ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआगको न छोड़ता ताप । तथा वैरको नहीं सांप ।
विश्वका वैरी है वासिप । अखंडित ॥ ५९ ॥
अथवा शरीरको काल । न भूलता कभी निर्मल ।
वैसे ही तममें अचल । रहता मद ॥ ७६० ॥
ऐसे ये पांच निद्रादिक । तामसके रहते दोष ।
इसका आधार जो एक । धृति तामस ॥ ६१ ॥
कर्म बुद्धि तथा धृतिका संबंध—
कहलाती है ऐसी धृति । जानना तामस सुमति ।
ऐसा कहता विश्व-पति । धनुर्धरसे ॥ ६२ ॥
इस प्रकार त्रिविध बुद्धि । करती कर्म निश्चय आदि ।
धृति बनाती उसकी सिद्धि । तदनंतर ॥ ६३ ॥
सूर्यादिसे दीखता पथ । चलना होता पैरोंको नित ।
किंतु चलना धैर्यसे पार्थ । होता निरंतर ॥ ६४ ॥
वैसे बुद्धि कर्मको दिखाती । इंद्रियां उसको हैं करतीं ।
करनेमें जो अपेक्षा होती । धैर्यकी सदा ॥ ६५ ॥
तब यह सब तेरे प्रति । कहा है मैंने त्रिविध धृति ।
इससे होती कर्म निष्पत्ति । होने पर तब ॥ ६६ ॥
त्रिविध कर्मके फल उत्पन्न । होने पर उसे सुख कहते जान ।
वह भी त्रिविध होता अर्जुन । कर्म परसे ॥ ६७ ॥
फल रूप यह सुख । त्रिगुणसे भिदा देख ।
मीमांसा इसकी नेक । करूंगा शुद्ध ॥ ६८ ॥
किंतु शुद्ध है वह कैसे कहूंगा । कानोंसे ग्रहण करना चाहेगा ।
कान तथा हाथका मल लगेगा । इस शुद्धताको ॥ ६९ ॥
इससे करके तू अनादर । श्रवण होता है जो बाहर ।
सुन अंतःकरण देकर । जीवभावसे ॥ ७७० ॥
ज्ञानेश्वरी ७७८