दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाना। महर्षि मार्कण्डेय ने भी उस मूल तत्व को “शक्ति
रूपेण संस्थिता” एक शक्ति रूप मे स्वीकार किया है। सृष्टि की
उत्पत्ति, पोषण, संहार, का मूल कारण वही एक शक्ति है
जिसके अगम्य स्वरूप का वर्णन निगमागम से परे है। वही सब
का मङ्गल करें :-
वेदत्रयी वा निगमत्रयी वा यस्या स्वरूपं गदितुं न शक्ताः ।
संसारजन्म स्थिति नाश हेतु सा कापि ‘शक्ति’ कुशलं करोतु ।।
पाश्चात्य वैज्ञानिक उसे ही ‘सुपर पावर’ कहते हैं ।
हमारे शाक्त ‘परा पराणां परमा’ परा से परां परमा शक्ति कहते
हैं। संसार में सद् असद् जो कुछ कहीं भी कोई भी पदार्थ है,
उसमें वही शक्ति है। वही एक शक्ति जड़, चेतन, स्थावरजंगम
में व्याप्त है :-“एकैव सर्वत्र वर्तते तस्मादुच्यते एका” (अथर्व)
जगत् का आधारभूत वही है “आधारभूता जगतस्त्वमेका”
दुर्गा सप्तशती ।
देवी भागवत उसे ब्रह्मरूपा, नित्या, सनातनी, आत्मा की
शक्ति, अग्नि की दाहकता की तरह सब वस्तुओं में उसी एक
शक्ति को अनुस्यूत कहती हैं :-
सा च ब्रह्म रूपा च नित्या सा च सनातनी ।
यथात्मा च तथा शक्ति यथाऽग्नौदाहिकास्थिता ॥
वह सर्व रूपा शक्ति विश्व का बीज रूप है, शक्ति पुञ्ज
है, सतत् एवं सनातन है। वह सब रूपों में सबकी स्वामिनी
एवं समस्त शक्तियों से समन्वित हैं :-
विश्वस्य बीजं शक्तिभूते सनातनी ॥
सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते ॥
लक्ष्यालक्ष्यस्वरूप चिद् शक्ति (चैतन्य शक्ति) के रूप में
विराट रूप में चारों ओर व्याप्त हैं :—
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्यस्थिता ।
लक्ष्यालक्ष्यस्वरूपा साव्याप्यकृत्स्नं व्यवस्थिता ॥
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