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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 914

ऊपरके दोनों गुण । जिसमें है विद्यमान ।
करने गीता श्रवण । नहीं योग्य ॥ १४९० ॥
उत्तम है जैसे मुक्ताफल । उसमें नहीं रंध्र सरल ।
गुण-प्रवेश होंगे निर्मल । उसमें कैसे ॥ ९१ ॥
सागर होता अति गंभीर । कौन करता है अस्वीकार ।
व्यर्थ जाती वर्षा धनुर्धर । उसपे जो होती ॥ ९२ ॥
दिव्यान्न देकर तृप्तको । व्यर्थ करनेसे उसको ।
वही नहीं दें क्यों भूखेको । उदारतासे ॥ ९३ ॥
हो सुयोग्य वह कितना ही । सुननेमें जिसे प्रेम नहीं ।
उसको गीता कहना नहीं । किसी समय ॥ ९४ ॥
रूप-दर्शी है सुजान नयन । किंतु नहीं परिमलमें प्राण ।
उसको देना सुगंध अर्जुन । उपयोग क्या है ॥ ९५ ॥
इसीलिये तप और भक्ति । यह देखना सुभद्रापति ।
किंतु सुननेमें अनासक्ति । न कहना उसे ॥ ९६ ॥
जिसमें तप और भक्ति । सुननेमें भी अनुरक्ति ।
इतना देखकर भी संगती । धनुर्धर ॥ ९७ ॥
जो है गीता-शास्त्रका निर्माता । वह मैं सकल-लोक-शास्ता ।
उसको जो सामान्य मानता । अपने मनमें भी ॥ ९८ ॥
तथा देव और संतोंकी नित । करता रहता निंदाकी बात ।
उसको गीता सुननेमें पार्थ । नहीं मानो योग्य ॥ ९९ ॥
वैसे उनकी संपूर्ण । सामग्री योग्य है मान ।
किंतु वह दीप बिन । रहता है रातमें ॥ १५०० ॥
अंग गौर और तरुण । ऊपर पहना भूषण ।
किंतु नहीं उसमें प्राण । उपयोग क्या है ॥ १ ॥
सुवर्णका घर सुंदर । निर्माण किया धनुर्धर ।
किंतु है सर्पांगना द्वार । रोक बैठी है ॥ २ ॥
ज्ञानेश्वरी ८४२