ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथवा जैसे उदयाचल पर । झलकते ही रवि-किरणके हार ।
खो जाता है अंतरालमें तिमिर । उसी भांति ॥ ३२ ॥
वैसे ही कर्णोंके महाद्वार । सुनते हैं गीताका गजर ।
मिटता है सभी पाप भार । सृष्ट्यादिका भी ॥ ३३ ॥
इससे भावी जन्म सर्वत्र । होते जाते हैं अति पवित्र ।
इससे अन्य ऐसे हैं अत्र । भारी पुण्य ॥ ३४ ॥
तथा इस गीताके हैं अक्षर । कानोंसे जाके हृदय-गव्हर ।
उतने ही करते हैं जो पूर । अश्वमेध याग ॥ ३५ ॥
तभी है श्रवणसे पाप हरता । वैसे ही धर्मको उन्नत करता ।
इससे स्वर्गका राज्य है मिलता । अंतमें जो ॥ ३६ ॥
मेरे पास आनेमें अर्जुन । स्वर्ग है पहला ही सदन ।
उसको भोग फिर सज्जन । मिलते मुझमें ही ॥ ३७ ॥
इस प्रकार गीता पार्था । जो सुनता और पढ़ता ।
उसे ब्रह्मानंद मिलता । मेरे रूपका ॥ ३८ ॥
यह सारा रहने दे पार्थ । किस लिये तुझे कही गीता ।
उसका क्या हुवा है स्पष्टता । कह तू मुझे ॥ ३९ ॥
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसः ।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनंजय ॥ ७२ ॥
सुन कर स्व-अज्ञान जन्य मोह दूर हुवा क्या—
तो तू मुझसे कह अर्जुन । यह शास्त्र-सिद्धांत संपूर्ण ।
किया न चित्त देके श्रवण । जीवभावसे ॥ १५४० ॥
हमने यहां जैसे जिस भांति । कानोंको दी है गीताकी संपत्ति
कानोंसे वह हृदयमें पूर्ति । रोपी है न ? ॥ ४१ ॥
इसे तूने सुना है न पूरा एकाग्र चित्तसे ।
अज्ञान रूप जो तेरा मिटा क्या मोह मूलता ॥ ७२ ॥
ज्ञानेश्वरी ८४६