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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 929

गुरुत्व होता है यहां निम्न । करेगा ऐसा कोई कथन ।
प्रकाश देता है दीप बन । अग्नि ही श्रेष्ठ ॥ १६५० ॥
परमात्मासे शक्ति ले अर्जुन । हुवा है उससे भी बलवान ।
उपरोक्त स्तुति गौरव सुन । तुष्ट होता देव ॥ ५१ ॥
सभी गुणोंमें पुत्रसे हीन । होना चाहता आपका मन ।
यह इच्छा श्रीकृष्णकी मान । हुई सफल ॥ ५२ ॥
अथवा मानो ऐसे नृप । हुवा है पार्थ कृष्णकृपा ।
जिस ओर वह साक्षेप । जीत है वहीं ॥ ५३ ॥
वही विजयका निश्चित स्थान । इसमें संदेह नहीं है जान ।
वहां जो जय नहीं मिला मान । वह जय ही नहीं ॥ ५४ ॥
इसीलिये जहां श्री श्रीकांत । वहां है तुम्हारा पांडुसुत ।
वहां सदा विजय समस्त । अभ्युदय सारा ॥ ५५ ॥
यदि व्यासके वचन पर । विश्वास सच्चा है नृपवर ।
तब मेरे शब्द मानकर । चलना ध्रुव है ॥ ५६ ॥
जहां वह श्रीवल्लभ । जहां है भक्त-कदंब ।
वहां सुख और लाभ । होगा कल्याणका ॥ ५७ ॥
यदि होंगे ये बोल असत्य । न कहाऊंगा व्यासका शिष्य ।
गर्जन कर यह अवश्य । किया हाथ ऊपर ॥ ५८ ॥
एक श्लोकमें भारतका सार—
एवं भारतका सब सार । एक श्लोकमें ला भरकर ।
देता है संजय नृपवर । धृतराष्ट्रके हाथमें ॥ ५९ ॥
जैसे वह्नि कितना न जानकर । उसे बातिके अग्रपे रखकर ।
लाते सूर्यकी अनुपस्थिति पर । सहाय्यार्थ ॥ १६६० ॥
वैसे शब्द ब्रह्म अनंत । हुवा सव्वा लक्ष भारत ।
भारतके जो शत-सात । गीता सर्वस्व ॥ ६१ ॥
८५७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग