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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 922

तब अब होती जो आज्ञा । सकल देवाधिदेवराज्ञा ।
मान करूंगा हेतु अनुज्ञा । किसी भी बातकी ॥ ७५ ॥
सुन अर्जुनके यह बोल । नाचता देव सुखसे भूल ।
कहता फला विश्वका फल । अर्जुन रूपसे ॥ ७६ ॥
खिला हुवा पूर्ण सुधाकर । देख अपना यह कुमार ।
सीमा भूलके क्षीर सागर । बढ़ता जैसे ॥ ७७ ॥
ऐसे संवादकी वेदी पर । दोनोंका भावैक्य देखकर ।
आया महदानंदसे भर । संजय हृदय ॥ ७८ ॥
ऐसे हृदयानंदातिशयसे । कहता संजय धृतराष्ट्रसे ।
बादरायणकी कृपासे कैसे । उद्धार हुए हम ॥ ७९ ॥
अजी आज आपने जो अवधारा । नहीं चर्म-चक्षुभी जो संसारा
किंतु ज्ञान दृष्टिके हैं व्यवहार । जानलिये जो ॥ १५८० ॥
रथमें लगते हैं जो घोडे । उन्हें लेने हमें रख छोडे ।
किंतु आज हुवा खडे खडे । ज्ञानबोध ॥ ८१ ॥
तथा युद्धका जो निर्वाण । होता है अत्यंत दारुण ।
दोनोंकी हार होगी समान । अपनी ही ॥ ८२ ॥
व्यासकी ऐसी कृपा महान । जहां युद्धसा कष्ट दारुण ।
वहां ब्रह्मानंद निरावरण । देते हैं सहज ॥ ८३ ॥
संजय कहता है यहां ऐसे । राजा कुछ भी न हुवा जैसे ।
तटस्थ रहा पाषाण जैसे । न द्रवता चांदनीमें ॥ ८४ ॥
संजय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ७४ ॥
संजयने कहा
जो कृष्णार्जुनका ऐसा हुवा संवाद अद्भुत ।
सुना मैने बडोंसे जो खिलाता रोमरोमको ॥ ७४ ॥
ज्ञानेश्वरी ८५०