ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् ।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५ ॥
तामस कर्मका लक्षण—
वह जो तामस कर्म । निंदाका है काला धाम ।
निषिद्ध कर्मका जन्म । हुवा हो सफल ॥ ११ ॥
वह जब संपन्न होता । दृष्टिमें कुछ भी न आता ।
जैसे पानीपे लिया जाता । रेखा चित्र ॥ १२ ॥
किया हो जैसे छासका मंथन । अग्निके लिये राख फूकी मान ।
या कोल्हूमें रेती पेरी अर्जुन । उसी प्रकार ॥ १३ ॥
पवनपे भूसा धरना । तीरसे गगन छेदना ।
पवनको फांस डालना । बांधानेके लिये ॥ १४ ॥
जैसे यह सकल । नासता है निष्फल ।
वैसे होता सकल । तामस कर्म ॥ १५ ॥
वैसे नरदेहके समान । व्यय होता है व्यर्थ ही धन ।
नासता कार्यके साथ जान । विश्वका सुख ॥ १६ ॥
कमल वनपे कांटेका फांस । खींचनेसे होता जिसके नाश ।
तथा करना वनका विध्वंस । पांडु कुमार ॥ १७ ॥
जैसे अपना तन जलाता । लोगोंको अंधेरेमें डालता ।
द्वेषसे दीपपे झेंप लेता । जैसे पतंग ॥ १८ ॥
वैसे सर्वस्व हो व्यर्थ । देह पर हो आघात ।
तथा होते अन्य त्रस्त । जिस कार्यसे ॥ १९ ॥
माखी अपनेको निगलाती । दूसरोंको वमन कराती ।
स्मरण दिलाती ऐसी कृति । तामस कर्म ॥ ६२० ॥
विनाश व्यय निष्पत्ति सामर्थ्य भी न देखके ।
मोहसे जो किया जाता कर्म तामस जान तू ॥ २५ ॥
ज्ञानेश्वरी ७६४