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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 926

फिर खडा हो कहता नृप । श्रीहरिका देख विश्व-रूप ।
देख कर ऐसे बैठा कैसे चुप । किस प्रकार ॥ १६ ॥
न देख कर जो दीखता । न होकर जो है रहता ।
न स्मरकर भी स्मरता । उसे टालता कैसे ॥ १७ ॥
देख कर यह चमत्कार । बैठनेमें भी नहीं विस्तार ।
मुझ सह वह महापूर । ले जाता बहाके ॥ १८ ॥
ऐसा है श्रीकृष्णार्जुन । संवाद संगम स्थान ।
कर देता तिल-दान । अहंताका मैं ॥ १९ ॥
उमड असंवृत्त आनंद । अलौकिक सिसक सद्गद ।
करता श्रीकृष्ण कृष्ण शब्द । अपने आप ॥ १६२० ॥
धृतराष्ट्रकी जडता दर्शन—
ये जो अष्ट-सात्विक भाव । न जाने कौरवका गांव ।
तब कल्पना हो संभव । कैसे राजाको ॥ २१ ॥
उस सुख-लाभकर अनुभव । अपनेमें लाकर स्थिर भाव ।
पचालिये अष्ट सात्विक-भाव । संजयने अपनेमें ॥ २२ ॥
इतनेमें है राजा कहता । युद्धमें कब क्या होता जाता ।
यह सब कहने निमित्त । रखा तुझे व्यासने ॥ २३ ॥
वह छोड़ कर तू यह ऐसे । बिठाया गया किस उद्देश्यसे ।
सब भूलकर क्या ऐसे वैसे । बोलता अप्रासंगिक ॥ २४ ॥
वनका जब प्रासादमें आता । दस दिशा सब सूना मानता ।
या उदयसे पिशाच जानता । रात हुई अब ॥ २५ ॥
जिसका जो गौरव न जानता । उसको विपरीत ही लगता ।
तभी है अप्रासंगिक कहता । इसमें क्या अचंबा ॥ २६ ॥
फिर कहता कह प्रस्तुत । लडाई चली है जो सांप्रत ।
उसमें किसकी हार जीत । होती यह कह तू ॥ २७ ॥
ज्ञानेश्वरी ८५४