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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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श्रीहरिः
पराम्बायै नमः
श्री दुर्गा सप्तशती
पारिजात सौरभ
द्वार - प्रवेश
जपो जल्पं शिल्पं, सकलमपि मुद्रा विरचनम् ।
गतिः प्रादक्षिण्यं भ्रमणमशनाद्याहुति विधिः ॥
प्रणामः संवेश सुखमखिलमात्मार्पण दशा ।
सपर्या पर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम् ॥ सौ० ल० २७ ॥
हे करुणामयी माँ ! मैं आपकी पूजा उपर्युक्त क्रम से कर
रहा हूँ, क्योंकि आपका एक अबोध बालक यही सहज रूप में
कर सकता है :—
मेरी बातचीत ही आपका जप है, मुद्राओं का रूप शिल्प
है, चलना - फिरना ही प्रदक्षिणा है, खाना - पीना - भोजन आदि
करना आपके लिए हवन है और शयन करना ही आपके लिए
प्रणाम है । यही सदाचार - पूजा आप सदा स्वीकार करें यही
सम्पराय है । सम्पराय का स्पष्टीकरण कर लेना अनिवार्य है :–
सम्पराय—सम्यक् परे काले देह पतनादूर्ध्वं यते - गम्यते,
इति सम्परायः परलोकः तत्प्राप्ति योजना साधन विशेषः
सम्परायः ।
अर्थात् परलोक की प्राप्ति का उत्तम साधन ‘सम्पराय’
है । नारायण, नारायण, नारायण, नारायण ! नमो महद्भ्यः
ब्राह्मणेभ्यो नमो नमः । परमात्मा स्वयं प्रेम स्वरूप है निर्विकार,
निराकार है, तथापि करुणावश द्रवित होकर ब्रह्मादि रूपों द्वारा
संसार का सृजन, पालन तथा संहार करता रहता है । इसके मूर्त