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दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

माना। महर्षि मार्कण्डेय ने भी उस मूल तत्व को “शक्ति
रूपेण संस्थिता” एक शक्ति रूप मे स्वीकार किया है। सृष्टि की
उत्पत्ति, पोषण, संहार, का मूल कारण वही एक शक्ति है
जिसके अगम्य स्वरूप का वर्णन निगमागम से परे है। वही सब
का मङ्गल करें :-
वेदत्रयी वा निगमत्रयी वा यस्या स्वरूपं गदितुं न शक्ताः ।
संसारजन्म स्थिति नाश हेतु सा कापि ‘शक्ति’ कुशलं करोतु ।।
पाश्चात्य वैज्ञानिक उसे ही ‘सुपर पावर’ कहते हैं ।
हमारे शाक्त ‘परा पराणां परमा’ परा से परां परमा शक्ति कहते
हैं। संसार में सद् असद् जो कुछ कहीं भी कोई भी पदार्थ है,
उसमें वही शक्ति है। वही एक शक्ति जड़, चेतन, स्थावरजंगम
में व्याप्त है :-“एकैव सर्वत्र वर्तते तस्मादुच्यते एका” (अथर्व)
जगत् का आधारभूत वही है “आधारभूता जगतस्त्वमेका”
दुर्गा सप्तशती ।
देवी भागवत उसे ब्रह्मरूपा, नित्या, सनातनी, आत्मा की
शक्ति, अग्नि की दाहकता की तरह सब वस्तुओं में उसी एक
शक्ति को अनुस्यूत कहती हैं :-
सा च ब्रह्म रूपा च नित्या सा च सनातनी ।
यथात्मा च तथा शक्ति यथाऽग्नौदाहिकास्थिता ॥
वह सर्व रूपा शक्ति विश्व का बीज रूप है, शक्ति पुञ्ज
है, सतत् एवं सनातन है। वह सब रूपों में सबकी स्वामिनी
एवं समस्त शक्तियों से समन्वित हैं :-
विश्वस्य बीजं शक्तिभूते सनातनी ॥
सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते ॥
लक्ष्यालक्ष्यस्वरूप चिद् शक्ति (चैतन्य शक्ति) के रूप में
विराट रूप में चारों ओर व्याप्त हैं :—
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्यस्थिता ।
लक्ष्यालक्ष्यस्वरूपा साव्याप्यकृत्स्नं व्यवस्थिता ॥
[ viii ]

यही आद्याशक्ति जगत् का आश्रय है, जगत् इसका एक
अंश मात्र है, वही विश्व का धारण, सृजन, पोषण, संहरण
करती है :-
सर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूतत्याकृता हि परमा प्रकृतिः त्वमाद्या ।
त्वयैतद्धार्यते विश्वं, त्वयैतत्सृज्यते जगत्, त्वयैतत्पाल्यते देवि,
त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥ दु० स० ४
इस शाक्त दर्शन में एकमात्र जो कुछ है वह पराशक्ति
ही है। उनके अनुसार शक्ति की व्युत्पत्ति इस प्रकार है :-'श'
ऐश्वर्य वाचक है। विश्व के समस्त ऐश्वर्य 'श' से अभिव्यक्त
होते हैं; 'क्ति' पराक्रम वाचक हैं। सृष्टिगत समस्त पराक्रम,
बल, ओज और तेज 'क्ति' से व्यञ्जित होते हैं; अर्थात् सृष्टि के
षड् (छः) ऐश्वर्य और पराक्रम जिस तत्व में अन्तर्निहित है वह
'शक्ति' पद वाच्य है।
इसी तत्व को शक्ति या महाशक्ति भी कहते हैं।
इसलिए योगीजन इस तत्व को स्त्री या पुरुष भेद में भी नहीं
मानते—अत एवहि योगीन्द्रियैः स्त्री पुं भेदो न मन्यते 'सर्वब्रह्म-
मयं ब्रह्मञ्छ स्वपि नारद ॥ महाशक्ति के बिना यह सृष्टि संभव
नहीं। शक्ति के बिना शक्तिमान शिव 'शव' हो जाते हैं “नहि
क्षमस्तथात्मा च सृष्टि स्रष्टुं तथा बिना 'सर्वशक्तिस्वरूपा सा
यथा च शक्तिमान् सदा'
शाक्त-दर्शन और ईश्वरवादी दर्शन का आधार तत्वतः
वह एक ही है। जब वह परम-शक्ति-विश्व रुपधारिणी अपनी
इच्छा से अपने में स्फुरण करती है श्रुति “वहुस्याम” तब
संसार-चक्र की उत्पत्ति होती है। पराशक्ति शिव शक्ति रुप धारण
कर जगत का अभिन्न निमित्तोपादान कारण होती है। इसे ही
परम वाक् तथा सांविदी कला कहते हैं :-यदा सा परमाशक्तिः
स्वेच्छया विश्वरुपिणी । स्फूरतामात्मनः पश्येत् तदा चक्रस्य
सम्भव । तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम् । सुधी पाठक
[ ix ]

वृन्द स्वत ही निम्न दो श्लोकों से दोनों दर्शनों के समन्वय भाव
का अवलोकन कर सकते हैं :—
भागद्वयवती यस्मात् सृजति सकलं जगत् ।
तत्रैकभागे सा प्रोक्तः सच्चिदानंद नामकः ॥१॥
मायाप्रकृति संज्ञास्तु द्वितीयाभाग ईरितः ।
सा च माया पराशक्ति मस्यहमेश्वरी ॥२॥
जैसा पहले कहा जा चुका है कि आस्तिकवाद में भावना
की प्रधानता होती है, इसी से भक्ति की प्राप्ति होती है । भक्ति
की आत्मैक्यता से शक्ति या शक्तिमान अथवा भगवती एवं
भगवान् का सामीप्य एवं सायुज्य उपलब्ध होता है अतः शक्ति
साधकों नै उस सर्जनात्मक व्यापार विस्तार के कारण महनीया
माता के रुप में स्वीकार किया है । वह मातृ शक्ति भाव रुप
में अलौकिक और कार्य रुप में लौकिक है “मातृ देवो भवः”
का उद्घोष सर्वप्रथम मातृशक्ति-पराशक्ति की ही मान्यता है ।
यही सृष्टि का मूल तत्व है ।
शैव, वैष्णव, सौर, गाणपत्य और शक्ति वैचारिक
एवं साधना परक सम्प्रदाय भी वस्तुतः एक ही सनातन धर्म के
विविध रूप हैं । आसेतु-हिमालय एवं चतुरुदधि पर्यन्त विशाल
भारत धराधाम की वेश-भूषा, भाषा तथा जलवायु एवं ऋतुएँ
भी विविध ही हैं; किन्तु भारतीय जन-जीवन में इन विविधताओं
जागतिक एवं आध्यात्मिकता, को एकरुपता प्रदान करने वाले
जीवन एवं संस्कारों की अनुप्राणित करने वाले, इहलौकिक एवं
पारलौकिक सिद्धियाँ तथा मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले ग्रन्थों
में वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस, श्रीमद्भागवतगीता,
महाभारत के साथ-साथ दुर्गा-सप्तशती भी अमूल्य रत्न-परिपूरित
मंजूषा रुप लोक प्रिय ग्रन्थ है । जिससे भक्तजनों को सदैव
प्रकाश एवं बल मिला है । इस रहस्यमय सिद्ध ग्रन्थ की गुणवत्ता
और माहात्म्य इसके उपासक-साधक ही जान सकते हैं । यह
[ x ]

सभी अलषित मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु स्वयं उद्घोष करता हैं
“यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्”
‘मेरे प्रसाद (अनुग्रह) से मेरे भक्त-जन परम ऐश्वर्य के
साथ जिस कामना की अभिलाषा करेंगे, उसे निश्चित रूप से
प्राप्त करते हैं।’
इस प्रकार अनेक रहस्यमय अलौकिक शक्तियाँ तथा
तत्वों से परिपूरित मार्कण्डेय पुराणान्तर्गत इस “दुर्गा-सप्तशती”
के कथन विषयों की विवेचना, सारगर्भित व्याख्या, समन्वयात्मक
चिन्तन और उसे जीवन में व्यावहारिक रूप में उतारने-वरतने
की सरणी हेतु इसके कीलित, तान्त्रिक ग्रन्थियों का उन्मोचन
और आध्यात्मिक तत्वों का उद्घाटन महामान्य भारत प्रसिद्ध
पुराण निगमागम-षट् दर्शनों के व्याख्याता श्रीमद्भागवत तथा
रामचरितमानस के तत्वोपदेष्टा, तपो-पूत-काय परमहंस
परिव्राजक शिरोमणि पूज्यपाद आचार्य श्री भागवतानन्द
सरस्वती महाराज (परमार्थ निकेतन, हृषिकेश) आनन्द धाम
वृन्दावन जी ने अपने प्रवचनों के माध्यम से किया है जिसे जन-
हिताय “सप्तशती पारिजात सौरभ” ग्रन्थ के रूप में प्रकाशित
किया जा रहा है; जो साधकों और भक्तों के लिए परमोपयोगी
सिद्ध होगा ।
जिज्ञासु पाठक जब पारिजात-सौरभ का मनोयोग से
अध्ययन और मनन करेंगे तो उन्हें वैदिक, दार्शनिक एवं शाक्त
दर्शन के तत्वों का समन्वयात्मक बोध होगा । यद्यपि आचार्य
श्री का लक्ष्य चिन्तन-मनन के उसी एक केन्द्र बिन्दु तत्व को
भाषित करना है । तथापि सामान्य जन हिताय यन्त्र-तन्त्र मन्त्रों
की साधना और फल श्रुति भी प्रतिपादित की है । वस्तुतः
आध्यात्मिक मर्मों के गवेषणात्मक बोध की जिज्ञासा तो आचार्य
चरणों में बैठकर उनके प्रवचनों को सुनकर ही शान्त होती है;
किन्तु क्षणिक शान्ति को स्थायित्व एवं शाश्वत बोध को
[ xi ]

अमरता प्रदान करने के लिए 'सप्तशती पारिजात सौरभ' का
चिन्तन-मनन एवं अध्ययन अनिवार्य है, जो महाराज श्री की
अनुपस्थिति में भी तात्त्विक बोध के साथ-साथ इस मातृशक्ति
के रहस्य एवं चमत्कार से परिचित करायेगा।
प्रचार-प्रसार से दूर रहने वाले सन्तों की सिद्ध-वाणियों
को संगृहीत कर सर्व जनहिताय ग्रन्थ के रूप में प्रकाशित
करना महान उपकार है क्योंकि सद्ग्रन्थों के प्रचार से मानव
संस्कृति का अभ्युदय होता है। इसे प्रकाशित कराने का श्रेय
पटना-सिटी (पाटली पुत्र) में स्थित श्रीराम-धाम मानस-मन्दिर
के कर्मठ संचालक स्वामी श्री सत्यानन्द जी सरस्वती जी को है;
जो स्तुत्य है।
माँ जगदम्बा विश्व के समस्त मानवों को सुख-शान्ति
का वरदान दें, यही हमारी कामना है :—
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणी,
त्रैलोक्य वासिनामीड्ये लोकानां वरदाभव।
विश्व की पीड़ा दूर करने वाली देवी! हम तुम्हारे
चरणों में नत मस्तक हैं। आप प्रसन्न होइए। तीनों लोकों के
निवासियों की पूजनीय माँ! सबको वरदान दो।
महाशक्तिमहं वन्दे, मातृवत् स्नेह दायिनीम्।
आचार्य चरणं नौम्युक्तं, पारिजात सौरभम् ॥
सम्पादित :
एस. एस. त्रिवेदी आचार्य श्री सूर्यदत्त शास्त्री 'रक्ताभ'
ए-३१, शिवाजी कालोनी महर्षि गर्गाचार्य ज्ञानपीठम्
मेरठ कैन्ट। सूर्यलोक, धर्मशाला घाट
पटना सिटी-२ (बिहार)
[ xii ]

सम्पादकीय
नवीन प्रकाशनों की बाढ़ में, लोकेषणा के व्यामोह के
कारणों से देवी-जागरणों की कलियुगी भक्तों की अपार भीड़ का
ऐसा सामुद्रिक ज्वार उमड़ रहा है जिसमें अमूल्य रत्न विलुप्त
हो जाते हैं। यह भी सर्व विदित है कि अथाह जल राशि का
स्वामी होने पर भी सागर किसी की पिपासा शान्त करने में
अक्षम है; क्योंकि उसके क्षार जल में यह क्षमता है ही नहीं
समुद्र की महत्ता के कारण तो दूसरे ही हैं। इस कलिकाल में
विद्वानों, संतों, महात्माओं का भी अभाव नहीं है और एक से एक
बढ़कर सिद्ध महात्मा अपनी सिद्धियों के चमत्कार से अथवा प्रारब्ध
से या वैयक्तिक कौशल से राजकीय प्रश्रय से अभिवन्दित तथा
अर्चित होते हुए उच्च गद्दियों पर आसीन हैं। उद्योग-पतियों,
नेताओं तथा मंत्रियों के भी अलग-अलग स्वामी हैं। ऐसी स्थिति
में जन-साधारण तथा स्वाध्यायी विद्वानों की पहुँच सन्तों,
महात्माओं के चरणों तक असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है।
इस कथन से मेरा यह प्रयोजन नहीं है कि सन्तों या महात्माओं
की उदारता, निष्कामिता या विद्वता अथवा निरीहता एवं
उन्मुक्तता का अभाव है। भला वसुन्धरा-रत्नगर्भा माँ भारती
ऐसे महामना उदार पुत्रों से विहीन कैसे हो सकती है ? आज
भी वह इस गरिमा से परिपूर्ण रूपेण मंडित है। ऐसे ही
महिमान्वित सन्त प्रवरों में से एक श्रद्धेय आचार्य भागवतानन्द
जी सरस्वती माँ सरस्वती के वरद-पुत्र हैं, जिनका करुणार्द्र हृदय
सदैव 'सर्वत्र-सर्व-जन-हिताय' द्रवित रहता है।
“श्री दुर्गा-सप्तशती पारिजात सौरभ” प्रस्तुत ग्रन्थ महाराज
श्री के माँ पराम्बा के प्रेमपूरित करुणाद्राप्लावित हृदय-निसृत
भक्तिरसामृत वर्षण है; जो सामान्यजन से लेकर मूर्धन्य विद्वद्वृंद
के लिए समान रूप से स्पृहणीय तथा कल्याण करणीय है। ग्रन्थ
[ xiii ]

को उपादेयता एवं उपयोगिता तो सुधीजन ही बता सकेंगे किन्तु
सौन्दर्य लहरी, दुर्गा-महिमा, षट्चक्रनिरुपण, वरिवर्या रहस्य
आदि अनेक ग्रन्थों के जीवन-ग्राह्य बोध का समावेश ग्रन्थ का
एक बार सिंहावलोकन मात्र से दृष्टिगोचर कर सकेंगे । इस तथ्य
को किसी प्रकार नकारा नहीं जा सकता । जिन्होंने महाराज श्री
के प्रवचनामृत का पान किया है वे भली-भाँति जानते हैं कि कम
से कम समय में कम से कम शब्दों में अधिकतम दुरुहज्ञान को
सहज आत्मीय करा देने की कला में वे सिद्ध-हस्त हैं; 'भागवत
पारिजात' तथा 'मानस-पारिजात' इसके ज्वलंत दृष्टांत हैं ।
लोकप्रियता इससे अधिक क्या होगी कि एक ही वर्ष में 'भागवत
पारिजात' की एक प्रति भी अवशेष नहीं रही । तब उनके समस्त
ज्ञान को लिपिबद्ध करने की क्षमता कैसे हो सकती है ? दूसरे टेप
निर्जीव से चेतनानंद की अभिव्यक्ति और वह भी सजीवता-सम्पन्न
उल्लासमय कैसे बनी, यह आचार्य श्री का आशीष ही है ।
इस सम्बन्ध में मेरा वैयक्तिक यही निवेदन है कि श्रद्धा के
साथ सन् १६४४ से प्रत्येक नवरात्र में 'दुर्गा-सप्तशती' का पाठ
कर्म-काण्ड के विधि विधान के साथ करते रहने पर भी सहज
अनुराग और जीवन-दर्शन में बदलाव नहीं आया था जो लिपिबद्ध
करने पर पराम्बा के साथ नैसर्गिक आत्मीयता और जीवन-
दर्शन की व्यावहारिकता का बोध हुआ, वह अपने आप में स्वयं
एक महती उपलब्धि है । अतः ग्रन्थ प्रत्येक जन-जन के लिए
अत्यन्त अपेक्षणीय है ।
अन्त में इस ग्रन्थ में जो पद, वाक्य, विन्यास अथवा
वर्तनी की अशुद्धियाँ हैं; वे सब मेरी भूलें हैं, उनके लिये मैं
सभी से क्षमा-याचना करते हुए पुनश्च निवेदन करता हूँ कि
छिलके के कारण जैसे आप केले का त्याग नहीं करते, अपितु
उसके गुणों के कारण उसका विविध रूपों में प्रयोग करते हैं
उसी प्रकार इस ग्रन्थ का अवश्य स्वाध्याय कर कामना-सिद्धि
कल्पतरु को न भूलें ।
[ xiv ]

ग्रन्थ की साज-सज्जा, मुद्रण की सुन्दरता, तन्त्रों के
ब्लाक और यहाँ तक कि प्रूफों के संशोधन में सहयोग और
उचित स्थलों के संयोजन में प्रेस के प्रबन्धक एवं स्वामी पुनीत
शादमां का हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने अपनी अत्यधिक
व्यस्तता वैविध्य बहुमुखी विस्तृतता के होते हुए भी इस कार्य-
सम्पन्नता में अभिरुचि ली। यद्यपि इससे पूर्व में मैं श्री पुनीत
जी से परिचित नहीं था, परिचय का श्रेय श्री वेद प्रकाश जी
(बिजली वाले) महामन्त्री, औघड़नाथ मन्दिर समिति काली
पलटन मेरठ कैन्ट को है जिन्होंने यह प्रकाशित होने के लिए
दी। धर्म के प्रचार-प्रसार में संलग्न, साधु-सन्तों, महात्माओं
के अनन्य प्रेमी भक्त, उत्साही युवक पुनीत जी से प्रकाशन-
विलम्ब के कारण कभी-कभी खीज भी हुई, किन्तु उनकी मन्द
मुसकान और विनम्र स्वभाव में यह सब बालू रेत की भित्ति
बनकर रह गई। अतः उनसे यह आग्रह करते हुए कि समय की
महत्ता को समझते हुये ही धर्मानुष्ठानों में द्विगुणित उत्साह के
साथ भाग लेकर यशस्वी बनें। यही शुभ कामना है। और
यही माँ जगदम्बा से प्रार्थना भी।
इसमें जो है, जैसा है वह सब गुरु चरणों का विद्वच्चरण-
चञ्चरीक प्रसाद और सब त्रुटियाँ मेरी हैं।
एस० एस० त्रिवेदी
ए-३१, शिवाजी कालोनी
मेरठ कैण्ट।
[ xv ]

अनुक्रमणिका
प्रकाशकीय iii
आभार iv
सम्मति vi
आमुख vii
सम्पादकीय xiii
१ द्वार प्रवेश १
२ दुर्गा-सप्तशती १२
३ अर्गला २१
४ कीलकम् २४
५ रात्रि-सूक्त ३१
६ प्रथमोऽध्यायः ३२
७ ध्यानम् ३७
८ मध्यम चरित्र-द्वितीयोऽध्यायः ६६
६ तृतीयोऽध्यायः ७७
१० चतुर्थोऽध्यायः ८६
११ पंचमोऽध्यायः ६४
१२ षष्ठोऽध्यायः १०१
१३ सप्तमोऽध्यायः १०३
१४ अष्टमोऽध्यायः १०५
१५ नवमोऽध्यायः १०८
१६ दशमोऽध्यायः १११
१७ एकदशोऽध्यायः ११५
१८ द्वादशोऽध्यायः ११६
१६ त्रयोदशोऽध्यायः १२१
२० उपसंहार १२३
२१ क्षमा प्रार्थना १२५
२२ दुर्गाद्वात्रिंशन्नाममाला १२६
२३ देव्य पराधक्षमापन स्तोत्र १२६
२४ श्री दुर्गा जी की आरती १२८
२५ बगला अष्टोत्तरनामस्तोत्रम् १२६
२६ सप्तश्लोकी दुर्गा १३०

भगवती पराम्बा माँ बगुलामुखी
(पीताम्बरा पीठ, दतिया)

माँ का तुमको प्यार मिला है ।
मत समझो तुम हो एकाकी,
नहीं कोई जग में अवलम्ब मिला है
जब-जब ध्यान किया तुमने,
उसका ही सार-सम्भाल मिला है ।
माँ का तुमको प्यार मिला है ॥
सरिता के कल कल निनाद में
और सुमनों के मधुर हास में
भ्रमरों के मधुरिम गुञ्जन में
उसका ही स्वर साकार मिला है। माँ का तुमको.........।
जग-वैभव के काम भोग में
यतियों के अविराम योग में
प्रियतम के दारुण वियोग में
उसका ही आधार मिला है ॥ माँ का तुमको...........।
ज्ञानी की गहन चाह में
दीनों की करुण आह में
भ्रमितों की विषम राह में
वह जीवन पतवार मिला है ॥ माँ का तुमको.........।
तन्त्र-मन्त्र के गहन विज्ञान में
दुःख दैन्य के विषम विधान में
शान्ति सौम्य सँयुक्त विहान में
उसका दिव्य विचार मिला है ॥ माँ का तुमको.........।
—कुमारी रमा मिश्रा

जिन चरणों से पाया प्रकाश
स्नेहिल नयनों से सुधाधार
वे ही गुरुदेव कृपा आगार
उनको सादर अर्पित साभार
—आचार्य प्रवक्ता
भागवतानन्द
राष्ट्रगुरु पूज्य स्वामी जी
पीताम्बरापीठ, दतिया

गुरु-वन्दना
कैसा अनुपम जादू है ?
गुरुदेव तुम्हारे चरणों में ।
जग के सब रस फीके पाये
जब रस आया इन चरणों में ॥ १
दुनियाँ के विषयों में भटकी
विष ही उन सब में पाया ।
सुख-शान्ति नहीं लव-लेश मिली
घबराकर जग को ठुकराया ॥
प्रभु कृपा हुई गुरुदेव मिले
लगी लगन तुम्हारे चरणों में। २
गुरु-ज्ञान की पावन गंगा में,
जब मुँह धोया तो नेत्र खुले ॥
मोह-मिटा स्वप्निल जग का
कलुषित मन के सब पाप धुले ।
क्षण - भंगुर जग छूट गया
सुधा मिली गुरु के चरणों में ॥ ३
ममता के रिश्ते नाते छोड़े,
घर बाहर से मुख मोड़ लिया
मन-बुद्धि-चित अहंकार त्याग-
गुरु चरणों से नाता जोड़ लिया ॥
अब जीवन ज्योति मिली गुरु चरणों में
कैसा अद्भुत जादू है ?
गुरुदेव तुम्हारे चरणों में ॥ ४
—कुमारी रमा मिश्रा

पूज्य स्वामी श्री आचार्य श्री भागवतानन्द जी
सरस्वती

इस पृष्ठ पर कोई पठनीय पाठ मुद्रित नहीं है (यह एक रिक्त पृष्ठ/फ्लाईलीफ है, जिस पर केवल पिछले पृष्ठ की बहुत हल्की और अस्पष्ट छाया मात्र दिखाई दे रही है)। अत: इसका लिप्यंतरण संभव नहीं है।

श्रीहरिः
पराम्बायै नमः
श्री दुर्गा सप्तशती
पारिजात सौरभ
द्वार - प्रवेश
जपो जल्पं शिल्पं, सकलमपि मुद्रा विरचनम् ।
गतिः प्रादक्षिण्यं भ्रमणमशनाद्याहुति विधिः ॥
प्रणामः संवेश सुखमखिलमात्मार्पण दशा ।
सपर्या पर्यायस्तव भवतु यन्मे विलसितम् ॥ सौ० ल० २७ ॥
हे करुणामयी माँ ! मैं आपकी पूजा उपर्युक्त क्रम से कर
रहा हूँ, क्योंकि आपका एक अबोध बालक यही सहज रूप में
कर सकता है :—
मेरी बातचीत ही आपका जप है, मुद्राओं का रूप शिल्प
है, चलना - फिरना ही प्रदक्षिणा है, खाना - पीना - भोजन आदि
करना आपके लिए हवन है और शयन करना ही आपके लिए
प्रणाम है । यही सदाचार - पूजा आप सदा स्वीकार करें यही
सम्पराय है । सम्पराय का स्पष्टीकरण कर लेना अनिवार्य है :–
सम्पराय—सम्यक् परे काले देह पतनादूर्ध्वं यते - गम्यते,
इति सम्परायः परलोकः तत्प्राप्ति योजना साधन विशेषः
सम्परायः ।
अर्थात् परलोक की प्राप्ति का उत्तम साधन ‘सम्पराय’
है । नारायण, नारायण, नारायण, नारायण ! नमो महद्भ्यः
ब्राह्मणेभ्यो नमो नमः । परमात्मा स्वयं प्रेम स्वरूप है निर्विकार,
निराकार है, तथापि करुणावश द्रवित होकर ब्रह्मादि रूपों द्वारा
संसार का सृजन, पालन तथा संहार करता रहता है । इसके मूर्त

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ २
एवं अमूर्त दोनों रूप वृहदारण्यक - उपनिषद् में स्पष्ट हैं । मूर्त
रूप में वह पराशक्ति ही है। उसी की करुणा से वही निराकार
परमात्मा साकार होकर लीला किया करते हैं ।
इसका प्रमाण लोकवत्तु लीला कैवल्यम् (ब्रह्मसूत्र) में
भी है । वही कभी राम, कभी घनश्याम बनकर दुष्टों का दलन
एवं भक्त - जनों का पालन करते हैं ।
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृति रष्टधा ।। गीता अध्याय ७/४
मूर्त रूप में—भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन,
बुद्धि और अहंकार ये आठ प्रकार की प्रकृति जो गीता में कही
गई है, वही महाकवि कालिदास ने अपनी विश्व-विश्रुत कीर्ति
प्रसारिणी कृति 'अभिज्ञान शाकुन्तलम्' नाटक के मङ्गलाचरण
के इस श्लोक में इस प्रकार बतलाई है--
या सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री
ये द्वे कालं विधत्तः श्रुति विषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्
यामाहुः सर्वबीज प्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः
प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभि खतु वस्ताभिरष्टाभिरीशः ।। अभि.शा. १
गीता में कथित अष्टधा-आठ प्रकार की प्रकृति र-सूर्य,
चन्द्र तथा यजमान रूप तीन का अन्तर है, वही इन तीनों के
स्थान पर मन, बुद्धि, अहंकार है—
परमात्मा का यह मूर्तरूप भक्तों के प्रति अनुग्रह करता है
और अमूर्त स्वरूप आत्मानन्द में स्थित रहता है । "एको देवः
सर्वभूतेषु गूढ़ः" इस श्रुति वचन के अनुसार प्राणी मात्र में वही
एक परमात्मा है । इस निश्चय में समर्थ केवल एक मनुष्य
योनि है । मनुष्य ही अपने आत्मस्वरूप को पहचानने में सक्षम
है । यह विचित्र जगत् परमात्मा का ही तो रूप है, किन्तु इसका
सृजन शक्ति की कृपा से ही होता है । यह शक्ति सर्वत्र सतत्
अबाध गति से अपना कार्य कर रही है । पृथ्वी में धारणा; जल

३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
में आप्यायन, अग्नि में दाहिका, वायु में गति, आकाश में व्यापन
तथा चेतन प्राणी में बुद्धि शक्ति रूप में वही पराशक्ति है।
भगवान् रेणुकाचार्य जगत् सृष्टि के प्रसङ्ग में परमात्मा को
सर्वज्ञ, सर्वशक्ति कहते हैं। यदि उनमें ऐसी शक्ति न होती, तो
इस चित्र-विचित्र शक्तियों से परिपूरित जगत् का निर्माण वे
कैसे कर पाते ? अवएव परमात्मा शक्ति-विशिष्ट ही है। यह
सिद्धान्त आचार्य प्रवर ने त्रेता-युग में निश्चित किया था।
श्वेताश्वतर श्रुति असंदिग्ध रूप से परमात्मा की विविध
पराशक्तियों का वर्णन करती है : 'स्वाभाविकी ज्ञान बल क्रिया
च' इस मंत्र के तात्पर्य का पर्यालोचन करने पर स्पष्ट हो जाता
है कि परमात्मा में शक्ति स्वभाव सिद्ध है। ज्ञान, बल, क्रिया
आदि रुप से उसके विविध प्रकार हैं। मन्त्राक्षरों में ही
'स्वाभाविकी' पद का प्रयोग शक्ति की नित्यता का घण्टा घोष
है। इसी मन्त्र के साथ दूसरी श्रुति 'प्रज्ञा च तस्मात्प्रसृता
पुराणी' कहकर सूचित करती है कि अनादि सिद्धा प्रज्ञाचिच्छक्ति
परमात्मा से ही प्रकट हुई है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि
परमात्मा ही सर्व-शक्तियों का उद्गम एवं विकास स्रोत है।
यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता (२.७.६) में 'स ह स्वस्रा-
म्बिकया' वाक्य परमात्मा की नित्य शक्ति का ही द्योतक है।
तै० सं० (४.५,८) में सोम पद का अर्थ “उमा सहित" ही है।
परमात्मा में शक्ति की नित्यता और समवाय सम्बन्ध से उसका
होना स्वतः सिद्ध है। समस्त लोक के निर्माण में शक्ति समवा-
यिनी है। कार्य में कारण का—जैसे घट में मृत्तिका का नित्य
सम्बद्ध होना 'समवाय' है। शक्ति का समवाय सम्बन्ध से रहना
और परमेश्वर के स्वरूप का अनुकरण करना सप्रमाण ही है।
श्री रेणुकाचार्य ने उत्तम रीति से इसका उपपादन किया है।
सिद्धान्तः- शिखामणि में इसका यह स्वरुप है—

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ४
यथा चन्द्रे स्थिरा ज्योत्स्ना विश्ववस्तु प्रकाशिनी ।
तथा शक्ति तिमिराख्या प्रकाशे ब्रह्मणि स्थिरा ।
अन्तः करण रूपेण जगदङ्कूर रूपतः
यस्मिन् विभाति चिच्छक्तिर्ब्रह्मभूतः स उच्यते ॥
अर्थात् समस्त वस्तुओं को प्रकाशित करने वाली चन्द्रिका
जैसे चन्द्रमा में स्थिर रहती है वैसे ही सकल चराचर पदार्थ-
प्रकाशिका की विमर्श-शक्ति प्रकाश स्वरुप परमात्मा में स्थिर
रहती है । यह शक्ति परमात्मा में मूलाहङ्कार एवं सूक्ष्म जगत् के
रुप में विराजमान हैं । इसी को चिच्छक्ति या विमर्श शक्ति कहते
हैं । ऐसे शक्ति विशिष्ट परमात्मा को ही भवरोग निवारक होने
के कारण रुद्र, सर्व मंगलकारी होने से शिव और विश्व - व्यापी
होने के कारण परब्रह्म कहा जाता है । यही सच्चिदानन्द
स्वरुपिणी चिच्छक्ति है । परमात्मा के विनोद - काल में चित्र -
विचित्र जगत् के निर्माणार्थ त्रिगुणात्मिका माया के नाम से यही
प्रसिद्ध है ।
‘म - शिवं अयति’ माया - प्रकृति, मायी महेश्वर है ।
म शिवं परमं ब्रह्म प्राप्नोतीति स्वभावतः ।
मायेति प्रोच्यते लोके ब्रह्म निष्ठा सनातनी (सिद्धागम)
यही शक्ति विशिष्ट परमात्मा ‘बहु स्याम’ ‘प्रजायै ऐक्षत्’
अनेक होऊँ की इच्छा करते हैं, तभी सृष्टि होती है । अतः
जगज्जननी जगन्माता कहलाती है ।
शक्ति उपासना भी अपौरुषेय वेद से ही प्राप्त है—देवी
सूक्त में कीर्ति, बुद्धि, लज्जा आदि रूपों में इसका प्रतिपादन
किया है । वेद में—अजामेका लोहित शुक्ल कृष्णा तथा, या
प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी गुहां प्रविश्य तिष्ठति या भूते
भिर्व्यजायत एतद् वै तद् (क० २/१/६१) देवतामयी अदिति
प्रकट होकर बुद्धि में प्रविष्ट होती है, वही पञ्चभूतों में
दीखती है ।

५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
पुराणों में सीता, लक्ष्मी, राधा, उमा आदि नामों से यही
शक्ति अभिहित है जो 'केनोपनिषद्' के यक्ष प्रसङ्ग में ब्रह्म-विद्या
होकर देवों को उपदेश देती है । ऋग्वेद में यही वाक्-शक्ति है ।
सांख्य-दर्शन में इसी का नाम 'अमृता' है । कहा है—पुरुषे षोडश
कले तामाहुमृतां कलाम् ।'
ऋषियों के विचार से प्रतिपाद्य वस्तु का प्रतिपादन
पुराण, श्रुति, ध्वनि, तेज, प्रभा इन पांच प्रकार से होता है ।
इसी क्रम से उनका वर्णन भी है । इसी देवी से अवतारों का
प्राकट्य इस क्रम से प्रतिपादित है । देवी के दायें हाथ के अंगूठे
से मत्स्य, तर्जनी से कूर्म, मध्यमा से वराह, अनामिका से नृसिंह,
कनिष्ठा से वामन और बायें हाथ के अंगूठे से परशुराम, तर्जनी
से राम, मध्यमा से कृष्ण, अनामिका से बुद्ध जी प्रकट हुये हैं ।
कश्मीर की पावन कन्दराओं से लेकर कन्या कुमारी तक,
कच्छ से लेकर कामाख्या तक सम्पूर्ण भारत में इस पराम्बा
शक्ति की अनेक स्थलों पर ख्याति प्राप्त सिद्ध पीठें हैं, जहाँ माँ
के परम उपासक उपासना के माध्यम से अभीष्ट प्राप्त करते हैं
ये सिद्ध पीठें सर्वत्र हैं जिनमें काशी, काञ्ची, मलयगिरि, विन्ध्य
मालावार, मालवा, गुजरात, दतिया, प्रयाग, बंगाल तथा नेपाल
कामाख्या आदि में विशेष प्रसिद्ध हैं ।
यही शक्ति दस महा विद्याओं के रूप में वर्णित है—
काली तारा महाविद्या षोडशी भुवनेश्वरी ।
भैरवी छिन्न मस्ता च विद्या धूमावती तथा ॥
बगला सिद्ध विद्या च मातंगी कमलात्मिका ।
एतादश महा विद्या *सर्व तन्त्रेषु गोपिता ॥

  • (सिद्ध विद्या प्रकीर्तिता पाठान्तर)
    इनमें से किसी एक की उपासना में दीक्षित होकर ही
    आराधना की जाती है ।
    समस्त शाक्त - उपासना का लक्ष्य 'सर्वं खलु, इदं ब्रह्म'
    का ज्ञान ही है ।” इसी की सिद्धि हेतु 'दुर्गा-पूजा' महोत्सव क