श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुना दी। उन्होंने उपदेश दिया, "नाथ! एक पाई की भूल का पता लगते ही जब तुम्हें इतना हर्ष हो रहा है तब
संसार की जो बड़ी भूल तुम्हारे हाथों हुई है उसका पता लगने से तुम्हें कितना आनन्द होगा? प्रिय शिष्य, यदि
ऐसी ही तन्मयता से श्री दत्त का चिन्तन करो तो भगवत्प्राप्ति की ताली मिल गयी समझो।" छः वर्ष तक उन्होंने
गुरु की सेवा की और जनार्दन स्वामी ने उन्हें श्री दत्तात्रेय के दर्शन कराने का संकल्प किया। देवगढ़ पर जहाँ
जनार्दन स्वामी समाधि लगाते थे वह स्थान अत्यन्त रमणीक था। इसी स्थान पर उन्हें श्री दत्तात्रेय के दर्शन होते
थे। एक दिन जनार्दन स्वामी ने एकनाथ से संकेत में ही बताया कि इस स्थान पर दत्तात्रेय भगवान के सिवाय
और कोई आता नहीं। वे किसी भी रूप में आ सकते हैं लेकिन उन्हें देखकर डरना नहीं। एक दिन जनार्दन
स्वामी पूजा से निवृत्त हुए थे तभी एक फकीर वहाँ आ पहुँचे और जनार्दन स्वामी से बातें करने लगे। उनका वेष
असाधारण था। पूरा शरीर चमड़े से ढँका हुआ था। साथ में एक कुतिया भी थी। उनकी आँखों से मानों आग
बरस रही थी। जनार्दन स्वामी ने फकीर की आज्ञा से कुतिया का दूध निकाला और मिट्टी के पात्रों में उसे उड़ेल
कर एक साथ पीने लगे। एकनाथ ने वह पात्र धोया और उसी धोवन को तीर्थ मानकर ग्रहण किया। फकीर ने
एकनाथ को अपने पास बुलाया। एकनाथ ने फकीर और गुरु दोनों को नमस्कार किया। फिर हाथ जोड़कर सामने
खड़े हो गये। उन्होंने देखा कि जो गुरु थे वही परमगुरु हैं और जो परमगुरु थे वही गुरु हैं। फकीर के रूप में
उपस्थित दत्तात्रेयजी बोले, "यहाँ महाभागवत का जन्म हुआ है। इसके हाथों भागवत धर्म का प्रसार होगा।"
इसका उल्लेख उन्होंने एक अभंग में इस प्रकार किया है—"एका (एकनाथ) ने जनार्दन की शरण जाकर,
आत्मदृष्टि पाकर परब्रह्म भगवान दत्त को इन आँखों से देखा।" श्री दत्तात्रेय के दर्शन से उन्हें इस बात का ज्ञान
हुआ कि सगुण-निर्गुण एक है। वह दत्त है अर्थात् अपना रूप उन्होंने पहले ही दिया हुआ है। वह सहजसिद्ध हैं,
अर्थात् बुद्धि पर से परदा हटते ही वह उपस्थित हो जाता है।
एकनाथ को श्री दत्तात्रेय भगवान के दर्शन हो गये और इनका वरप्रसाद भी मिला तो जनार्दन स्वामी के मन
में आया कि अब इससे अनुष्ठान कराना चाहिये। इसके लिये उन्होंने देवगढ़ पर वायव्य दिशा की ओर सुलभ
पर्वत पर एक सुरम्य स्थल निश्चित कर लिया। वहाँ वे ब्राह्म मुहूर्त में उठकर स्नान-संध्या आदि से निवृत्त होकर
तदुपरान्त पूर्वाभिमुख होकर सिद्धासन लगाकर बैठ जाते। श्रीकृष्ण की मूर्ति का ध्यान करना ही उनका दैनिक
कार्यक्रम था। वे इस प्रकार का अभ्यास योग करने लगे। इससे बाह्य स्फुरण की गति बन्द हो गयी और वे इसी
देह में विदेहावस्था का भोग करने लगे। जनार्दन स्वामी ने उन्हें अच्छी तरह समझा दिया था कि सगुण और
निर्गुण एक हैं। प्राणायाम, धारणा और ध्यान ये सब भक्ति के साधन हैं। वे भक्तिपूर्वक श्रीकृष्ण की मूर्ति का
ध्यान करते थे। फलस्वरूप एकनाथ को साक्षात आनन्दमय भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन हुए। देवगढ़ पर वे इस
प्रकार तपश्चर्या कर रहे थे कि एक दिन जब वे समाधि में थे तभी एक काला सर्प फूत्कार करता हुआ उन पर
टूट पड़ा और उनके शरीर से लिपट गया। आश्चर्य तो इस बात का था कि साम्य स्थिति का अनुभव करने वाले
एकनाथ के अंगस्पर्श से कालसर्प की दंश करने की दुष्ट बुद्धि नष्ट हो गयी ओर वह नाथ के मस्तक पर फन
फैलाकर झूमने लगा।
एकनाथ जब अनुष्ठान सम्पन्न कर घर लौटे तो गुरु जनार्दन स्वामी ने विचार किया अब उनका यहाँ का
काम समाप्त हो चुका है अतः अब उसे तीर्थयात्रा के लिये भेज देना चाहिये। वे चाहते थे कि इस प्रकार अनेक
संत-महात्माओं का सत्संग लाभ कर वह भागवत धर्म का प्रवर्तक बने। जनार्दन स्वामी ने उन्हें साथ लेकर
नासिक-त्र्यंबकेश्वर तक चलना स्वीकार कर लिया। रास्ते में गोदावरी के तट पर वे चन्द्रभट नामक ब्राह्मण के