दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
DevanagariHindipublished156 पृष्ठ
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गुरु-वन्दना
कैसा अनुपम जादू है ?
गुरुदेव तुम्हारे चरणों में ।
जग के सब रस फीके पाये
जब रस आया इन चरणों में ॥ १
दुनियाँ के विषयों में भटकी
विष ही उन सब में पाया ।
सुख-शान्ति नहीं लव-लेश मिली
घबराकर जग को ठुकराया ॥
प्रभु कृपा हुई गुरुदेव मिले
लगी लगन तुम्हारे चरणों में। २
गुरु-ज्ञान की पावन गंगा में,
जब मुँह धोया तो नेत्र खुले ॥
मोह-मिटा स्वप्निल जग का
कलुषित मन के सब पाप धुले ।
क्षण - भंगुर जग छूट गया
सुधा मिली गुरु के चरणों में ॥ ३
ममता के रिश्ते नाते छोड़े,
घर बाहर से मुख मोड़ लिया
मन-बुद्धि-चित अहंकार त्याग-
गुरु चरणों से नाता जोड़ लिया ॥
अब जीवन ज्योति मिली गुरु चरणों में
कैसा अद्भुत जादू है ?
गुरुदेव तुम्हारे चरणों में ॥ ४
—कुमारी रमा मिश्रा