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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 931

या गीता कमलका भृंग । या गीता सागर तरंग ।
या हैं श्रीहरिके तुरंग । गीता रथके ॥ ७४ ॥
या श्लोक सर्व तीर्थ समूह । मिले हैं गीता-गंगा प्रवाह ।
अर्जुन सिंहस्थ पर्व यह । आया है मान ॥ ७५ ॥
या नहीं यह श्लोक श्रेणी । किंतु अचिंत्य चिंतामणि ।
या निर्विकल्पमें लागणी । कल्पतरुकी ॥ ७६ ॥
सात शत श्लोक हैं जो ऐसे । बढे चढे हैं एक एकसे ।
किसका वर्णन करें कैसे । चुनाव करके ॥ ७७ ॥
दीप पहला क्या पिछला । छोटा या रवि मोटा भला ।
भेद गहरा या उथला । क्या अमृत सिंधुमें ॥ ७८ ॥
या बछिया और बछौना । कामधेनुमें भेद नाना ।
व्यर्थकी है गोष्ठी करना । न करने जैसी ॥ ७९ ॥
आदि है अथवा अंत । गीता श्लोककी है बात ।
जैसे पुष्प पारिजात । नया या पुराना ॥ १६८० ॥
इसमें नहीं न्यून अधिक । समान इसके सभी श्लोक ।
तथा न वाच्य वाचक । भेद भी इसमें ॥ ८१ ॥
इस शास्त्रमें है एक । श्रीकृष्ण वाच्य वाचक ।
जानते हैं सभी लोक । प्रसिद्ध यह ॥ ८२ ॥
इसका अर्थदान और पठन । फल-प्राप्तिमें एकही समान ।
वैसे वाच्य वाचकमें अभिन्न । भाव साधना यह ॥ ८३ ॥
इसीलिये मुझे इस समय । कहना नहीं है कोई विषय ।
मानो सब गीता है वाङ्मय । मूर्ति प्रभुकी ॥ ८४ ॥
शास्त्र-पठनमें अर्थ-फल । देकर जाते हैं ये सकल ।
ऐसे नहीं यह केवल । पर-ब्रह्मही है ॥ ८५ ॥
जगतपे करुणाकर । महानंद सुगम कर ।
अर्जुनको निमित्त कर । किया प्रकट ॥ ८६ ॥
८५९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग