दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
में आप्यायन, अग्नि में दाहिका, वायु में गति, आकाश में व्यापन
तथा चेतन प्राणी में बुद्धि शक्ति रूप में वही पराशक्ति है।
भगवान् रेणुकाचार्य जगत् सृष्टि के प्रसङ्ग में परमात्मा को
सर्वज्ञ, सर्वशक्ति कहते हैं। यदि उनमें ऐसी शक्ति न होती, तो
इस चित्र-विचित्र शक्तियों से परिपूरित जगत् का निर्माण वे
कैसे कर पाते ? अवएव परमात्मा शक्ति-विशिष्ट ही है। यह
सिद्धान्त आचार्य प्रवर ने त्रेता-युग में निश्चित किया था।
श्वेताश्वतर श्रुति असंदिग्ध रूप से परमात्मा की विविध
पराशक्तियों का वर्णन करती है : 'स्वाभाविकी ज्ञान बल क्रिया
च' इस मंत्र के तात्पर्य का पर्यालोचन करने पर स्पष्ट हो जाता
है कि परमात्मा में शक्ति स्वभाव सिद्ध है। ज्ञान, बल, क्रिया
आदि रुप से उसके विविध प्रकार हैं। मन्त्राक्षरों में ही
'स्वाभाविकी' पद का प्रयोग शक्ति की नित्यता का घण्टा घोष
है। इसी मन्त्र के साथ दूसरी श्रुति 'प्रज्ञा च तस्मात्प्रसृता
पुराणी' कहकर सूचित करती है कि अनादि सिद्धा प्रज्ञाचिच्छक्ति
परमात्मा से ही प्रकट हुई है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि
परमात्मा ही सर्व-शक्तियों का उद्गम एवं विकास स्रोत है।
यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता (२.७.६) में 'स ह स्वस्रा-
म्बिकया' वाक्य परमात्मा की नित्य शक्ति का ही द्योतक है।
तै० सं० (४.५,८) में सोम पद का अर्थ “उमा सहित" ही है।
परमात्मा में शक्ति की नित्यता और समवाय सम्बन्ध से उसका
होना स्वतः सिद्ध है। समस्त लोक के निर्माण में शक्ति समवा-
यिनी है। कार्य में कारण का—जैसे घट में मृत्तिका का नित्य
सम्बद्ध होना 'समवाय' है। शक्ति का समवाय सम्बन्ध से रहना
और परमेश्वर के स्वरूप का अनुकरण करना सप्रमाण ही है।
श्री रेणुकाचार्य ने उत्तम रीति से इसका उपपादन किया है।
सिद्धान्तः- शिखामणि में इसका यह स्वरुप है—