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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 156 में से

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पृष्ठ 28

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ४
यथा चन्द्रे स्थिरा ज्योत्स्ना विश्ववस्तु प्रकाशिनी ।
तथा शक्ति तिमिराख्या प्रकाशे ब्रह्मणि स्थिरा ।
अन्तः करण रूपेण जगदङ्कूर रूपतः
यस्मिन् विभाति चिच्छक्तिर्ब्रह्मभूतः स उच्यते ॥
अर्थात् समस्त वस्तुओं को प्रकाशित करने वाली चन्द्रिका
जैसे चन्द्रमा में स्थिर रहती है वैसे ही सकल चराचर पदार्थ-
प्रकाशिका की विमर्श-शक्ति प्रकाश स्वरुप परमात्मा में स्थिर
रहती है । यह शक्ति परमात्मा में मूलाहङ्कार एवं सूक्ष्म जगत् के
रुप में विराजमान हैं । इसी को चिच्छक्ति या विमर्श शक्ति कहते
हैं । ऐसे शक्ति विशिष्ट परमात्मा को ही भवरोग निवारक होने
के कारण रुद्र, सर्व मंगलकारी होने से शिव और विश्व - व्यापी
होने के कारण परब्रह्म कहा जाता है । यही सच्चिदानन्द
स्वरुपिणी चिच्छक्ति है । परमात्मा के विनोद - काल में चित्र -
विचित्र जगत् के निर्माणार्थ त्रिगुणात्मिका माया के नाम से यही
प्रसिद्ध है ।
‘म - शिवं अयति’ माया - प्रकृति, मायी महेश्वर है ।
म शिवं परमं ब्रह्म प्राप्नोतीति स्वभावतः ।
मायेति प्रोच्यते लोके ब्रह्म निष्ठा सनातनी (सिद्धागम)
यही शक्ति विशिष्ट परमात्मा ‘बहु स्याम’ ‘प्रजायै ऐक्षत्’
अनेक होऊँ की इच्छा करते हैं, तभी सृष्टि होती है । अतः
जगज्जननी जगन्माता कहलाती है ।
शक्ति उपासना भी अपौरुषेय वेद से ही प्राप्त है—देवी
सूक्त में कीर्ति, बुद्धि, लज्जा आदि रूपों में इसका प्रतिपादन
किया है । वेद में—अजामेका लोहित शुक्ल कृष्णा तथा, या
प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी गुहां प्रविश्य तिष्ठति या भूते
भिर्व्यजायत एतद् वै तद् (क० २/१/६१) देवतामयी अदिति
प्रकट होकर बुद्धि में प्रविष्ट होती है, वही पञ्चभूतों में
दीखती है ।