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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 927

वैसे कहता अपना मन । सहज विचार कर क्षण ।
पराक्रममें है दुर्योधन । अधिक हमारा ॥ २८ ॥
यह छोड़ करभी कहां । सैन्य रहा है ड्योढ़ा जहां ।
विजय निश्चय है वहां । सहज प्राप्त ॥ २९ ॥
हमको अब लगता ऐसे । किंतु तेरा ज्योतिष है कैसे ।
कह संजय जैसे है वैसे । मुझसे तेरी बात ॥ १६३० ॥
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८ ॥
गीताकी फलश्रुति—
प्रश्न सुन यह संजय कहता । किसका क्या होगा यह न जानता ।
जहां आयुष्य वहां जीवन होता । जानता यह ॥ ३१ ॥
चंद्र जहां चंद्रिका । शंभु जहां अंबिका ।
संत्र जहां विवेका । होता ही है ॥ ३२ ॥
नृपति जहां सैनिक । सौजन्य जहां संपर्क ।
अग्निमें जैसे दाहक । शक्ति है होती ॥ ३३ ॥
दया जहां वहां धर्म । वहां सुखायाम ।
सुखमें पुरुषोत्तम । रहता वैसे ॥ ३४ ॥
वसंत जहां वहां वन । वन जहां वहां सुमन ।
सुमन सह है गूंजन । सदा भ्रमरोंका ॥ ३५ ॥
गुरु जहां वहां ज्ञान । ज्ञानसे आत्म-दर्शन ।
दर्शनमें समाधान । होता नित्य ॥ ३६ ॥
जहां भाग्य वहां विलास । विलासमें रहा उल्हास ।
जहां सूर्य वहां प्रकाश । होता सहज ॥ ३७ ॥
योगेश्वर जहां कृष्ण जहां पार्थ धनुर्धर ।
वहां मैं देखता नित्य धर्म श्री जय वैभव ॥ ७८ ॥
८५५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-नोब