श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री एकनाथ-चरित्र
एकनाथ का जन्म संत परिवार में हुआ था। उनके परदादा भानुदास महाराष्ट्र के महान संत थे। उनके पुत्र
थे चक्रपाणि और उनके पुत्र थे सूर्यनारायण। एकनाथ ने सूर्यनारायण के घर में शक १४५० में पैठण में जन्म
लिया। एकनाथ को ज्ञानेश्वर का अवतार कहा जाता है क्योंकि उन्होंने ज्ञानेश्वर के कार्य को पूरा किया। तेरहवीं
सदी के अन्तिम दशक में ज्ञानेश्वर ने अपनी इहलीला समाप्त की। उन्होंने ज्ञानेश्वरी के रूप में जो ज्ञानसम्पदा
महाराष्ट्र को सौंपी उसका प्रचार-प्रसार करने का दायित्व नामदेव के कन्धों पर आ पड़ा। उन्होंने ई०स० १३५०
तक यह जिम्मेदारी निभायी लेकिन अगले दो सौ वर्ष का कालखण्ड (ई०स० १३५० से १५५० के बीच) इस
कार्य के लिए अनुपयुक्त था क्योंकि इसी कालखण्ड में मुसलमानों ने देश में भयानक उत्पात मचाया और
अशांति का वातावरण बना दिया। फिर एकनाथ का उदय हुआ। उन्होंने महाराष्ट्र में परमार्थ विषयक जागृति का
बिगुल बजाया। उनके प्रयासों से जनजीवन में धार्मिक आस्था जोर मारने लगी और जीवन सामान्य हो चला।
एकनाथ का जन्म मूल नक्षत्र में हुआ था। उनके जन्म के कुछ ही महीने बाद उनके माता-पिता की मृत्यु
हो गयी। वे अकेले रह गये तो उनके दादा-दादी लाड़-प्यार से उन्हें 'एका' कहकर पुकारने लगे। छठवें वर्ष ही
उनका जनेऊ हो गया और उन्हें घर में ही ब्रह्मकर्म की शिक्षा दी जाने लगी। घर में जो गुरु पढ़ाने आते थे वे
उनकी बुद्धि की तीव्रता से परेशान थे। एक दिन उन्होंने चक्रपाणीजी से कह ही दिया, "मैंने तो पेट के लिये
कथा कहना सीखा था किन्तु आपका पौत्र ऐसे जटिल प्रश्न करता है कि मैं उसका समाधान नहीं कर पाता।"
बारह वर्ष की आयु तक आते-आते उसने रामायण, महाभारत आदि पौराणिक ग्रन्थों का अध्ययन पूरा कर लिया
था। दैनिक कृत्य के उपरान्त वे भगवद्भजन में लग जाते। एक रात वे अकेले ही शिवालय में बैठकर राम-कृष्ण-
हरि का मंत्र जप रहे थे कि तभी उन्हें आत्मिक प्रेरणा हुई कि देवगढ़ जाकर जनार्दन स्वामी के चरणों में गिरना
है। वे दादा-दादी से बिना कुछ कहे ही देवगढ़ के लिये चल पड़े। तीसरे दिन प्रातःकाल वे देवगढ़ पहुँचे। गुरु
के दर्शन होते ही वे मानों गद्गद् हो गये। उन्होंने स्वयं को उनके चरणों में सौंप दिया। यह शक संवत् १४६७
की घटना है।
एकनाथ जनार्दन स्वामी के व्यक्तित्व से अत्यधिक प्रभावित हुए। ब्राह्मण कुल में पैदा होकर वे यवन
शासक की नौकरी में थे लेकिन किसी भी कर्म में वे कम नहीं थे। प्रातःकाल से मध्याह्न तक का काल स्नान-
संध्या, समाधि तथा दत्तात्रेय की सेवा में बीतता। इसके बाद वे अपने सरकारी कामकाज में व्यस्त हो जाते।
सायंकाल संध्यावंदन आदि से निवृत्त होकर वे 'ज्ञानेश्वरी' तथा 'अमृतानुभव' का पारायण करते। गुरुसेवा करते-
करते एकनाथजी के मनोविकार शान्त हो गये। उनकी चित्तवृत्ति शुद्ध हो गयी। उनके जैसा शिष्य पाकर जनार्दन
स्वामी अत्यन्त प्रसन्न हुए। एकनाथ ने गुरुमुख से ही ज्ञानेश्वरी, अमृतानुभव तथा श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थ सुने
और इससे उनका आत्मबोध जागृत हो गया। एक बार जनार्दन स्वामी ने एकनाथ को देवगढ़ के हिसाब-किताब
का काम सौंपा। उन्होंने देखा कि एक दिन के हिसाब में एक पाई की भूल रह गयी है। तीन पहर रात बीत जाने
पर जनार्दन स्वामी जागे तो उन्होंने एकनाथ को हिसाब मिलाते देखा। तभी संयोगवश भूल पकड़ में आ गयी थी।
एकनाथ ने जोर से ताली बजायी। गुरु ने हर्ष से पूछा, "यह ताली किसलिये बजायी?" एकनाथ ने पूरी कथा