दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
पृष्ठ 12, कुल 156 में से
संदर्भ में पढ़ेंवृन्द स्वत ही निम्न दो श्लोकों से दोनों दर्शनों के समन्वय भाव
का अवलोकन कर सकते हैं :—
भागद्वयवती यस्मात् सृजति सकलं जगत् ।
तत्रैकभागे सा प्रोक्तः सच्चिदानंद नामकः ॥१॥
मायाप्रकृति संज्ञास्तु द्वितीयाभाग ईरितः ।
सा च माया पराशक्ति मस्यहमेश्वरी ॥२॥
जैसा पहले कहा जा चुका है कि आस्तिकवाद में भावना
की प्रधानता होती है, इसी से भक्ति की प्राप्ति होती है । भक्ति
की आत्मैक्यता से शक्ति या शक्तिमान अथवा भगवती एवं
भगवान् का सामीप्य एवं सायुज्य उपलब्ध होता है अतः शक्ति
साधकों नै उस सर्जनात्मक व्यापार विस्तार के कारण महनीया
माता के रुप में स्वीकार किया है । वह मातृ शक्ति भाव रुप
में अलौकिक और कार्य रुप में लौकिक है “मातृ देवो भवः”
का उद्घोष सर्वप्रथम मातृशक्ति-पराशक्ति की ही मान्यता है ।
यही सृष्टि का मूल तत्व है ।
शैव, वैष्णव, सौर, गाणपत्य और शक्ति वैचारिक
एवं साधना परक सम्प्रदाय भी वस्तुतः एक ही सनातन धर्म के
विविध रूप हैं । आसेतु-हिमालय एवं चतुरुदधि पर्यन्त विशाल
भारत धराधाम की वेश-भूषा, भाषा तथा जलवायु एवं ऋतुएँ
भी विविध ही हैं; किन्तु भारतीय जन-जीवन में इन विविधताओं
जागतिक एवं आध्यात्मिकता, को एकरुपता प्रदान करने वाले
जीवन एवं संस्कारों की अनुप्राणित करने वाले, इहलौकिक एवं
पारलौकिक सिद्धियाँ तथा मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले ग्रन्थों
में वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस, श्रीमद्भागवतगीता,
महाभारत के साथ-साथ दुर्गा-सप्तशती भी अमूल्य रत्न-परिपूरित
मंजूषा रुप लोक प्रिय ग्रन्थ है । जिससे भक्तजनों को सदैव
प्रकाश एवं बल मिला है । इस रहस्यमय सिद्ध ग्रन्थ की गुणवत्ता
और माहात्म्य इसके उपासक-साधक ही जान सकते हैं । यह
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