दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
सम्पादकीय
नवीन प्रकाशनों की बाढ़ में, लोकेषणा के व्यामोह के
कारणों से देवी-जागरणों की कलियुगी भक्तों की अपार भीड़ का
ऐसा सामुद्रिक ज्वार उमड़ रहा है जिसमें अमूल्य रत्न विलुप्त
हो जाते हैं। यह भी सर्व विदित है कि अथाह जल राशि का
स्वामी होने पर भी सागर किसी की पिपासा शान्त करने में
अक्षम है; क्योंकि उसके क्षार जल में यह क्षमता है ही नहीं
समुद्र की महत्ता के कारण तो दूसरे ही हैं। इस कलिकाल में
विद्वानों, संतों, महात्माओं का भी अभाव नहीं है और एक से एक
बढ़कर सिद्ध महात्मा अपनी सिद्धियों के चमत्कार से अथवा प्रारब्ध
से या वैयक्तिक कौशल से राजकीय प्रश्रय से अभिवन्दित तथा
अर्चित होते हुए उच्च गद्दियों पर आसीन हैं। उद्योग-पतियों,
नेताओं तथा मंत्रियों के भी अलग-अलग स्वामी हैं। ऐसी स्थिति
में जन-साधारण तथा स्वाध्यायी विद्वानों की पहुँच सन्तों,
महात्माओं के चरणों तक असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है।
इस कथन से मेरा यह प्रयोजन नहीं है कि सन्तों या महात्माओं
की उदारता, निष्कामिता या विद्वता अथवा निरीहता एवं
उन्मुक्तता का अभाव है। भला वसुन्धरा-रत्नगर्भा माँ भारती
ऐसे महामना उदार पुत्रों से विहीन कैसे हो सकती है ? आज
भी वह इस गरिमा से परिपूर्ण रूपेण मंडित है। ऐसे ही
महिमान्वित सन्त प्रवरों में से एक श्रद्धेय आचार्य भागवतानन्द
जी सरस्वती माँ सरस्वती के वरद-पुत्र हैं, जिनका करुणार्द्र हृदय
सदैव 'सर्वत्र-सर्व-जन-हिताय' द्रवित रहता है।
“श्री दुर्गा-सप्तशती पारिजात सौरभ” प्रस्तुत ग्रन्थ महाराज
श्री के माँ पराम्बा के प्रेमपूरित करुणाद्राप्लावित हृदय-निसृत
भक्तिरसामृत वर्षण है; जो सामान्यजन से लेकर मूर्धन्य विद्वद्वृंद
के लिए समान रूप से स्पृहणीय तथा कल्याण करणीय है। ग्रन्थ
[ xiii ]
को उपादेयता एवं उपयोगिता तो सुधीजन ही बता सकेंगे किन्तु
सौन्दर्य लहरी, दुर्गा-महिमा, षट्चक्रनिरुपण, वरिवर्या रहस्य
आदि अनेक ग्रन्थों के जीवन-ग्राह्य बोध का समावेश ग्रन्थ का
एक बार सिंहावलोकन मात्र से दृष्टिगोचर कर सकेंगे । इस तथ्य
को किसी प्रकार नकारा नहीं जा सकता । जिन्होंने महाराज श्री
के प्रवचनामृत का पान किया है वे भली-भाँति जानते हैं कि कम
से कम समय में कम से कम शब्दों में अधिकतम दुरुहज्ञान को
सहज आत्मीय करा देने की कला में वे सिद्ध-हस्त हैं; 'भागवत
पारिजात' तथा 'मानस-पारिजात' इसके ज्वलंत दृष्टांत हैं ।
लोकप्रियता इससे अधिक क्या होगी कि एक ही वर्ष में 'भागवत
पारिजात' की एक प्रति भी अवशेष नहीं रही । तब उनके समस्त
ज्ञान को लिपिबद्ध करने की क्षमता कैसे हो सकती है ? दूसरे टेप
निर्जीव से चेतनानंद की अभिव्यक्ति और वह भी सजीवता-सम्पन्न
उल्लासमय कैसे बनी, यह आचार्य श्री का आशीष ही है ।
इस सम्बन्ध में मेरा वैयक्तिक यही निवेदन है कि श्रद्धा के
साथ सन् १६४४ से प्रत्येक नवरात्र में 'दुर्गा-सप्तशती' का पाठ
कर्म-काण्ड के विधि विधान के साथ करते रहने पर भी सहज
अनुराग और जीवन-दर्शन में बदलाव नहीं आया था जो लिपिबद्ध
करने पर पराम्बा के साथ नैसर्गिक आत्मीयता और जीवन-
दर्शन की व्यावहारिकता का बोध हुआ, वह अपने आप में स्वयं
एक महती उपलब्धि है । अतः ग्रन्थ प्रत्येक जन-जन के लिए
अत्यन्त अपेक्षणीय है ।
अन्त में इस ग्रन्थ में जो पद, वाक्य, विन्यास अथवा
वर्तनी की अशुद्धियाँ हैं; वे सब मेरी भूलें हैं, उनके लिये मैं
सभी से क्षमा-याचना करते हुए पुनश्च निवेदन करता हूँ कि
छिलके के कारण जैसे आप केले का त्याग नहीं करते, अपितु
उसके गुणों के कारण उसका विविध रूपों में प्रयोग करते हैं
उसी प्रकार इस ग्रन्थ का अवश्य स्वाध्याय कर कामना-सिद्धि
कल्पतरु को न भूलें ।
[ xiv ]
ग्रन्थ की साज-सज्जा, मुद्रण की सुन्दरता, तन्त्रों के
ब्लाक और यहाँ तक कि प्रूफों के संशोधन में सहयोग और
उचित स्थलों के संयोजन में प्रेस के प्रबन्धक एवं स्वामी पुनीत
शादमां का हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने अपनी अत्यधिक
व्यस्तता वैविध्य बहुमुखी विस्तृतता के होते हुए भी इस कार्य-
सम्पन्नता में अभिरुचि ली। यद्यपि इससे पूर्व में मैं श्री पुनीत
जी से परिचित नहीं था, परिचय का श्रेय श्री वेद प्रकाश जी
(बिजली वाले) महामन्त्री, औघड़नाथ मन्दिर समिति काली
पलटन मेरठ कैन्ट को है जिन्होंने यह प्रकाशित होने के लिए
दी। धर्म के प्रचार-प्रसार में संलग्न, साधु-सन्तों, महात्माओं
के अनन्य प्रेमी भक्त, उत्साही युवक पुनीत जी से प्रकाशन-
विलम्ब के कारण कभी-कभी खीज भी हुई, किन्तु उनकी मन्द
मुसकान और विनम्र स्वभाव में यह सब बालू रेत की भित्ति
बनकर रह गई। अतः उनसे यह आग्रह करते हुए कि समय की
महत्ता को समझते हुये ही धर्मानुष्ठानों में द्विगुणित उत्साह के
साथ भाग लेकर यशस्वी बनें। यही शुभ कामना है। और
यही माँ जगदम्बा से प्रार्थना भी।
इसमें जो है, जैसा है वह सब गुरु चरणों का विद्वच्चरण-
चञ्चरीक प्रसाद और सब त्रुटियाँ मेरी हैं।
एस० एस० त्रिवेदी
ए-३१, शिवाजी कालोनी
मेरठ कैण्ट।
[ xv ]
अनुक्रमणिका
प्रकाशकीय iii
आभार iv
सम्मति vi
आमुख vii
सम्पादकीय xiii
१ द्वार प्रवेश १
२ दुर्गा-सप्तशती १२
३ अर्गला २१
४ कीलकम् २४
५ रात्रि-सूक्त ३१
६ प्रथमोऽध्यायः ३२
७ ध्यानम् ३७
८ मध्यम चरित्र-द्वितीयोऽध्यायः ६६
६ तृतीयोऽध्यायः ७७
१० चतुर्थोऽध्यायः ८६
११ पंचमोऽध्यायः ६४
१२ षष्ठोऽध्यायः १०१
१३ सप्तमोऽध्यायः १०३
१४ अष्टमोऽध्यायः १०५
१५ नवमोऽध्यायः १०८
१६ दशमोऽध्यायः १११
१७ एकदशोऽध्यायः ११५
१८ द्वादशोऽध्यायः ११६
१६ त्रयोदशोऽध्यायः १२१
२० उपसंहार १२३
२१ क्षमा प्रार्थना १२५
२२ दुर्गाद्वात्रिंशन्नाममाला १२६
२३ देव्य पराधक्षमापन स्तोत्र १२६
२४ श्री दुर्गा जी की आरती १२८
२५ बगला अष्टोत्तरनामस्तोत्रम् १२६
२६ सप्तश्लोकी दुर्गा १३०
भगवती पराम्बा माँ बगुलामुखी
(पीताम्बरा पीठ, दतिया)
माँ का तुमको प्यार मिला है ।
मत समझो तुम हो एकाकी,
नहीं कोई जग में अवलम्ब मिला है
जब-जब ध्यान किया तुमने,
उसका ही सार-सम्भाल मिला है ।
माँ का तुमको प्यार मिला है ॥
सरिता के कल कल निनाद में
और सुमनों के मधुर हास में
भ्रमरों के मधुरिम गुञ्जन में
उसका ही स्वर साकार मिला है। माँ का तुमको.........।
जग-वैभव के काम भोग में
यतियों के अविराम योग में
प्रियतम के दारुण वियोग में
उसका ही आधार मिला है ॥ माँ का तुमको...........।
ज्ञानी की गहन चाह में
दीनों की करुण आह में
भ्रमितों की विषम राह में
वह जीवन पतवार मिला है ॥ माँ का तुमको.........।
तन्त्र-मन्त्र के गहन विज्ञान में
दुःख दैन्य के विषम विधान में
शान्ति सौम्य सँयुक्त विहान में
उसका दिव्य विचार मिला है ॥ माँ का तुमको.........।
—कुमारी रमा मिश्रा
जिन चरणों से पाया प्रकाश
स्नेहिल नयनों से सुधाधार
वे ही गुरुदेव कृपा आगार
उनको सादर अर्पित साभार
—आचार्य प्रवक्ता
भागवतानन्द
राष्ट्रगुरु पूज्य स्वामी जी
पीताम्बरापीठ, दतिया
गुरु-वन्दना
कैसा अनुपम जादू है ?
गुरुदेव तुम्हारे चरणों में ।
जग के सब रस फीके पाये
जब रस आया इन चरणों में ॥ १
दुनियाँ के विषयों में भटकी
विष ही उन सब में पाया ।
सुख-शान्ति नहीं लव-लेश मिली
घबराकर जग को ठुकराया ॥
प्रभु कृपा हुई गुरुदेव मिले
लगी लगन तुम्हारे चरणों में। २
गुरु-ज्ञान की पावन गंगा में,
जब मुँह धोया तो नेत्र खुले ॥
मोह-मिटा स्वप्निल जग का
कलुषित मन के सब पाप धुले ।
क्षण - भंगुर जग छूट गया
सुधा मिली गुरु के चरणों में ॥ ३
ममता के रिश्ते नाते छोड़े,
घर बाहर से मुख मोड़ लिया
मन-बुद्धि-चित अहंकार त्याग-
गुरु चरणों से नाता जोड़ लिया ॥
अब जीवन ज्योति मिली गुरु चरणों में
कैसा अद्भुत जादू है ?
गुरुदेव तुम्हारे चरणों में ॥ ४
—कुमारी रमा मिश्रा
पूज्य स्वामी श्री आचार्य श्री भागवतानन्द जी
सरस्वती
इस पृष्ठ पर कोई पठनीय पाठ मुद्रित नहीं है (यह एक रिक्त पृष्ठ/फ्लाईलीफ है, जिस पर केवल पिछले पृष्ठ की बहुत हल्की और अस्पष्ट छाया मात्र दिखाई दे रही है)। अत: इसका लिप्यंतरण संभव नहीं है।
श्रीहरिः
पराम्बायै नमः
श्री दुर्गा सप्तशती
पारिजात सौरभ
द्वार - प्रवेश
जपो जल्पं शिल्पं, सकलमपि मुद्रा विरचनम् ।
गतिः प्रादक्षिण्यं भ्रमणमशनाद्याहुति विधिः ॥
प्रणामः संवेश सुखमखिलमात्मार्पण दशा ।
सपर्या पर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम् ॥ सौ० ल० २७ ॥
हे करुणामयी माँ ! मैं आपकी पूजा उपर्युक्त क्रम से कर
रहा हूँ, क्योंकि आपका एक अबोध बालक यही सहज रूप में
कर सकता है :—
मेरी बातचीत ही आपका जप है, मुद्राओं का रूप शिल्प
है, चलना - फिरना ही प्रदक्षिणा है, खाना - पीना - भोजन आदि
करना आपके लिए हवन है और शयन करना ही आपके लिए
प्रणाम है । यही सदाचार - पूजा आप सदा स्वीकार करें यही
सम्पराय है । सम्पराय का स्पष्टीकरण कर लेना अनिवार्य है :–
सम्पराय—सम्यक् परे काले देह पतनादूर्ध्वं यते - गम्यते,
इति सम्परायः परलोकः तत्प्राप्ति योजना साधन विशेषः
सम्परायः ।
अर्थात् परलोक की प्राप्ति का उत्तम साधन ‘सम्पराय’
है । नारायण, नारायण, नारायण, नारायण ! नमो महद्भ्यः
ब्राह्मणेभ्यो नमो नमः । परमात्मा स्वयं प्रेम स्वरूप है निर्विकार,
निराकार है, तथापि करुणावश द्रवित होकर ब्रह्मादि रूपों द्वारा
संसार का सृजन, पालन तथा संहार करता रहता है । इसके मूर्त
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ २
एवं अमूर्त दोनों रूप वृहदारण्यक - उपनिषद् में स्पष्ट हैं । मूर्त
रूप में वह पराशक्ति ही है। उसी की करुणा से वही निराकार
परमात्मा साकार होकर लीला किया करते हैं ।
इसका प्रमाण लोकवत्तु लीला कैवल्यम् (ब्रह्मसूत्र) में
भी है । वही कभी राम, कभी घनश्याम बनकर दुष्टों का दलन
एवं भक्त - जनों का पालन करते हैं ।
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृति रष्टधा ।। गीता अध्याय ७/४
मूर्त रूप में—भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन,
बुद्धि और अहंकार ये आठ प्रकार की प्रकृति जो गीता में कही
गई है, वही महाकवि कालिदास ने अपनी विश्व-विश्रुत कीर्ति
प्रसारिणी कृति 'अभिज्ञान शाकुन्तलम्' नाटक के मङ्गलाचरण
के इस श्लोक में इस प्रकार बतलाई है--
या सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री
ये द्वे कालं विधत्तः श्रुति विषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्
यामाहुः सर्वबीज प्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः
प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभि खतु वस्ताभिरष्टाभिरीशः ।। अभि.शा. १
गीता में कथित अष्टधा-आठ प्रकार की प्रकृति र-सूर्य,
चन्द्र तथा यजमान रूप तीन का अन्तर है, वही इन तीनों के
स्थान पर मन, बुद्धि, अहंकार है—
परमात्मा का यह मूर्तरूप भक्तों के प्रति अनुग्रह करता है
और अमूर्त स्वरूप आत्मानन्द में स्थित रहता है । "एको देवः
सर्वभूतेषु गूढ़ः" इस श्रुति वचन के अनुसार प्राणी मात्र में वही
एक परमात्मा है । इस निश्चय में समर्थ केवल एक मनुष्य
योनि है । मनुष्य ही अपने आत्मस्वरूप को पहचानने में सक्षम
है । यह विचित्र जगत् परमात्मा का ही तो रूप है, किन्तु इसका
सृजन शक्ति की कृपा से ही होता है । यह शक्ति सर्वत्र सतत्
अबाध गति से अपना कार्य कर रही है । पृथ्वी में धारणा; जल
३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
में आप्यायन, अग्नि में दाहिका, वायु में गति, आकाश में व्यापन
तथा चेतन प्राणी में बुद्धि शक्ति रूप में वही पराशक्ति है।
भगवान् रेणुकाचार्य जगत् सृष्टि के प्रसङ्ग में परमात्मा को
सर्वज्ञ, सर्वशक्ति कहते हैं। यदि उनमें ऐसी शक्ति न होती, तो
इस चित्र-विचित्र शक्तियों से परिपूरित जगत् का निर्माण वे
कैसे कर पाते ? अवएव परमात्मा शक्ति-विशिष्ट ही है। यह
सिद्धान्त आचार्य प्रवर ने त्रेता-युग में निश्चित किया था।
श्वेताश्वतर श्रुति असंदिग्ध रूप से परमात्मा की विविध
पराशक्तियों का वर्णन करती है : 'स्वाभाविकी ज्ञान बल क्रिया
च' इस मंत्र के तात्पर्य का पर्यालोचन करने पर स्पष्ट हो जाता
है कि परमात्मा में शक्ति स्वभाव सिद्ध है। ज्ञान, बल, क्रिया
आदि रुप से उसके विविध प्रकार हैं। मन्त्राक्षरों में ही
'स्वाभाविकी' पद का प्रयोग शक्ति की नित्यता का घण्टा घोष
है। इसी मन्त्र के साथ दूसरी श्रुति 'प्रज्ञा च तस्मात्प्रसृता
पुराणी' कहकर सूचित करती है कि अनादि सिद्धा प्रज्ञाचिच्छक्ति
परमात्मा से ही प्रकट हुई है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि
परमात्मा ही सर्व-शक्तियों का उद्गम एवं विकास स्रोत है।
यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता (२.७.६) में 'स ह स्वस्रा-
म्बिकया' वाक्य परमात्मा की नित्य शक्ति का ही द्योतक है।
तै० सं० (४.५,८) में सोम पद का अर्थ “उमा सहित" ही है।
परमात्मा में शक्ति की नित्यता और समवाय सम्बन्ध से उसका
होना स्वतः सिद्ध है। समस्त लोक के निर्माण में शक्ति समवा-
यिनी है। कार्य में कारण का—जैसे घट में मृत्तिका का नित्य
सम्बद्ध होना 'समवाय' है। शक्ति का समवाय सम्बन्ध से रहना
और परमेश्वर के स्वरूप का अनुकरण करना सप्रमाण ही है।
श्री रेणुकाचार्य ने उत्तम रीति से इसका उपपादन किया है।
सिद्धान्तः- शिखामणि में इसका यह स्वरुप है—
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ४
यथा चन्द्रे स्थिरा ज्योत्स्ना विश्ववस्तु प्रकाशिनी ।
तथा शक्ति तिमिराख्या प्रकाशे ब्रह्मणि स्थिरा ।
अन्तः करण रूपेण जगदङ्कूर रूपतः
यस्मिन् विभाति चिच्छक्तिर्ब्रह्मभूतः स उच्यते ॥
अर्थात् समस्त वस्तुओं को प्रकाशित करने वाली चन्द्रिका
जैसे चन्द्रमा में स्थिर रहती है वैसे ही सकल चराचर पदार्थ-
प्रकाशिका की विमर्श-शक्ति प्रकाश स्वरुप परमात्मा में स्थिर
रहती है । यह शक्ति परमात्मा में मूलाहङ्कार एवं सूक्ष्म जगत् के
रुप में विराजमान हैं । इसी को चिच्छक्ति या विमर्श शक्ति कहते
हैं । ऐसे शक्ति विशिष्ट परमात्मा को ही भवरोग निवारक होने
के कारण रुद्र, सर्व मंगलकारी होने से शिव और विश्व - व्यापी
होने के कारण परब्रह्म कहा जाता है । यही सच्चिदानन्द
स्वरुपिणी चिच्छक्ति है । परमात्मा के विनोद - काल में चित्र -
विचित्र जगत् के निर्माणार्थ त्रिगुणात्मिका माया के नाम से यही
प्रसिद्ध है ।
‘म - शिवं अयति’ माया - प्रकृति, मायी महेश्वर है ।
म शिवं परमं ब्रह्म प्राप्नोतीति स्वभावतः ।
मायेति प्रोच्यते लोके ब्रह्म निष्ठा सनातनी (सिद्धागम)
यही शक्ति विशिष्ट परमात्मा ‘बहु स्याम’ ‘प्रजायै ऐक्षत्’
अनेक होऊँ की इच्छा करते हैं, तभी सृष्टि होती है । अतः
जगज्जननी जगन्माता कहलाती है ।
शक्ति उपासना भी अपौरुषेय वेद से ही प्राप्त है—देवी
सूक्त में कीर्ति, बुद्धि, लज्जा आदि रूपों में इसका प्रतिपादन
किया है । वेद में—अजामेका लोहित शुक्ल कृष्णा तथा, या
प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी गुहां प्रविश्य तिष्ठति या भूते
भिर्व्यजायत एतद् वै तद् (क० २/१/६१) देवतामयी अदिति
प्रकट होकर बुद्धि में प्रविष्ट होती है, वही पञ्चभूतों में
दीखती है ।
५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
पुराणों में सीता, लक्ष्मी, राधा, उमा आदि नामों से यही
शक्ति अभिहित है जो 'केनोपनिषद्' के यक्ष प्रसङ्ग में ब्रह्म-विद्या
होकर देवों को उपदेश देती है । ऋग्वेद में यही वाक्-शक्ति है ।
सांख्य-दर्शन में इसी का नाम 'अमृता' है । कहा है—पुरुषे षोडश
कले तामाहुमृतां कलाम् ।'
ऋषियों के विचार से प्रतिपाद्य वस्तु का प्रतिपादन
पुराण, श्रुति, ध्वनि, तेज, प्रभा इन पांच प्रकार से होता है ।
इसी क्रम से उनका वर्णन भी है । इसी देवी से अवतारों का
प्राकट्य इस क्रम से प्रतिपादित है । देवी के दायें हाथ के अंगूठे
से मत्स्य, तर्जनी से कूर्म, मध्यमा से वराह, अनामिका से नृसिंह,
कनिष्ठा से वामन और बायें हाथ के अंगूठे से परशुराम, तर्जनी
से राम, मध्यमा से कृष्ण, अनामिका से बुद्ध जी प्रकट हुये हैं ।
कश्मीर की पावन कन्दराओं से लेकर कन्या कुमारी तक,
कच्छ से लेकर कामाख्या तक सम्पूर्ण भारत में इस पराम्बा
शक्ति की अनेक स्थलों पर ख्याति प्राप्त सिद्ध पीठें हैं, जहाँ माँ
के परम उपासक उपासना के माध्यम से अभीष्ट प्राप्त करते हैं
ये सिद्ध पीठें सर्वत्र हैं जिनमें काशी, काञ्ची, मलयगिरि, विन्ध्य
मालावार, मालवा, गुजरात, दतिया, प्रयाग, बंगाल तथा नेपाल
कामाख्या आदि में विशेष प्रसिद्ध हैं ।
यही शक्ति दस महा विद्याओं के रूप में वर्णित है—
काली तारा महाविद्या षोडशी भुवनेश्वरी ।
भैरवी छिन्न मस्ता च विद्या धूमावती तथा ॥
बगला सिद्ध विद्या च मातंगी कमलात्मिका ।
एतादश महा विद्या *सर्व तन्त्रेषु गोपिता ॥
- (सिद्ध विद्या प्रकीर्तिता पाठान्तर)
इनमें से किसी एक की उपासना में दीक्षित होकर ही
आराधना की जाती है ।
समस्त शाक्त - उपासना का लक्ष्य 'सर्वं खलु, इदं ब्रह्म'
का ज्ञान ही है ।” इसी की सिद्धि हेतु 'दुर्गा-पूजा' महोत्सव क
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६
आयोजन होता है । यही दुर्गा-पूजा, दुर्गा सप्तशती में कही गई
है । एनर्जी पावर कहकर वैज्ञानिक भी इसे मानते हैं, किन्तु कुछ
कौल मतावलम्बियों के द्वारा आचारहीन-कृत्य किये जाने के
कारण शाक्त लोग समाज में बदनाम भी हुए हैं वस्तुतः यह
उनकी अल्पज्ञता अर्थवाद की अनर्थता के कारण हुई है । किस
शब्द का कहाँ क्या अर्थ होता है ? इस ज्ञान के अभाव में बड़े-
बड़े अनर्थ हुए हैं । अतः इससे बचने के लिए अर्थ समझ लेना
अनिवार्य है । जैसे देवी बलि से प्रसन्न होती है । लोगों ने
इसका अर्थ पशु-बलि ही नहीं, अपितु नर-बलि देने जैसे पाशविक
कृत्य करने का अर्थ ले लिया है, जबकि इस 'बलि' शब्द का
अर्थ स्वयं देवी जी ने स्पष्ट किया है जो दृष्टव्य ही नहीं; अपितु
ध्यातव्य भी है—'काम क्रोधौ द्वौ पशू तावेव बलिमर्पयेत्' अर्थात्
काम - क्रोध दोनों पशु है । मनुष्य जब इन दोनों को सर्वथा नष्ट
करता है, तभी देवी प्रसन्न होती हैं । कुछ दो - चार शब्दों के
उदाहरण प्रस्तुत करना यहाँ प्रासङ्गिक ही नहीं, अपितु अनिवार्य
भी है जिससे सुधीजन तो लाभान्वित होंगे ही, सामान्य जन भी
अनावश्यक पाप कर्म से वञ्चित होकर धर्म लाभ उठावेंगे ।
अब आप 'अजा' शब्द को लीजिए—अजा अविद्या को
कहते हैं । मूर्खों ने अविद्या का संहार करने की अपेक्षा बकरों
की बलि चढ़ाना प्रारंभ कर दिया । इसी प्रकार—मद्य, मांस,
मत्स्य, मैथुन और मुद्रा ये पञ्च मकार बड़े प्रसिद्ध हैं, जिनका
अर्थ न समझ कर अज्ञ तथा इन्द्रिय - लोलुप जनों ने बड़ा ही
दुरुपयोग किया है । वस्तुतः सन्त योगी जन ही इन गुत्थियों को
सुलझा कर मार्ग - दर्शन करते हैं । अतः संक्षेपतः इनका अर्थ
भी देखिए—
१. मद्य (मदिरा)—आत्मानन्द की परम अनुभूति में जो
(भूमा स्थिति) मस्ती आती है उसी को 'मदिरा' कहते हैं । जैसे
भरी है सहस्रार पद्म-रूपी भाजन में, पली है जो चन्द्र की कला
७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
सुधा के स्रव से ? कुण्डलिनी जागरण और अमृत रस या सोम
पान ही मद्य के लिये प्रयुक्त होता है ।
२. मांस-काम, क्रोध, लोभ मोह आदि पशु वृंद हनै, धैर्य
से विवेक रूपी खड्ग चलाय के' इस अर्थ में मांस शब्द का प्रयोग
हुआ है । मांस, उड़द को भी कहते हैं । सूरदास ने अपने कूट
पद (हरि-आहार चलिजात) में इसका अर्थ मांस (मास) महीना
अर्थात् अवधि के रूप में भी किया है ।
३. मत्स्य-विषय विराग रूपी बागुरा बिछाइ दैकै, धीवर
कृती की प्रतिकृति को अनुसरै । द्वेष-मद, मान, दम्भ, मत्सर पशु-
द्वय आदि मीन मति वृद्ध विद्या सहित मेलै धरै । अर्थात् विषय
रूपी जल में आसक्त इन्द्रिय रूपी मछलियों को अलग करना
है ।
४. मैथुन-
पर पद को पहुंची हैं सूक्ष्म रूप नाड़िका जो,
सुषुम्ना है नाम वाको, सुन्दरी समझिये ।
चन्द्र-सूर्य योग में उसी के साथ संग करि,
सुन्दर सब भूषण ले श्यामा को साजिये ।'
अर्थात् यह दिव्य नाड़ी सुषुम्ना का प्रसंग है । जिसका
इडा-पिंगला (सूर्य-चंद्र) नाड़ियों के साथ समागम है ।
५. मुद्रा-
आशा अरु तृष्णा, भय, घृणा, लज्जा, कोप, जुगुप्सा
(घृणा) ये अष्ट भारी कष्ट कारी हैं । वृक्ष रूपी पावक में आठों
को पकायदे वै, तांत्रिक क्रिया कलाप के जो अधिकारी हैं ।"
भावानुकारिणी आकृति - विकृति ही मुद्रायें हैं । गायत्री - जप के
पूर्वापर में भी मुद्रायें की जाती हैं। जिज्ञासु जन इन पाँचों मकारों
के अर्थ 'दुर्गा-महिमा' ग्रन्थ में विस्तार से देख सकते हैं ।
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ८
“वरिवर्या रहस्य” की टीका में पूज्य चरण स्वामी जी
महाराज (दतिया) ने पञ्च मकारों का अर्थ विस्तार से इस
प्रकार समझाया है ।
(१) मत्स्य-
गङ्गा यमुनयोर्मध्ये द्वौ मत्स्यौ चरतः सदा ।
तौ मत्स्यौ भक्षयेद् यस्तु स भवेन्मत्स्य साधकः
इडा भागीरथी गङ्गा पिङ्गला यमुना नदी ।
तयोर्मध्यगा नाड़ी सुषम्णास्था सरस्वती,
त्रिवेणी संगमो यत्र तीर्थ-राजः स उच्यते ।
क्रमशः इडा, पिङ्गला. सुषुम्ना का मिलन ही गंगा-यमुना-
सरस्वती के मिलन का तीर्थराज प्रयाग है । इन दोनों नाड़ियों
की साधना ही मत्स्य साधना है, मत्स्य भक्षण नहीं ।
(२) मुद्रा-
सत्सङ्गेन भवेन्मुक्तिरसत्सङ्गेषु बन्धनम् ।
असत्सङ्ग मुद्रणं यस्तु तन्मुद्रा परिकीर्तिता ॥
सत्संग से चिर शान्ति, स्वाधीनता और रसभरा जीवन
मिलता है तथा असत्संग से बन्धन । अतः कुसंग का त्याग तथा
सत्संग का सेवन ही मुद्रा सेवन है ।
(३) मैथुन-
इड़ा पिङ्गल्योः प्राणान् सुषम्नायां प्रवर्तयेत् ।
सुषुम्ना शक्ति रुद्दिष्टा जीवोऽयं तु परः शिवः ॥
तयोस्तु सङ्गमे देवैः सुरतं नाम कीर्तितम् ।
अर्थात् इडा - पिङ्गला नाड़ियों के माध्यम से प्राणों को
सुषुम्ना में प्रवर्तन करने वाला प्राणी शिवत्व प्राप्त कर लेता
है । इन दोनों के साथ सुषुम्ना के मिलन को देवों ने 'सुरत'
मैथुन कहा है । इसे सहज ही यूँ भी कह सकते हैं कि दायीं
नासिका में (सूर्य) 'पिगंला', बायीं नासिका में (चन्द्र) 'इडा' है।
६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
गुरुजनों के सान्निध्य में इन दोनों को सुषुम्ना में संगत करना
मैथुन है, दुराचार साधन करना नहीं । इस कथन की पुष्टि
निम्न श्लोक से भी होती है ।
पर द्रव्येषु योऽन्धः, पर स्त्रीषु नपुंसकः ।
परापवादे यो मूकः सर्वदा विजितेन्द्रियः ।
उक्त श्लोक में पर द्रव्यों के प्रति उदासीन, दूसरी स्त्रियों
के प्रति नपुंसकत्व तथा पर निन्दा के प्रकरण में मौन धारण
करने वाले जितेन्द्रिय पुरुष ही महा - महिम एवं गौरवशाली हैं
मत्स्य, मुद्रा, मैथुन, मदिरा, मांसाहारी नहीं ।
४. मांस-५. मदिरा-इन दोनों को आप पूर्व वर्णित रूप
में ही ग्रहण करें ।
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो गया कि काम, क्रोधादि
की बलि देना तथाकथित पञ्च मकारों का सेवन करना साधना
है । इसी से तंत्र-साधना कठिन मानी गई है । जानकार तत्त्वज्ञ
महा पुरुषों की सेवा एवं आराधना वेद - भगवान् में भी प्रति -
पादित है । उनकी सेवा से ज्ञान की प्राप्ति एवं आनन्द की
उपलब्धि होती है । इनकी महिमा देखिए-
कामान् यः कामयते मन्यमानः, सः कामभिर्जायते तत्र तत्र ।
पर्याप्त कामस्य कृतात्मनस्त्विहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥
अर्थात् कामनाओं की पूर्ति हेतु प्रयत्न करने वालों को
बार - बार जन्म लेना पड़ता है किन्तु आप्त काम अनपेक्ष भगवद्
भक्तों को जीव-मुक्ति का आनन्द यहीं मिल जाता है ।
यं यं लोकं मनसा संविभाति,
विशुद्ध सत्वः कामयते यांश्चकामान् ।
तं तं लोकं जयते तांश्च,
कामास्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद्भूतिकामः ॥
ऐसे महापुरुषों के संकल्प स्वयं सिद्ध होते हैं । जो लोग
उनकी सेवा करते हैं, उन्हें भी सब कुछ मिल जाता है ।
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०
इस प्रकार सत्सङ्ग से, पञ्च मकार सेवन से सत्व गुण की
वृद्धिहोती है । त्रिगुणमयी प्रकृति से परे परम तत्व की उपलब्धि
आत्मस्वरूप में होती है । प्रत्येक जीव में ईश्वर ने दिव्य गुण
दिये हैं, उन्हें प्रकट करना ही पुरुषार्थ है । शरीर क्षेत्र (खेत) है
'इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते' गीता (१३) । इसमें
दोनों प्रवृत्तियाँ हैं—सत्य क्षमादि सात्विकी तथा काम - क्रोधादि
तामसी । ये ही कभी धर्मराज - दुर्योधन तो कभी राम - रावण
कभी कृष्ण-कंस और कभी महिषासुर, चण्ड-मुण्डादि कह दिये
जाते हैं । देवासुर संग्राम अपने भीतर देखना ही साधना है,
आसुरी प्रवृत्तियों को जीतना ही पुरुषार्थ है ।
सच्चे साधक को सदैव निन्दा से दूर रहना अपेक्षित है ।
उसे किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिए । विशेषतः उसमें भी
'स्त्रियं न निन्देत' के अनुसार स्त्रियों की तो कदापि निन्दा न
करें, क्योंकि नारी तो सभी पराम्बा स्वरूपा ही हैं । तभी
'या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता' कहा है । इसी आचार
से माँ के किसी निम्नलिखित रूप का ध्यान करके लक्ष्य-सिद्धि
संभव है, क्योंकि यही आचार पुरुषार्थ है ।
माँ के ये मुख्य आठ रूप ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी,
वैष्णवीं, वाराही, नारंसिही, ऐन्द्री, चामुण्डा नामों से उल्लिखित
हैं, ये आठ शक्तियों के रूप में प्रसिद्ध हैं । दृष्टान्त के रूप में
'चामुण्डा' को ही ले लीजिए । 'चामुण्डा' आठवी शक्ति का नाम
चामुण्डा है । प्रवृत्ति का अर्थ चण्ड तथा निवृत्ति का अर्थ मुण्ड
है । ये दोनों भाई हैं जो काम और क्रोध के रूप में भी माने
गये हैं । पाणिनि जी की 'चडि कोपे तथा मुडि खण्डने धातुओं
से इसकी निष्पत्ति हुई है ।' इसकी संहारक शक्ति का नाम ही
चामुण्डा है, जो स्वयं प्रकाशमान हैं । वे किसी आधार को लेकर
प्रकाशित नहीं हैं । अतः इनका कोई वाहन भी नहीं बतलाया
गया है । इस पराम्बा शक्ति के पाँच कार्य बताये गये हैं ।