ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्या कहूं मैं तुझे अब अर्जुन । संतोंको देता जो गीता भोजन ।
देता हूं मैं उसको सिंहासन । मेरे अंतःकरणका ॥ २३ ॥
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥ ७० ॥
मेरा तेरा यह जो मिलन । जिससे बढ़ा यह कथन ।
खिला मोक्ष-धर्मका जीवन । जिस स्थानपे ॥ २४ ॥
यह जो सकालार्थ प्रद । हम दोनोंका है संवाद ।
नहीं करके पद-भेद । करना आवर्तन ॥ २५ ॥
उस ज्ञानाग्निमें जो है प्रदीप्त । मूल अविद्या-आहुति दे पार्थ ।
किया है मुझको संतोषित । परमात्मा मैं ॥ २६ ॥
करने गीतार्थ विवेचन । ज्ञानियोंमें जो है बुद्धिमान ।
प्राप्त होते हैं कर पठन । ब्रह्म-रूप यह ॥ २७ ॥
गीता पाठकको भी ऐसे । फल अर्थज्ञको है जैसे ।
गीता-मातामें भेद ऐसे । न है छोटे बडेका ॥ २८ ॥
श्रद्धावाननसूयश्चशृणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥ ७१ ॥
तथा सभी मार्गमें निंदा । छोड़कर आस्था में शुद्ध ।
गीता श्रवणमें ही श्रद्धा । रखता है जो ॥ २९ ॥
करेंगे जब उनके कान । गीताके अक्षरोंका श्रवण ।
करेंगे दुरित पलायन । उसी समय ॥ १५३० ॥
वनमें होते ही अग्निका प्रवेश । वहां करते जो पशु-पक्षी वास ।
छोड दौड़ते हैं दिशाएं दस । मिलती जहां राह ॥ ३१ ॥
यह जो धर्म-संवाद अभ्यासेंगे जहां कहीं ।
मानता पूजते हैं वे मुझको ज्ञान-यज्ञसे ॥ ७० ॥
सुनेगा यह जो कोई श्रद्धासे द्वेष छोडके ।
पायेगा कर्म-पूतोंकी मुक्त हो वह सद्गती ॥ ७१ ॥
८४५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग