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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 869 में से

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पृष्ठ 18

२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अधिष्ठान रहता है इसलिए मूषक-वाहन यह नाम तुम्हें शोभा देता है। तुम न तो पूरे नर हो न पूरे कुंजर हो। तुम
व्यक्त और अव्यक्त से परे हो। तुम्हें ऐसा निर्विकार जानकर मैं तुम्हें सादर प्रणाम करता हूँ ताकि यह ग्रन्थ बिना
किसी विघ्न के पूरा हो जाय। ऐसे श्री गजानन को 'मैं' कह कर प्रणाम करने वाला भी कहाँ का है ? क्योंकि जो
मूल रूप से अकर्ता है वही इस ग्रन्थ कथा का विस्तार कर रहा है। अब विवेक की साक्षात मूर्ति तथा जो इन्द्रिय
वृत्तियों को चेतनता प्रदान करती है उस सरस्वती को भी मैं प्रणाम करता हूँ। जो वाचा से बात कराती है, बुद्धि
को बोध प्रदान कराती है और प्रकाश को प्रकाशमान करती है, जो आँखों में दृष्टि के रूप में रहती है अथवा
फल में रस के रूप में रहती है, उसी प्रकार शिव की काया में शक्तिरूप से रहती है। शक्कर में जिस प्रकार
माधुर्य या पुष्प में मकरंद रहता है, उसी प्रकार शिव का और शक्ति का सम्बन्ध अनादिसिद्ध एवं तर्क से परे है।
वाचा से जिसका वर्णन सम्भव नहीं है, ऐसा वह आत्मस्वरूप का माधुर्य चारों ओर वाणियों में श्रेष्ठत्व से भरा
हुआ है। इसलिए वाणी की देवता सरस्वती ग्रन्थ के अर्थ की उत्तम अभिरुचि प्रदर्शित करती है। संसार में विवेक
का चुनाव करने वाले जो हंस हैं उस पर ही यह हँसवाहिनी देवी सहजासन में बैठी हुई है। परमहंस पर
विराजमान उस देवी को विवेकी हंस ही ठीक तरह से पहचानते हैं। लेकिन जो मूर्ख, मंदबुद्धि और भाग्यहीन
होते हैं उन्हें वह उनके पास होते हुए भी नहीं दिखाई देती। उसके रूप का विचार करने पर ऐसा प्रतीत होता है
कि उसका निराकार और विश्वाकार रूप भी वही है। वही आत्मीयता से अनुपम कथा कहलवाता है। 'यह बोल
अच्छा रहा' यह बात जिस प्रकार बोल कर ही अभिव्यक्त की जाती है, उसी प्रकार मन का स्तुति-भाव वाणी से
ही वाणी का गौरव करता है ऐसा समझना चाहिए। वह वाग्विलास रूपी सर्वांगसुन्दरी सरस्वती देवी अंतर्बाह्य
रहकर स्वयं ही ग्रन्थ का सुन्दर अर्थ कहती है। वह स्वभाव से सर्वदा ही प्रसन्न रहती है इसलिए इस निरूपण में
बहार आ गयी है। फिर भी उसने मुझमें वक्ता होने का अभिमान नहीं होने दिया है। वाग्देवता की यह स्तुति
वाणी ने ही की है, इसलिए मन में द्वैत का विचार आने का अवसर ही नहीं प्राप्त हुआ है। उसने 'बोल' और
'बोलने' को नष्ट किया, मौन को भी तोड़ दिया लेकिन निरूपण तो कराया ही और जो बोलने के लिए असम्भव
है उसे शब्दों के माध्यम से व्यक्त कराया। ऐसी उस सरस्वती को प्रणाम करने के लिए सेवक बन कर गया तो
'मैं पन' के साथ परावाणी भी लुप्त हो गयी। जहाँ 'मैं पन' का ही अभाव है वहाँ 'तू पन' को कहाँ स्थान
मिलेगा ? फिर भी इस विषय प्रतिपादन में वह कल्पनातीत प्रसाद भर-भर कर डाल रही है। जिस प्रकार सागर
में लहरें उछलती हैं उसी प्रकार यहाँ आत्मस्वरूप पर स्वरूपाकार शब्दों की लहरें शोभा दे रही हैं। जिस प्रकार
चीनी का रवा माधुर्य से अलग नहीं होता उसी प्रकार निरूपण के शब्द ब्रह्मरसयुक्त होने के कारण ब्रह्मसुख के
रस से अलग नहीं हैं। वहाँ ब्रह्मानन्द रस वृत्ति ने 'मैं पन' के साथ सरस्वती को भी एक ही थाली में परोसा है।
इससे अभिन्नत्व के शेष से तृप्ति की डकार आने के कारण इस कथा के उद्गार बाहर आ रहे हैं। अब संतप्त
जनों को शान्त करने के लिए स्वानन्द की वर्षा करने वाले जो चिदानन्द के मेघस्वरूप ही हैं उन्हें प्रणाम करता
हूँ। वे चैतन्य के अलंकार, ब्रह्मविद्या का श्रृंगार अथवा ईश्वर का मनोरम निवास ही हैं। वे ब्रह्मवस्तु के
निवासस्थान अथवा सुख का पूर्ण उल्लास अथवा सुरक्षित विश्राम स्थल हैं अथवा वे भूतदया का सागर, करुणा
का मायका अथवा स्वानन्द का गौरव करनेवाले निर्गुण के सगुण अवयव ही हैं अथवा वे आँखों की दृष्टि अथवा
उसकी सुन्दर पुष्टि हैं जिनके चरणांगुष्ठ में संतोष को भी संतोष प्राप्त होता है। वे जिनकी ओर देखते हैं उनका
भवसंकट दूर होता है और उनकी आँखों के सामने परब्रह्म अपने आप प्रकट हो जाता है। वे साधन में किया गया
कठिन प्रयास अथवा शास्त्रचातुरी का विलास नहीं देखते। यदि विश्वास हो तो वे स्वयं ही ज्ञान का प्रकाश