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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 7, कुल 869 में से

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पृष्ठ 7

श्री एकनाथ-चरित्र ५
आश्रम में रुके। ब्राह्मण ने अभ्यागतों का उचित स्वागत किया तथा बाद में चतुःश्लोकी भागवत का निरूपण
किया। जनार्दन स्वामी को वह इतना अच्छा लगा कि उन्होंने एकनाथ को चतुःश्लोकी भागवत पर 'ओवी' छन्द
में विस्तृत ग्रन्थ लिखने की आज्ञा दे दी। दूसरे दिन वे पंचवटी-नासिक पहुँचे। वहाँ से त्र्यंबकेश्वर। फिर वहाँ से
गोदावरी के उद्गम स्थल ब्रह्मगिरि पर्वत की परिक्रमा करके तथा निवृत्तिनाथ की समाधि के दर्शन करके
पुलकित हुए। गंगास्नान, ब्राह्मण-संतर्पण आदि से निवृत्त होकर तथा एकनाथ को आगे का कार्यक्रम बताकर
जनार्दन स्वामी देवगढ़ लौट गये। उनके साथ चन्द्रभट भी चले गये।
एकनाथ ने चार-पाँच वर्ष में भारतवर्ष की यात्रा की। गुरु से बिछोह उन्हें सहन नहीं हो रहा था। गुरु का
उपदेश था—'‘योगक्षेम चलाने वाले भगवान समर्थ हैं। अपना ज्ञान कहीं प्रकट न करो और साधु-महात्माओं से
मिलते हुए अपना स्वानंद अन्दर ही अनुभव करो।’'
एकनाथ ने इस प्रकार अखण्ड मनःस्थिति में रहकर यात्रा की। पयोष्णी, नर्मदा, ताप्ती, गंगा, यमुना,
कावेरी, तुङ्गभद्रा आदि नदियों में स्नान किया, आठों विनायकों तथा बारहौं ज्योतिर्लिंगों के दर्शन किये। गोकुल,
वृन्दावन, मथुरा आदि कृष्णभक्ति के क्षेत्रों में सुख का अनुभव किया फिर प्रयाग, काशी और गया की त्रिस्थली
यात्रा की। महान भक्त नरसी भगत का जूनागढ़ प्रदेश देखा, द्वारिका का दर्शन कर भाव-विभोर हो गये। पचीसवें
वर्ष वे घर लौटे।
एकनाथ के दादा-दादी ने एकनाथ की खोज की और उसे घर लिवा आये। दादा-दादी के आग्रह से
एकनाथ ने गृहस्थाश्रम धर्म स्वीकार कर लिया। उनकी पत्नी उनके अनुरूप ही थी। गुरु के घर रहकर जिस
वेदान्त विचार का अध्ययन उन्होंने किया था उससे उन्होंने यही निष्कर्ष निकाला कि परमार्थ का सच्चा अर्थ
गृहस्थाश्रम में रहकर उसे लोकोपयोगी और जीवनोपयोगी बनाना है। उनकी लोकसेवा में जातिभेद और वर्णभेद
को कोई स्थान नहीं था। स्त्री-पुरुष में भेद करना भी उन्हें स्वीकार नहीं था। उनके इस समव्यवहार के सम्बन्ध
में कथा प्रसिद्ध है कि एक बार श्राद्ध में ब्राह्मणों के समय पर न आने पर उन्होंने पितरों के लिये बनाया भोजन
अंत्यजों को खिला दिया था। उनके विरोधकों ने यह भ्रामक प्रचार कराया कि एकनाथ देववाणी (संस्कृत) का
अपमान करके मराठी भाषा में भागवत कहता है और रचता है। यह भी कहा कि यह चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को नष्ट
कर रहा है, ज्ञानमार्ग की अपेक्षा भक्तिमार्ग को प्रधानता देता है और ब्राह्मणों के समान अन्य तीनों वर्णों का
समादर करता है। लेकिन एकनाथ अपने समभाव पर अडिग रहे। उन्होंने एक अभंग में कहा है, निंदक हमारी
काशी है, वे हमारे सारे पापों का विनाश करने वाले हैं। निंदक हमारे धोबी हैं, वे हमारे कपड़ों को बिना कुछ
लिये ही धो डालते हैं। निंदक हमारे गुरु हैं।
एकनाथजी ने विपुल ग्रन्थ रचना की है जिनमें प्रमुख हैं—'स्वात्मबोध', 'चिरंजीव पद', 'आनन्दलहरी'
आदि। नाथ भागवत उनका सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसके अतिरिक्त 'भावार्थ रामायण' उनका महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ
है।