दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयही आद्याशक्ति जगत् का आश्रय है, जगत् इसका एक
अंश मात्र है, वही विश्व का धारण, सृजन, पोषण, संहरण
करती है :-
सर्वाश्रयाखिलमिदं जगदंशभूतत्याकृता हि परमा प्रकृतिः त्वमाद्या ।
त्वयैतद्धार्यते विश्वं, त्वयैतत्सृज्यते जगत्, त्वयैतत्पाल्यते देवि,
त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा ॥ दु० स० ४
इस शाक्त दर्शन में एकमात्र जो कुछ है वह पराशक्ति
ही है। उनके अनुसार शक्ति की व्युत्पत्ति इस प्रकार है :-'श'
ऐश्वर्य वाचक है। विश्व के समस्त ऐश्वर्य 'श' से अभिव्यक्त
होते हैं; 'क्ति' पराक्रम वाचक हैं। सृष्टिगत समस्त पराक्रम,
बल, ओज और तेज 'क्ति' से व्यञ्जित होते हैं; अर्थात् सृष्टि के
षड् (छः) ऐश्वर्य और पराक्रम जिस तत्व में अन्तर्निहित है वह
'शक्ति' पद वाच्य है।
इसी तत्व को शक्ति या महाशक्ति भी कहते हैं।
इसलिए योगीजन इस तत्व को स्त्री या पुरुष भेद में भी नहीं
मानते—अत एवहि योगीन्द्रियैः स्त्री पुं भेदो न मन्यते 'सर्वब्रह्म-
मयं ब्रह्मञ्छ स्वपि नारद ॥ महाशक्ति के बिना यह सृष्टि संभव
नहीं। शक्ति के बिना शक्तिमान शिव 'शव' हो जाते हैं “नहि
क्षमस्तथात्मा च सृष्टि स्रष्टुं तथा बिना 'सर्वशक्तिस्वरूपा सा
यथा च शक्तिमान् सदा'
शाक्त-दर्शन और ईश्वरवादी दर्शन का आधार तत्वतः
वह एक ही है। जब वह परम-शक्ति-विश्व रुपधारिणी अपनी
इच्छा से अपने में स्फुरण करती है श्रुति “वहुस्याम” तब
संसार-चक्र की उत्पत्ति होती है। पराशक्ति शिव शक्ति रुप धारण
कर जगत का अभिन्न निमित्तोपादान कारण होती है। इसे ही
परम वाक् तथा सांविदी कला कहते हैं :-यदा सा परमाशक्तिः
स्वेच्छया विश्वरुपिणी । स्फूरतामात्मनः पश्येत् तदा चक्रस्य
सम्भव । तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम् । सुधी पाठक
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