ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरके चातकका निमित्त । दौड़ते मेघ पानीके साथ ।
तथा करते विश्वको शांत । उसी प्रकार ॥ ६८ ॥
अथवा अनन्य गति जो कमल । उसके लिये है सूर्य यथा काल ।
उदय होकर देता है सकल । सुख विश्वको ॥ ६९ ॥
वैसे अर्जुनको कर कारण । गीता प्रकाशित कर श्रीकृष्ण ।
दूर किया भार जन्म मरण । इस संसारका ॥ १४७० ॥
शास्त्र-रत्नोंकी दीप्ति सकल । तीनों लोकमें कर उज्ज्वल ।
कृष्ण-मुखाकाशमें निर्मल । शोभता गीता-सूर्य ॥ ७१ ॥
पितृ-कुल किया जो पवित्र । पार्थ इस ज्ञानका हो पात्र ।
जिसने किया गीता स्वतंत्र । विश्वका घर ॥ ७२ ॥
द्वैत स्थितिमें आकर गुरु-शिष्य संवाद—
फिर वह जगद्गुरु श्रीकृष्ण । पार्थका जो अद्वय मिलन ।
समेट लेता है उसी क्षण । द्वैत-स्थितिमें ॥ ७३ ॥
जब कहता है यहां श्रीकृष्ण । जीव करता क्या शास्त्र-ग्रहण ।
तब कहता है पार्थ श्रीकृष्ण । कृपा देवकी ॥ ७४ ॥
अजी ! पानेमें निधान । भाग्य लगता अर्जुन ।
भोगमें वह धन । उससे अधिक ॥ ७५ ॥
जैसे क्षीर-सागरके समान । न जमता जो दूधका बर्तन ।
सुर असुरोंको कैसे मंथन । करना पडा है ॥ ७६ ॥
उस प्रयत्नका भी आया फल । आंखोंसे देखा अमृत निर्मल ।
जतन करनेमें है सकल । गये चूक ॥ ७७ ॥
परोसा जो अमृतत्व पानेमें । कारण हुवा जो मृत्यु लानेमें ।
न जान कर भोग भोगनेमें । होता है ऐसा ॥ ७८ ॥
नहुष हुवा जो स्वर्गाधीश्वर । किंतु भूला वहांका व्यवहार ।
इससे सर्प हुवा पृथ्वीपर । जानता है तू ॥ ७९ ॥
ज्ञानेश्वरी ८४०