ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
ऐसे जो अर्थ हीन । तथा स्वैर अर्जुन ।
उसे तामस ज्ञान । कहता हूं मैं ॥ ७८ ॥
ऐसे तामस ज्ञानको भी ज्ञान । कहते इसका भाव अर्जुन ।
कहते हैं जन्मांधके नयन । बडे विशाल जैसे ॥ ७९ ॥
अथवा बहरेके खडे कान । या अपेयको कहते हैं पान ।
वैसे कुल नाम उसका ज्ञान । इतना ही ॥ ५८० ॥
जाने दे कितना बोलना । ऐसी बातको कभी ज्ञान ।
न कहना उसे जानना । तामस मात्र ॥ ८१ ॥
गुणमें कहे ऐसे तीन । भेद कर यथा लक्षण ।
ऐसा श्रोता श्रेष्ठ अर्जुन । कहां है तुझसे ॥ ८२ ॥
ऐसे तीन प्रकार । ज्ञानके जो धनुर्धर ।
दीप्तिमें होगी गोचर । कर्ताकी क्रियाकी ॥ ८३ ॥
जैसे है बहता हुवा नीर । लेके जाता पात्रका आधार ।
उसी प्रकार लेता आकार । उसी भांतिका ॥ ८४ ॥
ज्ञान-त्रयके कारण । त्रिविध कर्म अर्जुन ।
होता है सात्विक सुन । कहता पहले ॥ ८५ ॥
नियतं संगरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्विकमुच्यते ॥ २३ ॥
सात्विक कर्मका लक्षण—
स्वाधिकारानुसार जो आता । उसीमें वह संतोष पाता ।
पति-व्रतालिंगनसे पाता । पति जैसे ॥ ८६ ॥
जैसे सांवले रंगमें चंदन । प्रमदाकी आंखोंमें अंजन ।
वैसे स्वाधिकारका भूषण । नित्यकर्म ॥ ८७ ॥
निर्दिष्ट और निष्काम तजके राग-द्वेषको ।
किया असंग वृत्तीसे वह है कर्म सात्विक ॥ २३ ॥
७६१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
नित्य-कर्म जो है भला भला । नैमित्तिकका जोड़ भी मिला ।
मानो सोनेसे सुहाग मिला । ऐसी है शोभा ॥ ८८ ॥
तन मनका सार सर्वस । दे कर बढाती स-संतोष ।
माता बालकको पाल पोस । बिन उकताये ॥ ८९ ॥
जीव भावसे ऐसे कर्मानुष्ठान । कर भी न जाते फलपे नयन ।
करता है उस कर्मका अर्पण । केवल ब्रह्ममें ॥ ५९० ॥
प्रियाराधनमें जैसे सहज भाव । नहीं रहता कम अधिकका भाव ।
ऐसे सत्प्रसंगमें रहता पांडव । नित्य-कर्म ॥ ९१ ॥
तब न होता अकारण खेद । उद्वेगसे जीवको न दें बांध ।
अथवा होनेसे मान आनंद । उछलता कभी ॥ ९२ ॥
ऐसे कुशलता पूर्वक । किया जाता है कर्म नेक ।
कहते हैं उसे सात्विक । कर्म पांडव ॥ ९३ ॥
इस पर राजसका सुन । कहता हूं मैं सही लक्षण ।
अपना चित्त देके अर्जुन । सुन तू यह ॥ ९४ ॥
यत् तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥
राजस कर्मका लक्षण—
धनमें जैसे कोई माता पितासे । न बोलता व्यवहारमें ठीकसे ।
किंतु चलता विश्वमें आदरसे । महामूर्ख ॥ ९५ ॥
या जड़में न दें तुलसीके । दूरसे देता बूंद पानीके ।
किंतु सींचता नित द्राक्षके । मूलमें दूध ॥ ९६ ॥
वैसे हैं जो नित्य नैमित्तिक । कर्म करना जो आवश्यक ।
उसके विषयमें जो देख । उठता भी नहीं ॥ ९७ ॥
सकाम और सायास साहंकारेण वा पुनः ।
किया जाता वही सारा कहाता कर्म राजस । २४ ॥
ज्ञानेश्वरी ७६२
अब कार्यक्रममें तन मन । दानादि देकर भी संपूर्ण ।
न जानता है कुछ भी अर्जुन । दिया अधिक ॥ ९८ ॥
ड्योढे सूदमें जब लगाता । तब देनेमें तृम न होता ।
या खेतमें जब बीज बोता । न कहता रुको अब ॥ ९९ ॥
पारस हाथमें आता अर्जुन । तब जैसे लोह लेनेमें धन ।
खर्च करनमें सोत्साह मन । उछलता जैसे ॥ ६०० ॥
वैसे फल देखकर सम्मुख । कर्म करता उत्साह पूर्वक ।
करता सो कम मान अधिक- । अधिक करता जाता ॥ १ ॥
ऐसे फल कामुकसे । होते हैं यथाविधिसे ।
काम्य-कर्म अधिकसे । होते अधिक ॥ २ ॥
तथा उस काम्य-कर्मका । पीटता ढिंढोरा सदाका ।
नाम-पाठसे है कर्मका । करता भोज्य ॥ ३ ॥
इससे बढ़ता कर्माहंकार । न जानता पिता या गुरु फिर ।
जैसे नहीं मानता काल-ज्वर । कोई औषध ॥ ४ ॥
ऐसे है स-अहंकार । फलाभिलाषासे नर ।
करता है स-आदर । जो जो कुछ ॥ ५ ॥
तथा इस करनेमें भी जैसा । मदारीका व्यवसाय हो ऐसा ।
करता है जो अतीव संयास । जीविकाही जान ॥ ६ ॥
एक दानेके लिये उंदुर । खोदता जाता सभी डोंगर ।
या सेवारके लिये दर्दुर । मथता समुद्र ॥ ७ ॥
भीखके परे कुछ न मिलता । फिर भी सपेरा साप ढोता ।
किसीको कष्ट भी अच्छा लगता । इसको करें क्या ॥ ८ ॥
देखके परमाणुका भी लाभ । दीमक खोदती पृथ्वीका गर्भ ।
वैसे धर स्वर्ग-सुखका लोभ । करते कष्ट ॥ ९ ॥
यह काम्य-कर्म सक्लेस । जानना है यहां राजस ।
कहता लक्षण तामस । सुन तू अब ॥ ६१० ॥
७६३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् ।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥
तामस कर्मका लक्षण—
वह जो तामस कर्म । निंदाका है काला धाम ।
निषिद्ध कर्मका जन्म । हुवा हो सफल ॥ ११ ॥
वह जब संपन्न होता । दृष्टिमें कुछ भी न आता ।
जैसे पानीपे लिया जाता । रेखा चित्र ॥ १२ ॥
किया हो जैसे छासका मंथन । अग्निके लिये राख फूकी मान ।
या कोल्हूमें रेती पेरी अर्जुन । उसी प्रकार ॥ १३ ॥
पवनपे भूसा धरना । तीरसे गगन छेदना ।
पवनको फांस डालना । बांधानेके लिये ॥ १४ ॥
जैसे यह सकल । नासता है निष्फल ।
वैसे होता सकल । तामस कर्म ॥ १५ ॥
वैसे नरदेहके समान । व्यय होता है व्यर्थ ही धन ।
नासता कार्यके साथ जान । विश्वका सुख ॥ १६ ॥
कमल वनपे कांटेका फांस । खींचनेसे होता जिसके नाश ।
तथा करना वनका विध्वंस । पांडु कुमार ॥ १७ ॥
जैसे अपना तन जलाता । लोगोंको अंधेरेमें डालता ।
द्वेषसे दीपपे झेंप लेता । जैसे पतंग ॥ १८ ॥
वैसे सर्वस्व हो व्यर्थ । देह पर हो आघात ।
तथा होते अन्य त्रस्त । जिस कार्यसे ॥ १९ ॥
माखी अपनेको निगलाती । दूसरोंको वमन कराती ।
स्मरण दिलाती ऐसी कृति । तामस कर्म ॥ ६२० ॥
विनाश व्यय निष्पत्ति सामर्थ्य भी न देखके ।
मोहसे जो किया जाता कर्म तामस जान तू ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ७६४
अपना सामर्थ्य न देखता । आगेका विचार न करता ।
मनमें जो आता सो करता । न देखता कुछ ॥ २१ ॥
मेरा सामर्थ्य कितना । कर्मकी कैसी है घटना ।
करने पर है क्या होना । सोचता नहीं ॥ २२ ॥
इस भांतिसे सब जो विचार । अविवेक पगसे पोंछकर ।
उद्यत होता है स-अहंकार । कर्ममें वह ॥ २३ ॥
अपना ही आसरा जलाकर । भड़कता है अग्नि भयंकर ।
या मर्यादा भंग कर सागर । उमड पड़ता ॥ २४ ॥
तब कम अधिक न जानता । आगे पीछे कुछ भी न देखता ।
पथ कुपथ भी एक करता । तामस कर्म ॥ २५ ॥
कृत्याकृत्य ऐसा कुछ लेकर । आप पर विचार भी न कर ।
होता है जो कर्म धनुर्धर । निश्चय ही तामस ॥ २६ ॥
ऐसे गुणत्रय भिन्न । कर्मकी स्थिति अर्जुन ।
यह किया विवेचन । कारणों सह ॥ २७ ॥
अब इन कर्मोंको जो करता । कर्मोंके अभिमानसे जो कर्ता ।
वह जीव भी कैसे त्रिविधता । पाता है देख ॥ २८ ॥
जैसे होके चतुर्थाश्रमवश । चतुर्धा दीखता एक पुरुष ।
कर्ता दीखता कर्मभेद वश । तीन प्रकारका ॥ २९ ॥
तीनमें अब मैं पार्थ । सात्विक तुझे प्रस्तुत ।
करता हो दत्त चित्त । सुन तू इसे ॥ ६३० ॥
मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते ॥ २६ ॥
निःसंग निरहंकारी उत्साही धैर्यसे भरा ।
फले जले अविकारी कर्ता सात्विक है कहा ॥ २६ ॥
७६५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद ग्रोग
सात्विक कर्ताके लक्षण—
छोडकर फलोद्देश । जैसे बढ़ जाती शाख ।
चंदनका जो विशेष । कहाता बावनी ॥ ३१ ॥
या फल बिना ही जो सार्थक । होती है जैसे नाग लतिका ।
वैसे करता है नित्यादिक । कर्म सदैव ॥ ३२ ॥
उनमें नहीं फल-शून्यता । अथवा नहीं है विफलता ।
फलके भी फल पांडुसुता । होते हैं क्या ॥ ३३ ॥
आदर-पूर्वक सब करता । किंतु किया ऐसा न कहता ।
वर्षाकालमें नहीं गर्जता । बादल जैसे ॥ ३४ ॥
वैसे परमात्म-प्रीत्यर्थ । समर्पणमें जो उचित ।
कर्म-समुदाय है पार्थ । करनेमें उत्पन्न ॥ ३५ ॥
कालका उल्लंघन नहीं करता । शुद्ध स्थलका विचार भी रखता ।
तथा शास्त्र-दृष्टिसे भी देखता । कार्य निर्णय ॥ ३६ ॥
वृत्तिको सदा एकाग्र रखता । चित्तको फलसे दूर रखता ।
नियमोंका बंधन भी पालता । शास्त्रोक्त जो ॥ ३७ ॥
इस निरोधको सहनेमें । सर्वोत्कृष्ट धैर्यको मनमें ।
रखनेका सद् चिंतनमें । रहता है नित ॥ ३८ ॥
तथा आत्म-प्रेमसे विहित । कर्म करनेमें जो सतत ।
देह-सुखकी चिंता किंचित । करता नहीं ॥ ३९ ॥
निद्रासे सदा दूर रहता । भूखको भी नहीं जानता ।
देह-सुख नहीं मिलता । उसको कभी ॥ ६४० ॥
सोना जैसे आगमें तपता । भार घट कसमें चढ़ता ।
वैसे उत्साह बढ़ता जाता । कर्ममें उसका ॥ ४१ ॥
पति पर प्रेम हो तो सच । सतीको जीनेमें हो संकोच ।
चितामें जलनेमें रोमांच । होते पतीसह ॥ ४२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७६६
प्रिय हो आत्माके समान । उसके लिये क्या अर्जुन ।
देहको दुःख होता मान । होगा क्या क्लेश ॥ ४३ ॥
विषय-सुख जैसे टूटता जाता । देह तथा बुद्धिका लय हो जाता ।
कर्ममें ही आनंद बढ़ता जाता । उसको सदैव ॥ ४४ ॥
ऐसा जब कर्म करता । कोई समय ऐसा आता ।
कर्म करना भी रुकता । उस समय ॥ ४५ ॥
कगार परसे जब गिरता रथ । टूटेगा मान सकुचाता नहीं पार्थ ।
वैसे मनमें नहीं होता संकुचित । किंचित भी वह ॥ ४६ ॥
अथवा मैंने जो कर्म किया । संपूर्ण रूपसे सिद्ध भया ।
ऐसे मैंने बडा जय पाया । यह भी नहीं मानता ॥ ४७ ॥
ऐसे जो कर्म करता । जहां कहीं देखा जाता ।
उसे कहना तत्वता । कर्ता सात्विक ॥ ४८ ॥
राजसका अब अर्जुन । कहता सुन पहचान ।
आकांक्षाका आश्रय-स्थान । बनता विश्वका ॥ ४९ ॥
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥
राजस कर्ताके लक्षण—
गांवका सब कल्मश जैसे । घूरेपे एक होता है वैसे ।
या स्मशानपे आता गांवसे । सारा अमंगल ॥ ६५० ॥
उसी भांति है जो अशेष । विश्वका सभी अभिलाष ।
पद प्रक्षालन विशेष । हुवा है स्थान ॥ ५१ ॥
इसीलिये फल लाभ । होता है जहां सुलभ ।
हो जाता है वहां लोभ । ऐसे कार्यमें ॥ ५२ ॥
फल कामुक आसक्त लोभी अस्वच्छ हिंसक ।
हर्ष औ' शोकसे मारा कर्ता राजस है कहा ॥ २७ ॥
७६७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
तथा आप कमाया हुवा धन । व्यय न करता कवडी जान ।
उस पर करता क्षण क्षण । निछावर जीव ॥ ५३ ॥
सावध रहता जैसा कृपण । बक रखता मीनपे नयन ।
वैसे देख वह पराया धन । रहता दक्ष ॥ ५४ ॥
पास जानेसे जो उलझाता । लगनेसे देह ही फाडता ।
फल मानो जीभको जलाता । खट्टा बेर ॥ ५५ ॥
वैसे वह जो काया वाचा मन । दुखाता रहता सबका मन ।
करनेमें वह स्वार्थ-साधन । न देखता परहित ॥ ५६ ॥
वैसे ही करनेमें जो कर्म । होता है यदि वह अक्षम ।
किंतु नहीं होता मनोधर्म । अरोचक उसका ॥ ५७ ॥
कनक फल सबाह्य जैसे । भरा रहता विष कांटोंसे ।
रहता वह दुर्बल वैसे । सदा शुचित्वमें ॥ ५८ ॥
जब वह कर्म फल पाता । फूलकर कुप्पा बन जाता ।
विश्वको अंगूठा भी दिखाता । चिढाकरके ॥ ५९ ॥
या कर्म होता जब निष्फल । शोकमें डूब जाता पाताल ।
तथा धिक्कारता है सकल । कर्म जात ॥ ६६० ॥
देख ऐसा कर्माचरण । जान तू काया वाचा मन ।
कर्ता है राजस अर्जुन । निःसंशय वह ॥ ६१ ॥
अब कहता धनुर्धर । जो है कुकर्मका आगर ।
होता है जो ऐसा गोचर । कर्ता तामस ॥ ६२ ॥
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८ ॥
स्वच्छंदी क्षुद्र गर्विष्ठ घातकी शठ आलसी ।
दीर्घ-सूत्री सदा खिन्न कर्ता तामस है कहा ॥ २८ ॥
ज्ञानेश्वरी ७६८
तामस कर्ताके लक्षण—
लगने पर मैं जैसे । आगेका जलता कैसे ।
यह न जानता वैसे । अग्निस्र्फुलिंग ॥ ६३ ॥
होता मैं कैसे वधका कारण । यह न जानता शस्त्र अर्जुन ।
कालकूटको नहीं होता ज्ञान । अपने परिणामका ॥ ६४ ॥
ऐसे वह धातुक क्रिया । करता रहता धनंजय ।
उससे अपना पराया । होता घात ॥ ६५ ॥
उसको जब जो कुछ करना । क्या होता है यह नहीं देखना ।
जिसभांति बवंडरका आना । ऐसी क्रिया उसकी ॥ ६६ ॥
उसका और जिस कार्यका । संबंध नहीं होता किसीका ।
पागलसे है जैसे कर्मका । नहीं होता वैसे ॥ ६७ ॥
बैलोंके गलेमें जैसे किल्हर । इंद्रियोंमें विषय है धनुर्धर ।
लगते हैं तब उन्हें भोगकर । बिताता जीवन ॥ ६८ ॥
हंसने या रोनेका काल । नहीं जानता जैसे बाल ।
वैसे ही सदा उच्छृंखल । रहता है वह ॥ ६९ ॥
होनेसे सदा प्रकृतिके आधीन । कृत्याकृत्य स्वादसे होता उलझन ।
अपने कृत्योंसे फूलता अर्जुन । कूडेके घरसा ॥ ६७० ॥
तथा कभी किसीको देनेमें मान । ईश्वरको भी न करता नमन ।
स्तब्धतामें पर्वतको भी अर्जुन । हराता वह ॥ ७१ ॥
अति कुटिल उसका मन । छुपाये हुए सभी वर्तन ।
पण्यांगना सम जो नयन । छल-मदसे भरे ॥ ७२ ॥
अथवा मानो कपटका । बनाया ही तन उसका ।
जीना मानो द्यूत-कर्मका । घर ही रहता है ॥ ७३ ॥
यह जो उसका प्रादुर्भाव । साभिलाष भिल्लका है गांव ।
उस राह पे कभी पांडव । जाना भी नहीं ॥ ७४ ॥
७६९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
(88)
दूसरोंका सुख देख कर । मानता कष्ट अपने पर ।
जैसे लवण दूधमें गिर । करता अपेय ॥ ७५ ॥
अथवा जैसे ठंडे पदार्थ । आगमें पड़ कर पार्थ :
भड़कते मानो वही मूर्त । अग्नि ही है ॥ ७६ ॥
जैसे अच्छा भला आहार । पहुंच पेटके अंदर ।
बनता मल धनुर्धर । उसी भांति ॥ ७७ ॥
बना है कभी किसीका कुशल । देखके वह जानता है शूल ।
तथा उस बताके प्रतिकूल । आता बाहर ॥ ७८ ॥
गुण लेकर जो देता दोष । अमृतका करता है विष ।
दूध पिलाता उसको विष । देता जैसे सर्प ॥ ७९ ॥
सुख मिलेगा इस लोकमें । गति मिलेगी परलोकमें ।
कर्म आता ऐसे समयमें । ऐसे समय ॥ ६८० ॥
आती है उसको अपने आप । निद्रा रखी है जैसे सुखरूप ।
दुर्व्यवहारमें अपने आप । भागती है वह ॥ ८१ ॥
जैसे द्राक्षारस या आम्र-रस । खानेमें मुख चुराता वायस ।
तथा अंधा बनाता है दिवस । जैसे उलूकको ॥ ८२ ॥
वैसे कल्याण-काल जब देखता । तब उसको है आलस आता ।
प्रमादमें है स्फुरण चढ़ता । चाहता वैसे ॥ ८३ ॥
जैसे सदैव समुद्रका उदर । वडवाग्नि रखता है भरकर ।
वैसे है वह विषाद निरंतर । रखता अपनेमें ॥ ८४ ॥
लेंड़ककी आगमें धूमावधि । या अपानमें होती है दुर्गंधि ।
इसी भांति वह जीवनावधि । विषाद करता ॥ ८५ ॥
वैसे कल्पांतके भी पार । फल प्राप्ति हो धनुर्धर ।
ऐसे रखता है व्यापार- । अभिलाषा ॥ ८६ ॥
विश्वके उस पारकी चिंता । चितमें ही करता रहता ।
किंतु हाथमें नहीं लगता । तृण भी उसके ॥ ८७ ॥
ऐसे वह लोगोंमें पार्थ । पाप-पुंज ही होता मूर्त ।
देखना ऐसे अन्याहत । कर्त्ता तामस ॥ ८८ ॥
ज्ञानेश्वरी ७७०
ऐसा कर्म कर्त्ता ज्ञान । इनके हैं चिन्ह तीन ।
दिखाये तुझे सुजन- । चक्रवर्ती ॥ ८९ ॥
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥ २९ ॥
बुद्धिके तीन प्रकार—
जब अविद्याके ग्राममें । बढ़कर मोह बस्तिमें ।
तथा संदेह भूषणमें । सजके जो आती ॥ ९० ॥
आत्म-निश्चयके जो दर्शन । करनेमें सुंदर दर्पण ।
ऐसी बुद्धिका भी तुझे तीन । कहता प्रकार ॥ ९१ ॥
इन सत्त्वादि गुणोंने तीन । न किये इस विश्वमें कौन ।
विषयके प्रकार अर्जुन । कह तू मुझे ॥ ९२ ॥
बिना अग्निके कोई काष्ठ । हुवा है क्या विश्वमें सृष्ट ।
वैसे दृश्य-कोटिमें स्पष्ट । नहीं है जो त्रिधा ॥ ९३ ॥
इसीलिये ये तीनों गुण । करते बुद्धिको त्रिगुण ।
वैसे धृतिको भी अर्जुन । त्रिधा किया है ॥ ९४ ॥
एक जो ऐसे दुष्ट तीन । लेकर भिन्न भिन्न लक्षण ।
इनको कहेंगे स-लक्षण । यहीं अब ॥ ९५ ॥
बुद्धि और धृतिके जहां । भाग दो किये गये यहां ।
प्रथम बुद्धिके ही यहां । कहूँगा प्रकार ॥ ९६ ॥
उत्तम मध्यम निकृष्ट । संसारमें आता जो सुभट ।
उस प्राणीकी तीन बाट । होती है यहां ॥ ९७ ॥
अकरण काम्य जो निषिद्ध । उसके मार्ग हैं ये प्रसिद्ध ।
ये हैं जो संसारमें सबाध । जीवोंको यहां ॥ ९८ ॥
बुद्धिके भेद ये तीन वैसे ही धृतिके कहे ।
गुणानुसार जो सारे कहता भिन्न भिन्न मैं ॥ २९ ॥
७७१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बंधं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥
सात्त्विक बुद्धिके लक्षण-
तभी अधिकारसे मान लिया । तथा विधि प्रवाहसे जो आया ।
वह एक ही भला कहलाया । नित्यकर्म ॥ ९९ ॥
वही आत्म-प्राप्ति फल । दृष्टि रखके केवल ।
प्यासमें जैसा है जल । सेवन योग्य ॥ ७०० ॥
इतनेसे ही वह जो कर्म । छुडाता जन्म-भय विषम ।
तथा कर देता है सुगम । मोक्ष-सिद्धि ॥ १ ॥
ऐसे कर्मको है करता । संसार भयसे छूटता ।
करणीयत्वमें बढता । मुमुक्ष पदमें ॥ २ ॥
वहां जो बुद्धि ऐसा । बंधाती है भरोसा ।
मोक्ष रखा हुवासा । मिलेगा ही ॥ ३ ॥
इसीलिये रची जैसे निवृत्ति । तलमें आधार डाल प्रवृत्ति ।
इस कर्ममें डुबकी लगाती । इतनेमें ही ॥ ४ ॥
तृषार्थ जैसे पानीसे जीता । पूरमें नांव है तरता ।
या अंधार कूपसे छूटता । सूर्य प्रकाशसे ॥ ५ ॥
नाना पथ्यसे औषध लेता । ऐसे रोग-ग्रस्त भी बचता ।
या मछलीको पानी मिलता । तब जैसे वह ॥ ६ ॥
निश्चय-पूर्वक बचता । उसमें न होता अन्यथा ।
वैसे कर्म-प्रवृत्त होता । मिलता मोक्ष ॥ ७ ॥
कर्म रहता जो करणीय । वहां पूर्ण ज्ञान धनंजय ।
तथा रहता अकरणीय । कहा है आगे ॥ ८ ॥
क्या कर्तव्य अकर्तव्य बंध मोक्ष भयाभय ।
धरना तजना जाने वह है बुद्धि सात्त्विक ॥ ३० ॥
ज्ञानेश्वरी ७७२
वह जो कर्म काम्यादिक । है संसार भय-दायक ।
अकरणीय है तू देख । कहा गया है ॥ ९ ॥
उस अकार्य कर्ममें । जन्म मरण कालमें ।
प्रवृत्ति सदा पीछेमें । भागती है ॥ ७१० ॥
जैसे आगमें नहीं घुसता । अथाह पानीमें न कूदता ।
प्रज्वलित शूल न धरता । उसी प्रकार ॥ ११ ॥
या काला नाग जो फूत्करता । उसे देख पकड़ा न जाता ।
व्याघ्र गुहामें घुसा न जाता । उसी प्रकार ॥ १२ ॥
वैसे कर्म अकरणीय । देखके होता महाभय ।
उपजाती जो असंशय । बुद्धि सात्विक ॥ १३ ॥
जैसे विष मिश्रित अन्न । देख होता मृत्युका ज्ञान ।
निषिद्ध कर्ममें भान । होता कर्मका वैसे ॥ १४ ॥
फिर जो बंध भय भरित । होता है निषिद्ध कर्म प्राप्त ।
निर्विकार जानता निवृत्त । होनेका वह ॥ १५ ॥
ऐसे ही कार्याकार्य विवेक । या प्रवृत्ति-निवृत्तिमापक ।
जैसे रत्न-पारखी परख । करता जौहरी ॥ १६ ॥
वैसे कार्याकार्य शुद्धि । जानती जो निरवधि ।
कहाती सात्त्विक बुद्धि । यह तू जान ॥ १७ ॥
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥
राजसिक बुद्धिका लक्षण—
बगुलोके गांवमें जैसे । चलता नीरक्षीर वैसे ।
या अंधा न जानता जैसे । दिवस रात्र ॥ १८ ॥
कार्य अकार्य कैसे क्या क्या है धर्म अधर्म जो ।
न जान सकती स्वच्छ जान तू बुद्धि राजस ॥ ३१ ॥
७५३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
या जिसे फूलोंका मकरंद भाता । अथवा काठ कुरेदना सुहाता ।
न होती दोनोंमें कोई विसंगतता । भ्रमरके लिये ॥ १९ ॥
वैसे यहां कार्याकार्य । धर्माधर्मका विषय ।
न होते कोई निर्णय । आचरणसे ॥ ७२० ॥
अजी ! आंखके बिन लेते मोती । उसमें फंसनेकी सदा भीती ।
कभी सफलता भी मिलती । आश्चर्यसे ही ॥ २१ ॥
वैसे जो अकरणीय होता । सम्मुख आनेसे रह जाता ।
तभी तो करनेसे छूटता । नहीं तो दोनों एक ॥ २२ ॥
बुद्धि वह उचित अनुचित । नहीं जानती कुछ भी पार्थ ।
विवाहमें जिस भांति अक्षत । डालते हैं लोग ॥ २३ ॥
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥ ३२ ॥
तामसिक बुद्धिके लक्षण—
होता जो राजाका राज पथ । चोरोंको होता है विपरीत ।
उदय होते ही माने रात । राक्षस जैसे ॥ २४ ॥
पुरुष होता है जो भाग्यहीन । उसे कोयला होता गढा धन ।
ऐसे होकर भी न होता धन । उस जीवको ॥ २५ ॥
वैसे धर्ममात्र जो है केवल । उसकी बुद्धि जो है पाप मल ।
सत्यको मानती असत्य मूल । तामस बुद्धि ॥ २६ ॥
मानते सब जिसे अर्थ । उसको संपूर्ण अनर्थ ।
जो जो गुण है व्यवस्थित । उसे मानता दोष ॥ २७ ॥
अथवा मानो श्रुति जात । अनुकरण करते पार्थ ।
वह सबही विपरीत । मानती वह ॥ २८ ॥
तमसे भरके जो है धर्म माने अधर्मको
देखती उल्टा अर्थ वह है बुद्धि तामसी ॥ ३२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७७४
इसे किसीसे न पूछकर । तामस मानना धनुर्धर ।
जिस बुद्धिको धर्मार्थ वैर । क्या करना वह ॥ २९ ॥
ऐसे ये बुद्धिके भेद । किये तुझसे विशद ।
स्वबोध कुमुद चंद्र । कहे तुझसे ॥ ७३० ॥
अब इसकी जो बुद्धि वृत्ति । सभी कर्मको आधार होती ।
कैसी वह त्रिविध धृति । कहता हूं तुझे ॥ ३१ ॥
उस धृतिके जो विभाग । तीन होते हैं यदा लिंग ।
कहता हूं उसे सुभग । सुन तू अब ॥ ३२ ॥
धृत्या यया धारयते मनःप्राणेंद्रियक्रियाः ।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥
सात्त्विक धृतिके लक्षण—
उदय होते ही दिनकर । मिटता चौर्य सह अंधार ।
अथवा राजाज्ञा अव्यापार । रोकती जैसे ॥ ३३ ॥
अथवा पवनका जो वेग । चलता रहता है सवेग ।
मिटते गर्जन सह मेघ । अपने आप ॥ ३४ ॥
या अगस्तके होते दर्शन । सिंधु धारण करता मौन ।
चंद्रोदयमें कमल-वन । सिमिटते हैं ॥ ३५ ॥
जैसे मदोन्मत्त कुंजर । चलनेमें उठाके पैर ।
न रखता है भूमिपर । देखके सिंह ॥ ३६ ॥
ऐसे होते हैं जो धीर । उपजते ही अंतर ।
मनादिकके व्यापार । तजते वहीं ॥ ३७ ॥
इंद्रिय विषयक जो गांठ । आप ही छूटती है सुभट ।
घुसते मन-मायके पेट- । में दसो जन ॥ ३८ ॥
चलाती जो क्रिया सारी मन इन्द्रिय प्राणकी ।
समता स्थिरतासे जो वह है धृति सात्त्विक ॥ ३३ ॥
७७५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
अधोर्ध्वकी मर्यादा तोड़कर । प्राण नवोंकी गांठ बांधकर ।
बैठा रहता है डूब कर । सुषुम्नामें ॥ ३९ ॥
संकल्प विकल्प पट । खोल होता मन प्रकट ।
बुद्धिके पीछे जा सुभट । बैठता वह ॥ ४० ॥
इस धृतिके कारण । मन प्राण और करण ।
स्वचेष्टाका संभाषण । छोड देते हैं ॥ ४१ ॥
मन प्राणादि फिर संपूर्ण । ध्यानके अंतर्गृहमें जान ।
बंद कर रखता अर्जुन । योगसे वह ॥ ४२ ॥
फिर जो परमात्मचक्रवर्ती । स्वाधीन होनेकी होती निश्चिती ।
तब तक छूट न होके धृती । बांध रखती उन्हे ॥ ४३ ॥
यहां जो वही धृती । सात्विक कहलाती ।
ऐसे जो लक्ष्मी-पति । कहता पार्थसे ॥ ४४ ॥
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
प्रसंगेन फलाकांक्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥ ३४ ॥
राजसी धृतिके लक्षण—
शरीर ही आप मान कर । स्वर्ग संसारके दोनों घर ।
भोगना चाहता पेट भर । त्रिवर्गोपायसे ॥ ४५ ॥
मनोरथके समुद्र पर । धर्मार्थकामके नांव पर ।
धैर्य-बलसे क्रिया व्यापार । करता है जो ॥ ४६ ॥
कर्मकी पूंजी जो डालना । उसका चौगुना चाहना ।
इतना सायास करना । जिसका धैर्य ॥ ४७ ॥
वह धृति है राजस । सुन तू पार्थ विशेष ।
तीसरी है जो तामस । कहता हूं अब ॥ ४८ ॥
धर्मार्थ काम सारे ही चलाती लाभ देखके ।
डुबाती फल-आशामें वह है धृति राजसी ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी ७७६
यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुंचति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ ३५ ॥
तामसी धृतिके लक्षण—
सभी अधम गुणोंसे । आ जाता है रूप जिसे ।
कोयला जो कालिमासे । बनता है ॥ ४९ ॥
अजी ! प्राकृत तथा हीन । उसको भी गुणका मान ।
नाम होता है पुण्यजन । दैत्यका जैसे ॥ ७५० ॥
नवग्रहमें जो है पिंगल । उसको कहते हैं मंगल ।
वैसे तममें गुण केवल । अविचार मात्र ॥ ५१ ॥
सब दोषोंका आश्रय स्थान । तमसे सान कर अर्जुन ।
अंगांग जिस नरका मान । बनाये गये हैं ॥ ५२ ॥
आलसको पकड़ बैठता । निद्राका मानो घर ही बनता ।
पापसे जो सगा ही रहता । छूटे दुःखसे कैसे ॥ ५३ ॥
तन धनके मोहसे अर्जुन । नहीं छूटता भयका कारण ।
पत्थर न छोड़ता कडापन । उसी प्रकार ॥ ५४ ॥
पदार्थ जातमें आस रखता । इससे शोकका घर बनता ।
पापसे कभी छूट न सकता । कृतघ्न जैसे ॥ ५५ ॥
जीव-भावसे असंतोष । धरके रखा अहर्निश ।
इससे मैत्री है विशेष । विषादसे नित ॥ ५६ ॥
ल्हसुन छोडती नहीं दुर्गंधी । तथा कुपथ्यको न छोडती व्याधी ।
इसी भांति इसको मरणावधी । विषाद् न छूटता ॥ ५७ ॥
तथा तारुण्य वित्त काम । इससे बढ़ता संभ्रम ।
तमी है भयका आश्रम । बनता वह ॥ ५८ ॥
निद्रा भय न जो छोडे शोक खेद तथा मद ।
ओढती बुद्धिपे तंद्रा वह है धृति तामस ॥ ३५ ॥
७७७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
आगको न छोड़ता ताप । तथा वैरको नहीं सांप ।
विश्वका वैरी है वासिप । अखंडित ॥ ५९ ॥
अथवा शरीरको काल । न भूलता कभी निर्मल ।
वैसे ही तममें अचल । रहता मद ॥ ७६० ॥
ऐसे ये पांच निद्रादिक । तामसके रहते दोष ।
इसका आधार जो एक । धृति तामस ॥ ६१ ॥
कर्म बुद्धि तथा धृतिका संबंध—
कहलाती है ऐसी धृति । जानना तामस सुमति ।
ऐसा कहता विश्व-पति । धनुर्धरसे ॥ ६२ ॥
इस प्रकार त्रिविध बुद्धि । करती कर्म निश्चय आदि ।
धृति बनाती उसकी सिद्धि । तदनंतर ॥ ६३ ॥
सूर्यादिसे दीखता पथ । चलना होता पैरोंको नित ।
किंतु चलना धैर्यसे पार्थ । होता निरंतर ॥ ६४ ॥
वैसे बुद्धि कर्मको दिखाती । इंद्रियां उसको हैं करतीं ।
करनेमें जो अपेक्षा होती । धैर्यकी सदा ॥ ६५ ॥
तब यह सब तेरे प्रति । कहा है मैंने त्रिविध धृति ।
इससे होती कर्म निष्पत्ति । होने पर तब ॥ ६६ ॥
त्रिविध कर्मके फल उत्पन्न । होने पर उसे सुख कहते जान ।
वह भी त्रिविध होता अर्जुन । कर्म परसे ॥ ६७ ॥
फल रूप यह सुख । त्रिगुणसे भिदा देख ।
मीमांसा इसकी नेक । करूंगा शुद्ध ॥ ६८ ॥
किंतु शुद्ध है वह कैसे कहूंगा । कानोंसे ग्रहण करना चाहेगा ।
कान तथा हाथका मल लगेगा । इस शुद्धताको ॥ ६९ ॥
इससे करके तू अनादर । श्रवण होता है जो बाहर ।
सुन अंतःकरण देकर । जीवभावसे ॥ ७७० ॥
ज्ञानेश्वरी ७७८
ऐसे कह करके देव । त्रिविध सुखका प्रस्ताव ।
निरूपते हैं सावयव । इस प्रकारके ॥ ७१ ॥
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखांतं च निगच्छति ॥ ३६ ॥
तीन प्रकारके सुखका विवेचन—
कहूंगा सुखत्रय संज्ञा । ऐसी की है मैंने प्रतिज्ञा ।
कहता हूं सुन तू प्राज्ञ । इस समय ॥ ७२ ॥
जीव करता जब आत्मालिंगन । तब अनुभव करता अर्जुन ।
उस प्रकारका कराता मैं दर्शन । तुझको अब ॥ ७३ ॥
किंतु मात्राके नापसे जैसे । दिव्यौषधियां लेते हैं वैसे ।
या रांगेको रस भावनासे । बनाते हैं चांदी ॥ ७४ ॥
अथवा जैसे नूनका नीर । करना हो तो दो चार बार ।
देने पड़ते उसको मार । पानीके जैसे ॥ ७५ ॥
वैसे प्राप्त सुख लेशसे । जीवको भावना देनेसे ।
नासता है भावाभ्याससे । जीवका दुःख ॥ ७६ ॥
ऐसा जो आत्म-सुख । हुआ यहां त्रिगुणात्मक ।
वह भी कहता हूं देख । उसका रूप ॥ ७७ ॥
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥ ३७ ॥
सात्विक सुखका लक्षण—
जैसे चंदनकी जड़ । सर्पसे रहता अड़ ।
या निधानका किवाड । पिशाचके हाथमें ॥ ७८ ॥
कहता सुन तू पार्थ सुख तीन प्रकारके ।
अभ्याससे रमाता जो दिखाता अंत दुःखका ॥ ३६ ॥
आदि जो विषसा तीता अंतमें अमृतोपम ।
आत्मामें शुद्ध बुद्धीको मिलता सुख सात्विक ॥ ३७ ॥
७७९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
या स्वर्गके सुंदर भोग । रोक रखते हैं जो याग ।
अथवा दुःखके प्रसंग । बालत्वमें जैसे ॥ ७९ ॥
होनेमें जैसे दीपकी सिद्धि । कठिनाई घूमकी है आदि ।
अथवा होती है दिव्योोषधि । जीभको दुःखद ॥ ७८० ॥
इस प्रकार सुन अर्जुन । जिस सुखका उगम-स्थान ।
यम दम आदिके कारण । होता है विषम ॥ ८१ ॥
करना सभी स्नेहका दमन । वैराग्य उत्पन्न होता अर्जुन ।
स्वर्ग संसार सीमाका बंधन । रहता है दूर ॥ ८२ ॥
विवेक श्रवणका अति त्रास । तथा व्रताचरण है कर्कश ।
करते हैं बुद्धि आदिका नाश । रात्रिदिवस ॥ ८३ ॥
मुखसे सुषुम्नाके । ढेर प्राणायामके ।
पडते हैं ढेर ढेरके । निगलना तब ॥ ८४ ॥
जैसे चक्रवाकके विरहमें होता । या शिशुको स्तनसे छुडानेमें होता ।
भूखेको थालीसे उठानेमें जो होता । उससे अधिक दुःख ॥ ८५ ॥
माताके सामनेसे बालक । छीनता है काल जब एक ।
अथवा छूटता है उदक । मीनसे जब ॥ ८६ ॥
वैसे विषयोंका घर है पार्थ । तजनेमें इंद्रियोंको युगांत ।
होता तब धीर सहता नित । वैराग्यशाली ॥ ८७ ॥
ऐसे जिस सुखका प्रारंभ । दिखाता है काठिण्यका क्षोभ ।
फिर होता क्षीराब्धिमें लाभ । अमृतसा अंतमें ॥ ८८ ॥
प्रथम आया वैराग्यका गरल । उसको दिया धैर्य शंभुने गला ।
तभी होता ज्ञानामृतका निर्मल । महदानंद ॥ ८९ ॥
चुभता अगसे भी तीखा । कच्चापन हरे द्राक्षका ।
पक्तामें जैसे उसका । माधुर्य रहता ॥ ७९० ॥
इस वैराग्यादिका भी वैसा । सुपक्व आत्म-प्रकाशमें वैसा ।
वैराग्य सह होता हे नाशसा । अविद्याजातका ॥ ९१ ॥
तब जैसे गंगा सागरमें । बुद्धि विलीन होती आत्मामें ।
अद्वयानंदकी अपनेमें । खुलती खान ॥ ९२ ॥
ज्ञानेश्वरी ७८०