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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 869 में से

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पृष्ठ 23

प्रथम अध्याय ७
तृप्त होकर नखशिखांत अर्थमय हो गये और पूर्ण परमानन्द से नाचने लगे। कन्धे पर ब्रह्म-वीणा रखे तथा
ब्रह्मज्ञान से गीत गाते और ब्रह्मानन्द से नाचते हुए भूमण्डल पर आये। सरस्वती के तट पर रुके। वहाँ उन्हें व्यास
ऋषि के दर्शन हुए। उस समय महर्षि व्यास सन्देह-सागर में हिचकोले खा रहे थे। उन्होंने वेदार्थ से युक्त समस्त
पुराणों की रचना की थी लेकिन जैसा समाधान वे चाहते थे, वह उन्हें नहीं मिला था। 'आप जरा भी चिन्तित न
हों' इस प्रकार नारदजी ने उन्हें आश्वस्त किया। उन्होंने एकान्त में व्यासजी को गोपनीय तत्त्व का उपदेश दिया
और फिर वे चार श्लोक दिखा कर उन्हें भयमुक्त कर दिया। उसे भानु से छिपा कर आकाश से भी बचा कर,
धीरे से कान में बताकर निजबोध का उपदेश किया तब कहीं उन्हें स्वसुख का समाधान प्राप्त हुआ। तब स्वयं
व्यासजी ने शुक को दशलक्षण भागवत का उपदेश देकर उसे आत्मज्ञान से सार्थक किया। इस प्रकार शुक को भी
आनन्द हुआ और वह भी परमानन्द से तृप्त हुआ। फिर वह समाधिस्थ होकर आत्मशान्ति में स्थिर होकर बैठ
गया। इससे उसे समाधि में ही सहज समाधान प्राप्त हुआ। फिर उस स्थिति में वह अचानक परीक्षित को
ब्रह्मज्ञान सिखाने पहुँचा। परीक्षित के अधिकार का क्या पूछना? उसने तो कलि को ही बाँध रखा था। उसका
अधिकार युधिष्ठिर से भी श्रेष्ठ है, ऐसा अनुभव हो रहा था। क्योंकि जब तक श्रीकृष्ण भूलोक पर थे तभी तक
धर्मराज वहाँ था, कृष्ण के निजधाम चले जाने के बाद वह कलि के भय से भाग गया। लेकिन परीक्षित कलि को
दबाकर शासन कर रहा था, अर्थात वह धर्मराज से भी अधिक साहसी था। वह अर्जुन की वीर निर्व्यंग परम्परा में
उत्पन्न हुआ था। वह कृष्ण की बहन सुभद्रा का नाती था। (सुभद्रा का पुत्र था अभिमन्यु और उसका पुत्र
परीक्षित) उसका पिण्ड मानों अधिकार रूपी पिण्ड था क्योंकि गर्भ में उसकी रक्षा श्रीकृष्ण ने की थी। वह जब
गर्भ में था तभी उसके भय से अश्वत्थामा का शस्त्र भीतर नहीं प्रवेश कर पाया था। उसके अधिकार की भला
कौन व्याख्या कर सकता है? जिसने गर्भ में भी मेरी रक्षा की वह परमेश्वर प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है, ऐसा
परीक्षण वह कर रहा था, इसीलिए उसका नाम परीक्षित रखा गया था। नाम की महिमा कितनी अगाध .है।
अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित ने पृथ्वी का उद्धार करने के लिए ही जन्म लिया था। उसके ही कारण त्रिभुवन को
श्रीमद्भागवत का प्याऊ उपलब्ध हुआ था, यह बात प्रसिद्ध है। शरीर में वैराग्य और विवेक लेकर ब्रह्मप्राप्ति के
लिए सर्वस्व का त्याग करनेवाले उस परीक्षित को देखकर श्रीकृष्ण को नितांत प्रसन्नता हुई। ब्राह्मणों का कोप
विचित्र था। उन्होंने परीक्षित को ब्रह्मज्ञान का शाप दिया। ऐसे लोगों के चरणों में मैं काया, वाचा तथा मन से
भक्तिभाव से नमस्कार करता हूँ। ब्राह्मण ब्रह्मा से भी अधिक श्रेष्ठ हैं इस सम्बन्ध में मैं अधिक क्या कहूँ?
लेकिन श्री विष्णु अभी भी अपने हृदय पर श्रीवत्सलांछन धारण करते हैं। इसलिए ब्राह्मण ब्रह्मा के लिए भी पूज्य
हैं यह मेरा विचार सही है। इसीलिए वेदरूप नारायण पृथ्वी पर आये। इसीलिए ब्राह्मण पृथ्वी पर के ईश्वर हैं। वे
परब्रह्म के अवयव हैं। ऐसा होते हुए भी जो उन्हें नहीं भजते वे भाग्यहीन हैं। ब्राह्मणों का सामर्थ्य विचित्र है।
उन्होंने ईश्वर को अपना आज्ञाधारी बना रखा है। अहो! मूर्त्ति की प्रतिष्ठा करते समय, उसमें केवल मंत्रांश से ही
देवत्व का अंश प्रकट होता है। इस पर संतों ने कहा, क्या कहूँ? तुम भक्ति से जो भी स्तवन करते हो उसमें
सचमुच ही साहित्य और चातुर्य के नये सिद्धान्तों की सृष्टि करते हो। तुमने गणपति और सरस्वती दोनों को ही
एक ही पंक्ति में बिठाया है। उसी प्रकार संत्वर्णन में तुमने स्तुति के रूप में एकात्मता प्रकट की। इसके बाद
कुल और कुलदेवता का वर्णन करते समय तुमने जो कथा सुनायी उसे सुनकर मन से चिन्ता का पूरी तरह
विस्मरण हो गया। जो सद्भाव संतचरणों में था वही ब्राह्मणों के प्रति भी। गुरुस्तवन से भी तुमने संतों को प्रसन्न
कर दिया इसलिए तुम्हारी वाणी धन्य है। तुम्हारे मुख से शब्द निकलते ही हमने पहचान लिया कि स्वयं गुरु