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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

विषयानुक्रमणिका १३
अध्याय १७ ४५१-४७५
चारों युगों के धर्म, वर्णाश्रम धर्म, उनके लक्षण, वर्ण-बाह्यों के लक्षण, धर्मों के धर्म
लक्षण, ब्रह्मचर्य गृहस्थ के धर्म।
अध्याय १८ ४७६-४९४
वानप्रस्थाश्रम धर्म, संन्यासाश्रम धर्म, परमहंस का. धर्म, शक्ति व भक्ति का वर्णन।
अध्याय १९ ४९५-५२०
युधिष्ठिर को भीष्म द्वारा मोक्ष धर्म कथन, ज्ञान-विज्ञान लक्षण, शक्ति रहस्य, यम
नियम, निर्गुण विवेचन, शम दमादि के लक्षण।
अध्याय २० ५२१-५४१
वेद ही गुण-दोष बनाते, फिर कैसे न देखें? किसकी सुनें तुम्हारी या वेद की?
उद्धव का प्रश्न एवं समाधान गुण-दोष न देखना उत्तम साधना, मनोजय, कर्म,
सांख्य एवं भक्ति योग।
अध्याय २१ ५४२-५६५
स्वधर्माचरण से मोक्ष-प्राप्ति, देशकाल द्रव्य की शुद्धता, धर्म, अधर्म, फलश्रुति का
स्वरूप, कर्मकाण्डियों का मनोराज्य, श्रीकृष्ण ही सही अर्थ में वेदज्ञ।
अध्याय २२ ५६६-५९९
तत्व संख्या निरूपण, प्रकृति एवं पुरुष, मंत्रों का एकत्व, जन्म, मरण, देह, अवस्था,
आत्मा पर आरोप।
अध्याय २३ ६००-६४४
भिक्षु गीतारंभ, अधर्म का धन नाशवान, धन के पाँच हिस्सेदार, भिक्षु कथा, छल
पश्चात्ताप तथा स्वयं की कथा का वर्णन, सुख-दुःख मीमांसा, भिक्षु गीत माहात्म्य।
अध्याय २४ ६४५-६७१
कपिल एवं देवहुति संवाद, ज्ञान से द्वंद्वनाश, नारायण का लीला विग्रह, सृष्टिक्रम;
त्रिलोक रचना, प्रलय लक्षण, कर्म की ऊँच-नीच गति, स्वर्ग, ध्रुव, वैकुण्ठ लोकों
का वर्णन, सगुण भक्तों को सायुज्यता, अनन्य भक्तों का प्रेमरहस्य, सांख्य शास्त्र।
अध्याय २५ ६७२-६९२
त्रिगुण विजय, निर्गुण उपासना, त्रिगुणों के लक्षण, त्रिगुण तथा निर्गुण आहार, त्रिगुणों
से सुख, निर्गुण सुख, विविध वृत्ति, विविध अहंकार एवं ममत्व के लक्षण, गुण एवं
निर्गुण ज्ञान वर्णन।
अध्याय २६ ६९३-७१४
विषयासक्ति से अनर्थप्राप्ति, भागवत धर्माचरण यही नरदेह का कर्त्तव्य, विषयासक्ति
निषेध, पुरूर व्याख्यान, ऐलगीत, संतसंग महिमा।

१४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अध्याय २७ ७१५-७३४
भक्तों की पूजाविधि, आगमोक्त हवन विधि, प्रतिमाओं के प्रकार, मूर्ति प्रतिष्ठा,
फलश्रुति, पूजोपचार का वैभव, निष्काम भक्ति से साधक की भगवदैकता।
अध्याय २८ ७३५-७६६
किसी के स्वाभाविक कर्म की स्तुति या निन्दा न करें, सर्वत्र भगवद्भाव से देखें,
आत्मा में संसार निर्मूल, ज्ञानी की विदेहता, अनन्य भक्तों को विघ्न नहीं सताते।
अध्याय २९ ७६७-८०९
भोले भाले लोगों को ईश्वर प्राप्ति सुगम कैसे ? भागवद्धर्म से जन्म-मरणच्छेद, स्त्री
संग त्याग की आवश्यकता, प्राचीन ज्ञानी स्त्रियाँ, श्रीकृष्णाज्ञा से उद्धव का
बदरिकाश्रम प्रयाण।
अध्याय ३० ८१०-८२८
श्रीकृष्ण स्वरूप सौन्दर्य वर्णन, द्वारका में भीषण उत्पात का वर्णन, यादवों में कलह
एवं संहार, बलराम निर्वाण, कृष्ण मूर्ति वर्णन, जराव्याध का बाण मारना, पश्चात्ताप
एवं कृष्ण का क्षमादान एवं सदेह स्वर्ग को भेजना।
अध्याय ३१ ८२९-८५१
श्रीकृष्ण निर्वाण, देवताओं की कृष्णस्तुति, १४ श्लोकों का माहात्म्य, दारूक का
द्वारका में आगमन, कृष्ण निधन समाचार का कथन, शोक, यादव सतियाँ, अर्जुन
द्वारा मृतक संस्कार, द्वारका विलय, पाण्डव स्वर्गारोहण, उपसंहार इति।

संत एकनाथ

॥ श्री॥
श्रीमद् एकनाथी भागवत
सदा सेव्या सदा सेव्या श्रीमद्भागवती कथा
यस्याः स्मरणमात्रेण हरिश्चत्तं समाश्रयेत्।
अर्थोऽयं ब्रह्मसूत्राणां भारतार्थविनिर्णयः
गायत्री भाष्यरूपौ सौ वेदार्थ परिबृंहिता ॥
प्रथम अध्याय
ॐ श्री गणाधिपतये नमः श्री सरस्वत्यै नमः।
श्री गुरुभ्यो नमः॥
भक्त्या भागवतं भावमभावं काव्यपाठतः।
पठनात्पदव्युत्पत्तिर्ज्ञानप्राप्तिस्तु भक्तितः॥
ओंकारस्वरूप श्री जनार्दन स्वामी को मैं प्रणाम करता हूँ। हे सद्गुरु जनार्दन ! आपके स्वरूप में आदि-अंत
की कल्पना ही सम्भव नहीं है। ऐसे आपके श्रीचरणों को 'मैं' और 'तुम' वाला भाव भूलकर मैं प्रणाम करता हूँ।
श्री एकदंत गजानन ! आपको भी मैं प्रणाम करता हूँ। सम्प्रति तुम ही एकात्म भाव से एक में अनेकता काः दर्शन
करा रहे हो, फिर भी अद्वैत नहीं टूटता। तुझमें समस्त चराचर का वास है इसीलिये तुम्हें 'लम्बोदर' कहते हैं
इसीलिए सचमुच ही तुम सबके सम्बन्धी हो। तुम्हारा जो दर्शन करता है उसका संसार सुखमय होता है और
इसीलिये तुम्हें 'विघ्नकर्ता' यह उत्तम नाम शोभा देता है। हे गणराजा ! 'आनन्द' ही तुम्हारा मुख है, चारों पुरुषार्थ
तुम्हारे चार हाथ हैं और प्रकाशमानों को प्रकाश देनेवाला तुम्हारा दाँत चमकता रहता है। पूर्वमीमांसा तथा
उत्तरमीमांसा ये दोनों तुम्हारे कर्ण के स्थान पर हैं। मुख में परा-पश्यंती-मध्यमा तथा वैखरी नामक चार वाणी
हाथ जोड़कर खड़ी रहती हैं। हे विनायक ! सारी सृष्टि एकाएक आत्मस्वरूप से परिपूर्ण दिखाई देने लगती है।
वही तुम्हारी दृष्टि दिव्य और सुख से सन्तुष्ट करने वाली है। सुख से तोंद भरी है, नाभी में आनन्द भरा हुआ है।
नाभी के नीचे करधनी शोभा दे रही है। तुमने शुद्ध सत्व का सुन्दर वस्त्र परिधान किया है। तुमने शरीर पर धारण
किये हुए सुन्दर अलंकारों को तुम्हारे ही शरीर के कारण शोभा प्राप्त हुई है। प्रकृति और पुरुष तुम्हारे दो चरण हैं,
उन्हें मोड़ कर सहजासन में बैठकर तुम पूर्णत्व से शोभायमान लग रहे हो। तुम्हारा क्षणमात्र के लिए भी दर्शन हो
जाए तो विघ्न तो खोजने से भी नहीं मिलता। संसार का बन्धन तोड़ने वाला परशु तुम्हारी मुट्ठी में है ही।
अनन्यभाव से जो भक्त तुम्हें अच्छा लगता है उसे तुम सांसारिक संकटों से मुक्त करते हो। तुम स्वयं ही उसे
अपने बोधरूपी अंकुश से अपनी ओर खींच लेते हो। जो निरभिमान और निरपेक्ष है उसका सुख तुम्हीं बढ़ाते हो।
उसे आनन्दरूपी मोदक देकर उसे अपने हाथ से शान्ति प्रदान करते हो। सूक्ष्म से सूक्ष्म कण में भी तुम्हारा

२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अधिष्ठान रहता है इसलिए मूषक-वाहन यह नाम तुम्हें शोभा देता है। तुम न तो पूरे नर हो न पूरे कुंजर हो। तुम
व्यक्त और अव्यक्त से परे हो। तुम्हें ऐसा निर्विकार जानकर मैं तुम्हें सादर प्रणाम करता हूँ ताकि यह ग्रन्थ बिना
किसी विघ्न के पूरा हो जाय। ऐसे श्री गजानन को 'मैं' कह कर प्रणाम करने वाला भी कहाँ का है ? क्योंकि जो
मूल रूप से अकर्ता है वही इस ग्रन्थ कथा का विस्तार कर रहा है। अब विवेक की साक्षात मूर्ति तथा जो इन्द्रिय
वृत्तियों को चेतनता प्रदान करती है उस सरस्वती को भी मैं प्रणाम करता हूँ। जो वाचा से बात कराती है, बुद्धि
को बोध प्रदान कराती है और प्रकाश को प्रकाशमान करती है, जो आँखों में दृष्टि के रूप में रहती है अथवा
फल में रस के रूप में रहती है, उसी प्रकार शिव की काया में शक्तिरूप से रहती है। शक्कर में जिस प्रकार
माधुर्य या पुष्प में मकरंद रहता है, उसी प्रकार शिव का और शक्ति का सम्बन्ध अनादिसिद्ध एवं तर्क से परे है।
वाचा से जिसका वर्णन सम्भव नहीं है, ऐसा वह आत्मस्वरूप का माधुर्य चारों ओर वाणियों में श्रेष्ठत्व से भरा
हुआ है। इसलिए वाणी की देवता सरस्वती ग्रन्थ के अर्थ की उत्तम अभिरुचि प्रदर्शित करती है। संसार में विवेक
का चुनाव करने वाले जो हंस हैं उस पर ही यह हँसवाहिनी देवी सहजासन में बैठी हुई है। परमहंस पर
विराजमान उस देवी को विवेकी हंस ही ठीक तरह से पहचानते हैं। लेकिन जो मूर्ख, मंदबुद्धि और भाग्यहीन
होते हैं उन्हें वह उनके पास होते हुए भी नहीं दिखाई देती। उसके रूप का विचार करने पर ऐसा प्रतीत होता है
कि उसका निराकार और विश्वाकार रूप भी वही है। वही आत्मीयता से अनुपम कथा कहलवाता है। 'यह बोल
अच्छा रहा' यह बात जिस प्रकार बोल कर ही अभिव्यक्त की जाती है, उसी प्रकार मन का स्तुति-भाव वाणी से
ही वाणी का गौरव करता है ऐसा समझना चाहिए। वह वाग्विलास रूपी सर्वांगसुन्दरी सरस्वती देवी अंतर्बाह्य
रहकर स्वयं ही ग्रन्थ का सुन्दर अर्थ कहती है। वह स्वभाव से सर्वदा ही प्रसन्न रहती है इसलिए इस निरूपण में
बहार आ गयी है। फिर भी उसने मुझमें वक्ता होने का अभिमान नहीं होने दिया है। वाग्देवता की यह स्तुति
वाणी ने ही की है, इसलिए मन में द्वैत का विचार आने का अवसर ही नहीं प्राप्त हुआ है। उसने 'बोल' और
'बोलने' को नष्ट किया, मौन को भी तोड़ दिया लेकिन निरूपण तो कराया ही और जो बोलने के लिए असम्भव
है उसे शब्दों के माध्यम से व्यक्त कराया। ऐसी उस सरस्वती को प्रणाम करने के लिए सेवक बन कर गया तो
'मैं पन' के साथ परावाणी भी लुप्त हो गयी। जहाँ 'मैं पन' का ही अभाव है वहाँ 'तू पन' को कहाँ स्थान
मिलेगा ? फिर भी इस विषय प्रतिपादन में वह कल्पनातीत प्रसाद भर-भर कर डाल रही है। जिस प्रकार सागर
में लहरें उछलती हैं उसी प्रकार यहाँ आत्मस्वरूप पर स्वरूपाकार शब्दों की लहरें शोभा दे रही हैं। जिस प्रकार
चीनी का रवा माधुर्य से अलग नहीं होता उसी प्रकार निरूपण के शब्द ब्रह्मरसयुक्त होने के कारण ब्रह्मसुख के
रस से अलग नहीं हैं। वहाँ ब्रह्मानन्द रस वृत्ति ने 'मैं पन' के साथ सरस्वती को भी एक ही थाली में परोसा है।
इससे अभिन्नत्व के शेष से तृप्ति की डकार आने के कारण इस कथा के उद्गार बाहर आ रहे हैं। अब संतप्त
जनों को शान्त करने के लिए स्वानन्द की वर्षा करने वाले जो चिदानन्द के मेघस्वरूप ही हैं उन्हें प्रणाम करता
हूँ। वे चैतन्य के अलंकार, ब्रह्मविद्या का श्रृंगार अथवा ईश्वर का मनोरम निवास ही हैं। वे ब्रह्मवस्तु के
निवासस्थान अथवा सुख का पूर्ण उल्लास अथवा सुरक्षित विश्राम स्थल हैं अथवा वे भूतदया का सागर, करुणा
का मायका अथवा स्वानन्द का गौरव करनेवाले निर्गुण के सगुण अवयव ही हैं अथवा वे आँखों की दृष्टि अथवा
उसकी सुन्दर पुष्टि हैं जिनके चरणांगुष्ठ में संतोष को भी संतोष प्राप्त होता है। वे जिनकी ओर देखते हैं उनका
भवसंकट दूर होता है और उनकी आँखों के सामने परब्रह्म अपने आप प्रकट हो जाता है। वे साधन में किया गया
कठिन प्रयास अथवा शास्त्रचातुरी का विलास नहीं देखते। यदि विश्वास हो तो वे स्वयं ही ज्ञान का प्रकाश

प्रथम अध्याय ३
फैलाते हैं। वे सदैव संसार में ही रहते हैं, हर प्राणी को दिखाई पड़ते हैं लेकिन अनिश्चय के कारण प्राणी दुविधा
में रहते हैं और नास्तिक लोग उनके अस्तित्व को नकारते हैं। एकलव्य ने द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूरत बनायी
और उसे गुरु मानकर सम्पूर्ण धनुर्विद्या सीखी और अर्जुन आदि पर भी भारी रहा ऐसी कथा महाभारत में है। वह
गुरुभाव ही उसके लिए फलदायी सिद्ध हुआ। अर्थात यह संसार विश्वास न होने के कारण ही नष्ट होता है और
अनिश्चय में फँसा रहता है। यदि निश्चय कर उन पर विश्वास किया जाए और भक्तिभाव से उनके चरणों पर
माथा रखा जाए तो कभी आत्मानुभव की कमी नहीं होती। उन्हें आस्थापूर्वक प्रणाम करने से वे हमसे एकात्मता
कायम करते हैं लेकिन हमें भी एकात्मता से उनका सेवक बनकर रहना होगा। उनकी सेवा के माधुर्य को
ब्रह्मसुख की उपमा भी कम होगी। अनन्य भक्ति से जो उनकी उपासना करते हैं वे उस आत्मस्वरूप के सच्चे
माधुर्य का अनुभव लेते हैं। वे प्रकृति से परे रहते हैं, प्रकृतिरूप में रहते हुए भी वे अविकृत रहते हैं, उनके ही
कारण प्रकृति के आकार, विकार और व्यवहार की बाधा नहीं होती। वे न तो भोग से ऊबते हैं न त्याग का
आडम्बर रचते हैं। वे हमेशा अपनी सहज स्थिति में ही रहते हैं। जिस प्रकार आत्म-साक्षात्कार के समय उत्पन्न
होने वाली प्रेम की तरंगें शरीर में ही विलीन हो गयीं उसी प्रकार उस समय होने वाले विलक्षण आनन्द से
अनुभव होने वाला विस्मय भी विस्मृत हो गया, प्रपंच और परमार्थ एक हो गया। लेकिन ऐसा कुछ हुआ था
इसका भी उसे स्मरण न रहा। स्मरण का विस्मरण के साथ ही लोप हो गया, काया काया में ही विलीन हो गयी,
अन्दर-बाहर वाला भाव टूट गया, लेकिन वह गया या रहा इसका भी उसे स्मरण नहीं है। स्वरूप की जागृति के
कारण उनके स्वप्न और जागृति नष्ट हो गयी, साक्षात्कार के साथ सुषुप्ति समाप्त हो गयी, उन्मनी अवस्था में
तूर्यावस्था स्थिर हो गयी। दृश्य द्रष्टा के साथ चला गया, अकेलेपन के कारण दर्शन भी नष्ट हो गया और उनका
न होना भी लुप्त होकर उस लोप के साथ लुप्त करने वाले ज्ञान का भी विलय हो गया। ज्ञान अज्ञान को ले गया
तभी ज्ञातापन का भी लोप हो गया और विज्ञान शरीर में घुल गया। लेकिन यह घुलना कोई नयी बात नहीं है।
इसलिए जो सचमुच ही सज्जन हैं वे मुझे सावधान करें, मेरी ओर ध्यान दें, यही इस शिशु की प्रार्थना है। लेकिन
जिस प्रकार सूर्य सदैव प्रकाश का ही गोला है, अग्नि सदैव तेजयुक्त ही रहती है, उसी प्रकार संत सदैव सावधान
ही रहते हैं। मेरा यह कहना कि वे मेरी ओर ध्यान दें, एक बचकाना प्रयास ही है। यह सुनकर संतजनों ने बार-
बार गौरव कर आग्रहपूर्वक आज्ञा की और यह ग्रन्थ प्राकृत में लिखवाया। एकान्त में तथा अन्य लोगों के बीच
भी जब संतों ने आग्रह किया जो मैंने कहा, "महाराज ! कृपया बतायें कि मैं किस ग्रन्थ को लिखना प्रारम्भ
करूँ ? उस समय संत बोले, पुराणों में भागवत श्रेष्ठ है और उसमें उद्धवगीत तो अत्यन्त श्रेष्ठ है इसलिए तुम उसे
प्रारम्भ करो। वक्ता भगवान तुम्हारे सहायक हैं। हमें ज्ञानकथा सुनने की लालसा है, तिस पर तुम्हारे जैसा सरस
वक्ता हो तो फिर और क्या चाहिए ? हमें मालूम है कि संतों की स्तुति करने से तुम्हें स्फूर्ति प्राप्त होती है लेकिन
अब कथा की शुरुआत कर विषय का प्रारम्भ करो। संतों की इस वाणी से मन सहसा प्रसन्न हो उठा। इस
प्रसादवाणी से अंतःकरण स्वानंदरूपी उल्लास से भर उठा। जिस प्रकार मेघों की गर्जना से विभोर होकर मोर
नाचनें लगता है या मेघों से गिरते जल को देख चातक मन ही मन प्रसन्न हो उठता है अथवा जैसे चन्द्रकिरण
देखकर चकोर आनन्द से डोलने लगता है उसी प्रकार संतों के मुख से निकला उत्तर मुझे सदैव सुख ही देता
आया है। हे स्वामीजन ! आपने सचमुच ही मुझे आनन्द विभोर कर दिया। क्योंकि आपका यह कार्य आप मुझसे
ही पूरा कराने वाले हैं इसलिए मैं व्यर्थ ही 'मैं पन' के वश में क्यों हो जाऊँ ? लेकिन दास समर्थों की आज्ञा का
उल्लंघन नहीं कर सकता। इसलिए आपने जो कार्य मुझे सौंपा है, उसे मैं पूरा करूँगा। लेकिन आप अपनी

कृपादृष्टि बनाये रखें जिससे कार्य अपने आप ही पूर्णत्व की ओर पहुँचेगा। इस पर संत बोले, "अरे! हमने
तुम्हारे मन के साथ अपना मन जोड़ कर शब्दों में तारतम्य बना रखा है। इसलिए तुम अपना विषय शीघ्र प्रारम्भ
करो। अब कुलदेवता को नमस्कार करें। वह ऐक्य रूप से एकनाथ में ही निहित होने के कारण ऐक्य के सिवाए
अन्य कोई चीज निकालने ही नहीं देता। उसने मन को केवल एक ही रूप दिखलाया है इसलिए जन में या वन
में वही स्वरूप दिखायी देने लगा है। कानों में और मुख में वह 'एकवीरा' (श्रीरेणुका) देवी ही एकत्व से
निवास कर रही है। वही शिव और शक्ति का रूप लेकर एकत्व से शोभायमान हो रही है। उस एकवीरा ने गर्भ
धारण कर एकत्व में ही एक वीर को जन्म दिया। जिसके आतंक से बड़े-बड़े वीर भी काँपते हैं, उस बोधरूपी
परशुराम को उसने जन्म दिया। उसने जन्म लेकर माया जननी का वध किया और आज्ञा शिरोधार्य कर पिता को
संतोष प्रदान किया। इसीलिए वह इस भूमण्डल पर सदा विजयी होता रहा। उसने अहंकार रूप-सहस्रबाहु
सहस्रार्जुन का वध किया और उसका राज्य अपने स्वजातीय ब्राह्मणों को अर्पण कर दिया। उसने जननी को मार
कर उसे पुनर्जीवित कर दिया। वही हमारी कुलदेवता बनी। उसने अपने ही नाम से हमें ख्याति दिलवायी,
क्योंकि एकवीरा और एकनाथ एक ही अर्थ के शब्द हैं। उसका जब वध हुआ उसी समय उसके स्वभाव में
परिवर्तन हुआ और वह माता जगदम्बा क्रोध त्याग कर शान्त हो गयी। उसने गोद में बिठा कर आश्वासन दिया
कि कैसा भी संकट क्यों न आये लेकिन मेरा नामस्मरण करने से समाधान प्राप्त होगा। उस जगदम्बा का
जयजयकार करने के लिए ग्रन्थ के प्रारम्भ में ही 'उदो', 'उदो' (उदयोस्तु) अर्थात् उदय हो कहता हूँ। वही मेरी
बुद्धि में योगरूपी गर्भ रखकर स्वयं प्रकट हुई है। अब उस गुरु जनार्दन को प्रणाम करें जो संसाररूपी गज के
लिए सिंह के समान है और जो जन में तथा विजन में समदृष्टि से पूर्ण है। जिसके कृपाप्रसाद से साधक को देह
में देहांगों का भास नहीं होता और संसार का अंधड़ देखते-देखते स्वप्नवत हो जाता है। जिसके कृपाकटाक्ष से
अलक्ष्य वस्तु भी दिखाई दे जाती है और गुरुत्व के कारण साक्षी को भी साक्ष्य का विस्मरण हो जाता है। जिन्होंने
बिना जीवन के ही जीवित रखा, मृत्यु के बिना हीं मृत्यु को मार डाला, दृष्टि लेकर अदृश्य का दर्शन कराया,।
सारा शरीर ही चक्षुरूप बनाया, देह में ही देह को विदेही बनाया और फिर विदेह भाव को मिटाया और अन्त में
मिटने को भी मिटाया बचा केवल आत्मरूप। अभाव भाव में मिला, सन्देह असन्देह में गला, विस्मय विस्मयी में
डूब गया, दिव्यानंद का अनुभव हुआ। स्वेच्छा से ही भक्त बना तो उस भक्तिभाव में भी ईश्वर दिखाई दिया। तब
भज्य, भजक और भजन का अंत हुआ सा लगा। नमन से ही नमन किया, फिर नमन करने वाले कहाँ चले गये
इसका पता नहीं चला। दृष्य और द्रष्टा दोनों का ही एक साथ अन्त हो गया। दृष्टि का सामर्थ्य नष्ट होकर दर्शन
भी क्षीण हो गया। अब जब सब कुछ देवतामय ही हो गया इसलिए भक्त का भक्तिभाव भी नष्ट हो गया। दोनों
भाव नष्ट होकर अभेद भाव से केवल अनंतरूप शेष रह गया। त्याग के साथ अत्याग का लय हुआ, भोग के
साथ अभोग भी उड़ गया, योग के साथ अयोग भी डूब गया और योग्यता का अहंभाव भी नष्ट हो गया। इसमें
भी अधिक आस यह है कि सायुज्य स्थिति में भी वह दास बन कर रह गया है। वहाँ का आनन्दरस अत्यन्त
अविनाशी और अगोचर है। 'शिवो भूत्वा शिवं भजेत' अर्थात् शिव होकर शिव की पूजा करना इसी अवस्था में
शोभा देता है। अन्यथा बोलना तो केवल बोलना ही है। उस योग में स्वस्वरूप से भजन करने में कोई लाभ नहीं
है। अभेद भाव के इस सेवासुख में नारद प्रसन्नता से नाचता, गाता है। शुकसनकादिक जो स्वस्वरूप के संत हुए
वे इसी पथ पर आगे बढ़ने से हुए। सागर में जब ज्वार आता है तो उसी पानी से गड्ढे भी भर जाते हैं। उसी
प्रकार ईश्वर ने मुझे अपना देवत्व प्रदान कर मुझे अपना भक्त बना लिया। वैसे देखा जाए तो समुद्र और नदी का

प्रथम अध्याय ५
जल एक समान है, लेकिन जब उनका संगम होता है तो उसकी विशेष शोभा रहती है। उसी प्रकार परमेश्वर के
साथ ऐक्य रूप से भजन करने पर भजन का सुख द्विगुणित हो जाता है। दायाँ और बायाँ ये शरीर के दो अंग हैं
लेकिन इन से जिस शरीर का बोध होता है, वह एक ही है। उसी प्रकार ईश्वर और भक्त ये दो अलग मालूम होने
पर भी देवत्व में दोनों के ऐक्य का अनुभव होता है। उसी प्रकार यद्यपि गुरु जनार्दन ने मुझे अपनत्व का सम्मान
देकर मुझे अद्वैत भक्त बना रखा है, फिर भी मेरी काया, वाचा तथा मन को प्रेरित कर वही मुझे परिचालित करते
हैं। वही (जनार्दन) मेरा मुख बन गया है, मेरी दृष्टि के आगे मूर्तिमंत होकर वही खड़ा है और विवेक बन कर
वही ग्रन्थ का लेखन करा रहा है। लेकिन उनका लाघव विस्मयकारी है क्योंकि उन्होंने मेरा नाम अभंग में रख
दिया है। लेकिन उसका अभिमान भी नहीं होता।" यह भाषण सुनकर उसे संतोष हुआ और उसने कहा,
"शाबास ! तुम सचमुच ही निजभक्ति के अवतार हो, इसीलिए यह रहस्य तुम्हारे मुँह से निकल रहा है। इसे
स्तुति कहें या विषय का प्रतिपादन ? यह ग्रन्थ की प्रस्तावना है या ब्रह्मज्ञान ? यह साहित्यशास्त्र है या समाधान !
यह क्या है यही समझ में नहीं आता। तुम्हारा एक-एक शब्द मानों विलासपूर्ण विवेक है। वह संतोष को
अपरिमित संतोष प्रदान करता है। तुम्हारे मुख से जो भी वाणी निकलती है वह संतों के हृदय को ग्राह्य होती है।
मुमुक्ष रूपी भ्रमरों के झुण्ड उस पर मँडराते रहेंगे। ग्रन्थ का प्रारम्भ सुन्दर होने के कारण मुक्त, मुमुक्षु, साधक एवं
प्रतिबद्ध लोग भी केवल श्रवणसुख से निजसुख का आनन्द प्राप्त करेंगे। वचनामृत के इस तुषार से ग्रन्थरूपी
भूमि में विवेक के अंकुर फूटे और उसमें फल लगे। अथवा निष्प्राण में प्राण आये, सिद्ध को सिद्धि प्राप्त हुई
अथवा पतिव्रता को अपना पति वर्तमान वैभव के साथ प्राप्त हुआ। इस प्रकार मैंने हर्षभरे स्वर में कहा, ठीक है
महाराज ! आपके चरणों के कृपाप्रसाद से मैं ग्रन्थ का अनुवाद सहज और सरल ढंग से करूँगा। सेतुबंध के समय
श्रीरामचन्द्र के दृष्टिप्रताप से ही शिलाएँ समुद्र पर तैर सकी थीं और वसिष्ठजी की आज्ञा से सूर्यमण्डल के स्थान
पर छाटी (साधुओं का गमछा) ही प्रकाशमान हुई थी। याज्ञवल्क्यजी के मंत्राक्षतों से ही शुष्क काष्ठ में नये
पल्लव विकसित हुए या धर्मराज ने श्वान को भी स्वर्गारोहण के योग्य बनाया। उसी प्रकार मेरे नाम से ग्रन्थ
प्रकाशित होना भी गुरु के प्रताप और वैभव का द्योतक है। यदि एका (एकनाथ) और एकादश इन आद्याक्षरों से
ही घटित देखा जाए तो राशि-नक्षत्र एक ही होता है। लेकिन जब उस एक ही में पूर्ण दिखाई देता है तो उसकी
कीमत दस गुनी हो जाती है। एक के साथ एक रखने से ग्यारह हो जाता है। इसीलिए एका को भी अकेले ही
ग्रन्थ लिखने की प्रेरणा हुई। जो सुन्दर है उसे और भी सुन्दर बनाकर, मन को दृढ़ रखकर गुरु जनार्दन एकनाथ
को टीकाकार बना कर उसका जीवन सार्थक कर रहे हैं। दशमस्कंध का जहाँ अन्त होता है, वहीं एकादश स्कन्ध
का प्रारम्भ होता है और मानों एकादश स्कन्ध से जगन्नाथ ही ग्रन्थ का प्रारम्भ कर रहे हैं। इसलिए एकादश
स्कन्ध की यह टीका एकादशी के ही दिन एका अर्थात एकनाथ कर रहा है। इसलिए उस एक के सुख से एकत्व
की प्राप्ति होगी। अब व्यास, वाल्मीकि, भार्गव आदि जिनका पुराणों में 'उशना कवि' शुक्राचार्य, आदिकवि के
रूप में गौरव किया गया है-उन महाकवियों को प्रणाम करता हूँ। उनसे प्रार्थना करता हूँ कि वे अपने ज्ञान से
मेरी बुद्धि को विकसित करें ताकि मेरा यह ग्रन्थ पूर्ण हो। उसी प्रकार ग्रन्थ का अनुवाद करने के लिए अत्यन्त
चतुर श्री शंकराचार्यजी को भी प्रणाम करता हूँ। उन्होंने अपनी कर्मठता का विचार दूर रखकर पृथ्वी पर ज्ञानसूर्य
(ज्ञानमार्ग) का प्रकाश फैलाया। अब भागवत के श्रेष्ठ टीकाकार श्रीधर को प्रणाम करता हूँ जिनकी टीका में
असीम अर्थ भरा हुआ है। इसके अतिरिक्त अन्य अनेक टीकाकार, काव्य रचयिता तथा विवेक चतुर होंगे, जिनके
चरणों में नमस्कार कर ग्रन्थश्रवण करने के लिए उपस्थित रहने की विनती करता हूँ। अब निवृत्तिनाथ, ज्ञानेश्वर,

६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नामदेव, वटेश्वर आदि जिन पर गुरु की विशेष कृपा है ऐसे प्राकृत कवियों को भी प्रणाम करता हूँ। जिनके
ग्रन्थों का अवलोकन करने से प्राकृत लोगों को भी ज्ञानप्राप्ति होती है, उनके चरणों पर भी एकात्म-भाव से और
अनन्य भक्ति से मस्तक रखता हूँ। संस्कृत ग्रन्थकर्ताओं को 'महाकवि' कहते हैं और प्राकृत ग्रन्थकर्ताओं को
'लघुकवि' ऐसा क्यों है? क्या सुवर्ण पुष्पों में किसी को नया तथा किसी को पुराना कहा जा सकता है? क्या
कपिलागाय का दूध, दूध है और अन्य गायों का दूध पानी ? वास्तव में दोनों का दूध रंग और स्वाद में समान रूप
से मधुर होता है। जब मराठी अनुवाद से संस्कृत समझ में आती है तो मराठी भाषा समझने में क्या कठिनाई है?
राजा यदि जंगल में जाकर बैठता है तो सेवक के लिए वही स्थान पवित्र हो जाता है। यदि सेवक उसकी सेवा के
लिए जंगल में नहीं पहुँचेगा तो राजा उसे दण्ड देगा अथवा यदि राजा एक गरीब लड़की से तथा दूसरी अमीर
लड़की से शादी करता है तो वहाँ जाकर दोनों का दर्जा बराबरी का हो जाएगा। संसार में वस्तुओं के नाम देश
और भाषा के अनुसार बदलते रहते हैं किन्तु राम, कृष्ण आदि जो विशिष्ट नाम हैं वे भाषा की भिन्नता के कारण
नहीं बदलते। संस्कृत भाषा की उत्पत्ति यदि ईश्वर से हुई तो क्या मराठी भाषा चोरों ने बनायी? इन भ्रमों को दूर
रखिये। व्यर्थ की बातें करने से क्या लाभ है? सारांश हरिकथा संस्कृत में हो या मराठी में, वह समान रूप से
पावन है, ऐसा ही लोग कहेंगे। अब मेरे पितामह के पितामह भानुदास का वंदन करता हूँ क्योंकि उनके ही
कारण हमारा वंश भगवान को सर्वतोपरि प्रिय हुआ है। जिसने बचपन में ही ज्ञानसूर्य को प्राप्त कर लिया और
स्वयं चित्सूर्य बन गया, उसी प्रकार मानापमान को जीत कर वे भगवत् पावन हुए जिसकी पगबंध प्राप्ति देखने
के लिए साक्षात श्री विट्ठल आये थे। उनके कुण्डल कान में चमकने के कारण रात में भी दिखाई दिये। उसी
भानुदास का पुत्र था चक्रपाणी, जिसे सुलक्षण पुत्र की प्राप्ति हुई। उसका नाम 'सूर्य' रख कर भानुदास ने इस
लोक से बिदा ली। उस सूर्य के तेजस्वी किरणों से माता रुक्मिणी पैदा हुई, इसलिए रखुमाई वास्तव में हमारी
माता है। ग्रन्थ के प्रारम्भ में मैंने पूर्वजों की मालिका का अभिवादन किया। ऐसे वैष्णव कुल में मैंने जन्म लिया
यह मेरा अहोभाग्य है। इसी वैष्णव कुल में नारद, प्रह्लाद, सनकादिक, उद्धव, अक्रूर, श्रीशुक, वसिष्ठ आदि
परमेश्वर के महान भक्तों ने जन्म लिया और वे संसार के लिए भूषण बन गये हैं। ये सारे वैष्णव ग्रंथार्थ की ओर
अवधान देंगे इसलिए मैंने ग्रन्थ के प्रारम्भ में ही वैष्णव वंश की मालिका को प्रणाम किया। अब जिस गोत्र में
मैंने जन्म लिया उन विश्वामित्र जी को मैं प्रणाम करता हूँ। वे प्रतिसृष्टि निर्माता ब्रह्मदेव सदृश हैं तथा उनके ही
कारण गायत्री मंत्र को महत्व प्राप्त हुआ है। उपनिषदों का विवेचन करने वाले ऋषि याज्ञवल्क्य को भी मैं प्रणाम
करता हूँ। वे कृपामृत की वर्षा कर कवि के कर्त्तव्य की पुष्टि करते हैं। आज समस्त प्राणिमात्र को भी मैं प्रणाम
करता हूँ क्योंकि उनके ही कारण ईश्वर से मैत्री सम्भव हुई और ग्रन्थारम्भ का कार्य उत्तम रीति से सम्पन्न हुआ।
अब गुरुओं के भी गुरु दत्तात्रय महाराज को प्रणाम करता हूँ जिन्होंने अपना बोध विशद करने के लिए ग्रन्थ
लिखने की प्रेरणा दी। वही शब्द सुझाते हैं, अर्थों में अर्थ प्रकाशित करते हैं पर वक्तृत्व का श्रेय मुझको देते हैं।
वे कहते हैं कि श्रीमद्भागवत भगवान के हृद्गत है। जिसका चित्त निरन्तर भगवान के साथ रहता है, उसे ही वह
प्राप्त होगा। कल्प से भी पूर्व, भगवान ने बुद्धिमान ब्रह्मदेवजी को आत्मबोध कराने के उद्देश्य से, इस ज्ञान का
चार श्लोकों में उपदेश किया था। उसका सद्भाव-विस्मयकारी है। क्योंकि केवल शब्दमात्र (एक बार कहने
से) से ही उसे उसका अनुभव प्राप्त हुआ। सद्गुरु कृपा की महानता का वर्णन किन शब्दों में किया जाय ? उसने
क्षणमात्र में ब्रह्मदेव को निःसन्देह कर दिया। वही चार श्लोकोंवाला उपदेश गुरुपरम्परा से वैसा का वैसा चला
आ रहा है। ब्रह्मदेव ने वह उपदेश अत्यन्त बुद्धिमान एवं भक्तिमान मानसपुत्र नारद को दिया। उसे सुनकर नारद

प्रथम अध्याय ७
तृप्त होकर नखशिखांत अर्थमय हो गये और पूर्ण परमानन्द से नाचने लगे। कन्धे पर ब्रह्म-वीणा रखे तथा
ब्रह्मज्ञान से गीत गाते और ब्रह्मानन्द से नाचते हुए भूमण्डल पर आये। सरस्वती के तट पर रुके। वहाँ उन्हें व्यास
ऋषि के दर्शन हुए। उस समय महर्षि व्यास सन्देह-सागर में हिचकोले खा रहे थे। उन्होंने वेदार्थ से युक्त समस्त
पुराणों की रचना की थी लेकिन जैसा समाधान वे चाहते थे, वह उन्हें नहीं मिला था। 'आप जरा भी चिन्तित न
हों' इस प्रकार नारदजी ने उन्हें आश्वस्त किया। उन्होंने एकान्त में व्यासजी को गोपनीय तत्त्व का उपदेश दिया
और फिर वे चार श्लोक दिखा कर उन्हें भयमुक्त कर दिया। उसे भानु से छिपा कर आकाश से भी बचा कर,
धीरे से कान में बताकर निजबोध का उपदेश किया तब कहीं उन्हें स्वसुख का समाधान प्राप्त हुआ। तब स्वयं
व्यासजी ने शुक को दशलक्षण भागवत का उपदेश देकर उसे आत्मज्ञान से सार्थक किया। इस प्रकार शुक को भी
आनन्द हुआ और वह भी परमानन्द से तृप्त हुआ। फिर वह समाधिस्थ होकर आत्मशान्ति में स्थिर होकर बैठ
गया। इससे उसे समाधि में ही सहज समाधान प्राप्त हुआ। फिर उस स्थिति में वह अचानक परीक्षित को
ब्रह्मज्ञान सिखाने पहुँचा। परीक्षित के अधिकार का क्या पूछना? उसने तो कलि को ही बाँध रखा था। उसका
अधिकार युधिष्ठिर से भी श्रेष्ठ है, ऐसा अनुभव हो रहा था। क्योंकि जब तक श्रीकृष्ण भूलोक पर थे तभी तक
धर्मराज वहाँ था, कृष्ण के निजधाम चले जाने के बाद वह कलि के भय से भाग गया। लेकिन परीक्षित कलि को
दबाकर शासन कर रहा था, अर्थात वह धर्मराज से भी अधिक साहसी था। वह अर्जुन की वीर निर्व्यंग परम्परा में
उत्पन्न हुआ था। वह कृष्ण की बहन सुभद्रा का नाती था। (सुभद्रा का पुत्र था अभिमन्यु और उसका पुत्र
परीक्षित) उसका पिण्ड मानों अधिकार रूपी पिण्ड था क्योंकि गर्भ में उसकी रक्षा श्रीकृष्ण ने की थी। वह जब
गर्भ में था तभी उसके भय से अश्वत्थामा का शस्त्र भीतर नहीं प्रवेश कर पाया था। उसके अधिकार की भला
कौन व्याख्या कर सकता है? जिसने गर्भ में भी मेरी रक्षा की वह परमेश्वर प्रत्येक प्राणी में विद्यमान है, ऐसा
परीक्षण वह कर रहा था, इसीलिए उसका नाम परीक्षित रखा गया था। नाम की महिमा कितनी अगाध .है।
अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित ने पृथ्वी का उद्धार करने के लिए ही जन्म लिया था। उसके ही कारण त्रिभुवन को
श्रीमद्भागवत का प्याऊ उपलब्ध हुआ था, यह बात प्रसिद्ध है। शरीर में वैराग्य और विवेक लेकर ब्रह्मप्राप्ति के
लिए सर्वस्व का त्याग करनेवाले उस परीक्षित को देखकर श्रीकृष्ण को नितांत प्रसन्नता हुई। ब्राह्मणों का कोप
विचित्र था। उन्होंने परीक्षित को ब्रह्मज्ञान का शाप दिया। ऐसे लोगों के चरणों में मैं काया, वाचा तथा मन से
भक्तिभाव से नमस्कार करता हूँ। ब्राह्मण ब्रह्मा से भी अधिक श्रेष्ठ हैं इस सम्बन्ध में मैं अधिक क्या कहूँ?
लेकिन श्री विष्णु अभी भी अपने हृदय पर श्रीवत्सलांछन धारण करते हैं। इसलिए ब्राह्मण ब्रह्मा के लिए भी पूज्य
हैं यह मेरा विचार सही है। इसीलिए वेदरूप नारायण पृथ्वी पर आये। इसीलिए ब्राह्मण पृथ्वी पर के ईश्वर हैं। वे
परब्रह्म के अवयव हैं। ऐसा होते हुए भी जो उन्हें नहीं भजते वे भाग्यहीन हैं। ब्राह्मणों का सामर्थ्य विचित्र है।
उन्होंने ईश्वर को अपना आज्ञाधारी बना रखा है। अहो! मूर्त्ति की प्रतिष्ठा करते समय, उसमें केवल मंत्रांश से ही
देवत्व का अंश प्रकट होता है। इस पर संतों ने कहा, क्या कहूँ? तुम भक्ति से जो भी स्तवन करते हो उसमें
सचमुच ही साहित्य और चातुर्य के नये सिद्धान्तों की सृष्टि करते हो। तुमने गणपति और सरस्वती दोनों को ही
एक ही पंक्ति में बिठाया है। उसी प्रकार संत्वर्णन में तुमने स्तुति के रूप में एकात्मता प्रकट की। इसके बाद
कुल और कुलदेवता का वर्णन करते समय तुमने जो कथा सुनायी उसे सुनकर मन से चिन्ता का पूरी तरह
विस्मरण हो गया। जो सद्भाव संतचरणों में था वही ब्राह्मणों के प्रति भी। गुरुस्तवन से भी तुमने संतों को प्रसन्न
कर दिया इसलिए तुम्हारी वाणी धन्य है। तुम्हारे मुख से शब्द निकलते ही हमने पहचान लिया कि स्वयं गुरु

८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जनार्दन तुम्हारे मुख से बोल रहे हैं। तुम में प्रेम का ज्वार उठ रहा है, उसे नियंत्रण में रखो और अगली कथा
सुनाने का मन में निश्चय कर कथा का प्रारम्भ करो। आपने स्मरण दिला कर अच्छा ही किया। इसीलिए मैंने
आपके चरणों पर पूरा विश्वास रखा है। जहाँ कहीं आपको गलती लगती हो उसे आप सुधार दें। ग्रंथार्थ सिद्ध
कर मुझे सज्जनों के बीच मान्यता दिलायें। उन्होंने कहा, "ठीक कह रहे हो। तो हे कविपोषक! तुम्हारे ग्रन्थ का
सन्दर्भ ठीक तरह से जानने के लिए अब संस्कृत पर भी टीका करना शुरू कर दो।" इसी भाषण पर भक्तिभाव
रख कर मैं आपके चरणों से लगा हूँ। अब आपकी आज्ञा से कथा प्रारम्भ करता हूँ तो नैमिषारण्य में सूत
शौनकादिकों को पिछला कथा सन्दर्भ इस प्रकार सुना रहे हैं। इससे पूर्व दशम स्कन्ध में नौ लक्षणों से युक्त कथा
सुनायी। अब ग्यारहवें स्कन्ध में श्रीकृष्ण मोक्ष का लक्षण बता रहे हैं। जो चिदाकाश के पूर्णचन्द्र हैं और
ज्ञानयोगियों में श्रेष्ठ हैं ऐसे वे शुकयोगिन्द्र बोलने लगे और सुनने लगे राजा परीक्षित। उसने कहा, "महाराज,
इसीलिए मैंने सर्वस्व का त्याग किया। तभी आपने कृपापूर्वक दर्शन दिये। मेरे भाग्य की अब कोई सीमा नहीं है।
सचमुच इस मोक्ष की कथा अगाध है। जिन्हें अपने मोक्ष के प्रति आस्था है उन्हें मन लगाकर अत्यन्त आदर के
साथ श्रवण करने के लिए तैयार रहना चाहिए। मन को एकाग्र कर कान में रखना चाहिए और अवधान को
सावधान कर श्रवण करना चाहिए। भगवान ने अनेक युगों में अनेक अवतार धारण किये किन्तु इस श्रीकृष्ण
अवतार का चमत्कार कुछ और ही है। हरि की लीला अगाध है। उसका रहस्य देवताओं की समझ में भी नहीं
आता। जिसने जन्म लेते ही माया (माँ) से अलग होकर अपनी ही लीला से अपना पोषण किया जिसने
बाल्यावस्था में ही पूतना आदि को मुक्ति का सुख भोगने दिया, माँ को विश्वरूप दिखलाया, गोपालों को वैकुंठ
का दर्शन कराया और फिर भी अपना बालरूप नहीं बदलने दिया। बालक था तभी अनेक बलवान लोगों को
मारा, संसार में विलक्षण कर्म किये किन्तु बाल्यावस्था की सीमा कभी पार नहीं की। साक्षात परब्रह्म होते हुए
चोरी की, देवता होते हुए भी व्यभिचार किया, पत्नी और बच्चे रहते हुए भी ब्रह्मचारी होने का आदर्श प्रस्तुत
किया। अधर्म से धर्म की वृद्धि की, अकर्म से कर्म का उद्धार किया, अनियमितता से अत्यन्त कठिन नियमों का
पालन किया। संग से निःसंगता सम्पादित की, भोग से योग को बढ़ाया, बिना त्याग किये अत्यन्त अव्यंग और
निर्दोष त्याग किये। कर्मठ लोगों को बोध कराने के लिए कर्म की जड़ता के बन्धन तोड़ डाले और स्पष्ट कर
दिया कि भोग से भी मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। भक्ति, भुक्ति और मुक्ति इन तीनों को एक ही पंक्ति में
बिठाया। इसकी ख्याति के सम्बन्ध में क्या कहा जाय? इसने मिट्टी खाकर विश्वरूप दिखलाया। उस श्रीकृष्ण
का उत्तम एवं परमपवित्र चरित्र मैं तुम्हें बताऊँगा। इस अवतार में आत्मबोध का पूरी तरह विस्तार हुआ है इसमें
जरा भी सन्देह नहीं है। एकादश स्कन्ध के सारांश में आदि और अन्त में कहीं संक्षेप में तो कहीं विस्तार से
परमात्मस्थिति अर्थात मुक्ति के ही सम्बन्ध में कहा गया है। नारद ने वसुदेव को 'निमि-जयंत' की कथा संवाद
रूप में संक्षेप में बतायी। और उद्धव पर अत्यन्त प्रेम होने के कारण उसे अनेक दृष्टांत देकर श्रीकृष्ण ने स्वमुख
से जो कथा सुनायी वह 'विस्तारस्थिति' है। पहले दशम स्कन्ध में निरोधन लक्षण बताये थे जिसमें श्रीकृष्ण ने
अनेक युक्तियाँ सोच कर किस प्रकार अधार्मिक लोगों का संहार कर पृथ्वी का भार कम किया था इसके बारे में
बताया गया था। उनके अधर्म के कारण पृथ्वी आक्रोश कर रही थी, इसलिए लोगों की सहायता के लिए पूर्णब्रह्म
भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया। उन दुष्ट दैत्य और दानव तथा पृथ्वी के लिए भारस्वरूप हुए समस्त राजाओं
का श्रीकृष्ण भगवान ने वध किया। पिछली कथा का सारांश श्रीशुक आगे बता रहे हैं।

प्रथम अध्याय ९
श्रीबादरायणिरुवाच
कृत्वा दैत्यवधं कृष्णः सरामो यदुभिर्वृतः।
भुवोऽवतारयद्भारं जविष्ठं जनयन्कलिम्॥ १॥
स्वयं पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण ने लोगों का चित्त रंजन करने वाले बलवान को लेकर तथा वीर यादवों को एकत्र कर
दैत्यों का संहार किया। जिन्हें यादव नहीं मार सकते थे, उनके सम्बन्ध में श्रीकृष्ण ने निराली युक्ति की योजना की।
वह यह कि उन्होंने उनके ही मित्र, निकट सम्बन्धी, रिश्तेदार इनमें परस्पर घोर कलह उत्पन्न कर दिया और पृथ्वी
का भार कम करने के लिए पाण्डवों को भी क्षुब्ध कर कलह के बहाने कौरवों का भार हलका किया।
ये कोपिताः सुबहु पाण्डुसुताः सपत्नैर्दुद्यूतहेलनकचग्रहणादिभिस्तान्।
कृत्वा निमित्तमितरेतरतः समेतान् हत्वा नृपान्निरहरत्क्षितिभारमीशः ॥२॥
अत्यन्त अघोर कृत्य करने वाले दुष्ट, जिनकी सेना पृथ्वी के लिए भारस्वरूप थी, उनका संहार करने के
लिए उन्हें एकत्र किया जाए और भूमि का भार हलका किया जाए इस उद्देश्य से कृष्ण ने कलह का कारण
उपस्थित किया। श्रीकृष्ण के इस संकल्प के अनुसार कपट के पाँसों का निर्माण हुआ। उसी कपट से देखिए
कौरवों का समुदाय अनायास ही मारा गया। संसार में जुआ दुष्ट लोग ही खेलते हैं। तिस पर इस जुए का प्रारम्भ
कपट से हुआ। दुष्टबुद्धि कौरवों ने जानबूझ कर धर्म के सामने कपट के पाँसे फेंके। सीधे-सादे अनाड़ी लोग भी
धर्मपत्नी का छल नहीं करते और द्रौपदी तो सचमुच धर्म की पत्नी थी, उसे ये लोग बाँधकर सभा में ले आये।
इतना ही नहीं बल्कि उसकी वेणी के केश खींचे जिससे किचकिच इतनी बढ़ी। वास्तव में उसका यही कर्म
उसके लिए हानिकारक सिद्ध हुआ। जंगल में कोई किसी को लूटता है तो राजा उसकी खोज करता है लेकिन
अगर भरी सभा में राजा ही लूटने लगे तो समझ लो कि वह मृत्यु को ही निमंत्रण देता है। बिना किसी अन्याय
के यदि राजा ही लूटने लगे तो वहाँ भगवान सहायता के लिए दौड़ कर आता है। द्रौपदी वस्त्रहरण यही कौरवों
का मुख्य अन्याय था। आग लगाना, विष प्रयोग करना तथा स्त्रियों का अपहरण करना, घात लगाकर मारना,
मारने के लिए हाथ में शस्त्र लेना, अवज्ञा और उपहास, दुर्वचन, धर्म का छल इसी को श्रीकृष्ण ने निमित्त
बनाया। पतिव्रता स्त्री को अनावृत्त किया इस कारण मृत्यु तो होनी ही थी। यही कलह का कारण बना और इसी
कर्म से पूरे कुल का विनाश हो गया। ऐसा जो धर्म का विरोधी होता है उसका वध ईश्वर निश्चित रूप से करता
है। सचमुच इसीलिए उसने पाण्डवों के मन में भीषण क्रोध निर्माण किया। पृथ्वी का भार कम करने के उद्देश्य
से सगे-सम्बन्धी, इष्ट मित्र, सखा, भाई, शास्त्रज्ञ और जो अत्यन्त पवित्र थे उनमें भी विचित्र प्रकार का कलह
उत्पन्न किया। पृथ्वी का भार हलका करने के लिए श्रीकृष्ण ने सुहृद, सखा, भाईयों का भी, उनके साथ आयी हुई
राजसेना पर हमला कर समूल गोत्र का वध किया।
भूभारराजपृतना यदुभिर्निरस्य गुप्तैः स्वबाहुभिरचिन्तयदप्रमेयः।
मन्येऽवनेर्ननु गतोऽप्यगतं हि भारं। यद् यादवं कुलमहो ह्यविषह्यमास्ते॥ ३॥
ऐसे दुष्टों का साथ देने वाले और अधर्माचरण करने वाले, भूमि के लिए केवल भारभूत ऐसे अनेक राजा
और उनकी सेना का संहार किया। कलह का तो मात्र बहाना था। पृथ्वी पर अधर्म करने वाले राजा और उनकी
इतनी अधिक सेना को खोज-खोज कर मारा कि उसका कोई हिसाब नहीं। फिर भी श्रीकृष्ण को लगा कि पृथ्वी

१० श्रीमद् एकनाथी भागवत
का भार अभी कम नहीं हुआ है। इसका कारण यह था कि जिन यादवों ने शक्तिशाली होकर असंख्य दुष्टों का
संहार किया था, वही यादव अब विद्रोही हो गये थे यह बात श्रीकृष्ण को अच्छी नहीं लगी। इसलिए यादवों का
नाश हुए बिना पृथ्वी का पूरा भार कम नहीं होगा और यह यादवकुल कैसे नष्ट होगा इसके बारे में वे विचार
करने लगे। कपूर खाने से अग्नि बढ़ती है लेकिन कपूर समाप्त होने पर अग्नि भी बुझ जाती है। उसी प्रकार
यादवों द्वारा सबका संहार होने के बाद अन्त में उनके ही संहार की बारी आयी। जब तक केले के पेड़ में फल
नहीं आते तब तक वह बढ़ता रहता है लेकिन केले पुष्ट होते ही माली वह पेड़ काट डालता है। उसी प्रकार
यादव वंश की इतनी अधिक वृद्धि हुई कि वह अब भविष्य में संहार के ही लिए थी। फल पकने के बाद जब
उसकी गन्ध फैलने लगती है तो माली उसे तोड़ कर ले जाता है उसी प्रकार अपने ही कुल के फलों को तोड़कर
ले जाने का विचार श्रीकृष्ण के मन में आया। श्रीकृष्ण की कृपा से यादव अपने बाहुबल से पराक्रम कर बढ़े हुए
थे लेकिन वही श्रीकृष्ण उनके नाश का संकल्प कर मन ही मन क्षुब्ध हुआ था। यादवों का कुल अत्यन्त
प्रबल हुआ। उन पर शासन करने वाला कोई नहीं रहा। ऐसे इन उन्मत्त वीरों की अवस्था श्रीकृष्ण के लिए असह्य
हो उठी।
नैवान्यतः परिभवोऽस्य भवेत् कथञ्चिन्मत्संश्रयस्य विभवोन्नहनस्य नित्यम्।
अन्तःकलिं यदुकुलस्य विधाय वेणुस्तम्बस्य वह्निमिव शान्तमुपैमि धाम ॥ ४॥
यदि मैं निजधाम को चला गया तो यही लोग अधर्म के लिए प्रवृत्त होंगे। क्योंकि कुकर्म के लिए प्रवृत्त
होने में सम्पत्ति का मद और अहंकार का अतिरेक यहीं बाते मुख्य रूप से कारणीभूत होती हैं। मेरे ही बल से
बलशाली होकर ये सारे अजिरथि बन बैठे हैं। इनका सामना करने के लिए भूमण्डल पर कोई नहीं बचा है।
इनका गर्व मैं ही उतार सकता हूँ। इंद्रादि देवतागण, दैत्य, राक्षस या दानवों के वश में भी ये नहीं हो सकेंगे और
अगर ये इसी प्रकार पीछे पड़े रहें तो इन यादवों का संहार करने के लिए पुनः मुझे ही अवतार लेना पड़ेगा। इस
प्रकार अब अपनी ही आँखों के सामने अपने कुल को काल के मुँह में झोंकने का विचार कर श्रीकृष्ण ने वही
निश्चय पक्का किया। यदुवंश रूपी वंशबेल श्रीकृष्ण के कृपा जप से बढ़ी हुई थी। वहाँ अब कपट के बहाने
ऋषियों के शाप की चिनगारी गिरी। वास्तव में वह श्रीकृष्ण के संकल्प और ब्रह्मशाप से भड़क उठी। वह अब
स्वजनों के विरोध के रूप में तथा कालाग्नि के कोप से सबके विनाश का कारण बनेगी। इस प्रकार यादवों के
कुल का निर्दलन कर फिर अपनी लीला से अपने निजधाम जाने की श्रीकृष्ण ने योजना बनायी।
एवं व्यवसितो राजन् सत्यसङ्कल्प ईश्वरः।
शापव्याजेन विप्राणां संजह्रे स्वकुलं विभुः ॥ ५ ॥
इस प्रकार अपने कुल को स्वयं ही नष्ट करने का विचार उनके मन में आया और उन्होंने समूलकुलक्षय
का निश्चय किया। अब यह कार्य हो कैसे ? इस पर जगदीश ने यह विचार किया कि ब्राह्मण के शाप के बहाने
कुल का अपने आप ही विनाश हो जाएगा। बस इतना सिद्ध हो जाए तो अवतार की इतिकर्तव्यता समाप्त हो
जाएगी और फिर स्वलीला से निजधाम चलें ऐसा यदुवीर ने विचार किया। श्रीकृष्ण 'लीलाविग्रह' अर्थात् स्वेच्छा
से देह धारण करने (जीवों की तरह कर्म के अनुसार देह धारण करनेवालों की तरह नहीं) वाले तथा नितान्त
सुन्दर थे। उनकी गुणकर्मक्रिया अत्यन्त पवित्र थी। वह परिपूर्ण ब्रह्म, पूर्णावतारी तथा संसार का उद्धार करने
वाला था।

प्रथम अध्याय ११
स्वमूर्त्या लोकलावण्यनिर्मुुक्त्या लोचनं नृणाम्।
गीर्भिस्ताः स्मरतां चित्तं पदैस्तानीक्षतां क्रियाः ॥ ६ ॥
समस्त मंगलों से पूर्ण मंगल तथा गोकुल की स्त्रियों को रिझाने वाला वह श्रीकृष्ण स्वयं मोक्ष की नौका ही
था। उसका सौन्दर्य अलौकिक था। जो भक्तकामकलद्रुम, मेघ की तरह नीली कांतिवाला मनोहर दीखने वाला,
जिसका नाम त्रैलोक्य में प्रसिद्ध है, ऐसे वह पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण स्वभाव से ही इस नाम के अनुरूप है। श्रीकृष्ण
के सौन्दर्य पर जहाँ लक्ष्मी पागल हो उठी, बेचारा मदन जन्म लेने को विवश था वहाँ दण्डचंद्र की क्या दशा है ?
जिसका नाम त्रैलोक्य को पवित्र करने वाला है, जो राक्षसों को. भस्म करने वाला है, जिसे 'पूर्णकाम' कहा जाता
है, वह भक्तों के लिए सदा सुगम है। त्रैलोक्य में जितना भी कुछ सौन्दर्य है, वह सब भूल कर श्रीकृष्ण के पास
आ गया था या यों कहिए कि कृष्ण के सौन्दर्य से ही त्रैलोक्य का सौन्दर्य सुशोभित होता है। जो सारे सौन्दर्य की
शोभा है, लावण्य की राशि है, जिसके अंग की प्रभा से संसार को शोभा प्राप्त हुई है। जो हर्ष में भी परम हर्ष,
अथवा सुख को ही अत्यन्त सुख देने वाला परमसुख है, जिसके कारण विश्राम को भी आराम मिलता है, वह
निराकार ही मानों साकार हुआ अथवा त्रैलोक्य के सम्पूर्ण लावण्य से युक्त सुन्दर श्रीकृष्ण, शोभा को भी सुशोभित
करने वाला था। जमा हुआ घृत पिघलने पर भी उसका घृतपना नष्ट नहीं होता, उसी प्रकार निराकार स्वरूप
साकार होने पर भी वह पूर्ण परब्रह्म ही था। उसे देखते ही देखने की इच्छा पूरी होती है, देखते-देखते ही देखना
पूरा हो जाता है, दृष्टा के साथ दर्शनक्रिया भी लज्जित होकर अपने स्वरूप में लौट जाती है। दृष्टि संतृप्त होकर
ढकार लेती है और व्यक्ति अपना पड़ोसी बनकर कृष्ण स्वरूप का आनन्द अनुभव करता है। एक बार श्रीकृष्ण
के माधुर्य का आस्वाद लेने पर जिह्वा रसस्वाद को भूल जाती है क्योंकि फिर स्वाद ही अच्छा नहीं लगता।
उसकी माधुरी विचित्र है। उस माधुरी ने अमृत का स्वाद भी फीका कर दिया है। इस प्रकार जिह्वा हरिरस में पूर्ण
रूप से सुख का अनुभव करती है। श्रीकृष्ण की हवा से ही सारा संसार नीरस हो जाता है। श्रीकृष्ण की
सुगन्धवायु के सिवा अन्य कोई गन्ध नाक को अच्छी ही नहीं लगती। वास, सुवास, पुष्प, ज्ञेय, घ्राता और घ्राण
ये सब कृष्ण के मकरंद से स्वयं ही एकत्र होकर उनके यहाँ विश्राम के लिये आते हैं। उनके शरीर के स्पर्श से
देह, देही और देहपन यह भाव नष्ट हो जाता है। देह ही अपनी देहबुद्धि किस तरह भूल जाता है? कठिन की
कठिनता नष्ट हो जाती है, मृदु की मृदुता लुप्त हो जाती है, इस प्रकार स्पर्श का स्पर्शत्व नष्ट हो जाता है, ऐसी
अवस्था श्रीकृष्ण ने कर डाली है। उसके पठन से वाच्य-वाचक का स्थान जो वाणी है उसने 'नेति' शब्द को
मिटा कर उसे निःशब्द कर दिया है। वाक वाचा में ही समा गयी, वाक्शक्ति अवाक हो गयी। कृष्णनाम ने
वाच्य-वाचक का भेद नष्ट कर दिया। उन चरणों का चिन्तन करते ही चित्त सहज ही विस्मृत हो जाता है और
फिर निश्चिंत होकर कृष्ण चरणों में विश्राम करता है। चित्त, चिन्ता और चिन्तन इन तीनों का स्मरण ही नहीं
रहता। श्रीकृष्ण चरणों का चिन्तन करते ही चित्त परिपूर्ण ब्रह्म ही हो जाता है। भूमि पर पड़े उसके पदचिन्ह
आश्चर्यजनक है। उसे देखते ही कर्माकर्म का लय हो जाता है और फिर कर्म, कर्त्ता और क्रिया यह भ्रम उसके
पदरज से निर्भ्रम हो जाता है। उसके चरणों की छाप देखते ही कर्माकर्म के बन्धन टूट जाते हैं क्योंकि कर्म का
मुख्य अंग है माया जिसका अल्पांश भी शेष नहीं रह पाता। गौ के पीछे अंकित पद-चिह देखने पर कर्त्ता के
साथ कर्म का विलय हो जाता है। 'अकर्म' यह कहना भी शेष नहीं रहता। इस प्रकार कर्म का निष्कर्म हो जाता
है। उसकी कीर्ति सुनने से श्रोता का श्रोतापन ही नहीं रह जाता, वक्ता का वक्तापन शेष नहीं रह जाता, वक्ता का
वक्तापन नहीं बच पाता, केवल श्रवणमात्र से ही परब्रह्म स्वरूप की प्राप्ति होती है।

आच्छिद्य कीर्तिं सुश्लोकां वितत्य ह्यञ्जसानु कौ।
तमोऽनया तरिष्यन्तीत्यगात्स्वं पदमीश्वरः ॥७॥
इस प्रकार उदारकीर्त्ति कृष्ण ने अपने अवतार को विख्यात बना दिया। उसके कारण जड़ जीवों का उद्धार
होता है और श्रवणमात्र से त्रैलोक्य पावन होता है। स्वयं निजधाम जाने के बाद, अपने बाद संसार सागर को पार
करने के लिए भगवान स्वयं की कृष्ण कीर्त्तिरूपी नौका छोड़ गये थे। इस नौका की स्थिति विचित्र है। कल्पांत
में भी वह डूबने नहीं देती। उसके श्रवणमात्र से आज तक कितने ही श्रद्धालु तर गये और आगे भी कितने ही तर
जायेंगे यह मालूम नहीं है। श्रीकृष्ण की कीर्त्तिरूपी नौका को भवसागर में छोड़ना ही पर्याप्त है, उसके छोड़ते ही
सागर सूख जाता है। फिर श्रवणार्थी पुरुष जो नौका से उतरता है वह सूखे कदमों से ही सागर पार करता है। जो
कृष्ण की कीर्ति का पठन करते हैं उनके जन्ममरण का संसार शून्य हो जाता है वे अत्यन्त पावन और कीर्तिमान
हो जाते हैं और सुरगण उनकी वन्दना करते हैं। श्रीकृष्ण कीर्त्ति का आदर से पालन करने पर चारों मुक्तियाँ पैरों
तले आ जाती हैं। उनके योग से त्रिभुवन पावन होता है, हरिनाम से परम निर्वृत्ति अर्थात् परमानन्द प्राप्त होता है।
श्रीकृष्ण कीर्त्ति के नामाक्षर श्रवणद्वार से भीतर प्रवेश करते ही, अंतःकरण में भरा हुआ सारा अज्ञान एकाएक
खड़बड़ा कर बाहर आ जाता है। उसी प्रकार (कृष्ण कीर्ति) के गर्जन से अज्ञान को बाहर भी कोई आसरा नहीं
मिलता। इसलिए भय के मारे उसका सपरिवार विलय हो जाता है। इस प्रकार कृष्णकीर्त्ति में परमानन्द प्राप्त होता
है। कृष्णकीर्त्ति प्रताप के प्रकाश से सारा संसार कृष्णमय ही दिखायी देने लगता है। इसलिए वह कीर्ति उसे
कीर्त्तिमंत की ही तरह सहज ही निजसुख प्रदान करती है। जिसे देखने पर देखना समाप्त हो जाता है, जिसे
चखने पर चखना पूर्ण हो जाता है, जिसका श्रवण करने से श्रवण समाप्त हो जाता है, जिसका चिन्तन करने से
चित्तवृत्ति ही जम जाती है। जिसकी भेंट हो जाने पर मिलन की कमी कभी नहीं रह जाती, जिसके साथ बात
करने से परमार्थ को ही आलिंगन हो जाता है, और जिसके आलिंगन करने से आलिंगन की इच्छा विलीन हो
जाती है और जिसका नाम लेने से महाभय का भी नाश होता है, ऐसा वह सत्य संकल्प ईश्वर, वह सर्वेश्वर
शार्ङ्गधर स्वलीला से अर्थात् स्वेच्छा से शीघ्र ही निजधाम जाने के लिए उद्यत हुए।
राजोवाच
ब्रह्मण्यानां वदान्यानां नित्यं वृद्धोपसेविनाम्।
विप्रशापः कथमभूद् वृष्णीनां कृष्णचेतसाम् ॥८॥
तब परीक्षित ने बड़े आदर के साथ पूछा कि हे शुकयोगीन्द्र ! यादव तो विप्र भक्ति में विनम्र थे। ऐसा होते
हुए भी उन्हें शाप क्यों मिला यह बतलाइए। यादव दानवीर थे, राजा होते हुए भी परम पवित्र थे, निरन्तर ब्राह्मणों
की सेवा में तत्पर रहते हुए कृष्ण के आज्ञाधारी थे। सदैव कृष्ण का सहवास होने के कारण यादवों के पास
निरन्तर साधुसंत रहते थे। नारदमुनि तो सदैव वहीं रहते थे। ऐसा होते हुए भी यादवों को शाप कैसे मिला ? दक्ष
के शाप का प्रभाव, कृष्ण के पास रहने से नहीं होगा, इसलिए नारद भी द्वारका में ही रहते थे। फिर, ऐसा वह
श्रीकृष्ण स्वयं वहाँ उपस्थित रहने पर भी यादवों को शाप कैसे मिला ?
यन्निमित्तः स वै शापो यादृशो द्विजसत्तम।
कथमेकात्मनां भेद एतत्सर्वं वदस्व मे ॥ ९ ॥
शाप के लिए मूल कारण हैं संताप। तब ब्राह्मणों को क्रोध कैसे हुआ ? और शाप भी क्या दिया ? इसे

प्रथम अध्याय १३
कृपया संक्षेप में बतायें। यादव तो सभी भाई बंद हैं, एक दूसरे के चहेते और उनका पालनकर्ता स्वयं श्रीकृष्ण !
ऐसा उनमें ऐक्य भाव और समस्त एक परिवार होते हुए उनमें की परस्पर एकता टूट कर मारपीट तक की
नौबत कैसे आ पहुँची ? 'आत्मा वै पुत्रनामासि' (आत्मा ही पुत्र है) यह श्रुति सबके लिए प्रमाण है। ऐसा होते
हुए भी श्रीकृष्ण के ही लड़के शाप से कैसे बाधित हुए ? वह शाप सच कैसे हुआ ? 'कुल का विनाश करने
का संकल्प कृष्ण का ही था, वही ब्राह्मणों के शाप के लिए कारणीभूत हुआ और इसीलिए वह सभी यादवों
के लिए बाधक हुआ इसे ध्यान में रखो। कृष्ण संकल्पमात्र से ही सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार करता
है। उसने ही यादवकुल का संहार करने का निश्चय किया' यह कहकर, शुक उसके अवतार की महत्ता का
वर्णन करते हैं।
श्रीशुक उवाच
बिभ्रद्वपुः सकलसुन्दरसन्निवेशं कर्माचरन्भुवि सुमङ्गलमाप्तकामः।
आस्थाय धाम रममाण उदारकीर्तिः संहर्तुमैच्छत् कुलं स्थितकृत्यशेषः ॥ १०॥
कर्माणि पुण्यनिवहानि सुमङ्गलानि, गायज्जगत्कलिमलापहराणि कृत्वा।
कालात्मना निवसता यदुदेवगेहे पिण्डारकं समगमन्मुनयो निसृष्टाः ॥ ११ ॥
परीक्षित राजा से शुक्राचार्य ने कहा, "कर्ता तथा कराने वाला वह एक श्रीकृष्ण है। उसने ही अपने
लड़कों को शाप मिले इसलिए उनके मन में अविचार उत्पन्न किया। श्रीकृष्ण के मन में निजधाम जाने की
उत्कंठा लगी हुई थी इसलिए शेष बचा हुआ कार्य भी पूरा करने की उसे जल्दी हो रही थी। अब मेरा कुलक्षय
कब होता है यही चिन्ता भगवान के मन में लगी हुई थी। भगवान का यही उद्देश्य शाप के लिए कारणीभूत
हुआ ऐसा समझ लो। जिस कृष्ण ने कुलक्षय का विचार मन में लाया था, उस कृष्ण की सुन्दर मूर्ति का वर्णन
उल्लसित मन से शुक परीक्षित से करने लगे। समस्त सौन्दर्य का अधिष्ठान, ऐसा मनोहर सुशोभित वेष उसने
धारण किया था। उस जगदीश ने अपने शरीर में मानों सभी प्रकार के लावण्य का संग्रह किया था। कैसा
चमत्कार कहा जाए। उसके सौन्दर्य पर ऐसा तेज चढ़ गया था कि उसके प्रत्येक अंग पर लोगों की दृष्टि जम
सी गयी थी। कृष्ण का स्वरूप इतना आकर्षक था कि लोगों की दृष्टि भय से काँप रही थी। जिस प्रकार गुड़
पर मक्खियाँ आकर बैठती हैं उसी प्रकार कृष्ण के स्वरूप पर लोगों की दृष्टि जम सी गयी थी और उसने
उनके शरीर को चारों ओर से बाँध दिया था। आँखें दर्शन लोभ के कारण ललचायी हुई थीं। आँखों में मानों
जिह्वा निकल आयी थीं। इस प्रकार श्रीकृष्ण मूर्ति की शोभा मानों स्वानंद का साकार भण्डार ही था। उस
श्रीकृष्ण को जिस दृष्टि ने देखा वह मानों लौटने के लिए तैयार ही नहीं थी। वे उसका अधिक से अधिक
आलिंगन कर रही थीं। इसलिए सारी सृष्टि उन्हें कृष्णरूप ही दिखायी देती थी। आँखों को उसकी ऐसी चाह
थी कि कामिनियाँ उस पर टूट पड़ती थीं और इसीलिए गोपियों के मन में उस गोविन्द के लिए मीठी चाह
उत्पन्न हो गयी थी। कृष्ण इस प्रकार अत्यन्त सुन्दर था इसलिए उसमें विषय की अभिलाषा हो ऐसी बात नहीं
है क्योंकि वह पूर्णकाम अर्थात निरिच्छ और केवल आत्मस्वरूप में ही रमण करते थे। कृष्ण यदि पूर्णकाम थे
तो वे द्वारका में घर बसाकर स्त्रीपुत्रों के साथ राजसी ठाठ से रहकर विषयों का उपभोग क्यों करते थे ? तो
इसका कारण यह है कि श्रीकृष्ण चारों आश्रमों के प्रकाशक हैं तथा त्रैलोक्य में सच्चे गृहस्थ एक अकेले
श्रीकृष्ण ही हैं, सच्ची निष्ठा से वही ब्रह्मचारी हैं। कृष्णदेह में 'दैव' अर्थात 'भाग्य' की प्रधानता नहीं थी। वह

'लीलाविग्रही' अर्थात स्वेच्छा से देहधारण करने वाला (अन्य जीवों की तरह कर्म से कर्मपरावलंबी-देह
धारण करने वालों की तरह नहीं) तथा शुद्ध चैतन्य सागर पर एक लहर के समान उसका देह था। उसके सारे
कर्म पवित्र करने वाले थे। उनका श्रवण और कथन करने से ही सबका उद्धार होता है। कृष्ण के कर्मों का जो
स्मरण करता है, उसका वही कर्म जीव को कर्मबन्धन से मुक्त करता है। दोनों का उद्धार करने के लिए ही
श्रीकृष्ण ने ऐसा उत्कृष्ट कर्माचरण किया था। यदि यह कहें कि श्रीकृष्ण सकाम होंगे इसीलिए उन्होंने
कर्माचरण किया तो फिर जिसका नाम दूसरे को निष्काम कर सकता है वह स्वयं सकाम कैसे हो सकता है?
श्रीकृष्ण की विषय भोग लीलाओं का स्मरण करने से संन्यासी भी अपने आप निष्काम हो जाते हैं। विषयी
लोगों की भी विषयेच्छा नष्ट हो सके ऐसा ही उदार कर्माचरण उसने किया सभी दृष्टियों से पूर्णकाम होते हुए
उसने असाधारण कार्य किये। केवल स्मरण मात्र से लोग भवसागर पार कर सकें इसलिए उसने अपनी कीर्ति
का विस्तार किया और वह कर्म भी कितना मंगलदायक था। किंचित श्रवण मात्र से ही कर्म का फल तत्काल
नष्ट हो जाता है। श्रवण से मन में सद्भाव उत्पन्न होता है, सद्भाव से देवत्व प्रकट होता है और उससे
अहंकार नष्ट होता है। श्रीकृष्ण की कीर्ति का स्मरण, श्रवण अथवा पठन करने से अनेक लोगों का उद्धार हुआ
है और आगे भी होगा। पूर्वजन्म में पुण्य कमाया है तभी हरिकथा में मन लगता है, अन्यथा अनेक लोगों को
अनायास ही गहरी निद्रा आ जाती है। जो हरिकथा में तत्पर रहते हैं उनके पुण्य की कोई सीमा नहीं है। कीर्तन
से दीनों का उद्धार हो इसलिए श्रीकृष्ण ने इस सरल उपाय की योजना की है। हरिकीर्तन की कथाओं को जोर
से कहने से प्रायश्चित लज्जा से नत हो जाते हैं और तीर्थों का बड़प्पन भी कम हो जाता है। नाममात्र से ही
मुक्ति प्राप्त होती है। इस प्रकार अपनी कीर्ति से उदार, पूर्णब्रह्म शार्ङ्गधर, लीलाविग्रही सर्वेश्वर ने यदुवंश में
पूर्णावतार धारण किया था। उसे नहीं लगता था कि पृथ्वी का भार कम हुआ है क्योंकि जो अत्यन्त प्रबल
यादव बचे हुए हैं उनका भी निर्दलन हो जाना चाहिए ऐसा उनका विचार था। श्रीकृष्ण ने कहा, अब इस
अवतार में मेरे लिए इतना ही कार्य बच रहा है—अपने वंश को समाप्त करना। उसे पूरा कर फिर निजधाम को
चलूँ। यादवों के कालस्वरूप देवाधिदेव ने भविष्य को ध्यान में रखते हुए जो चमत्कार किया उसे सुनिए।
नारदादि मुनियों को स्वयं श्रीकृष्ण ने बुलाकर आग्रहपूर्वक बताया कि अब आप लोग यहाँ से चले जाएँ क्योंकि
संतजन जिस स्थान को छोड़ कर चले जाते हैं वहाँ अनर्थ की लीला शुरु हो जाती है। इसलिए यादवों के
विनाश के लिए पहले यही आवश्यक है यह जानकर उन्होंने यह युक्ति रची। भक्त, संत और साधु जिसके
निकट हों वहाँ अनर्थ की भीड़ नहीं रहती। यह रहस्य केवल श्रीकृष्ण को ही मालूम था। जहाँ संतों का
समुदाय रहता है वहाँ जन्म और मृत्यु का भी अभाव रहता है। यह बात केवल श्रीकृष्ण को ही मालूम होने के
कारण उसने ब्रह्मपाश के लिये इसी उपाय की योजना की। जिस स्थान को छोड़ कर संत दूर चले जाते हैं वहाँ
अनर्थ तत्काल मस्तक पर प्रहार करता है। इसे ध्यान में रखकर ही श्रीकृष्ण ने समस्त ऋषियों को द्वारका के
बाहर भेज दिया। ऋषिगण अपने-अपने आश्रम की ओर जाने वाले थे किन्तु इस नाटकीय श्रीकृष्ण ने तीर्थ का
बहाना बनाकर उन्हें 'पिंडारका' भेज दिया। जिनका स्मरण करते ही कलिकाल भी भय से काँपने लगता है,
ऐसे किन-किन ऋषियों को श्रीकृष्ण ने पिंडारका भेजा, जरा सुनो।
विश्वामित्रोऽसितः कण्वो दुर्वासा भृगुरंगिराः।
कश्यपो वामदेवोऽत्रिर्वशिष्ठो नारदादयः ॥ १२ ॥
जो तपस्या के तेज से देदीप्यमान, जो पूर्ण ज्ञान में योग से चैतन्यधन हैं जिनका श्रीकृष्ण निरन्तर वन्दन

प्रथम अध्याय १५
करते थे वे सारे बड़े-बड़े ऋषि पिंडारक जाने के लिए निकल पड़े। गायत्री मंत्र से प्रति सृष्टि निर्माण करने में
समर्थ महा हठी विश्वामित्र भी शीघ्र ही चल पड़े। जहाँ शीत और ऊष्मा की बाधा नहीं होती ऐसे आश्रम में रहने
वाला और जिसके नाम से द्वंद्व भागने लगते हैं, ऐसा असित मुनि भी तत्काल निकल पड़ा। जिसने सूर्य की शरण
में जाकर उसके घोड़े के कान में बैठकर सम्पूर्ण वेदपाठ किया, वह कण्व ऋषि भी निकल पड़ा। जो अत्याहारी
होते हुए भी निराहारी के नाम से प्रसिद्ध थे वे दुर्वासा ऋषि भी तेजी से द्वारका के बाहर चल पड़े। जिस भृगु ने
मारी हुई लात को श्रीकृष्ण हृदय पर धारण कर वह 'श्रीवत्स' भूषण कह कर विचरण करता है, वह भृगु ऋषि
भी चल पड़ा। अंगिरांऋषि तो स्वयं सृष्टि में बुद्धिमान, जिसका पुत्र देवगुरु बृहस्पति था वह भी जाने के लिए
निकला। कश्यप की बात तो विचित्र ही थी। उसने सुर, नर, किन्नर आदि को जन्म दिया और जिस लिए इस
सृष्टि को 'काश्यपसृष्टि' भी कहते हैं, वह भी जाने के लिए निकल पड़ा। सभी युक्तों में जो योग्यता में श्रेष्ठ है,
जिनका वर्णन वेदों में भी है वे वामदेवऋषि भी जाने के लिए निकल पड़े। अत्रि का भी चमत्कार ही है। उन्होंने
तीन देवताओं को जन्म दिया। उस श्रीदत्त महाराज को बड़े-बड़े योगी भी वन्दन करते हैं। अनुसूया का यह कैसा
अहोभाग्य है। वे अत्रि मुनि सभी ऋषियों में श्रेष्ठ होते हुए भी श्रीकृष्ण की आज्ञा मानने के लिए सदैव तत्पर
रहते थे। इसलिए उन्होंने पिंडारक जाने में बड़ी जल्दी की। जो श्रीराम के सद्गुरु, ब्रह्मज्ञान के कारण नितांत
उदार, जिसकी कफ़नी की ऐसी महिमा थी कि उसने तेजस्विता में सूर्य को भी पीछे छोड़ दिया। ऐसा वह
वसिष्ठ ऋषि भी कृष्ण की सूचना स्वीकार कर तुरन्त द्वारका छोड़ कर पिंडारक जाने के लिए निकल पड़े। उसी
प्रकार देवर्षि नारद जिसका ज्ञान भी अगाध था जो सदैव परमानन्द में लीन रहते थे और जिनकी उत्सुकता
हरिकीर्तन में ही रहती थी वे भी कन्धे पर वीणा रखकर ब्रह्मपद गाते-गाते ब्रह्मानन्द से नाचते-गाते पिंडारक की
ओर चल पड़े। ऐसे सारे मुनिश्रेष्ठ और बड़े-बड़े ऋषि सपरिवार शिष्य समुदाय के साथ पिंडारक में एकत्र हुए।
इस प्रकार पिंडारक में शाप देने और अनुग्रह करने में भी समर्थ सभी ऋषि एकत्र हुए और कृष्ण के वैभव का
वर्णन करने लगे। कपटी-नाटकी श्रीकृष्ण ने इधर तुरन्त कुलक्षय करने की इच्छा से अपने ही लड़कों का कपट-
मेला आयोजित कराकर बड़े-बड़े ऋषियों की हँसी उड़वायी। निंदा, अपमान तथा दिल्लगी करने से ब्राह्मणों का
छल होता है और यदि ब्राह्मणों का पूरी तरह द्वेष हुआ तो फिर कुलक्षय हो गया ऐसा निश्चय ही समझिये !
ब्राह्मणों के गुस्से के सामने कुल की क्या बिसात है। महादेव का लिंग गल गया और इन्द्र की सारी सम्पत्ति समुद्र
में डूब गयी। सारा समुद्र भी खारा कर डाला।'ऐसा भयानक कोप था ब्राह्मणों का। ऐसा चरित्र जिन ऋषियों का
था 'वे सब वहाँ एकत्र थे। पृथ्वी पर ब्राह्मण ही ब्रह्म का रूप है और उसका वचन परमप्रमाण है यह सच कर
दिखाने के लिए ही श्रीकृष्ण ने कुल का संहार कर दिखलाया।
क्रीडन्तस्तनुपव्रज्य कुमारा यदुनन्दनाः।
उपसंगृह्य पप्रच्छुरविनीता विनीतवत्॥ १३॥
सभी यादवपुत्र गेंद खेलने लगे। वे गेंद को ऊपर ही ऊपर लोक लेते थे और एक-दूसरे को मारते हुए
शरीर को बचाते हुए भागते जाते थे। इस प्रकार विविध प्रकार से मजे लेते हुए वे यादवों के लड़के पिंडारक
पहुँचे। उनमें अपनी अमीरी का जबरदस्त अहंकार भरा हुआ था। वे सभी मदोन्मत्त होकर बड़े उद्धत हो गये थे।
उन्होंने अपने मन में विचार किया कि यहाँ भूत भविष्य जानने वाले अनेक महर्षि एकत्र हुए हैं। सुना है कि
उनकी बातें बिल्कुल सच सिद्ध होती हैं। लेकिन हम लोग उन्हें अवश्य चकमा दे सकेंगे। क्योंकि जो कभी भी

१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
घटना सम्भव नहीं है, वह इनके वचनों से भी कैसे घटेगा ? यह कहकर यादव वंश के लड़कों ने बड़े-बड़े
ऋषियों के सामने एक कपट प्रस्तुत किया।
ते वेषयित्वा स्त्रीवेषैः साम्बं जाम्बवतीसुतम्।
एषा पृच्छति वो विप्रा अंतर्वत्न्यसितेक्षणा ॥ १४ ॥
पहले से ही लक्ष्मी के मद में लीन, तिस पर कपट की योजना बनायी। उन्होंने जांबवती के पुत्र 'सांब'
को स्त्री के वेष में सजाया। वह साँवला और सुन्दर था। उसकी आँखें पानीदार थी। उस पर वह स्त्रीवेष
बहुत ही फबने लगा और वह अभिनय पटु होने के कारण स्त्रियोचित लज्जा, नेत्रकटाक्षादि हावभाव आदि का
उत्तम ढंग से प्रदर्शन कर सका। उसने आँखों में काजल लगाया था। वह इस प्रकार नेत्रकटाक्ष करने लगा
जिससे उस पर नजर टिक नहीं पाती थी। वह स्वाभाविक रूप से ही सुन्दर और नाजुक था। तिस पर वह
हंस की गति से धीरे-धीरे चलने लगा। कुछ शैतान बच्चों ने उसके पेट पर कपड़े के टुकड़े बाँध कर पेट को
बड़ा कर दिया था, जिससे वह कोई गर्भवती स्त्री मालूम होती थी। सखियों के कन्धे पर हाथ रख कर वह
धीमे कदमों से इस प्रकार चल रही थी ताकि पेट न हिलने पाये। इस प्रकार पग-पग पर सुस्ताते हुए चलने
वाली उस युवती को ऋषियों ने देखा। स्त्रियोचित मर्यादा का पालन करते हुए वह ऋषियों से थोड़े से अन्तर
पर खड़ी हो गयी। उसके साथ के लड़के ऋषियों के पास पहुँच आए उन्होंने उन्हें साष्टांग दण्डवत किया।
छल करने के उद्देश्य से आये उन यदुकुमारों ने उन ऋषियों की प्रदक्षिणा की, अत्यन्त आदर के साथ उनका
चरणस्पर्श किया और बोले, हम आपके दर्शन के लिए आये हैं। इस प्रकार वे सभी राजकुमार भीतर से अनम्र
होते हुए भी ऊपर से विनम्र होने का दंभ भरते हुए हाथ जोड़कर खड़े हो गये और अत्यन्त लीनता से उन
ऋषियों से इस प्रकार निवेदन किया, "महाराज ! उस तरफ वह जो स्त्री खड़ी है, उसे आपके वचनों पर
अत्यधिक विश्वास है। वह गर्भवती है और उसका समय पूरा हो चला है। उस सुन्दरी को आप से स्वयं
पूछने में लज्जा का अनुभव हो रहा है।"
प्रष्टु विलज्जती साक्षात् प्रभूतामोघदर्शनाः ।
प्रसोष्यन्ती पुत्रकामा किं स्वित्सजनयिष्यति ॥ १५ ॥
उसे स्वयं आपके पास आकर पूछने का साहस नहीं होता, इसलिये उसने हमारे माध्यम से आपसे विनती
की है। आप सचमुच ही सत्यदर्शी हैं, आपका वचन कभी भी असत्य नहीं होता। साक्षात हरिहर भी आपकी
वन्दना करते हैं। आप सभी प्रकार का ज्ञान प्रदान करने में उदार हैं। इसलिये यह गर्भवती स्त्री आपसे यह
सविनय पूछ रही है कि वह किसे जन्म देगी ? उसे तो पुत्र की इच्छा है। इस प्रकार वे कपट भक्ति से हाथ जोड़
कर खड़े हो गये। उन्हें कपट ही प्रिय होने के कारण उन्हें फल भी उनकी भावना के अनुरूप ही मिले। उनका
यह झूठा कर्म पहचान कर नारद तो ऋषियों के आगे नाचने लगे। उन्होंने मन ही मन कहा, यादवों की मृत्यु अब
अत्यन्त निकट आ गयी है। चूँटी को जब पर निकलने लगते हैं तो उसकी मृत्यु निश्चित हो जाती है। इस प्रकार
ब्राह्मणों का छल होने पर कुल का विनाश निश्चित ही है। ब्राह्मण भले ही गाली या शाप दे लेकिन उसे
भक्तिपूर्वक प्रणाम करना चाहिए। ब्राह्मण यदि मारने के लिए आये तो उसके सामने मस्तक झुकाना चाहिये। उन
ब्राह्मणों का छल करना विषभक्षण करने की तरह है। विष में तो केवल खाने वाले के प्राण चले जाते हैं किन्तु
ब्राह्मणों का छल करने से सारे कुल का नाश होता है। विद्वान अथवा अविद्वान का मन में विचार लाये बिना,

प्रथम अध्याय १७
ब्राह्मण पृथ्वी पर ब्रह्म का ही अवतार है ऐसा समझना चाहिए। उसका छल करने से कुलक्षय निश्चित है ऐसा
समझना चाहिए।
एवं प्रलब्धा मुनयस्तानूचुः कुपिता नृप।
जनयिष्यति वो मन्दा मुसलं कुलनाशनम्॥ १६॥
हे राजाधिराज परीक्षित सुनो ! इस प्रकार उन यादवों के शरीर में मानों मृत्यु की वायु का संचार ही हो चुका
था इसलिए वे उन ऋषियों का छल करने गये। उनका प्रश्न कपटपूर्ण है, यह मालूम होने पर उन्हें अत्यन्त क्रोध
हुआ। फिर क्या ! उन उद्धत लड़कों पर उन्होंने अनिवार्य वाग्वज्र छोड़ा। उन्होंने कहा, अरे ! इसके गर्भ से जो
बालक उत्पन्न होगा वह तुम्हारे कुल के लिए कालस्वरूप होगा। आप सभी अभागे हैं। शुद्ध लोहे के मूसल का
वह प्रसव करेगी।
तच्छ्रुत्वातेऽतिसंत्रस्ता विमुच्य सहसोदरम्।
साम्बस्य ददृशुस्तस्मिन् मुसलं कुलनाशनम्॥ १७॥
यह शापवचन सुनकर यादवों के वे लड़के घबरा गये। उन्होंने तत्काल उस सांवा के पेट पर बाँधा हुआ
कपड़ा हटा कर देखा। तो वहीं पर लोहे का मूसल निकला हुआ दिखायी दिया। उसे देखते ही सब लोग
भयविह्वल हो गये, एकाएक चौंक गये और आश्चर्यचकित हो गये। यादवों के कुल का विनाश करने का जो
संकल्प श्रीकृष्ण ने लिया था वही उन ऋषियों के शब्द के साथ तत्काल मूसल बन गया। ब्राह्मण जिन-जिन
वचनों का उच्चार करते हैं उन्हें श्रीकृष्ण झूठा नहीं होने देते। ब्राह्मण के मुँह से निकले हुए शब्द को श्रीकृष्ण
स्वयं सच करके दिखाते हैं। उन महान ऋषियों का कोप देखकर तथा कुलक्षय का शाप सुनकर उन यदुकुमारों
को बड़ा खेद हुआ और वे भय से काँपने लगे।
किं कृतं मन्दभाग्यैर्नः किं वदिष्यन्ति नो जनाः।
इति विह्वलिता गेहानादायं मुसलं ययुः॥ १८॥
हम भाग्यहीन हैं, हमने व्यर्थ ही कपटपूर्वक उन महान ऋषियों को चिढ़ाया और अपने ही हाथ से अपना
घात कर कपट के द्वारा घर में कुलक्षय ले आये। अब नगरवासी हमें क्या कहेंगे? वे कहेंगे इन ब्राह्मणों का
छल करने की क्या आवश्यकता थी? इसलिए चिंताक्रांत हो कर, म्लान मुख से वे सब उस मूसल को लेकर घर
आ गये।
तच्चोपनीय सदसि परिम्लानमुखश्रियः।
राज्ञ आवेदयाञ्चक्रुः सर्वयादवसन्निधौ ॥ १९॥
सभा में वसुदेव, उग्रसेन, बलराम, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न आदि अनेक यादव बैठे थे, केवल श्रीकृष्ण वहाँ नहीं
था। ऐसी उस सभा में सांब आदि सभी कुमार आये और लोहे का वह मूसल सामने रखकर मुँह छोटा कर पूरा
वृत्तांत सुनाने लगे।
श्रुत्वाऽमोघं ब्रह्मशापं दृष्ट्वा च मुसलं नृप।
विस्मिता भयसंत्रस्ता बभूवुर्द्वार्रकौकसः ॥ २० ॥
श्लोक २०—ब्राह्मणों का हमारे ऊपर भयंकर कोप हुआ है यह देखकर यादव भी भय से काँपने लगे।