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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 924

अथवा दीपके सम्मुख । रखके दीप और एक ।
कौन किसका प्रयोजक । कहे कौन ॥ ९७ ॥
अथवा अर्कके सम्मुख अर्क । उदय हुवा मानो और एक ।
कौन कहें उसमें प्रकाशक । तथा प्रकाश्य कौन ॥ ९८ ॥
करनेमें इसका निश्चय । कुंठित हो जाता है निश्चय ।
दोनों हुए हैं इस समय । संवाद रूप ॥ ९९ ॥
मिलते दो ओघ जिस स्थान । उनको कर देनेमें भिन्न ।
रख दिया बीचमें लवण । क्षणमें होगा जैसे ॥ १६०० ॥
कृष्णार्जुनके संवादमें संजयका लय होना—
वैसे श्रीकृष्ण और अर्जुन । संवादते हैं मन ही मन ।
उसे सोचनेमें मेरा मन । हुवा है वैसे ॥ १ ॥
ऐसे संजय कहता नहीं । सात्विक भाव इतनेमें ही ।
ले जाते स्मृति न जाने कहीं । संजयपनकी ॥ २ ॥
रोमांचित हुवा बदन । वैसे ही संकुचित तन ।
स्वेद स्तंभको है कंपन । रोकता एक ॥ ३ ॥
अद्वय-आनंदके स्पर्शसे । रसमय हुई दृष्टि जैसे ।
प्रेमका सोता ही बना जैसे । नहीं ये अश्रु ॥ ४ ॥
न जाने उसमें क्या नहीं समाता था । अथवा गलेमें कहां क्या अटका था ।
किंतु सिसकीसे वाणी-मार्ग रुका था । न उमडते शब्द ॥ ५ ॥
अथवा अष्ट सात्विक भाव । बनाते थे संजयको ठाव ।
तब हुवा संजय चौराहा । संवाद सुखका ॥ ६ ॥
उस सुखकी ऐसी जाति । अपने आप होती शांति ।
आयी है फिर देह-स्मृति । संजयकी तब ॥ ७ ॥
स्थिर होकर वह आनंद । कहता है जो उपनिषद् ।
नहीं जानते व्यास-प्रसाद- । से सुना मैंने ॥ ८ ॥
ज्ञानेश्वरी ८५२