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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 925

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद् गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥ ७५ ॥
वह एकांतकी गोष्ठि । ब्रह्मत्वकी पडी मिठी ।
मैं तू पनकी जो दृष्टि । मिट गयी पूरी ॥ ९ ॥
योग जो ये संपूर्ण । आते हैं जिस स्थान ।
सुलभ वे वचन । किये व्यासदेवने ॥ १६१० ॥
दिखाकर अर्जुनका कारण । बता करके अपनेको भिन्न ।
अपने दिये बोल वचन । आप ही देव ॥ ११ ॥
वहां हैं मेरे ये श्रोत्र । सुननेमें हुए पात्र ।
क्या कहें यह स्वतंत्र । सामर्थ्य गुरूका ॥ १२ ॥
राजन् संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥ ७६ ॥
बोलनेमें हुवा वह विस्मित । जिससे हो गया है देह विस्मृत ।
रत्नमें हो रत्नसे प्रकाशित । छिपता है जैसे ॥ १३ ॥
हिमालयके जो सरोवर । होते चंद्रोदयमें काश्मीर ।
सूर्योदयमें पिघल कर । बहते जैसे ॥ १४ ॥
वैसे होते ही शरीरका स्मरण । संजय करता संवाद धारण ।
यही होता देह विस्मृतिके कारण । दूसरी बार ॥ १५ ॥
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ ७७ ॥
योग-गुह्य महाश्रेष्ठ कृपासे व्यासदेवकी ।
सुना प्रत्यक्ष जो मैने कहा योगेश कृष्णने ॥ ७५ ॥
जो कृष्णार्जुन संवाद राजन् अद्भुत पावन ।
सोचके मनमें भारी हर्षता मैं पुनः पुनः ॥ ७६ ॥
स्मरके वह जो रूप हरिका अति अद्भुत ।
राजन् विस्मित होके मैं नचता हूं पुनः पुनः ॥ ७७ ॥
८५३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग