श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 19, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम अध्याय ३
फैलाते हैं। वे सदैव संसार में ही रहते हैं, हर प्राणी को दिखाई पड़ते हैं लेकिन अनिश्चय के कारण प्राणी दुविधा
में रहते हैं और नास्तिक लोग उनके अस्तित्व को नकारते हैं। एकलव्य ने द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूरत बनायी
और उसे गुरु मानकर सम्पूर्ण धनुर्विद्या सीखी और अर्जुन आदि पर भी भारी रहा ऐसी कथा महाभारत में है। वह
गुरुभाव ही उसके लिए फलदायी सिद्ध हुआ। अर्थात यह संसार विश्वास न होने के कारण ही नष्ट होता है और
अनिश्चय में फँसा रहता है। यदि निश्चय कर उन पर विश्वास किया जाए और भक्तिभाव से उनके चरणों पर
माथा रखा जाए तो कभी आत्मानुभव की कमी नहीं होती। उन्हें आस्थापूर्वक प्रणाम करने से वे हमसे एकात्मता
कायम करते हैं लेकिन हमें भी एकात्मता से उनका सेवक बनकर रहना होगा। उनकी सेवा के माधुर्य को
ब्रह्मसुख की उपमा भी कम होगी। अनन्य भक्ति से जो उनकी उपासना करते हैं वे उस आत्मस्वरूप के सच्चे
माधुर्य का अनुभव लेते हैं। वे प्रकृति से परे रहते हैं, प्रकृतिरूप में रहते हुए भी वे अविकृत रहते हैं, उनके ही
कारण प्रकृति के आकार, विकार और व्यवहार की बाधा नहीं होती। वे न तो भोग से ऊबते हैं न त्याग का
आडम्बर रचते हैं। वे हमेशा अपनी सहज स्थिति में ही रहते हैं। जिस प्रकार आत्म-साक्षात्कार के समय उत्पन्न
होने वाली प्रेम की तरंगें शरीर में ही विलीन हो गयीं उसी प्रकार उस समय होने वाले विलक्षण आनन्द से
अनुभव होने वाला विस्मय भी विस्मृत हो गया, प्रपंच और परमार्थ एक हो गया। लेकिन ऐसा कुछ हुआ था
इसका भी उसे स्मरण न रहा। स्मरण का विस्मरण के साथ ही लोप हो गया, काया काया में ही विलीन हो गयी,
अन्दर-बाहर वाला भाव टूट गया, लेकिन वह गया या रहा इसका भी उसे स्मरण नहीं है। स्वरूप की जागृति के
कारण उनके स्वप्न और जागृति नष्ट हो गयी, साक्षात्कार के साथ सुषुप्ति समाप्त हो गयी, उन्मनी अवस्था में
तूर्यावस्था स्थिर हो गयी। दृश्य द्रष्टा के साथ चला गया, अकेलेपन के कारण दर्शन भी नष्ट हो गया और उनका
न होना भी लुप्त होकर उस लोप के साथ लुप्त करने वाले ज्ञान का भी विलय हो गया। ज्ञान अज्ञान को ले गया
तभी ज्ञातापन का भी लोप हो गया और विज्ञान शरीर में घुल गया। लेकिन यह घुलना कोई नयी बात नहीं है।
इसलिए जो सचमुच ही सज्जन हैं वे मुझे सावधान करें, मेरी ओर ध्यान दें, यही इस शिशु की प्रार्थना है। लेकिन
जिस प्रकार सूर्य सदैव प्रकाश का ही गोला है, अग्नि सदैव तेजयुक्त ही रहती है, उसी प्रकार संत सदैव सावधान
ही रहते हैं। मेरा यह कहना कि वे मेरी ओर ध्यान दें, एक बचकाना प्रयास ही है। यह सुनकर संतजनों ने बार-
बार गौरव कर आग्रहपूर्वक आज्ञा की और यह ग्रन्थ प्राकृत में लिखवाया। एकान्त में तथा अन्य लोगों के बीच
भी जब संतों ने आग्रह किया जो मैंने कहा, "महाराज ! कृपया बतायें कि मैं किस ग्रन्थ को लिखना प्रारम्भ
करूँ ? उस समय संत बोले, पुराणों में भागवत श्रेष्ठ है और उसमें उद्धवगीत तो अत्यन्त श्रेष्ठ है इसलिए तुम उसे
प्रारम्भ करो। वक्ता भगवान तुम्हारे सहायक हैं। हमें ज्ञानकथा सुनने की लालसा है, तिस पर तुम्हारे जैसा सरस
वक्ता हो तो फिर और क्या चाहिए ? हमें मालूम है कि संतों की स्तुति करने से तुम्हें स्फूर्ति प्राप्त होती है लेकिन
अब कथा की शुरुआत कर विषय का प्रारम्भ करो। संतों की इस वाणी से मन सहसा प्रसन्न हो उठा। इस
प्रसादवाणी से अंतःकरण स्वानंदरूपी उल्लास से भर उठा। जिस प्रकार मेघों की गर्जना से विभोर होकर मोर
नाचनें लगता है या मेघों से गिरते जल को देख चातक मन ही मन प्रसन्न हो उठता है अथवा जैसे चन्द्रकिरण
देखकर चकोर आनन्द से डोलने लगता है उसी प्रकार संतों के मुख से निकला उत्तर मुझे सदैव सुख ही देता
आया है। हे स्वामीजन ! आपने सचमुच ही मुझे आनन्द विभोर कर दिया। क्योंकि आपका यह कार्य आप मुझसे
ही पूरा कराने वाले हैं इसलिए मैं व्यर्थ ही 'मैं पन' के वश में क्यों हो जाऊँ ? लेकिन दास समर्थों की आज्ञा का
उल्लंघन नहीं कर सकता। इसलिए आपने जो कार्य मुझे सौंपा है, उसे मैं पूरा करूँगा। लेकिन आप अपनी