श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ श्री॥
श्रीमद् एकनाथी भागवत
सदा सेव्या सदा सेव्या श्रीमद्भागवती कथा
यस्याः स्मरणमात्रेण हरिश्चत्तं समाश्रयेत्।
अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां भारतार्थविनिर्णयः
गायत्री भाष्यरूपौ सौ वेदार्थ परिबृंहिता ॥
प्रथम अध्याय
ॐ श्री गणाधिपतये नमः श्री सरस्वत्यै नमः।
श्री गुरुभ्यो नमः॥
भक्त्या भागवतं भावमभावं काव्यपाठतः।
पठनात्पदव्युत्पत्तिर्ज्ञानप्राप्तिस्तु भक्तितः॥
ओंकारस्वरूप श्री जनार्दन स्वामी को मैं प्रणाम करता हूँ। हे सद्गुरु जनार्दन ! आपके स्वरूप में आदि-अंत
की कल्पना ही सम्भव नहीं है। ऐसे आपके श्रीचरणों को 'मैं' और 'तुम' वाला भाव भूलकर मैं प्रणाम करता हूँ।
श्री एकदंत गजानन ! आपको भी मैं प्रणाम करता हूँ। सम्प्रति तुम ही एकात्म भाव से एक में अनेकता काः दर्शन
करा रहे हो, फिर भी अद्वैत नहीं टूटता। तुझमें समस्त चराचर का वास है इसीलिये तुम्हें 'लम्बोदर' कहते हैं
इसीलिए सचमुच ही तुम सबके सम्बन्धी हो। तुम्हारा जो दर्शन करता है उसका संसार सुखमय होता है और
इसीलिये तुम्हें 'विघ्नकर्ता' यह उत्तम नाम शोभा देता है। हे गणराजा ! 'आनन्द' ही तुम्हारा मुख है, चारों पुरुषार्थ
तुम्हारे चार हाथ हैं और प्रकाशमानों को प्रकाश देनेवाला तुम्हारा दाँत चमकता रहता है। पूर्वमीमांसा तथा
उत्तरमीमांसा ये दोनों तुम्हारे कर्ण के स्थान पर हैं। मुख में परा-पश्यंती-मध्यमा तथा वैखरी नामक चार वाणी
हाथ जोड़कर खड़ी रहती हैं। हे विनायक ! सारी सृष्टि एकाएक आत्मस्वरूप से परिपूर्ण दिखाई देने लगती है।
वही तुम्हारी दृष्टि दिव्य और सुख से सन्तुष्ट करने वाली है। सुख से तोंद भरी है, नाभी में आनन्द भरा हुआ है।
नाभी के नीचे करधनी शोभा दे रही है। तुमने शुद्ध सत्व का सुन्दर वस्त्र परिधान किया है। तुमने शरीर पर धारण
किये हुए सुन्दर अलंकारों को तुम्हारे ही शरीर के कारण शोभा प्राप्त हुई है। प्रकृति और पुरुष तुम्हारे दो चरण हैं,
उन्हें मोड़ कर सहजासन में बैठकर तुम पूर्णत्व से शोभायमान लग रहे हो। तुम्हारा क्षणमात्र के लिए भी दर्शन हो
जाए तो विघ्न तो खोजने से भी नहीं मिलता। संसार का बन्धन तोड़ने वाला परशु तुम्हारी मुट्ठी में है ही।
अनन्यभाव से जो भक्त तुम्हें अच्छा लगता है उसे तुम सांसारिक संकटों से मुक्त करते हो। तुम स्वयं ही उसे
अपने बोधरूपी अंकुश से अपनी ओर खींच लेते हो। जो निरभिमान और निरपेक्ष है उसका सुख तुम्हीं बढ़ाते हो।
उसे आनन्दरूपी मोदक देकर उसे अपने हाथ से शान्ति प्रदान करते हो। सूक्ष्म से सूक्ष्म कण में भी तुम्हारा