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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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सम्पादकीय
नवीन प्रकाशनों की बाढ़ में, लोकेषणा के व्यामोह के
कारणों से देवी-जागरणों की कलियुगी भक्तों की अपार भीड़ का
ऐसा सामुद्रिक ज्वार उमड़ रहा है जिसमें अमूल्य रत्न विलुप्त
हो जाते हैं। यह भी सर्व विदित है कि अथाह जल राशि का
स्वामी होने पर भी सागर किसी की पिपासा शान्त करने में
अक्षम है; क्योंकि उसके क्षार जल में यह क्षमता है ही नहीं
समुद्र की महत्ता के कारण तो दूसरे ही हैं। इस कलिकाल में
विद्वानों, संतों, महात्माओं का भी अभाव नहीं है और एक से एक
बढ़कर सिद्ध महात्मा अपनी सिद्धियों के चमत्कार से अथवा प्रारब्ध
से या वैयक्तिक कौशल से राजकीय प्रश्रय से अभिवन्दित तथा
अर्चित होते हुए उच्च गद्दियों पर आसीन हैं। उद्योग-पतियों,
नेताओं तथा मंत्रियों के भी अलग-अलग स्वामी हैं। ऐसी स्थिति
में जन-साधारण तथा स्वाध्यायी विद्वानों की पहुँच सन्तों,
महात्माओं के चरणों तक असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है।
इस कथन से मेरा यह प्रयोजन नहीं है कि सन्तों या महात्माओं
की उदारता, निष्कामिता या विद्वता अथवा निरीहता एवं
उन्मुक्तता का अभाव है। भला वसुन्धरा-रत्नगर्भा माँ भारती
ऐसे महामना उदार पुत्रों से विहीन कैसे हो सकती है ? आज
भी वह इस गरिमा से परिपूर्ण रूपेण मंडित है। ऐसे ही
महिमान्वित सन्त प्रवरों में से एक श्रद्धेय आचार्य भागवतानन्द
जी सरस्वती माँ सरस्वती के वरद-पुत्र हैं, जिनका करुणार्द्र हृदय
सदैव 'सर्वत्र-सर्व-जन-हिताय' द्रवित रहता है।
“श्री दुर्गा-सप्तशती पारिजात सौरभ” प्रस्तुत ग्रन्थ महाराज
श्री के माँ पराम्बा के प्रेमपूरित करुणाद्राप्लावित हृदय-निसृत
भक्तिरसामृत वर्षण है; जो सामान्यजन से लेकर मूर्धन्य विद्वद्वृंद
के लिए समान रूप से स्पृहणीय तथा कल्याण करणीय है। ग्रन्थ
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