दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
पृष्ठ 13, कुल 156 में से
संदर्भ में पढ़ेंसभी अलषित मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु स्वयं उद्घोष करता हैं
“यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्”
‘मेरे प्रसाद (अनुग्रह) से मेरे भक्त-जन परम ऐश्वर्य के
साथ जिस कामना की अभिलाषा करेंगे, उसे निश्चित रूप से
प्राप्त करते हैं।’
इस प्रकार अनेक रहस्यमय अलौकिक शक्तियाँ तथा
तत्वों से परिपूरित मार्कण्डेय पुराणान्तर्गत इस “दुर्गा-सप्तशती”
के कथन विषयों की विवेचना, सारगर्भित व्याख्या, समन्वयात्मक
चिन्तन और उसे जीवन में व्यावहारिक रूप में उतारने-वरतने
की सरणी हेतु इसके कीलित, तान्त्रिक ग्रन्थियों का उन्मोचन
और आध्यात्मिक तत्वों का उद्घाटन महामान्य भारत प्रसिद्ध
पुराण निगमागम-षट् दर्शनों के व्याख्याता श्रीमद्भागवत तथा
रामचरितमानस के तत्वोपदेष्टा, तपो-पूत-काय परमहंस
परिव्राजक शिरोमणि पूज्यपाद आचार्य श्री भागवतानन्द
सरस्वती महाराज (परमार्थ निकेतन, हृषिकेश) आनन्द धाम
वृन्दावन जी ने अपने प्रवचनों के माध्यम से किया है जिसे जन-
हिताय “सप्तशती पारिजात सौरभ” ग्रन्थ के रूप में प्रकाशित
किया जा रहा है; जो साधकों और भक्तों के लिए परमोपयोगी
सिद्ध होगा ।
जिज्ञासु पाठक जब पारिजात-सौरभ का मनोयोग से
अध्ययन और मनन करेंगे तो उन्हें वैदिक, दार्शनिक एवं शाक्त
दर्शन के तत्वों का समन्वयात्मक बोध होगा । यद्यपि आचार्य
श्री का लक्ष्य चिन्तन-मनन के उसी एक केन्द्र बिन्दु तत्व को
भाषित करना है । तथापि सामान्य जन हिताय यन्त्र-तन्त्र मन्त्रों
की साधना और फल श्रुति भी प्रतिपादित की है । वस्तुतः
आध्यात्मिक मर्मों के गवेषणात्मक बोध की जिज्ञासा तो आचार्य
चरणों में बैठकर उनके प्रवचनों को सुनकर ही शान्त होती है;
किन्तु क्षणिक शान्ति को स्थायित्व एवं शाश्वत बोध को
[ xi ]