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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 840

तथा आप कमाया हुवा धन । व्यय न करता कवडी जान ।
उस पर करता क्षण क्षण । निछावर जीव ॥ ५३ ॥
सावध रहता जैसा कृपण । बक रखता मीनपे नयन ।
वैसे देख वह पराया धन । रहता दक्ष ॥ ५४ ॥
पास जानेसे जो उलझाता । लगनेसे देह ही फाडता ।
फल मानो जीभको जलाता । खट्टा बेर ॥ ५५ ॥
वैसे वह जो काया वाचा मन । दुखाता रहता सबका मन ।
करनेमें वह स्वार्थ-साधन । न देखता परहित ॥ ५६ ॥
वैसे ही करनेमें जो कर्म । होता है यदि वह अक्षम ।
किंतु नहीं होता मनोधर्म । अरोचक उसका ॥ ५७ ॥
कनक फल सबाह्य जैसे । भरा रहता विष कांटोंसे ।
रहता वह दुर्बल वैसे । सदा शुचित्वमें ॥ ५८ ॥
जब वह कर्म फल पाता । फूलकर कुप्पा बन जाता ।
विश्वको अंगूठा भी दिखाता । चिढाकरके ॥ ५९ ॥
या कर्म होता जब निष्फल । शोकमें डूब जाता पाताल ।
तथा धिक्कारता है सकल । कर्म जात ॥ ६६० ॥
देख ऐसा कर्माचरण । जान तू काया वाचा मन ।
कर्ता है राजस अर्जुन । निःसंशय वह ॥ ६१ ॥
अब कहता धनुर्धर । जो है कुकर्मका आगर ।
होता है जो ऐसा गोचर । कर्ता तामस ॥ ६२ ॥
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८ ॥
स्वच्छंदी क्षुद्र गर्विष्ठ घातकी शठ आलसी ।
दीर्घ-सूत्री सदा खिन्न कर्ता तामस है कहा ॥ २८ ॥
ज्ञानेश्वरी ७६८