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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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को उपादेयता एवं उपयोगिता तो सुधीजन ही बता सकेंगे किन्तु
सौन्दर्य लहरी, दुर्गा-महिमा, षट्चक्रनिरुपण, वरिवर्या रहस्य
आदि अनेक ग्रन्थों के जीवन-ग्राह्य बोध का समावेश ग्रन्थ का
एक बार सिंहावलोकन मात्र से दृष्टिगोचर कर सकेंगे । इस तथ्य
को किसी प्रकार नकारा नहीं जा सकता । जिन्होंने महाराज श्री
के प्रवचनामृत का पान किया है वे भली-भाँति जानते हैं कि कम
से कम समय में कम से कम शब्दों में अधिकतम दुरुहज्ञान को
सहज आत्मीय करा देने की कला में वे सिद्ध-हस्त हैं; 'भागवत
पारिजात' तथा 'मानस-पारिजात' इसके ज्वलंत दृष्टांत हैं ।
लोकप्रियता इससे अधिक क्या होगी कि एक ही वर्ष में 'भागवत
पारिजात' की एक प्रति भी अवशेष नहीं रही । तब उनके समस्त
ज्ञान को लिपिबद्ध करने की क्षमता कैसे हो सकती है ? दूसरे टेप
निर्जीव से चेतनानंद की अभिव्यक्ति और वह भी सजीवता-सम्पन्न
उल्लासमय कैसे बनी, यह आचार्य श्री का आशीष ही है ।
इस सम्बन्ध में मेरा वैयक्तिक यही निवेदन है कि श्रद्धा के
साथ सन् १६४४ से प्रत्येक नवरात्र में 'दुर्गा-सप्तशती' का पाठ
कर्म-काण्ड के विधि विधान के साथ करते रहने पर भी सहज
अनुराग और जीवन-दर्शन में बदलाव नहीं आया था जो लिपिबद्ध
करने पर पराम्बा के साथ नैसर्गिक आत्मीयता और जीवन-
दर्शन की व्यावहारिकता का बोध हुआ, वह अपने आप में स्वयं
एक महती उपलब्धि है । अतः ग्रन्थ प्रत्येक जन-जन के लिए
अत्यन्त अपेक्षणीय है ।
अन्त में इस ग्रन्थ में जो पद, वाक्य, विन्यास अथवा
वर्तनी की अशुद्धियाँ हैं; वे सब मेरी भूलें हैं, उनके लिये मैं
सभी से क्षमा-याचना करते हुए पुनश्च निवेदन करता हूँ कि
छिलके के कारण जैसे आप केले का त्याग नहीं करते, अपितु
उसके गुणों के कारण उसका विविध रूपों में प्रयोग करते हैं
उसी प्रकार इस ग्रन्थ का अवश्य स्वाध्याय कर कामना-सिद्धि
कल्पतरु को न भूलें ।
[ xiv ]