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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 928

वैसे सकल पुरुषार्थ । होते हैं स्वामी सह नाथ ।
जहां रहता है श्रीनाथ । वहां है श्री ॥ ३८ ॥
जहां अपने पति सहित । जगन्माता रहती है नित ।
अणिमादि सिद्धि दास्य-रत । रहती हैं वहां ॥ ३९ ॥
स-शरीर कृष्ण विजय-रूप । रहता सदा जिसके समीप ।
उसीके साथ जय है आप । चलेगा सदैव ॥ १६४० ॥
विजय नामसे पार्थ विख्यात । विजय स्वरूप श्रीकृष्ण नाथ ।
श्रिया सह विजय है निश्चित । उसी स्थान ॥ ४१ ॥
ज्ञानेश्वरका राष्ट्र-प्रेम-
जिस देशका है वह घास । उसमें माता पिताका है वास ।
कल्पतरुको भी स-उल्हास । जीतेगा वह ॥ ४२ ॥
उस देशका सब पाषाण । क्यों न हो चिंतामणि संपूर्ण ।
उस भूमिमें है क्या कारण । न आये चैतन्य ॥ ४३ ॥
उस देशके जो नदी प्रवाह । बहें न क्यों लें अमृत अथाह ।
अचरण नहीं है राजन् यह । विचार कर देख ॥ ४४ ॥
जिसके सहज शब्द । बनते हैं जहां वेद ।
सदेह सच्चिदानंद । क्यों न कहें उन्हें ॥ ४५ ॥
अर्जुनका भाग्य-
स्वर्गापवर्ग दोनों मान । पद हैं उसके आधीन ।
माता लक्ष्मी और श्रीकृष्ण । पिता जिनके साथ ॥ ४६ ॥
जिसका कहना सदा लोभ । उस लक्ष्मीका जो वल्लभ ।
सर्व सिद्धि सह है स्वयंभु । खडा है जहां ॥ ४७ ॥
बनता है समुद्रसे मेघ । उपयोगमें उससे चांग ।
वैसे पार्थको आया सुयोग । इस समय ॥ ४८ ॥
कनकत्व दीक्षाका जो गुरु । परिस लोहसे श्रेष्ठ तर ।
किंतु है चलाता व्यवहार । वही जगका ॥ ४९ ॥
ज्ञानेश्वरी ८५६