श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकनाथ की श्रीमद्भागवत
( एकादश स्कन्ध )
मान्यता है कि श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध पर जिसमें साधकोपयोगी तत्त्वज्ञान का ही विस्तृत विवेचन
है उसकी रचना करने के लिये ही एकनाथ महाराज ने जन्म लिया था। वारकरी सम्प्रदाय के लोग उन्हें संत
ज्ञानेश्वर का अवतार मानते हैं और 'ज्ञानेश्वरी' के बाद 'नाथ भागवत' को पूजनीय मानते हैं। जहाँ ज्ञानेश्वरी
में कृष्ण-अर्जुन संवाद को ग्रन्थ का आधार बनाया गया है, वहाँ नाथ-भागवत में श्रीकृष्ण उद्धव संवाद की
चर्चा है। जिस प्रकार समस्त भारतवर्ष में रामायण और महाभारत का आदरपूर्वक पठन-पाठन किया जाता है,
उसी श्रद्धा से महाराष्ट्र में एकनाथी भागवत का पठन-पाठन किया जाता है।
ज्ञानेश्वरजी कहते हैं कि वेद अत्यन्त महान होते हुए भी देने के मामले में कंजूस हैं। वे सबके समझने
लायक भी नहीं हैं। वेद की दृष्टि से गीता अधिक उदार है। वेद की कमी को पूरा करने के लिये ही भगवान
ने गीता प्रकट की।
"वेद सम्पन्न होय ठायीं। परी कृपणु ऐसा आनु नाहीं। जे कानीं लागला तिहीं। वर्णांच्याचि ॥ ....तरी मज
पाहतां तें उणें। फेडावया गीतापणें। वेदु वेठला भलतेणें। सेव्य होआवया ॥ म्हणोनि मज कांही। समर्थनी आत
विषय नाहीं। गीता जाणा हे वाङ्मयी। श्रीमूर्त्ति प्रभुची ॥ इ० (ज्ञानेश्वरी, अ० १८)'' इसमें ज्ञानदेव ने गीता
को 'प्रभु की वाङ्मयी मूर्ति' तक कह डाला है।
गीता के सम्बन्ध में एकनाथ महाराज कहते हैं—‘‘कृष्णनिःश्वासी जन्मले वेद। गीता श्रीकृष्ण मुखें
प्रगटली शुद्ध। यालागीं गीतार्थ अगाध। धडौते वेद तेणें झाले ॥’’ (अ० ३१) अर्थात् वेदों का जन्म कृष्ण के
श्वासोच्छ्वास से हुआ लेकिन गीता साक्षात उनके मुख से प्रकट हुई यह उसकी विशेषता है। श्री गुलाबराव
महाराज तो गीता को 'जागृत श्रुति' कहते हैं।
जो सम्बन्ध वेद और गीता में है वही सम्बन्ध गीता और ज्ञानेश्वरी में है और वही सम्बन्ध श्री ज्ञानेश्वरी
और नाथ भागवत में है। गीता के काल में उसका अन्तर्निहित रहस्य ग्रहण करने लायक अधिकांश लोगों की
क्षमता नहीं हुई थी इसलिये भगवान श्रीकृष्ण को पुनः चार हजार वर्षों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। शक १११७
में ज्ञानेश्वर के रूप में श्रीकृष्ण का अवतार हुआ। इससे पूर्व गीता ग्रन्थ संस्कृत भाषा की मोटी पोथियों के
वेष्टनों में बँधा हुआ था तथा जनसाधारण की पहुँच से बहुत दूर था। हालांकि उनका हृदय उस ज्ञान को प्राप्त
करने के लिए छटपटा रहा था। ज्ञानेश्वर ने 'ज्ञानेश्वरी' लिख कर जनमानस की तृष्णा को शान्त किया।
वेद की कमी को गीता ने पूरा किया तथा गीता की कमी की आपूर्ति ज्ञानेश्वरी ने की। उसी प्रकार
ज्ञानेश्वरी की कमी को एकनाथी भागवत ने पूरा किया। सन् १५७३ में एकनाथजी ने भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध
पर विस्तृत और प्रौढ़ टीका लिखी। ज्ञानेश्वरी श्रीमद्भागवत की भावार्थ टीका है तो नाथभागवत श्रीमद्भागवत
के ग्यारहवें स्कन्ध पर सर्वांगपूर्ण टीका है। आकार में यह ज्ञानेश्वरी से दुगुनी है। इसकी रचना पैठण में शुरू
हुई और समापन वाराणसी में हुआ। यदि ज्ञानेश्वरी को ठीक तरह से समझना है तो एकनाथी भागवत के अनेक
पारायण करने चाहिये ऐसा अनेक विद्वानों का मत है। यह मर्म जानकर ही श्री तुकाराम महाराज ने भण्डारा
पर्वत पर बैठकर उस ग्रन्थ के एक सहस्र पारायण किये थे यह बात सर्वविदित है।