दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ २
एवं अमूर्त दोनों रूप वृहदारण्यक - उपनिषद् में स्पष्ट हैं । मूर्त
रूप में वह पराशक्ति ही है। उसी की करुणा से वही निराकार
परमात्मा साकार होकर लीला किया करते हैं ।
इसका प्रमाण लोकवत्तु लीला कैवल्यम् (ब्रह्मसूत्र) में
भी है । वही कभी राम, कभी घनश्याम बनकर दुष्टों का दलन
एवं भक्त - जनों का पालन करते हैं ।
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृति रष्टधा ।। गीता अध्याय ७/४
मूर्त रूप में—भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन,
बुद्धि और अहंकार ये आठ प्रकार की प्रकृति जो गीता में कही
गई है, वही महाकवि कालिदास ने अपनी विश्व-विश्रुत कीर्ति
प्रसारिणी कृति 'अभिज्ञान शाकुन्तलम्' नाटक के मङ्गलाचरण
के इस श्लोक में इस प्रकार बतलाई है--
या सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री
ये द्वे कालं विधत्तः श्रुति विषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्
यामाहुः सर्वबीज प्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः
प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभि खतु वस्ताभिरष्टाभिरीशः ।। अभि.शा. १
गीता में कथित अष्टधा-आठ प्रकार की प्रकृति र-सूर्य,
चन्द्र तथा यजमान रूप तीन का अन्तर है, वही इन तीनों के
स्थान पर मन, बुद्धि, अहंकार है—
परमात्मा का यह मूर्तरूप भक्तों के प्रति अनुग्रह करता है
और अमूर्त स्वरूप आत्मानन्द में स्थित रहता है । "एको देवः
सर्वभूतेषु गूढ़ः" इस श्रुति वचन के अनुसार प्राणी मात्र में वही
एक परमात्मा है । इस निश्चय में समर्थ केवल एक मनुष्य
योनि है । मनुष्य ही अपने आत्मस्वरूप को पहचानने में सक्षम
है । यह विचित्र जगत् परमात्मा का ही तो रूप है, किन्तु इसका
सृजन शक्ति की कृपा से ही होता है । यह शक्ति सर्वत्र सतत्
अबाध गति से अपना कार्य कर रही है । पृथ्वी में धारणा; जल