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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 923

देख यह स्थिति राजाकी । वाणी मूक बनी संजयकी ।
फिर भी अनुभूति ले सुखकी । पगलायीसी ॥ ८५ ॥
भूलके हर्षावेगसे । कहता था जो राजासे ।
अयोग्य यह इसे । जान कर भी यह ॥ ८६ ॥
फिर कहता है कुरुनंदन । ऐसे तेरे बंधु-पुत्र अर्जुन ।
बोला तब सुन यह श्रीकृष्ण । कहता अति मधुर ॥ ८७ ॥
कृष्णार्जुनके अद्वय-भावका वर्णन—
पूर्व-पश्चिम सागर । देखनेमें भिन्न पर ।
संपूर्ण एक है नीर । उसी भांति ॥ ८८ ॥
श्रीकृष्ण अर्जुन हैं ऐसे । भिन्न हैं केवल तनसे ।
किंतु हैं संवादमें जैसे । सदा अभिन्न ॥ ८९ ॥
स्वच्छ होते हैं जो दर्पणसे । आते ही दोनों सम्मुख जैसे ।
देखते हैं परस्पर ऐसे । आपसमें आप ॥ १५९० ॥
वैसे श्रीकृष्णमें पांडुसुत । देखता है अपने सहित ।
वैसे ही अर्जुनमें अनंत । देखता अपनेको ॥ ९१ ॥
भक्तके लिये देव जो अवकाश । देखता था भक्त वही अवकाश ।
अब दोनोंमें एक ही अवकाश । देखता है पार्थ ॥ ९२ ॥
और कुछ भी नहीं । अपने बिन कहीं ।
यह मानके वहीं । रहे वे दोनों ॥ ९३ ॥
यदि द्वेत ही अब न रहा । तब प्रश्नोत्तर कहां रहा ।
अथवा यदि द्वैत भी रहा । कहां संवाद सुख ॥ ९४ ॥
बोलते थे ऐसा दूजापनसे । निगला द्वैतका संवाद ऐसे ।
वह बोलना मैंने सुना ऐसे । दोनोंका कहा ॥ ९५ ॥
स्वच्छ कर दो दर्पण । सम्मुख रखे हैं जान ।
उसमें देखता कौन । कहे कैसे ॥ ९६ ॥
८५१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग'