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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 920

प्राण-क्षोभसे डुलता हुवा । अंग अंगसे संभाला हुवा ।
हल चल सब भूल हुवा । खडा सूना स्तंभसा ॥ ५४ ॥
नेत्र-युगलसे बहते । आनंदामृतसे झरते ।
आंसुओंको जो संभालते । अति कष्टसे ॥ ५५ ॥
विविध औत्सुक्यका भार । भरा था गलेमें आकर ।
उसको कुछ दबाकर । हृदयमें तब ॥ ५६ ॥
वाचाका द्रवना । प्राण संभालना ।
अक्रम श्वासन । सुचारुकर ॥ ५७ ॥
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहःस्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥
तेरा दर्शन सब कुछ देता है—
अर्जुन कहता यह क्या देव । पूछता क्या रहा अब भी मोह ।
गया वह स-कुटुंब छोड ठाव । लेकर सब साथ ॥ ५८ ॥
पास आकरके दिनकर । पूछता आ आंखोंसे अंधार ।
दीखता क्या कहो किसी ओर । दीखेगा क्या वह ॥ ५९ ॥
ऐसा है तू श्रीकृष्ण । हमें देता दर्शन ।
क्या न देगा दर्शन । यही हमको ॥ १५६० ॥
फिर प्रेमसे माताके समान । कहता है बोध पूर्ण वचन ।
किसी उपायसे न होता ज्ञान । उस विषयमें ॥ ६१ ॥
और पूछता मोह है या नहीं । ऐसा यह पूछना रहा कहीं ।
कृतकृत्य हुवा मैं मुझमें ही । तेरे ही रूपसे ॥ ६२ ॥
अर्जुनने कहा
मिटा है मोह तो देव कृपासे बोध भी हुवा ।
हुवा निःशंक मैं आज करूंगा जो कहा मुझे ॥ ७३ ॥
ज्ञानेश्वरी ८४८