरील टीका समाप्त झाली" (३१-५५२)
कुछ ही महीनों बाद कई पण्डित आदरपूर्वक ग्रन्थ का श्रवण करने लगे। ग्रन्थ पूर्ण होते ही उनके पूर्व
विरोधकों ने नाथ भागवत की पाण्डुलिपि को पालकी में रखकर उसकी जयजयकार करते हुए जुलूस निकाला
और फूल-मालाएँ चढ़ा कर उनकी पूजा की।
इस ग्रन्थ में भागवत धर्म की परम्परा, स्वरूप, विशेषताएँ, ध्येय, साधन आदि सब कुछ भागवत के आधार
पर रोचक ढंग से निरूपित किया हुआ है। भागवत धर्म की आत्मा है—"सब भूतों में भगवद्भाव का अनुभव
करना"।
एकनाथजी ने तीन प्रकार के भक्त कहे हैं—(१) प्राकृत, (२) मध्यम और (३) उत्तम। मूर्तिपूजक प्राकृत
हैं, ईश्वर को ध्यान में रखकर प्राणिमात्र को समान दृष्टि से देखने वाले को मध्यम तथा प्राणिमात्र में ईश्वर