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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 869 में से

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पृष्ठ 9

८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
श्री दत्तात्रय भगवान के आदेश से एकनाथ ने भागवत के एकादश स्कन्ध पर टीका लिखना प्रारम्भ किया।
वे अपने ग्रन्थ निर्माण का कारण सन्तजनों की आज्ञा बतलाते हैं। "संतों ने काफी आग्रह किया तो मैंने पूछा,
महाराज किस ग्रन्थ को प्रारम्भ करूँ यह बतलाएँ। इस पर संतों ने कहा, पुराणों में भागवत श्रेष्ठ है; उसमें
'उद्धवगीत' अत्यन्त श्रेष्ठ है अतः तुम उसी का प्रारम्भ करो। भगवान तुम्हें सहायक हैं।"
"एकांती आणि लोकांतीही ग्रंथ करण्याबद्दल संतांनी फार आग्रह केला, तेव्हां मी म्हटलं, महाराज!
कोणत्या ग्रंथाला प्रारम्भ करूँ ते सांगावें त्या वेळीं संत म्हणालें, पुराणांमध्ये भागवत हे श्रेष्ठ होय, त्याकरितां
त्याचा तूं आरम्भ कर वक्ता भगवान तुला साह्य आहे (१-५७-५८)"
फलतः वे संतों को वन्दन कर उसके बाद अपनी कुलदेवी एकवीरा (रेणुका) तथा सद्गुरु जनार्दन
महाराज को नमस्कार करते हैं।
"आता कुलदेवतेला नमस्कार करूँ. ती ऐक्यरूपानें एकनाथामध्येच राहिलेली असल्याकारणानें,
ऐक्यावांचून दुसरो गोष्टच काहूँ देत नाहीं. कानांमध्ये आणि मुखामध्ये एकपणानें ती 'एकवीरा' (श्री रेणुका)
देवीच एकत्वानें वास करीत आहे. तीच शिव आणि शक्ति अशीं दोन्ही स्वरूपें घेऊन, एकपणानेंच मिरवीत
आहे. (१-६८-७०)" एकादश स्कन्ध की अपनी टीका का आरम्भ उन्होंने (किसी) एकादशी को ही
किया था।
"म्हणून एकादश स्कंधावरची ही टीका, एकादशीलाच एका म्हणजे एकनाथ करीत आहे त्यामुळे ती
एकपणाच्या सुखाला एकत्वानें प्राप्त होईल" (१-११४-११५)
"इसलिये एकादश स्कन्ध की यह टीका एकादशी के ही दिन एका अर्थात् एकनाथ आरम्भ कर रहा
हैं। इससे वह एकपन के सुख को एकत्व से पात्र होगी।" (१-११४-११५)
श्री एकनाथजी ने अपनी टीका के लिये सम्पूर्ण भागवत को छोड़कर ग्यारहवें स्कन्ध को क्यों चुना इसको
वे स्वयं ग्रन्थ के आरम्भ तथा अन्त में बताते हैं। ग्यारह का अर्थ एक के साथ एक ही होता है। वहाँ दो
का प्रवेश नहीं है, अर्थात् यहाँ केवल 'अद्वैत ही अद्वैत है द्वैत की कोई बात नहीं है।'
एकनाथी भागवत में ३१ अध्याय हैं जिनमें कुल मिलाकर १८७९८ ओवियाँ हैं। ओवी मराठी के सन्त
साहित्य का अत्यन्त लोकप्रिय छन्द है, जिसका मुकुन्दराज के समय से ही प्रयोग होता आ रहा है, अर्थात्
काल के साथ ही ओवी की बनावट में अन्तर भी विद्यमान है। लेकिन ज्ञानेश्वर की ओवी अप्रतिम मानी जाती
है। एकनाथजी ने स्वयं अपनी संशोधित ज्ञानेश्वरी में इसका प्रमाण-पत्र दिया है। वे कहते हैं कि ज्ञानेश्वर
के बाद 'ओवी' लिखने का अर्थ है अमृत से भरी थाली में 'नरोटी' (नारियल को तोड़ने के बाद उसके ऊपरी
आवरण का टुकड़ा) रखना। स्पष्ट है इस अभिप्राय को लाक्षणिक रूप में ही लेना होगा।
यह त्रिकालाबाधित सत्य है कि जब दुनिया में कोई नयी चीज आती है या कोई नया आविष्कार होता
है तो उसका जमकर विरोध होता है। जिस समय एकनाथ पैठण में भागवत की टीका लिख रहे थे उस समय
पैठण के कतिपय संस्कृत विद्वानों तथा अनुदार पण्डितों ने उनका प्रखर विरोध किया किन्तु एकनाथ ने अपने
स्वभाव के अनुरूप बड़े संयम से उनका विरोध सहन किया। एकनाथजी के पुत्र हरि पण्डित भी संस्कृत के
प्रकाण्ड विद्वान थे। पहले उनका स्वर भी विरोधकों में था, पर बाद में वे अपने पिता के भक्त हो गये। पैठण
के एक भक्त ने नाथ द्वारा लिखित भागवत के पाँच अध्यायों (पंचाध्यायी) की नकल तैयार की और उसका