ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
करके चातकका निमित्त । दौड़ते मेघ पानीके साथ ।
तथा करते विश्वको शांत । उसी प्रकार ॥ ६८ ॥
अथवा अनन्य गति जो कमल । उसके लिये है सूर्य यथा काल ।
उदय होकर देता है सकल । सुख विश्वको ॥ ६९ ॥
वैसे अर्जुनको कर कारण । गीता प्रकाशित कर श्रीकृष्ण ।
दूर किया भार जन्म मरण । इस संसारका ॥ १४७० ॥
शास्त्र-रत्नोंकी दीप्ति सकल । तीनों लोकमें कर उज्ज्वल ।
कृष्ण-मुखाकाशमें निर्मल । शोभता गीता-सूर्य ॥ ७१ ॥
पितृ-कुल किया जो पवित्र । पार्थ इस ज्ञानका हो पात्र ।
जिसने किया गीता स्वतंत्र । विश्वका घर ॥ ७२ ॥
द्वैत स्थितिमें आकर गुरु-शिष्य संवाद—
फिर वह जगद्गुरु श्रीकृष्ण । पार्थका जो अद्वय मिलन ।
समेट लेता है उसी क्षण । द्वैत-स्थितिमें ॥ ७३ ॥
जब कहता है यहां श्रीकृष्ण । जीव करता क्या शास्त्र-ग्रहण ।
तब कहता है पार्थ श्रीकृष्ण । कृपा देवकी ॥ ७४ ॥
अजी ! पानेमें निधान । भाग्य लगता अर्जुन ।
भोगमें वह धन । उससे अधिक ॥ ७५ ॥
जैसे क्षीर-सागरके समान । न जमता जो दूधका बर्तन ।
सुर असुरोंको कैसे मंथन । करना पडा है ॥ ७६ ॥
उस प्रयत्नका भी आया फल । आंखोंसे देखा अमृत निर्मल ।
जतन करनेमें है सकल । गये चूक ॥ ७७ ॥
परोसा जो अमृतत्व पानेमें । कारण हुवा जो मृत्यु लानेमें ।
न जान कर भोग भोगनेमें । होता है ऐसा ॥ ७८ ॥
नहुष हुवा जो स्वर्गाधीश्वर । किंतु भूला वहांका व्यवहार ।
इससे सर्प हुवा पृथ्वीपर । जानता है तू ॥ ७९ ॥
ज्ञानेश्वरी ८४०
तूने बहुत पुण्य किया । उससे आज धनंजया ।
सुननेमें सुपात्र भया । गीता-तत्व ॥ १४८० ॥
इस शास्त्रके धनुर्धर । संप्रदायको ओढ़कर ।
आचर तू शास्त्रानुसार । भली भांति ॥ ८१ ॥
नहीं तो अमृत-मंथन । वैसे होगा जान अर्जुन ।
यदि होगा अनुष्ठान । संप्रदाय छोड़ ॥ ८२ ॥
गाय मिली है भली भाग्यसे । किंतु दुहना आता है उसे ।
नहीं तो दूध मिलेगा कैसे । मिलकर भी व्यर्थ ॥ ८३ ॥
वैसे गुरु होकर प्रसन्न । शिष्यको देता है विद्या-दान ।
संप्रदाय-युक्त अनुष्ठान । करनेसे फलती है ॥ ८४ ॥
इसीलिये यहां धनंजय । गीता शास्त्रका जो संप्रदाय ।
कहता सुन इस समय । आदरसे तू ॥ ८५ ॥
इदं ते नातपस्याय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥ ६७ ॥
यह इससे नहीं कहना चाहिये—
तुझे मिला यह जो पार्था । इसमें रखनेसे आस्था ।
तपोहीनको जो सर्वथा । कहना नहीं ॥ ८६ ॥
या तापस भी हुवा अर्जुन । किंतु है गुरु-भक्तिसे हीन ।
उनको वैसे ही दूर मान । जैसे अंत्यजको वेद ॥ ८७ ॥
अथवा पुरोडासु जैसा । मृगको नहीं देते वैसा ।
न दो गीता वैसे तापसा । गुरु-भक्तिहीन ॥ ८८ ॥
तथा तनसे जो है तपता । गुरु-देवको भी है भजता ।
किंतु जो सुनना न चाहता । उसको न कहना ॥ ८९ ॥
न है जिसे तपोभक्ति उसे न कह तू यह ।
ईर्षा जो करता मेरी न चाहता सुने इसे ॥ ६७ ॥
८४१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
ऊपरके दोनों गुण । जिसमें है विद्यमान ।
करने गीता श्रवण । नहीं योग्य ॥ १४९० ॥
उत्तम है जैसे मुक्ताफल । उसमें नहीं रंध्र सरल ।
गुण-प्रवेश होंगे निर्मल । उसमें कैसे ॥ ९१ ॥
सागर होता अति गंभीर । कौन करता है अस्वीकार ।
व्यर्थ जाती वर्षा धनुर्धर । उसपे जो होती ॥ ९२ ॥
दिव्यान्न देकर तृप्तको । व्यर्थ करनेसे उसको ।
वही नहीं दें क्यों भूखेको । उदारतासे ॥ ९३ ॥
हो सुयोग्य वह कितना ही । सुननेमें जिसे प्रेम नहीं ।
उसको गीता कहना नहीं । किसी समय ॥ ९४ ॥
रूप-दर्शी है सुजान नयन । किंतु नहीं परिमलमें प्राण ।
उसको देना सुगंध अर्जुन । उपयोग क्या है ॥ ९५ ॥
इसीलिये तप और भक्ति । यह देखना सुभद्रापति ।
किंतु सुननेमें अनासक्ति । न कहना उसे ॥ ९६ ॥
जिसमें तप और भक्ति । सुननेमें भी अनुरक्ति ।
इतना देखकर भी संगती । धनुर्धर ॥ ९७ ॥
जो है गीता-शास्त्रका निर्माता । वह मैं सकल-लोक-शास्ता ।
उसको जो सामान्य मानता । अपने मनमें भी ॥ ९८ ॥
तथा देव और संतोंकी नित । करता रहता निंदाकी बात ।
उसको गीता सुननेमें पार्थ । नहीं मानो योग्य ॥ ९९ ॥
वैसे उनकी संपूर्ण । सामग्री योग्य है मान ।
किंतु वह दीप बिन । रहता है रातमें ॥ १५०० ॥
अंग गौर और तरुण । ऊपर पहना भूषण ।
किंतु नहीं उसमें प्राण । उपयोग क्या है ॥ १ ॥
सुवर्णका घर सुंदर । निर्माण किया धनुर्धर ।
किंतु है सर्पांगना द्वार । रोक बैठी है ॥ २ ॥
ज्ञानेश्वरी ८४२
बनाया गया नाना विध पक्वान्न । उसमें मिलाया कालकूट मान ।
अथवा छल भरी मैत्री अर्जुन । रहती है जैसे ॥ ३ ॥
वैसे तप भक्ति मेधा । उसकी जान प्रबुद्धा ।
करता जो मेरी निंदा । तथा मद्भक्तोंकी ॥ ४ ॥
इसी कारण तू पांडुकुमार । भक्त तपी मेधावी होनेपर ।
गीता उसको त्याज्य मान कर । न कह तू बाबा ॥ ५ ॥
क्या कहूं यदि वह निंदक । योग्य है सृष्टिकर्ता सरीखा ।
गीता-ग्रंथ यह सकौतुक । न दे उसको ॥ ६ ॥
तभी है तपका धनुर्धर । पत्थरका बाडा बना कर ।
रचा गुरु-भक्तिका सुंदर । प्रासाद जिसने ॥ ७ ॥
वैसे ही श्रवणेच्छा द्वार । खुला रखना चारों प्रहर ।
फिर रचा कलश सुंदर । अनिंदा रत्नका ॥ ८ ॥
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥ ६८ ॥
मेरे भक्तोंसे जो यह गीता कहेगा वह मद्रूप होगा—
देख ऐसा भक्तालय सुंदर । प्रतिष्ठा कर वहां गीतेश्वर ।
तुलेगा तू मेरे समान फिर । इस विश्वमें निश्चित ॥ ९ ॥
क्यों कि जो एकाक्षरपनमें । तीन मात्राओंके उदरमें ।
फंसाथा वहां गर्भ-वासमें । यह प्रणव ॥ १५१० ॥
यह वेद-बीज जो ओंकार । गीता विस्तारसे फैलकर ।
या गायत्री फल-फूलकर । आयी है श्लोकोंमें ॥ ११ ॥
यह जो मंत्र-रहस्य गीता । मेरे भक्तोंसे जो है कहता ।
अनन्य शिशुको जैसे माता । देती है जीव ॥ १२ ॥
कहेगा गूढ जो श्रेष्ठ मेरे भक्त-गणों सह ।
उसी परम भक्ती से मिलेगा मुझमें वह ॥ ६८ ॥
८४३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-गोम
अध्याय १५: पुरुषोत्तमयोग
वैसे भक्तोंको जो गीतासे । परिचय कराता ऐसे ।
देह-पातपे है मुझसे । मिलता वह ॥ १३ ॥
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ६९ ॥
उसे मैं अपना हृदय-सिंहासन देता हूं—
अथवा ले शरीरका भूषण । लेकर रहता है भिन्न जान ।
तब भी मेरा यह जीव प्राण । जान तू पार्थ ॥ १४ ॥
ज्ञानी कर्मठ तापस । जो है ये मेरे मानस ।
इनमें वह विशेष । प्रिय है मेरा ॥ १५ ॥
भूतल पर ऐसे संपूर्ण । अन्य कोई नहीं है अर्जुन ।
गीता कहता जो भक्त-जन- । मेलेमें मेरे ॥ १६ ॥
धरके मुझ ईश्वरका लोभ । गीता कहता है जो हो अक्षय ।
वह भूषण होता है सुलभ । संत-समाजका ॥ १७ ॥
नव-पल्लवोंसा रोमांचित । तथा मंदानिलसा कंपित ।
आमोद-जलसा हो द्रवित । पुष्य-नयन जैसे ॥ १८ ॥
कोकिल कल-रव वत । सगद्गद करके बात ।
मद्भक्तोग्रानमें वसंत । करता प्रवेश ॥ १९ ॥
सफल जन्म माने जैसे चकोर । वैसे उदित होता शशि अंबर ।
या नव-मेघ आते सुन पुकार । मयूरके जैसे ॥ १५२० ॥
वैसे सज्जनोंके मेलेमें जाकर । गीता पद रत्नोंका बरखा कर ।
मेरे स्वरूप प्राप्तिकी हेतु भर । रख अपनेमें ॥ २१ ॥
तब उससे मेरा कोई प्रिय । नहीं दीखता मुझे धनंजय ।
मेरे भक्तोंके सारे समुदाय । मध्यमें और ॥ २२ ॥
कोई मेरा नहीं पार्थ उससे बढके प्रिय ।
वैसे ही न कभी होगा जगमें उससे प्रिय ॥ ६९ ॥
ज्ञानेश्वरी ८४४
क्या कहूं मैं तुझे अब अर्जुन । संतोंको देता जो गीता भोजन ।
देता हूं मैं उसको सिंहासन । मेरे अंतःकरणका ॥ २३ ॥
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥ ७० ॥
मेरा तेरा यह जो मिलन । जिससे बढ़ा यह कथन ।
खिला मोक्ष-धर्मका जीवन । जिस स्थानपे ॥ २४ ॥
यह जो सकालार्थ प्रद । हम दोनोंका है संवाद ।
नहीं करके पद-भेद । करना आवर्तन ॥ २५ ॥
उस ज्ञानाग्निमें जो है प्रदीप्त । मूल अविद्या-आहुति दे पार्थ ।
किया है मुझको संतोषित । परमात्मा मैं ॥ २६ ॥
करने गीतार्थ विवेचन । ज्ञानियोंमें जो है बुद्धिमान ।
प्राप्त होते हैं कर पठन । ब्रह्म-रूप यह ॥ २७ ॥
गीता पाठकको भी ऐसे । फल अर्थज्ञको है जैसे ।
गीता-मातामें भेद ऐसे । न है छोटे बडेका ॥ २८ ॥
श्रद्धावाननसूयश्चशृणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥ ७१ ॥
तथा सभी मार्गमें निंदा । छोड़कर आस्था में शुद्ध ।
गीता श्रवणमें ही श्रद्धा । रखता है जो ॥ २९ ॥
करेंगे जब उनके कान । गीताके अक्षरोंका श्रवण ।
करेंगे दुरित पलायन । उसी समय ॥ १५३० ॥
वनमें होते ही अग्निका प्रवेश । वहां करते जो पशु-पक्षी वास ।
छोड दौड़ते हैं दिशाएं दस । मिलती जहां राह ॥ ३१ ॥
यह जो धर्म-संवाद अभ्यासेंगे जहां कहीं ।
मानता पूजते हैं वे मुझको ज्ञान-यज्ञसे ॥ ७० ॥
सुनेगा यह जो कोई श्रद्धासे द्वेष छोडके ।
पायेगा कर्म-पूतोंकी मुक्त हो वह सद्गती ॥ ७१ ॥
८४५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
अथवा जैसे उदयाचल पर । झलकते ही रवि-किरणके हार ।
खो जाता है अंतरालमें तिमिर । उसी भांति ॥ ३२ ॥
वैसे ही कर्णोंके महाद्वार । सुनते हैं गीताका गजर ।
मिटता है सभी पाप भार । सृष्ट्यादिका भी ॥ ३३ ॥
इससे भावी जन्म सर्वत्र । होते जाते हैं अति पवित्र ।
इससे अन्य ऐसे हैं अत्र । भारी पुण्य ॥ ३४ ॥
तथा इस गीताके हैं अक्षर । कानोंसे जाके हृदय-गव्हर ।
उतने ही करते हैं जो पूर । अश्वमेध याग ॥ ३५ ॥
तभी है श्रवणसे पाप हरता । वैसे ही धर्मको उन्नत करता ।
इससे स्वर्गका राज्य है मिलता । अंतमें जो ॥ ३६ ॥
मेरे पास आनेमें अर्जुन । स्वर्ग है पहला ही सदन ।
उसको भोग फिर सज्जन । मिलते मुझमें ही ॥ ३७ ॥
इस प्रकार गीता पार्था । जो सुनता और पढ़ता ।
उसे ब्रह्मानंद मिलता । मेरे रूपका ॥ ३८ ॥
यह सारा रहने दे पार्थ । किस लिये तुझे कही गीता ।
उसका क्या हुवा है स्पष्टता । कह तू मुझे ॥ ३९ ॥
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसः ।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनंजय ॥ ७२ ॥
सुन कर स्व-अज्ञान जन्य मोह दूर हुवा क्या—
तो तू मुझसे कह अर्जुन । यह शास्त्र-सिद्धांत संपूर्ण ।
किया न चित्त देके श्रवण । जीवभावसे ॥ १५४० ॥
हमने यहां जैसे जिस भांति । कानोंको दी है गीताकी संपत्ति
कानोंसे वह हृदयमें पूर्ति । रोपी है न ? ॥ ४१ ॥
इसे तूने सुना है न पूरा एकाग्र चित्तसे ।
अज्ञान रूप जो तेरा मिटा क्या मोह मूलता ॥ ७२ ॥
ज्ञानेश्वरी ८४६
अथवा वह बीचमें । गिरा फैला है व्यर्थमें ।
या वैसे ही उपेक्षामें । दिया छोड़ ॥ ४२ ॥
या मैंने जैसे कथन किया । हृदयमें वैसे रोपन भया ।
मुझसे कह तू धनंजया । पूछता हूं मैं ॥ ४३ ॥
था जो स्व-अज्ञान जनित । मोहमें हो चित्त भ्रमित ।
कर्माकर्म-मोहकी बात । रही क्या अब ॥ ४४ ॥
यह सब भला मैं क्यों पूछता । यह मैं करता या न करता ।
यह अपने हाथमें मानता । क्या तू अब भी ॥ ४५ ॥
स्वानंदैक्य इसमें पार्थ । गलेगा मान कर द्वैत ।
भावमें लाता लक्ष्मीनाथ । प्रश्न करके ॥ ४६ ॥
अर्जुनका समरसैक्यसे द्वैतमें अवतरण—
पूर्ण-ब्रह्म हुवा है पार्थ । अगला कार्य साधनार्थ ।
नहीं होने देता श्रीकांत । मर्यादा भंग ॥ ४७ ॥
स्वयं वैसे जो करता । सर्वज्ञ क्या नहीं जानता ।
किंतु श्रीकृष्ण है पूछता । सकारण ही ॥ ४८ ॥
ऐसे करके वह प्रश्न । लुप्त-प्राय अर्जुनपन ।
पूर्णत्वसे लाके कथन । कराता है अब ॥ ४९ ॥
जैसे क्षीराब्धि तटपर । नभमें बैठा रश्मिकर ।
अभिन्न हो भिन्न होकर । दीखता पूर्णचंद्र ॥ १५५० ॥
वैसे ब्रह्म मैं यह भूलता । ब्रह्मसे विश्व ही भरता ।
यह भी भूल सहज होता । स्वयं ब्रह्मत्व ॥ ५१ ॥
भूलता स्मरता ऐसे ब्रह्मत्व । देह दुख सीमापे मान तत्व ।
अर्जुन मैं ऐसा नाम-रूपत्व । लेके खडा रहा ॥ ५२ ॥
फिर वह कंपित करतल । दबाकर कुछ रोमांच-मूल ।
अपने आपमें ही स्वेद जल । पचा करके ॥ ५३ ॥
८४७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
प्राण-क्षोभसे डुलता हुवा । अंग अंगसे संभाला हुवा ।
हल चल सब भूल हुवा । खडा सूना स्तंभसा ॥ ५४ ॥
नेत्र-युगलसे बहते । आनंदामृतसे झरते ।
आंसुओंको जो संभालते । अति कष्टसे ॥ ५५ ॥
विविध औत्सुक्यका भार । भरा था गलेमें आकर ।
उसको कुछ दबाकर । हृदयमें तब ॥ ५६ ॥
वाचाका द्रवना । प्राण संभालना ।
अक्रम श्वासन । सुचारुकर ॥ ५७ ॥
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहःस्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥
तेरा दर्शन सब कुछ देता है—
अर्जुन कहता यह क्या देव । पूछता क्या रहा अब भी मोह ।
गया वह स-कुटुंब छोड ठाव । लेकर सब साथ ॥ ५८ ॥
पास आकरके दिनकर । पूछता आ आंखोंसे अंधार ।
दीखता क्या कहो किसी ओर । दीखेगा क्या वह ॥ ५९ ॥
ऐसा है तू श्रीकृष्ण । हमें देता दर्शन ।
क्या न देगा दर्शन । यही हमको ॥ १५६० ॥
फिर प्रेमसे माताके समान । कहता है बोध पूर्ण वचन ।
किसी उपायसे न होता ज्ञान । उस विषयमें ॥ ६१ ॥
और पूछता मोह है या नहीं । ऐसा यह पूछना रहा कहीं ।
कृतकृत्य हुवा मैं मुझमें ही । तेरे ही रूपसे ॥ ६२ ॥
अर्जुनने कहा
मिटा है मोह तो देव कृपासे बोध भी हुवा ।
हुवा निःशंक मैं आज करूंगा जो कहा मुझे ॥ ७३ ॥
ज्ञानेश्वरी ८४८
उलझा था मैं अर्जुनपनसे । मुक्त हुवा हूं समरैक्यसे ।
अब कहना पूछना जो ऐसे । नहीं रहा कुछ ॥ ६३ ॥
अब मैं तेरे ही प्रसादसे । प्राप्त जो इस आत्मबोधसे ।
मोहको सब मूल रूपसे । भूल गया हूं ॥ ६४ ॥
तेरे बिना भिन्न कुछ न होनेसे संदेह भी नहीं रहा—
अब करना या नहीं करना । रहता यह कैसे द्वैत-स्थान ।
वह न रहा तेरे बिन भिन्न । कहीं भी यहां ॥ ६५ ॥
इस विषयमें मुझमें कहीं । संदेहका नाम तक भी नहीं ।
त्रिशुद्धि-पूर्वक कर्म है नहीं । वह मैं हुवा आज ॥ ६६ ॥
तुझसे पाकर स्व-स्वरूप । कर्तव्य मिटा है पूर्ण रूप ।
अब रहा है आज्ञाके रूप । करना सारा ॥ ६७ ॥
क्यों कि जो दृश्य दृश्यको नाशता । तथा जो द्वैत द्वैतको ग्रासता ।
एक ही एक सर्वत्र बसता । सर्वकाल ॥ ६८ ॥
जिस संबंधसे बंधुत्व मिटता । जिसके लोभसे लोभही टूटता ।
मिलनेसे जो सब ही मिल जाता । अपनेमें आप ॥ ६९ ॥
वह जो गुरु-लिंग तू मेरा । एकत्वको जो पोसता है सारा ।
उसके लिये कहते हैं पूरा । अद्वय बोध ॥ १५७० ॥
स्वयं आप ही हो कर ब्रह्म । दूर कर कृत्याकृत्य कर्म ।
फिर करना जो निःसीम । सेवा जिसकी ॥ ७१ ॥
सिंधुसे गंगा मिलने गयी । मिलते ही समुद्र हो गयी ।
वैसे भक्तोंको सेवा हो गयी । जिस पदकी आज ॥ ७२ ॥
वह तू मेरा निरुपचार । श्रीकृष्ण सेव्य जगदीश्वर ।
मानता ब्रह्मत्व उपकार । ऐसा है तो ॥ ७३ ॥
हम दोनोंमें जो आड़ । था जो भेदका किवाड़ ।
दूर कर दिया गोड़ । सेवाके रूपमें ॥ ७४ ॥
(93) ८४९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-जोश
तब अब होती जो आज्ञा । सकल देवाधिदेवराज्ञा ।
मान करूंगा हेतु अनुज्ञा । किसी भी बातकी ॥ ७५ ॥
सुन अर्जुनके यह बोल । नाचता देव सुखसे भूल ।
कहता फला विश्वका फल । अर्जुन रूपसे ॥ ७६ ॥
खिला हुवा पूर्ण सुधाकर । देख अपना यह कुमार ।
सीमा भूलके क्षीर सागर । बढ़ता जैसे ॥ ७७ ॥
ऐसे संवादकी वेदी पर । दोनोंका भावैक्य देखकर ।
आया महदानंदसे भर । संजय हृदय ॥ ७८ ॥
ऐसे हृदयानंदातिशयसे । कहता संजय धृतराष्ट्रसे ।
बादरायणकी कृपासे कैसे । उद्धार हुए हम ॥ ७९ ॥
अजी आज आपने जो अवधारा । नहीं चर्म-चक्षुभी जो संसारा
किंतु ज्ञान दृष्टिके हैं व्यवहार । जानलिये जो ॥ १५८० ॥
रथमें लगते हैं जो घोडे । उन्हें लेने हमें रख छोडे ।
किंतु आज हुवा खडे खडे । ज्ञानबोध ॥ ८१ ॥
तथा युद्धका जो निर्वाण । होता है अत्यंत दारुण ।
दोनोंकी हार होगी समान । अपनी ही ॥ ८२ ॥
व्यासकी ऐसी कृपा महान । जहां युद्धसा कष्ट दारुण ।
वहां ब्रह्मानंद निरावरण । देते हैं सहज ॥ ८३ ॥
संजय कहता है यहां ऐसे । राजा कुछ भी न हुवा जैसे ।
तटस्थ रहा पाषाण जैसे । न द्रवता चांदनीमें ॥ ८४ ॥
संजय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥
संजयने कहा
जो कृष्णार्जुनका ऐसा हुवा संवाद अद्भुत ।
सुना मैने बडोंसे जो खिलाता रोमरोमको ॥ ७४ ॥
ज्ञानेश्वरी ८५०
देख यह स्थिति राजाकी । वाणी मूक बनी संजयकी ।
फिर भी अनुभूति ले सुखकी । पगलायीसी ॥ ८५ ॥
भूलके हर्षावेगसे । कहता था जो राजासे ।
अयोग्य यह इसे । जान कर भी यह ॥ ८६ ॥
फिर कहता है कुरुनंदन । ऐसे तेरे बंधु-पुत्र अर्जुन ।
बोला तब सुन यह श्रीकृष्ण । कहता अति मधुर ॥ ८७ ॥
कृष्णार्जुनके अद्वय-भावका वर्णन—
पूर्व-पश्चिम सागर । देखनेमें भिन्न पर ।
संपूर्ण एक है नीर । उसी भांति ॥ ८८ ॥
श्रीकृष्ण अर्जुन हैं ऐसे । भिन्न हैं केवल तनसे ।
किंतु हैं संवादमें जैसे । सदा अभिन्न ॥ ८९ ॥
स्वच्छ होते हैं जो दर्पणसे । आते ही दोनों सम्मुख जैसे ।
देखते हैं परस्पर ऐसे । आपसमें आप ॥ १५९० ॥
वैसे श्रीकृष्णमें पांडुसुत । देखता है अपने सहित ।
वैसे ही अर्जुनमें अनंत । देखता अपनेको ॥ ९१ ॥
भक्तके लिये देव जो अवकाश । देखता था भक्त वही अवकाश ।
अब दोनोंमें एक ही अवकाश । देखता है पार्थ ॥ ९२ ॥
और कुछ भी नहीं । अपने बिन कहीं ।
यह मानके वहीं । रहे वे दोनों ॥ ९३ ॥
यदि द्वेत ही अब न रहा । तब प्रश्नोत्तर कहां रहा ।
अथवा यदि द्वैत भी रहा । कहां संवाद सुख ॥ ९४ ॥
बोलते थे ऐसा दूजापनसे । निगला द्वैतका संवाद ऐसे ।
वह बोलना मैंने सुना ऐसे । दोनोंका कहा ॥ ९५ ॥
स्वच्छ कर दो दर्पण । सम्मुख रखे हैं जान ।
उसमें देखता कौन । कहे कैसे ॥ ९६ ॥
८५१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग'
अथवा दीपके सम्मुख । रखके दीप और एक ।
कौन किसका प्रयोजक । कहे कौन ॥ ९७ ॥
अथवा अर्कके सम्मुख अर्क । उदय हुवा मानो और एक ।
कौन कहें उसमें प्रकाशक । तथा प्रकाश्य कौन ॥ ९८ ॥
करनेमें इसका निश्चय । कुंठित हो जाता है निश्चय ।
दोनों हुए हैं इस समय । संवाद रूप ॥ ९९ ॥
मिलते दो ओघ जिस स्थान । उनको कर देनेमें भिन्न ।
रख दिया बीचमें लवण । क्षणमें होगा जैसे ॥ १६०० ॥
कृष्णार्जुनके संवादमें संजयका लय होना—
वैसे श्रीकृष्ण और अर्जुन । संवादते हैं मन ही मन ।
उसे सोचनेमें मेरा मन । हुवा है वैसे ॥ १ ॥
ऐसे संजय कहता नहीं । सात्विक भाव इतनेमें ही ।
ले जाते स्मृति न जाने कहीं । संजयपनकी ॥ २ ॥
रोमांचित हुवा बदन । वैसे ही संकुचित तन ।
स्वेद स्तंभको है कंपन । रोकता एक ॥ ३ ॥
अद्वय-आनंदके स्पर्शसे । रसमय हुई दृष्टि जैसे ।
प्रेमका सोता ही बना जैसे । नहीं ये अश्रु ॥ ४ ॥
न जाने उसमें क्या नहीं समाता था । अथवा गलेमें कहां क्या अटका था ।
किंतु सिसकीसे वाणी-मार्ग रुका था । न उमडते शब्द ॥ ५ ॥
अथवा अष्ट सात्विक भाव । बनाते थे संजयको ठाव ।
तब हुवा संजय चौराहा । संवाद सुखका ॥ ६ ॥
उस सुखकी ऐसी जाति । अपने आप होती शांति ।
आयी है फिर देह-स्मृति । संजयकी तब ॥ ७ ॥
स्थिर होकर वह आनंद । कहता है जो उपनिषद् ।
नहीं जानते व्यास-प्रसाद- । से सुना मैंने ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ८५२
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद् गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥ ७५ ॥
वह एकांतकी गोष्ठि । ब्रह्मत्वकी पडी मिठी ।
मैं तू पनकी जो दृष्टि । मिट गयी पूरी ॥ ९ ॥
योग जो ये संपूर्ण । आते हैं जिस स्थान ।
सुलभ वे वचन । किये व्यासदेवने ॥ १६१० ॥
दिखाकर अर्जुनका कारण । बता करके अपनेको भिन्न ।
अपने दिये बोल वचन । आप ही देव ॥ ११ ॥
वहां हैं मेरे ये श्रोत्र । सुननेमें हुए पात्र ।
क्या कहें यह स्वतंत्र । सामर्थ्य गुरूका ॥ १२ ॥
राजन् संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥ ७६ ॥
बोलनेमें हुवा वह विस्मित । जिससे हो गया है देह विस्मृत ।
रत्नमें हो रत्नसे प्रकाशित । छिपता है जैसे ॥ १३ ॥
हिमालयके जो सरोवर । होते चंद्रोदयमें काश्मीर ।
सूर्योदयमें पिघल कर । बहते जैसे ॥ १४ ॥
वैसे होते ही शरीरका स्मरण । संजय करता संवाद धारण ।
यही होता देह विस्मृतिके कारण । दूसरी बार ॥ १५ ॥
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ ७७ ॥
योग-गुह्य महाश्रेष्ठ कृपासे व्यासदेवकी ।
सुना प्रत्यक्ष जो मैने कहा योगेश कृष्णने ॥ ७५ ॥
जो कृष्णार्जुन संवाद राजन् अद्भुत पावन ।
सोचके मनमें भारी हर्षता मैं पुनः पुनः ॥ ७६ ॥
स्मरके वह जो रूप हरिका अति अद्भुत ।
राजन् विस्मित होके मैं नचता हूं पुनः पुनः ॥ ७७ ॥
८५३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
फिर खडा हो कहता नृप । श्रीहरिका देख विश्व-रूप ।
देख कर ऐसे बैठा कैसे चुप । किस प्रकार ॥ १६ ॥
न देख कर जो दीखता । न होकर जो है रहता ।
न स्मरकर भी स्मरता । उसे टालता कैसे ॥ १७ ॥
देख कर यह चमत्कार । बैठनेमें भी नहीं विस्तार ।
मुझ सह वह महापूर । ले जाता बहाके ॥ १८ ॥
ऐसा है श्रीकृष्णार्जुन । संवाद संगम स्थान ।
कर देता तिल-दान । अहंताका मैं ॥ १९ ॥
उमड असंवृत्त आनंद । अलौकिक सिसक सद्गद ।
करता श्रीकृष्ण कृष्ण शब्द । अपने आप ॥ १६२० ॥
धृतराष्ट्रकी जडता दर्शन—
ये जो अष्ट-सात्विक भाव । न जाने कौरवका गांव ।
तब कल्पना हो संभव । कैसे राजाको ॥ २१ ॥
उस सुख-लाभकर अनुभव । अपनेमें लाकर स्थिर भाव ।
पचालिये अष्ट सात्विक-भाव । संजयने अपनेमें ॥ २२ ॥
इतनेमें है राजा कहता । युद्धमें कब क्या होता जाता ।
यह सब कहने निमित्त । रखा तुझे व्यासने ॥ २३ ॥
वह छोड़ कर तू यह ऐसे । बिठाया गया किस उद्देश्यसे ।
सब भूलकर क्या ऐसे वैसे । बोलता अप्रासंगिक ॥ २४ ॥
वनका जब प्रासादमें आता । दस दिशा सब सूना मानता ।
या उदयसे पिशाच जानता । रात हुई अब ॥ २५ ॥
जिसका जो गौरव न जानता । उसको विपरीत ही लगता ।
तभी है अप्रासंगिक कहता । इसमें क्या अचंबा ॥ २६ ॥
फिर कहता कह प्रस्तुत । लडाई चली है जो सांप्रत ।
उसमें किसकी हार जीत । होती यह कह तू ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी ८५४
वैसे कहता अपना मन । सहज विचार कर क्षण ।
पराक्रममें है दुर्योधन । अधिक हमारा ॥ २८ ॥
यह छोड़ करभी कहां । सैन्य रहा है ड्योढ़ा जहां ।
विजय निश्चय है वहां । सहज प्राप्त ॥ २९ ॥
हमको अब लगता ऐसे । किंतु तेरा ज्योतिष है कैसे ।
कह संजय जैसे है वैसे । मुझसे तेरी बात ॥ १६३० ॥
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥
गीताकी फलश्रुति—
प्रश्न सुन यह संजय कहता । किसका क्या होगा यह न जानता ।
जहां आयुष्य वहां जीवन होता । जानता यह ॥ ३१ ॥
चंद्र जहां चंद्रिका । शंभु जहां अंबिका ।
संत्र जहां विवेका । होता ही है ॥ ३२ ॥
नृपति जहां सैनिक । सौजन्य जहां संपर्क ।
अग्निमें जैसे दाहक । शक्ति है होती ॥ ३३ ॥
दया जहां वहां धर्म । वहां सुखायाम ।
सुखमें पुरुषोत्तम । रहता वैसे ॥ ३४ ॥
वसंत जहां वहां वन । वन जहां वहां सुमन ।
सुमन सह है गूंजन । सदा भ्रमरोंका ॥ ३५ ॥
गुरु जहां वहां ज्ञान । ज्ञानसे आत्म-दर्शन ।
दर्शनमें समाधान । होता नित्य ॥ ३६ ॥
जहां भाग्य वहां विलास । विलासमें रहा उल्हास ।
जहां सूर्य वहां प्रकाश । होता सहज ॥ ३७ ॥
योगेश्वर जहां कृष्ण जहां पार्थ धनुर्धर ।
वहां मैं देखता नित्य धर्म श्री जय वैभव ॥ ७८ ॥
८५५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-नोब
वैसे सकल पुरुषार्थ । होते हैं स्वामी सह नाथ ।
जहां रहता है श्रीनाथ । वहां है श्री ॥ ३८ ॥
जहां अपने पति सहित । जगन्माता रहती है नित ।
अणिमादि सिद्धि दास्य-रत । रहती हैं वहां ॥ ३९ ॥
स-शरीर कृष्ण विजय-रूप । रहता सदा जिसके समीप ।
उसीके साथ जय है आप । चलेगा सदैव ॥ १६४० ॥
विजय नामसे पार्थ विख्यात । विजय स्वरूप श्रीकृष्ण नाथ ।
श्रिया सह विजय है निश्चित । उसी स्थान ॥ ४१ ॥
ज्ञानेश्वरका राष्ट्र-प्रेम-
जिस देशका है वह घास । उसमें माता पिताका है वास ।
कल्पतरुको भी स-उल्हास । जीतेगा वह ॥ ४२ ॥
उस देशका सब पाषाण । क्यों न हो चिंतामणि संपूर्ण ।
उस भूमिमें है क्या कारण । न आये चैतन्य ॥ ४३ ॥
उस देशके जो नदी प्रवाह । बहें न क्यों लें अमृत अथाह ।
अचरण नहीं है राजन् यह । विचार कर देख ॥ ४४ ॥
जिसके सहज शब्द । बनते हैं जहां वेद ।
सदेह सच्चिदानंद । क्यों न कहें उन्हें ॥ ४५ ॥
अर्जुनका भाग्य-
स्वर्गापवर्ग दोनों मान । पद हैं उसके आधीन ।
माता लक्ष्मी और श्रीकृष्ण । पिता जिनके साथ ॥ ४६ ॥
जिसका कहना सदा लोभ । उस लक्ष्मीका जो वल्लभ ।
सर्व सिद्धि सह है स्वयंभु । खडा है जहां ॥ ४७ ॥
बनता है समुद्रसे मेघ । उपयोगमें उससे चांग ।
वैसे पार्थको आया सुयोग । इस समय ॥ ४८ ॥
कनकत्व दीक्षाका जो गुरु । परिस लोहसे श्रेष्ठ तर ।
किंतु है चलाता व्यवहार । वही जगका ॥ ४९ ॥
ज्ञानेश्वरी ८५६
गुरुत्व होता है यहां निम्न । करेगा ऐसा कोई कथन ।
प्रकाश देता है दीप बन । अग्नि ही श्रेष्ठ ॥ १६५० ॥
परमात्मासे शक्ति ले अर्जुन । हुवा है उससे भी बलवान ।
उपरोक्त स्तुति गौरव सुन । तुष्ट होता देव ॥ ५१ ॥
सभी गुणोंमें पुत्रसे हीन । होना चाहता आपका मन ।
यह इच्छा श्रीकृष्णकी मान । हुई सफल ॥ ५२ ॥
अथवा मानो ऐसे नृप । हुवा है पार्थ कृष्णकृपा ।
जिस ओर वह साक्षेप । जीत है वहीं ॥ ५३ ॥
वही विजयका निश्चित स्थान । इसमें संदेह नहीं है जान ।
वहां जो जय नहीं मिला मान । वह जय ही नहीं ॥ ५४ ॥
इसीलिये जहां श्री श्रीकांत । वहां है तुम्हारा पांडुसुत ।
वहां सदा विजय समस्त । अभ्युदय सारा ॥ ५५ ॥
यदि व्यासके वचन पर । विश्वास सच्चा है नृपवर ।
तब मेरे शब्द मानकर । चलना ध्रुव है ॥ ५६ ॥
जहां वह श्रीवल्लभ । जहां है भक्त-कदंब ।
वहां सुख और लाभ । होगा कल्याणका ॥ ५७ ॥
यदि होंगे ये बोल असत्य । न कहाऊंगा व्यासका शिष्य ।
गर्जन कर यह अवश्य । किया हाथ ऊपर ॥ ५८ ॥
एक श्लोकमें भारतका सार—
एवं भारतका सब सार । एक श्लोकमें ला भरकर ।
देता है संजय नृपवर । धृतराष्ट्रके हाथमें ॥ ५९ ॥
जैसे वह्नि कितना न जानकर । उसे बातिके अग्रपे रखकर ।
लाते सूर्यकी अनुपस्थिति पर । सहाय्यार्थ ॥ १६६० ॥
वैसे शब्द ब्रह्म अनंत । हुवा सव्वा लक्ष भारत ।
भारतके जो शत-सात । गीता सर्वस्व ॥ ६१ ॥
८५७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
उन्हीं जो सात शतोंका । इत्यर्थ शेष श्लोकका ।
व्यास-शिष्य संजयका । पूर्णोद्गार ॥ ६२ ॥
इसी एक श्लोक पर । पूर्ण विरक्त होकर ।
सब इच्छाओंका सार । पायेगा निश्चित ॥ ६३ ॥
गीता महिमा वर्णन-
ऐसे ये श्लोक शत-सात । गीता पद उठाते हैं नित ।
ये शब्द क्या परामृत । कहें आकाशका ॥ ६४ ॥
या आत्मराजाकी गीता सभा । इसे उठाते हैं ये श्लोक स्तंभ ।
अनुभवती ऐसी प्रतिभा । यहां मेरी ॥ ६५ ॥
अथवा यह गीता सप्तशती । जो मंत्र प्रतिपाद्य भगवती ।
मोह-महिषासुरसे दे मुक्ति । आनंदती है ॥ ६६ ॥
इसीलिये काया वाचा मन । करता जो इसका सेवन ।
उसे दे स्वानंद सिंहासन । करती सम्राट ॥ ६७ ॥
अथवा अविद्याका अंधार । जीतने सूर्यसे बाजी मार ।
ऐसे श्लोक गीता कहकर । प्रकट किये देवने ॥ ६८ ॥
या श्लोकाक्षर द्राक्षालता । फैल मांडव बनी गीता ।
संसार पथिक वे जो शांत । विश्रांति ले यहां ॥ ६९ ॥
या भाग्यवंत संत-अलि-कुल । बनाकर श्लोक-रूप कमल ।
श्रीकृष्ण तडागमें खिली बेल । गीता-कमलकी ॥ १६७० ॥
अथवा श्लोक नहीं ये जान । लगता गीताका महिमान ।
बखानते हैं बंदी जन । अखंड जैसे ॥ ७१ ॥
या श्लोकोंका किला बनाकर । सप्त-शत करके सुंदर ।
सर्वांगम आये गीता पुर । बसानेको यहां ॥ ७२ ॥
या निजकांता आत्मासे । मिलने आयी प्रीतिसे ।
बाहु पसारके ऐसे । श्लोक रूप ॥ ७३ ॥
ज्ञानेश्वरी ८५८
या गीता कमलका भृंग । या गीता सागर तरंग ।
या हैं श्रीहरिके तुरंग । गीता रथके ॥ ७४ ॥
या श्लोक सर्व तीर्थ समूह । मिले हैं गीता-गंगा प्रवाह ।
अर्जुन सिंहस्थ पर्व यह । आया है मान ॥ ७५ ॥
या नहीं यह श्लोक श्रेणी । किंतु अचिंत्य चिंतामणि ।
या निर्विकल्पमें लागणी । कल्पतरुकी ॥ ७६ ॥
सात शत श्लोक हैं जो ऐसे । बढे चढे हैं एक एकसे ।
किसका वर्णन करें कैसे । चुनाव करके ॥ ७७ ॥
दीप पहला क्या पिछला । छोटा या रवि मोटा भला ।
भेद गहरा या उथला । क्या अमृत सिंधुमें ॥ ७८ ॥
या बछिया और बछौना । कामधेनुमें भेद नाना ।
व्यर्थकी है गोष्ठी करना । न करने जैसी ॥ ७९ ॥
आदि है अथवा अंत । गीता श्लोककी है बात ।
जैसे पुष्प पारिजात । नया या पुराना ॥ १६८० ॥
इसमें नहीं न्यून अधिक । समान इसके सभी श्लोक ।
तथा न वाच्य वाचक । भेद भी इसमें ॥ ८१ ॥
इस शास्त्रमें है एक । श्रीकृष्ण वाच्य वाचक ।
जानते हैं सभी लोक । प्रसिद्ध यह ॥ ८२ ॥
इसका अर्थदान और पठन । फल-प्राप्तिमें एकही समान ।
वैसे वाच्य वाचकमें अभिन्न । भाव साधना यह ॥ ८३ ॥
इसीलिये मुझे इस समय । कहना नहीं है कोई विषय ।
मानो सब गीता है वाङ्मय । मूर्ति प्रभुकी ॥ ८४ ॥
शास्त्र-पठनमें अर्थ-फल । देकर जाते हैं ये सकल ।
ऐसे नहीं यह केवल । पर-ब्रह्मही है ॥ ८५ ॥
जगतपे करुणाकर । महानंद सुगम कर ।
अर्जुनको निमित्त कर । किया प्रकट ॥ ८६ ॥
८५९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग