ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउलझा था मैं अर्जुनपनसे । मुक्त हुवा हूं समरैक्यसे ।
अब कहना पूछना जो ऐसे । नहीं रहा कुछ ॥ ६३ ॥
अब मैं तेरे ही प्रसादसे । प्राप्त जो इस आत्मबोधसे ।
मोहको सब मूल रूपसे । भूल गया हूं ॥ ६४ ॥
तेरे बिना भिन्न कुछ न होनेसे संदेह भी नहीं रहा—
अब करना या नहीं करना । रहता यह कैसे द्वैत-स्थान ।
वह न रहा तेरे बिन भिन्न । कहीं भी यहां ॥ ६५ ॥
इस विषयमें मुझमें कहीं । संदेहका नाम तक भी नहीं ।
त्रिशुद्धि-पूर्वक कर्म है नहीं । वह मैं हुवा आज ॥ ६६ ॥
तुझसे पाकर स्व-स्वरूप । कर्तव्य मिटा है पूर्ण रूप ।
अब रहा है आज्ञाके रूप । करना सारा ॥ ६७ ॥
क्यों कि जो दृश्य दृश्यको नाशता । तथा जो द्वैत द्वैतको ग्रासता ।
एक ही एक सर्वत्र बसता । सर्वकाल ॥ ६८ ॥
जिस संबंधसे बंधुत्व मिटता । जिसके लोभसे लोभही टूटता ।
मिलनेसे जो सब ही मिल जाता । अपनेमें आप ॥ ६९ ॥
वह जो गुरु-लिंग तू मेरा । एकत्वको जो पोसता है सारा ।
उसके लिये कहते हैं पूरा । अद्वय बोध ॥ १५७० ॥
स्वयं आप ही हो कर ब्रह्म । दूर कर कृत्याकृत्य कर्म ।
फिर करना जो निःसीम । सेवा जिसकी ॥ ७१ ॥
सिंधुसे गंगा मिलने गयी । मिलते ही समुद्र हो गयी ।
वैसे भक्तोंको सेवा हो गयी । जिस पदकी आज ॥ ७२ ॥
वह तू मेरा निरुपचार । श्रीकृष्ण सेव्य जगदीश्वर ।
मानता ब्रह्मत्व उपकार । ऐसा है तो ॥ ७३ ॥
हम दोनोंमें जो आड़ । था जो भेदका किवाड़ ।
दूर कर दिया गोड़ । सेवाके रूपमें ॥ ७४ ॥
(93) ८४९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-जोश